गर्मियों में ज्यादातर लोग ठंडी कॉफी या आइस्ड कॉफी पीना पसंद करते हैं। तेज गर्मी में बर्फ से भरा कॉफी का गिलास राहत देने वाला लगता है, लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि गर्म मौसम में भी गर्म कॉफी शरीर के लिए ज्यादा फायदेमंद हो सकती है।
पोषण विशेषज्ञों और डॉक्टरों के मुताबिक, गर्म कॉफी पाचन को बेहतर बनाने, शरीर के तापमान को संतुलित रखने और ऊर्जा को स्थिर बनाए रखने में मदद कर सकती है। वहीं जरूरत से ज्यादा आइस्ड कॉफी शरीर में डिहाइड्रेशन, बेचैनी और अत्यधिक कैफीन सेवन जैसी समस्याएं बढ़ा सकती है।
मुंबई की गट हेल्थ न्यूट्रिशनिस्ट पायल कोठारी के अनुसार, गर्म कॉफी शरीर के प्राकृतिक पाचन तंत्र के साथ बेहतर तालमेल बनाती है। गर्म पेय पदार्थ पाचन क्रिया को सक्रिय रखते हैं और रक्त संचार को बेहतर बनाने में मदद करते हैं।
इसके विपरीत, बहुत ठंडी कॉफी कुछ लोगों में पाचन को धीमा कर सकती है। खासकर जिन लोगों को पेट फूलना, गैस या संवेदनशील पाचन की समस्या होती है, उनके लिए आइस्ड कॉफी परेशानी बढ़ा सकती है।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि गर्म कॉफी धीरे-धीरे पी जाती है, जबकि आइस्ड कॉफी को लोग तेजी से खत्म कर देते हैं। इससे शरीर में कैफीन की मात्रा अचानक बढ़ सकती है।
इंटीग्रेटिव लाइफस्टाइल विशेषज्ञ ल्यूक कोटिन्हो के मुताबिक, कोल्ड ब्रू कॉफी को लंबे समय तक तैयार किया जाता है, जिसके कारण उसमें कैफीन की मात्रा अधिक हो सकती है।
चूंकि इसका स्वाद कम कड़वा और ज्यादा स्मूद होता है, लोग बिना महसूस किए ज्यादा मात्रा में इसे पी लेते हैं। इससे चिंता, घबराहट, एसिडिटी, नींद की समस्या और डिहाइड्रेशन जैसी दिक्कतें बढ़ सकती हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि गर्म कॉफी शरीर को अधिक संतुलित और धीरे-धीरे ऊर्जा देती है। इससे शरीर को अचानक झटका महसूस नहीं होता।
यह सुनने में अजीब लग सकता है, लेकिन डॉक्टरों के अनुसार गर्म पेय पदार्थ शरीर को ठंडा करने में भी मदद कर सकते हैं।
मुंबई के न्यूरोलॉजिस्ट डॉक्टर प्रशांत माखीजा बताते हैं कि जब हम गर्म पेय पीते हैं तो शरीर की रक्त वाहिकाएं फैलती हैं। इससे शरीर की गर्मी त्वचा के जरिए बाहर निकलने लगती है।
वहीं न्यूट्रिशनिस्ट नमामी अग्रवाल के मुताबिक, गर्म पेय हल्का पसीना लाने में मदद करते हैं। जब पसीना सूखता है, तो शरीर को प्राकृतिक रूप से ठंडक मिलती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि आइस्ड कॉफी पूरी तरह नुकसानदायक नहीं है। समस्या तब बढ़ती है जब इसमें अत्यधिक चीनी, फ्लेवर्ड सिरप, व्हिप्ड क्रीम और कृत्रिम स्वीटनर मिलाए जाते हैं।
साधारण और सीमित मात्रा में पी गई आइस्ड कॉफी संतुलित जीवनशैली का हिस्सा हो सकती है। हालांकि लगातार इसे पानी की तरह पीना शरीर के लिए ठीक नहीं माना जाता।
विशेषज्ञों के अनुसार कॉफी खाली पेट पीने से बचना चाहिए। सुबह नाश्ते के बाद या मध्य सुबह कॉफी पीना बेहतर माना जाता है। इससे एसिडिटी और कोर्टिसोल बढ़ने की संभावना कम हो सकती है।
