देश की प्रतिष्ठित सिविल सेवा परीक्षा के उम्मीदवारों के लिए महत्वपूर्ण खबर सामने आई है। Union Public Service Commission (UPSC) ने सिविल सेवा परीक्षा 2025 (CSE 2025) के प्रीलिम्स, मेंस और फाइनल चरण की कट-ऑफ मार्क्स आधिकारिक तौर पर जारी कर दी है।
आयोग के अनुसार, अंतिम परिणाम में जनरल कैटेगरी का फाइनल कट-ऑफ 963 अंक रहा है। वहीं अन्य श्रेणियों में भी कट-ऑफ अलग-अलग तय किया गया है।
UPSC के अनुसार, प्रीलिम्स परीक्षा की कट-ऑफ केवल GS पेपर-1 के आधार पर तय की जाती है, जबकि GS पेपर-2 (CSAT) केवल क्वालिफाइंग होता है, जिसमें न्यूनतम 33 प्रतिशत अंक लाना अनिवार्य है।
प्रीलिम्स 2025 के लिए विभिन्न श्रेणियों की कट-ऑफ इस प्रकार है:
वहीं PwBD (दिव्यांग) श्रेणी के उम्मीदवारों के लिए कट-ऑफ 76.66 से 40.66 अंकों के बीच रही।
मेंस परीक्षा में इंटरव्यू के लिए क्वालिफाई करने की कट-ऑफ भी आयोग ने जारी की है।
अंतिम परिणाम में मेंस परीक्षा और पर्सनैलिटी टेस्ट (इंटरव्यू) के अंकों को मिलाकर फाइनल मेरिट तैयार की जाती है।
Union Public Service Commission ने बताया कि UPSC CSE 2025 में कुल 958 उम्मीदवारों को चयनित कर विभिन्न सेवाओं के लिए नियुक्ति की सिफारिश की गई है। इनमें प्रमुख सेवाएं IAS, IPS, IFS और अन्य केंद्रीय सेवाएं शामिल हैं।
परीक्षा का परिणाम 6 मार्च को घोषित किया गया था। आयोग ने यह भी बताया कि उम्मीदवारों के प्राप्तांक परिणाम घोषित होने के 15 दिनों के भीतर, यानी 20 मार्च तक, आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध करा दिए जाएंगे।
आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि दो या अधिक उम्मीदवारों के कुल अंक समान होते हैं, तो रैंक तय करने के लिए विशेष नियम लागू किए जाते हैं।
सबसे पहले निबंध (Essay), सामान्य अध्ययन के चारों पेपर (GS-1, GS-2, GS-3, GS-4) और पर्सनैलिटी टेस्ट में प्राप्त अंकों के आधार पर उच्च अंक पाने वाले उम्मीदवार को प्राथमिकता दी जाती है।
यदि इसके बाद भी अंक समान रहते हैं, तो केवल अनिवार्य लिखित पेपरों में अधिक अंक पाने वाले उम्मीदवार को ऊपर रखा जाता है। इसके बावजूद यदि बराबरी बनी रहती है, तो उम्र में वरिष्ठ उम्मीदवार को उच्च रैंक दी जाती है।
UPSC द्वारा कट-ऑफ जारी होने के बाद अब अभ्यर्थियों को परीक्षा की प्रतिस्पर्धा और चयन के स्तर का स्पष्ट अंदाजा मिल गया है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) बॉम्बे के शोधकर्ताओं ने एक अत्याधुनिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित सिस्टम विकसित किया है, जो बाढ़ संभावित क्षेत्रों की पहचान करने के साथ-साथ 30 मीटर रिजॉल्यूशन पर बाढ़ के पानी की गहराई का भी अनुमान लगा सकता है। यह तकनीक दक्षिण भारत के पश्चिमी घाट क्षेत्र में विकसित की गई है और भविष्य में देश के अन्य बाढ़ प्रभावित इलाकों में भी इसका उपयोग किया जा सकता है। 