राज्यसभा में सवाल के जवाब में नितिन गडकरी ने बताया कि E20 फ्यूल को लेकर इंडियन ऑयल, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पेट्रोलियम, SIAM और ARAI समेत संबंधित संस्थानों की स्टडीज की गई हैं। इन अध्ययनों के मुताबिक E20 के इस्तेमाल से वाहनों की ड्राइविंग क्षमता, स्टार्ट होने की क्षमता और समग्र प्रदर्शन में कोई बड़ा असामान्य बदलाव सामने नहीं आया।
सरकार के मुताबिक BS-VI वाहनों को E20 के साथ टेस्ट करने पर वे निर्धारित उत्सर्जन मानकों को पूरा करते हैं और कार या दोपहिया वाहनों के इंजन में किसी बड़े बदलाव की जरूरत नहीं पाई गई।
सबसे महत्वपूर्ण बात पुराने BS-III वाहनों को लेकर सामने आई है। गडकरी के मुताबिक 2005 से 2016 के बीच बने कुछ BS-III वाहनों में E20 पेट्रोल के इस्तेमाल के दौरान कुछ रबर पार्ट्स और गैस्केट बदलने की जरूरत पड़ सकती है।
इसका मतलब यह नहीं है कि E20 इस्तेमाल करते ही हर पुरानी गाड़ी का इंजन खराब हो जाएगा। चिंता मुख्य रूप से उन कंपोनेंट्स को लेकर है जो लंबे समय तक ईंधन के संपर्क में रहते हैं। इनमें रबर आधारित सील, गैस्केट और अन्य फ्यूल-सिस्टम पार्ट्स शामिल हो सकते हैं।
E20 को लेकर पहले सामने आई ARAI की एक रिपोर्ट में भी E10-कंपैटिबल वाहनों के फ्यूल सिस्टम में इस्तेमाल होने वाले कुछ रबर कंपोनेंट्स के लंबे समय तक E20 के संपर्क में रहने पर खराब होने की संभावना जताई गई थी। रिपोर्ट के अनुसार होज, गैस्केट, सील और O-rings जैसे पार्ट्स को समय के साथ बदलने की जरूरत पड़ सकती है।
हालांकि, उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक इस अध्ययन में धातु के कंपोनेंट्स पर E20 का कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पाया गया था।
E20 पेट्रोल को लेकर वाहन मालिकों की सबसे बड़ी शिकायतों में माइलेज कम होना भी शामिल है। सरकार ने हालांकि माइलेज में बदलाव को केवल E20 से जोड़ने से बचते हुए कई दूसरे कारणों का भी उल्लेख किया है।
ड्राइविंग स्टाइल, वाहन का रखरखाव, इंजन ऑयल और एयर फिल्टर की स्थिति, टायर प्रेशर, व्हील अलाइनमेंट और AC के इस्तेमाल जैसी चीजें भी ईंधन दक्षता को प्रभावित कर सकती हैं।
इसलिए किसी वाहन का माइलेज कम होने पर केवल पेट्रोल के ब्लेंड को जिम्मेदार मानने के बजाय वाहन की पूरी स्थिति की जांच करना जरूरी है।
E20 के मामले में सबसे अहम अंतर वाहन की उम्र और उसकी फ्यूल-कंपैटिबिलिटी का है। नई पीढ़ी के E20-कंपैटिबल वाहनों को इस तरह के ईंधन के अनुरूप डिजाइन किया गया है, जबकि पुराने वाहनों में इस्तेमाल सामग्री और फ्यूल सिस्टम अलग हो सकते हैं।
इसी वजह से पुराने BS-III या E10-कंपैटिबल वाहन मालिकों को अपने वाहन के फ्यूल सिस्टम के रबर पार्ट्स, सील और गैस्केट की स्थिति पर नजर रखनी चाहिए।
E20 पेट्रोल को बढ़ावा देने के पीछे सरकार की बड़ी वजह पेट्रोल में घरेलू एथेनॉल का इस्तेमाल बढ़ाना, कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करना और उत्सर्जन से जुड़े लक्ष्यों को आगे बढ़ाना है। सरकार ने हाल में भी E20 की सुरक्षा और प्रदर्शन को लेकर वैज्ञानिक परीक्षणों का हवाला दिया है।
लेकिन पुराने वाहनों के रबर कंपोनेंट्स को लेकर सामने आई चिंता ने बहस को एक नया आयाम दे दिया है। अब सवाल सिर्फ इंजन की परफॉर्मेंस या माइलेज का नहीं, बल्कि लंबे समय तक इस्तेमाल के दौरान फ्यूल-सिस्टम पार्ट्स की टिकाऊ क्षमता का भी है।