साथ ही पूरे दिन पर्याप्त पानी पीना भी जरूरी है, ताकि शरीर में डिहाइड्रेशन न हो।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि कॉफी छोड़ने की जरूरत नहीं है, बल्कि इसे सही तरीके और सीमित मात्रा में पीना अधिक जरूरी है। गर्मियों में भी गर्म कॉफी कई लोगों के लिए शरीर को बेहतर महसूस कराने में मदद कर सकती है, बशर्ते कैफीन का सेवन संतुलित रखा जाए।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। विश्व हेपेटाइटिस दिवस के मौके पर स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने लोगों को इस गंभीर बीमारी को लेकर जागरूक रहने की अपील की है। विशेषज्ञों के अनुसार हेपेटाइटिस से संक्रमित बड़ी संख्या में लोगों को लंबे समय तक अपनी बीमारी का पता नहीं चलता। यही वजह है कि कई मामलों में संक्रमण बढ़ने के बाद ही बीमारी की पहचान हो पाती है और तब तक लिवर को काफी नुकसान पहुंच चुका होता है। हेपेटाइटिस एक ऐसी बीमारी है जिसमें लिवर में सूजन हो जाती है। यह मुख्य रूप से वायरस के संक्रमण के कारण होती है। हेपेटाइटिस के कई प्रकार होते हैं, जिनमें हेपेटाइटिस ए, बी, सी, डी और ई शामिल हैं। इनमें हेपेटाइटिस बी और सी को सबसे ज्यादा गंभीर माना जाता है क्योंकि ये लंबे समय तक शरीर में रहकर लिवर को धीरे-धीरे नुकसान पहुंचा सकते हैं। बड़ी संख्या में लोग संक्रमण से अनजान स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि हेपेटाइटिस की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इसके शुरुआती लक्षण अक्सर दिखाई नहीं देते। संक्रमित व्यक्ति सामान्य जीवन जीता रहता है, लेकिन उसके शरीर में वायरस सक्रिय रहता है। इस कारण बहुत से लोगों को वर्षों तक यह जानकारी नहीं हो पाती कि वे हेपेटाइटिस से संक्रमित हैं। विशेषज्ञों के अनुसार समय पर जांच नहीं होने के कारण कई मरीजों में बीमारी आगे बढ़ जाती है और लिवर सिरोसिस, लिवर फेलियर या लिवर कैंसर जैसी गंभीर समस्याएं पैदा हो सकती हैं। इसलिए जिन लोगों में संक्रमण का खतरा अधिक है, उनके लिए नियमित जांच बेहद जरूरी मानी जाती है। कैसे फैलता है हेपेटाइटिस संक्रमण हेपेटाइटिस वायरस अलग-अलग माध्यमों से फैल सकता है। संक्रमित खून के संपर्क में आने, असुरक्षित इंजेक्शन के इस्तेमाल, संक्रमित मेडिकल उपकरणों और कुछ मामलों में संक्रमित मां से बच्चे तक संक्रमण पहुंच सकता है। हेपेटाइटिस बी और सी से बचाव के लिए सुरक्षित स्वास्थ्य आदतों को अपनाना जरूरी है। इसके अलावा हेपेटाइटिस बी से बचाव के लिए वैक्सीन भी उपलब्ध है, जो संक्रमण के खतरे को कम करने में मदद करती है। समय पर इलाज से बच सकती है गंभीर स्थिति स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार हेपेटाइटिस की पहचान अगर शुरुआती चरण में हो जाए तो इसे नियंत्रित किया जा सकता है। हेपेटाइटिस सी का इलाज आधुनिक दवाओं से संभव है, जबकि हेपेटाइटिस बी के मरीजों को नियमित निगरानी और उचित उपचार की जरूरत होती है। लोगों को सलाह दी जाती है कि लगातार थकान, पेट में दर्द, भूख कम लगना, त्वचा और आंखों का पीला पड़ना जैसे लक्षण दिखाई देने पर डॉक्टर से सलाह लें। हालांकि कई बार बिना लक्षण के भी संक्रमण मौजूद हो सकता है, इसलिए जोखिम वाले लोगों को जांच जरूर करानी चाहिए। जागरूकता बढ़ाना है विश्व हेपेटाइटिस दिवस का उद्देश्य हर साल 28 जुलाई को विश्व हेपेटाइटिस दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य लोगों को हेपेटाइटिस के कारण, बचाव और इलाज के बारे में जागरूक करना है। स्वास्थ्य संगठनों का मानना है कि जागरूकता, समय पर जांच, टीकाकरण और बेहतर इलाज के जरिए हेपेटाइटिस से होने वाली मौतों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