93% से ज्यादा सटीकता के साथ करता है बाढ़ का अनुमान शोधकर्ताओं के अनुसार, यह AI सिस्टम 93 प्रतिशत से अधिक सटीकता के साथ बाढ़ संभावित क्षेत्रों की पहचान करने में सक्षम है। यह मॉडल लगभग 55,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को कवर करता है, जो कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ जिले के तदरी से लेकर तमिलनाडु के कन्याकुमारी तक फैला हुआ है। इस तकनीक का उद्देश्य भारी बारिश के कारण आने वाली अचानक बाढ़ (Flash Flood) से होने वाले जान-माल के नुकसान को कम करना और समय रहते प्रशासन को सतर्क करना है। सिर्फ बारिश नहीं, कई कारकों का करता है विश्लेषण IIT बॉम्बे की रिसर्च टीम ने इस मॉडल में केवल वर्षा के आंकड़ों पर निर्भर रहने के बजाय कई अन्य कारकों को भी शामिल किया है। इनमें शामिल हैं: सतही जल प्रवाह (Surface Runoff) मिट्टी की नमी भूमि उपयोग (Land Use) जल अवशोषण क्षमता ड्रेनेज सिस्टम शोधकर्ताओं का कहना है कि सतही जल प्रवाह, केवल बारिश की मात्रा की तुलना में बाढ़ का अधिक विश्वसनीय संकेतक साबित हुआ। सैटेलाइट और AI का अनोखा संयोजन इस सिस्टम को तैयार करने के लिए यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) के Sentinel-1 Synthetic Aperture Radar (SAR) सैटेलाइट डेटा का उपयोग किया गया। यह रडार तकनीक घने मानसूनी बादलों के बीच भी पृथ्वी की स्पष्ट तस्वीरें लेने में सक्षम है। AI मॉडल ने बाढ़ से पहले और बाद की सैटेलाइट तस्वीरों का विश्लेषण कर पानी से भरे क्षेत्रों की पहचान करना सीखा और उसी आधार पर संभावित बाढ़ की गहराई का अनुमान लगाया। दो चरणों में करता है काम यह AI सिस्टम दो स्तरों पर कार्य करता है: पहले चरण में यह पहचानता है कि कौन-सा क्षेत्र बाढ़ की चपेट में आने की आशंका रखता है। दूसरे चरण में यह अनुमान लगाता है कि उस स्थान पर पानी कितनी गहराई तक भर सकता है। इससे प्रशासन को राहत एवं बचाव कार्यों की बेहतर योजना बनाने में मदद मिल सकती है। अस्पताल, सड़क और स्कूलों की सुरक्षा में होगी मदद 30 मीटर रिजॉल्यूशन वाले हाई-प्रिसिजन मैप्स की मदद से यह पता लगाया जा सकेगा कि बाढ़ के दौरान कौन-कौन से अस्पताल, स्कूल, सड़कें और अन्य महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे प्रभावित हो सकते हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह तकनीक विशेष रूप से केरल और कर्नाटक जैसे राज्यों में आपदा प्रबंधन और शहरी नियोजन के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकती है। भविष्य में मुंबई और पूर्वी तट तक होगा विस्तार फिलहाल यह मॉडल पश्चिमी घाट के कम ढलान (7% से कम) वाले क्षेत्रों के लिए विकसित किया गया है। हालांकि, शोधकर्ताओं का कहना है कि आवश्यक बदलाव और अतिरिक्त डेटा जोड़कर इसे मुंबई और भारत के पूर्वी तटीय क्षेत्रों जैसे जटिल इलाकों में भी लागू किया जा सकता है।
श्रीनगर, एजेंसियां। जम्मू-कश्मीर सरकार ने सरकारी स्कूलों की लाइब्रेरी में उपलब्ध कराई गई दो विवादित पुस्तकों में कथित रूप से अलगाववादी नेताओं और आतंकवादियों का महिमामंडन किए जाने के आरोपों के बाद बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने स्कूल शिक्षा विभाग के आठ अधिकारियों को निलंबित कर दिया है, एक संविदाकर्मी की सेवा समाप्त कर दी है और पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच के आदेश दिए हैं। साथ ही दोनों पुस्तकों को तत्काल प्रभाव से स्कूलों से वापस लेने का निर्देश भी जारी किया गया है। दो पुस्तकों पर उठे थे गंभीर सवाल विवाद उन दो पुस्तकों को लेकर खड़ा हुआ जिन्हें समग्र शिक्षा अभियान के तहत सरकारी स्कूलों की लाइब्रेरी में भेजा गया था। आरोप है कि