इसलिए वाहन मालिकों के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि वे अपनी गाड़ी की मैन्युफैक्चरिंग ईयर, BS नॉर्म्स और निर्माता की E20-कंपैटिबिलिटी जानकारी को ध्यान में रखें। किसी भी तरह की खराबी या फ्यूल सिस्टम में असामान्य लक्षण दिखने पर अधिकृत सर्विस सेंटर से जांच कराना बेहतर होगा।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
कमर्शियल व्हीकल कारोबार को मजबूत करने की रणनीति मुंबई, एजेंसियां। महिंद्रा एंड महिंद्रा (M&M) ने अपने ट्रक और बस कारोबार को अपनी सूचीबद्ध सहायक कंपनी SML Mahindra में स्थानांतरित करने का फैसला किया है। इस सौदे के तहत महिंद्रा का Mahindra Truck and Bus Division (MTBD) लगभग ₹525 करोड़ में SML Mahindra को हस्तांतरित किया जाएगा। इस कदम का उद्देश्य पूरे कमर्शियल व्हीकल (CV) कारोबार को एक ही कंपनी के तहत लाकर संचालन को अधिक कुशल और प्रतिस्पर्धी बनाना है। FY27 तक पूरी होगी प्रक्रिया कंपनी के अनुसार, यह लेनदेन FY27 (वित्त वर्ष 2026-27) के दौरान पूरा होने की उम्मीद है। महिंद्रा ने 2025 में SML Isuzu में नियंत्रक हिस्सेदारी खरीदने के बाद कंपनी का नाम बदलकर SML Mahindra कर दिया था। अब दोनों कारोबारों के एकीकरण के साथ कंपनी कमर्शियल वाहन बाजार में अपनी स्थिति और मजबूत करना चाहती है। चौथी सबसे बड़ी CV कंपनी बनने का लक्ष्य महिंद्रा का लक्ष्य इस एकीकरण के बाद भारतीय कमर्शियल व्हीकल बाजार में चौथा सबसे बड़ा खिलाड़ी बनना है। कंपनी ने वित्त वर्ष 2030-31 तक हेवी कमर्शियल व्हीकल (HCV) बाजार में 10–12% हिस्सेदारी और FY36 तक 20% से अधिक बाजार हिस्सेदारी हासिल करने का लक्ष्य रखा है। ग्राहकों और डीलर नेटवर्क को मिलेगा फायदा महिंद्रा का कहना है कि दोनों कारोबारों के एकीकरण से उत्पाद विकास, निर्माण, बिक्री और सर्विस नेटवर्क को एक मंच पर लाया जा सकेगा। इससे ग्राहकों को बेहतर उत्पाद और सेवाएं मिलने के साथ-साथ कंपनी की परिचालन क्षमता और बाजार प्रतिस्पर्धा भी बढ़ेगी।
मुंबई: शेयर बाजार में मल्टीबैगर रिटर्न देने वाले स्टॉक्स हमेशा निवेशकों का ध्यान खींचते हैं। ऐसा ही एक नाम Magnus Steel and Infra Ltd. (BSE: 517320) है, जिसके शेयर ने एक साल से भी कम अवधि में जबरदस्त तेजी दिखाई है। कंपनी के हालिया तिमाही नतीजों के बाद शेयर में लगातार अपर सर्किट देखने को मिला है। हालांकि, तेज रिटर्न की यह कहानी जितनी आकर्षक है, इसमें जोखिम भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यह एक माइक्रो-कैप शेयर है और इसके भाव में हाल के महीनों में काफी उतार-चढ़ाव भी देखा गया है। इसलिए सिर्फ पुराने रिटर्न के आधार पर निवेश का फैसला करना उचित नहीं होगा। Q1 नतीजों में दिखी तेज ग्रोथ Magnus Steel and Infra के बोर्ड ने 22 जुलाई को वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही यानी जून 2026 को समाप्त तिमाही के अनऑडिटेड स्टैंडअलोन नतीजे जारी किए। कंपनी का ऑपरेशन से रेवेन्यू Q1 FY27 में ₹7.30 करोड़ रहा, जबकि एक साल पहले इसी अवधि में यह ₹1.95 करोड़ था। यानी सालाना आधार पर रेवेन्यू में करीब 274% की बढ़ोतरी हुई। मुनाफे के मोर्चे पर भी कंपनी ने मजबूत प्रदर्शन किया। जून तिमाही में प्री-टैक्स प्रॉफिट करीब ₹2.41 करोड़ रहा, जो पिछले साल की समान तिमाही में ₹0.41 करोड़ था। यानी इसमें करीब 490% की सालाना वृद्धि दर्ज हुई। नतीजों के बाद शेयर में अपर सर्किट मजबूत तिमाही प्रदर्शन के बाद Magnus Steel and Infra के शेयर में निवेशकों की दिलचस्पी बढ़ी। हालिया कारोबारी सत्रों में शेयर कई बार 5% के अपर सर्किट तक पहुंचा है। उपलब्ध बाजार आंकड़ों में भी Q1 नतीजों के बाद 5% अपर सर्किट दर्ज किया गया था। इस तरह की तेजी में यह समझना जरूरी है कि अपर सर्किट का मतलब केवल मजबूत मांग है, यह भविष्य में शेयर के बढ़ने की गारंटी नहीं देता। 