Nerve Compression Symptoms: अगर आपकी कमर से शुरू होकर दर्द कूल्हों, जांघ, पिंडली या पैरों तक पहुंचता है और इसके साथ झनझनाहट, सुन्नपन या कमजोरी महसूस होती है, तो इसे सामान्य कमर दर्द या मांसपेशियों का खिंचाव समझकर नजरअंदाज न करें। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे लक्षण कई बार नस दबने (Nerve Compression) या साइटिका (Sciatica) जैसी समस्या का संकेत हो सकते हैं। समय पर जांच और सही इलाज न मिलने पर नस को स्थायी नुकसान भी पहुंच सकता है। आजकल लंबे समय तक बैठकर काम करना, गलत पॉश्चर, भारी वजन उठाना और बढ़ती उम्र के कारण रीढ़ से जुड़ी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि सामान्य मांसपेशियों के दर्द और नस के दर्द में क्या अंतर होता है। नस दबने की समस्या क्या होती है? विशेषज्ञों के अनुसार जब रीढ़ की हड्डी के आसपास मौजूद डिस्क, हड्डी, लिगामेंट या अन्य टिशू किसी नस पर दबाव डालने लगते हैं, तो उसे नस दबना या Nerve Compression कहा जाता है। इससे नस मस्तिष्क और शरीर के बीच सामान्य रूप से संदेश नहीं पहुंचा पाती, जिसके कारण दर्द, झनझनाहट, सुन्नपन और कमजोरी जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। किन लक्षणों को बिल्कुल नजरअंदाज न करें? यदि आपको इनमें से कोई भी लक्षण दिखाई दे रहे हैं, तो डॉक्टर से जांच कराना जरूरी हो सकता है— कमर से शुरू होकर पैरों तक फैलने वाला तेज दर्द बिजली के झटके जैसा दर्द या झनझनाहट पैरों में सुन्नपन या जलन चलने या लंबे समय तक खड़े रहने में परेशानी पैरों में कमजोरी महसूस होना आराम करने के बाद भी दर्द का बने रहना नस के दर्द और मांसपेशियों के दर्द में अंतर नस दबने के दर्द के संकेत दर्द कमर से पैरों तक फैलता है। झनझनाहट और सुन्नपन महसूस होता है। बिजली के झटके जैसा दर्द हो सकता है। जलन और कमजोरी महसूस हो सकती है। आराम करने पर भी दर्द पूरी तरह कम नहीं होता। मांसपेशियों के दर्द के संकेत दर्द एक सीमित हिस्से में रहता है। दबाने पर दर्द बढ़ सकता है। झनझनाहट या सुन्नपन नहीं होता। आराम करने और हल्की स्ट्रेचिंग से धीरे-धीरे राहत मिलती है। नस दबने के सामान्य कारण स्लिप डिस्क (Slip Disc): रीढ़ की डिस्क बाहर निकलकर नस पर दबाव डाल सकती है। साइटिका (Sciatica): साइटिक नस दबने पर दर्द कमर से पैरों तक फैल सकता है। स्पाइनल स्टेनोसिस: उम्र बढ़ने के साथ रीढ़ की नलिका संकरी होने से नसों पर दबाव बढ़ सकता है। बोन स्पर: हड्डियों की अतिरिक्त वृद्धि नसों को दबा सकती है। चोट या दुर्घटना: गिरने या किसी चोट के कारण नस पर दबाव पड़ सकता है। डॉक्टर कैसे करते हैं पहचान? नस दबने की पुष्टि के लिए डॉक्टर सबसे पहले मरीज के लक्षण, मेडिकल हिस्ट्री और शारीरिक जांच करते