इन पुस्तकों में कुछ अलगाववादी नेताओं और प्रतिबंधित संगठनों से जुड़े व्यक्तियों को सकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया था। मामला सामने आने के बाद सरकार ने पुस्तकों का वितरण तुरंत रोक दिया और उनकी समीक्षा शुरू कर दी। उच्चस्तरीय जांच के आदेश सरकार ने पूरे प्रकरण की विभागीय जांच शुरू कर दी है। जांच अधिकारी को 30 दिनों के भीतर रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए गए हैं। साथ ही विवादित पुस्तकों के लेखकों और प्रकाशकों को जम्मू-कश्मीर में भविष्य की शैक्षणिक प्रकाशन प्रक्रिया से ब्लैकलिस्ट करने का भी निर्णय लिया गया है। राजनीतिक प्रतिक्रिया तेज मामले के सामने आने के बाद विभिन्न राजनीतिक दलों ने शिक्षा व्यवस्था में ऐसी सामग्री शामिल होने पर सवाल उठाए। सरकार का कहना है कि स्कूलों में केवल तथ्यात्मक, संतुलित और राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप सामग्री ही उपलब्ध कराई जाएगी तथा जिम्मेदार पाए जाने वाले अधिकारियों के खिलाफ आगे भी कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
श्रीनगर, एजेंसियां। नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत के कई महीने बाद भी जम्मू में नौवीं कक्षा की एनसीईआरटी (NCERT) की सभी किताबें उपलब्ध नहीं हो सकी हैं। गर्मी की छुट्टियों के बाद स्कूल दोबारा खुल चुके हैं और पढ़ाई नियमित रूप से शुरू हो गई है, लेकिन सोशल स्टडीज और गणित की कुछ महत्वपूर्ण पुस्तकें अब भी बाजार से नदारद हैं। इससे छात्रों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है और अभिभावकों की चिंता बढ़ गई है। कुछ विषयों की किताबें उपलब्ध, लेकिन जरूरी पुस्तकें अब भी नहीं जम्मू शहर के विभिन्न बुक स्टोर्स पर पहले की तुलना में स्थिति में सुधार जरूर आया है। नौवीं कक्षा के अधिकांश विषयों की किताबें अब उपलब्ध हैं, लेकिन सोशल स्टडीज पार्ट-1, सोशल स्टडीज पार्ट-2 और मैथ्स पार्ट-2 की पुस्तकें अभी भी अधिकांश दुकानों पर नहीं मिल रही हैं। इन किताबों की कमी के कारण छात्रों को पढ़ाई में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। सिलेबस में बदलाव बना बड़ी वजह इस वर्ष एनसीईआरटी ने नौवीं कक्षा के लगभग सभी विषयों के पाठ्यक्रम में बदलाव किया है। नए सिलेबस के अनुरूप नई किताबें जारी की गईं, जिसके चलते अप्रैल और मई में अधिकांश विषयों की पुस्तकें बाजार में उपलब्ध नहीं थीं। हालांकि समय के साथ कई किताबों की आपूर्ति सामान्य हुई है, लेकिन कुछ प्रमुख विषयों की पुस्तकें अब भी पर्याप्त संख्या में नहीं पहुंच पाई हैं। खाली हाथ लौट रहे अभिभावक बुक स्टोर्स पर बड़ी संख्या में अभिभावक अपने बच्चों के लिए किताबें खरीदने पहुंच रहे हैं, लेकिन जरूरी किताबें उपलब्ध नहीं होने से उन्हें निराश होकर लौटना पड़ रहा है। कई दुकानदार अभिभावकों का नाम और मोबाइल नंबर दर्ज कर रहे हैं ताकि नई खेप आने पर उन्हें सूचना दी जा सके। शिक्षा सत्र आगे बढ़ने के साथ किताबों की कमी छात्रों की पढ़ाई पर असर डाल रही है। अभिभावकों का कहना है कि समय पर पुस्तकें उपलब्ध नहीं होने से बच्चों को नए सिलेबस के अनुसार पढ़ाई करने में परेशानी हो रही है। ऐसे में जल्द से जल्द सभी विषयों की किताबों की आपूर्ति सुनिश्चित किए जाने की मांग तेज हो गई है।