1100% से ज्यादा रिटर्न का दावा रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक 8 सितंबर 2025 को शेयर की कीमत ₹5.14 थी, जो 30 जुलाई 2026 को ₹66.40 तक पहुंच गई। इस आधार पर शेयर में करीब 1191% का रिटर्न बनता है। लेकिन इस तेजी के बीच शेयर में बड़ी अस्थिरता भी रही है। बाजार आंकड़ों से पता चलता है कि स्टॉक ने हाल के महीनों में कई बार 5% की दैनिक चाल देखी है और इसका 52-सप्ताह का दायरा भी काफी व्यापक रहा है। यानी जिसने निचले स्तरों पर निवेश किया, उसके लिए रिटर्न शानदार रहा हो सकता है, लेकिन मौजूदा स्तर पर प्रवेश करने वाले निवेशक के लिए जोखिम का आकलन अलग होगा। कंपनी के कारोबार में भी हुआ बदलाव Magnus Steel and Infra ने हाल के वर्षों में अपने कारोबार में बदलाव किया है। कंपनी पहले Magnus Retail के नाम से जानी जाती थी और मई 2025 में इसका नाम बदलकर Magnus Steel and Infra किया गया। कंपनी अब स्टील और इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े कारोबार पर फोकस कर रही है। वित्त वर्ष 2026 में भी कंपनी के राजस्व में काफी तेज वृद्धि दर्ज की गई थी। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार FY26 में ऑपरेटिंग रेवेन्यू करीब ₹225.8 मिलियन रहा, जबकि FY25 में यह करीब ₹31.88 मिलियन था। निवेशकों को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? Magnus Steel and Infra के तिमाही नतीजों में ग्रोथ जरूर नजर आ रही है, लेकिन शेयर बाजार में किसी भी स्टॉक के पिछले रिटर्न को भविष्य के प्रदर्शन की गारंटी नहीं माना जा सकता। खासकर माइक्रो-कैप शेयरों में कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव, सीमित लिक्विडिटी और अचानक गिरावट का जोखिम ज्यादा हो सकता है। इसलिए निवेश से पहले कंपनी के कारोबार, कर्ज, कैश फ्लो, प्रमोटर होल्डिंग, वैल्यूएशन, ट्रेडिंग वॉल्यूम और आने वाली तिमाहियों के नतीजों का विश्लेषण करना जरूरी है।
वैश्विक संकेतों के बीच निवेशकों ने बरती सतर्कता मुंबई, एजेंसियां। अमेरिकी फेडरल रिजर्व के ब्याज दरों पर फैसले के बाद गुरुवार को भारतीय शेयर बाजार की शुरुआत सुस्त रही। कारोबार के शुरुआती सत्र में सेंसेक्स और निफ्टी लगभग सपाट स्तर पर कारोबार करते दिखे। हालांकि, आईटी शेयरों में अच्छी खरीदारी के चलते बाजार को सहारा मिला और प्रमुख सूचकांक गिरावट से बच गए। फेड के फैसले का दिखा असर बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, फेडरल रिजर्व के ताजा नीति निर्णय और उसके भविष्य के संकेतों को लेकर निवेशकों ने सतर्क रुख अपनाया। वैश्विक बाजारों से मिले मिले-जुले संकेतों का असर घरेलू बाजार पर भी देखने को मिला, जिसके कारण शुरुआती कारोबार में उतार-चढ़ाव बना रहा। आईटी सेक्टर बना बाजार का सहारा सुबह के कारोबार में आईटी कंपनियों के शेयरों में सबसे ज्यादा खरीदारी देखने को मिली। इस तेजी ने बैंकिंग और वित्तीय शेयरों में हल्की कमजोरी की भरपाई की। टीसीएस, इंफोसिस, एचसीएल टेक और टेक महिंद्रा जैसे प्रमुख शेयरों में मजबूती दर्ज की गई। निवेशकों की नजर अहम आंकड़ों पर बाजार की चाल अब कंपनियों के तिमाही नतीजों, विदेशी संस्थागत निवेशकों की गतिविधियों और वैश्विक आर्थिक संकेतों पर निर्भर रहेगी। विश्लेषकों का मानना है कि यदि कॉर्पोरेट आय अनुमान के अनुरूप रहती है, तो बाजार में आगे भी सकारात्मक रुख देखने को मिल सकता है।