हैं। जरूरत पड़ने पर निम्न जांच कराई जा सकती हैं— MRI Scan CT Scan X-ray Electromyography (EMG) Neurological Examination बचाव के लिए अपनाएं ये आसान उपाय लंबे समय तक एक ही स्थिति में बैठने से बचें। सही पॉश्चर में बैठें और काम करें। नियमित रूप से हल्की एक्सरसाइज करें। भारी वजन सही तकनीक से उठाएं। शरीर का वजन नियंत्रित रखें। पर्याप्त नींद लें और तनाव कम करें। योग और स्ट्रेचिंग से मिल सकती है मदद रीढ़ की सेहत बेहतर रखने और मांसपेशियों को मजबूत बनाने के लिए विशेषज्ञों की सलाह से भुजंगासन, मकरासन, मार्जरी-व्याघ्रासन (Cat-Cow Pose), ताड़ासन और बालासन जैसे योगासन किए जा सकते हैं। इसके अलावा अनुलोम-विलोम और भ्रामरी प्राणायाम तनाव कम करने और शरीर को रिलैक्स रखने में मदद कर सकते हैं। यदि दर्द तेज हो तो बिना विशेषज्ञ की सलाह के कोई भी व्यायाम न करें। हेल्दी डाइट भी है जरूरी नसों और हड्डियों को स्वस्थ रखने के लिए संतुलित आहार लेना भी बेहद जरूरी है। अपनी डाइट में विटामिन B12, विटामिन D, कैल्शियम, मैग्नीशियम, ओमेगा-3 फैटी एसिड, हरी पत्तेदार सब्जियां, दूध, दही, अंडे, दालें, मेवे और मौसमी फल शामिल करें। पर्याप्त पानी पीना भी शरीर की रिकवरी में मदद करता है। कब तुरंत डॉक्टर से मिलें? अगर दर्द लगातार बढ़ रहा हो, पैरों में कमजोरी आ रही हो, चलने में कठिनाई हो, पेशाब या मल पर नियंत्रण कम हो जाए या सुन्नपन लगातार बना रहे, तो तुरंत ऑर्थोपेडिक, स्पाइन विशेषज्ञ या न्यूरोलॉजिस्ट से संपर्क करें। ध्यान रखें: कमर से पैरों तक फैलने वाला दर्द हर बार सामान्य नहीं होता। समय पर जांच, संतुलित आहार, नियमित योग, सही पॉश्चर और उचित इलाज से नस दबने की समस्या को गंभीर होने से काफी हद तक रोका जा सकता है।
कमर दर्द आज के समय में सबसे आम स्वास्थ्य समस्याओं में से एक बन चुका है। हालांकि हर कमर दर्द गंभीर नहीं होता, लेकिन यदि दर्द कमर से शुरू होकर कूल्हों, जांघों और पैरों तक फैलने लगे, साथ ही झनझनाहट, सुन्नपन या कमजोरी महसूस हो, तो इसे सामान्य मांसपेशियों का खिंचाव समझकर नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे लक्षण नस दबने (Nerve Compression) या साइटिका (Sciatica) जैसी समस्या की ओर इशारा कर सकते हैं, जिसका समय रहते इलाज न होने पर नस को स्थायी नुकसान भी पहुंच सकता है। नस दबने पर कैसा महसूस होता है दर्द? कई लोगों को चलते, खड़े होने या लंबे समय तक बैठने के दौरान कमर से शुरू होकर पैरों तक जाने वाला तेज दर्द महसूस होता है। यह दर्द अक्सर बिजली के झटके जैसा, चुभने वाला या जलन पैदा करने वाला होता है। इसके साथ पैरों में झनझनाहट, सुन्नपन या कमजोरी भी महसूस हो सकती है। यही वजह है कि विशेषज्ञ ऐसे लक्षणों को गंभीरता से लेने की सलाह देते हैं। रीढ़ की हड्डी के आसपास मौजूद डिस्क, हड्डी, लिगामेंट या अन्य ऊतक जब किसी नस पर दबाव डालने लगते हैं, तब नस सामान्य रूप से मस्तिष्क और शरीर के बीच संदेश नहीं पहुंचा पाती। इसी कारण दर्द और अन्य न्यूरोलॉजिकल लक्षण दिखाई देने लगते हैं। नस दबना क्या होता है? नस दबना एक ऐसी स्थिति है जिसमें शरीर की किसी नस पर आसपास के ऊतकों का अतिरिक्त दबाव पड़ता है। यह समस्या सबसे अधिक रीढ़ की हड्डी में देखने को मिलती है। लगातार दबाव बने रहने से नस की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है और समय पर इलाज न मिलने पर स्थायी क्षति का खतरा भी बढ़ जाता है। नस के दर्द और मांसपेशियों के दर्द में अंतर दोनों तरह के दर्द के लक्षण अलग-अलग होते हैं। इन्हें पहचानना जरूरी है। नस दबने का दर्द मांसपेशियों का दर्द दर्द कमर से पैर तक फैलता है दर्द एक ही हिस्से तक सीमित रहता है बिजली के झटके या झनझनाहट जैसा महसूस होता है दबाने पर दर्द बढ़ता है सुन्नपन और जलन हो सकती है सुन्नपन या झनझनाहट नहीं होती पैर में कमजोरी महसूस हो सकती है कमजोरी कम देखने को मिलती है आराम करने पर भी दर्द बना रह सकता है आराम करने से धीरे-धीरे राहत मिलती है नस दबने के प्रमुख कारण 1. स्लिप डिस्क रीढ़ की डिस्क अपनी जगह से खिसककर नस पर दबाव डाल सकती है। यह नस दबने के सबसे आम कारणों में से एक है। 2. साइटिका साइटिक नर्व शरीर की सबसे लंबी नस होती है। इसके दबने पर दर्द कमर से शुरू होकर पूरे पैर तक फैल सकता है। 3. स्पाइनल स्टेनोसिस उम्र बढ़ने के साथ रीढ़ की नलिका संकरी होने लगती है, जिससे नसों पर दबाव बढ़ जाता है। इससे चलने में दर्द, पैरों में भारीपन और कमजोरी महसूस हो सकती है। 4. बोन स्पर हड्डियों के अतिरिक्त उभार (Bone Spurs) आसपास की नसों पर दबाव डाल सकते हैं, जिससे दर्द और नस संबंधी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। 5. चोट या दुर्घटना गिरने, दुर्घटना या किसी गंभीर चोट के कारण नस खिंच सकती है, दब सकती है या उसके आसपास सूजन आ सकती है, जिससे नस पर दबाव बढ़ जाता है। डॉक्टर कैसे करते हैं नस दबने की जांच? यदि मरीज में नस दबने के लक्षण दिखाई देते हैं, तो डॉक्टर सबसे पहले उसकी मेडिकल हिस्ट्री और लक्षणों के बारे में जानकारी लेते हैं। इसके बाद शारीरिक और न्यूरोलॉजिकल परीक्षण किया जाता है। जरूरत पड़ने पर निम्न जांच कराई जा सकती हैं: एमआरआई (MRI) सीटी स्कैन (CT Scan) एक्स-रे इलेक्ट्रोमायोग्राफी (EMG) इन जांचों के जरिए यह पता लगाया जाता है कि नस पर दबाव किस कारण से पड़ रहा है और उसकी गंभीरता कितनी है। किन लक्षणों को बिल्कुल नजरअंदाज न करें? यदि आपको निम्न में से कोई भी लक्षण महसूस हो रहा है, तो जल्द से जल्द ऑर्थोपेडिक, न्यूरोलॉजिस्ट या स्पाइन विशेषज्ञ से सलाह लें। कमर से पैर तक फैलने वाला तेज दर्द पैरों में लगातार झनझनाहट सुन्नपन या संवेदना कम होना पैर में कमजोरी चलने या संतुलन बनाने में कठिनाई आराम करने के बाद भी दर्द कम न होना समय पर इलाज है सबसे जरूरी विशेषज्ञों का कहना है कि कमर से पैरों तक फैलने वाला तेज या बिजली जैसा दर्द हमेशा सामान्य कमर दर्द नहीं होता। यदि इसके साथ झनझनाहट, सुन्नपन या कमजोरी जैसे लक्षण भी मौजूद हैं, तो यह नस दबने का संकेत हो सकता है। अच्छी बात यह है कि समय रहते सही जांच और उचित उपचार शुरू कर दिया जाए, तो अधिकांश मरीज बिना किसी स्थायी नुकसान के पूरी तरह स्वस्थ हो सकते हैं। इसलिए ऐसे लक्षणों को हल्के में लेने के बजाय तुरंत विशेषज्ञ डॉक्टर से परामर्श लेना सबसे सुरक्षित विकल्प है।