झारखंड में भीषण गर्मी के बीच मौसम अब करवट लेने जा रहा है। राज्य के कई हिस्सों में जहां तेज गर्मी और लू लोगों को परेशान कर रही है, वहीं आने वाले दिनों में बारिश, आंधी और गर्जन की संभावना जताई गई है। Jharkhand के मौसम विज्ञान केंद्र ने पलामू प्रमंडल के जिलों के लिए लू का अलर्ट जारी किया है, जबकि रांची और संताल परगना समेत कई इलाकों में 25 से 28 मई के बीच मौसम बदलने का अनुमान है।
रविवार को Daltonganj राज्य का सबसे गर्म इलाका रहा, जहां अधिकतम तापमान 44 डिग्री सेल्सियस रिकॉर्ड किया गया। इसके अलावा:
राज्य के अधिकांश हिस्सों में मौसम शुष्क बना रहा, हालांकि बहरागोड़ा में चार मिमी बारिश दर्ज की गई।
मौसम विभाग ने Palamu, Garhwa और Chatra सहित उत्तर-पश्चिमी जिलों में भीषण लू चलने की चेतावनी जारी की है। विभाग के अनुसार इन इलाकों में तापमान सामान्य से ऊपर बना हुआ है और दोपहर के समय बाहर निकलने से बचने की सलाह दी गई है।
मौसम विभाग के मुताबिक 25 से 28 मई के बीच राज्य के कई हिस्सों में आंशिक बादल छाए रहेंगे और हल्की से मध्यम बारिश हो सकती है।
विशेष रूप से:
इस बदलाव से तापमान में कुछ गिरावट दर्ज की जा सकती है।
Ranchi और आसपास के इलाकों में अगले पांच दिनों तक मौसम लगातार बदलता रहेगा। 25 और 27 मई को गर्जन वाले बादल बनने की संभावना जताई गई है। मौसम विभाग के अनुसार 28 मई तक राजधानी का अधिकतम तापमान घटकर करीब 36 डिग्री सेल्सियस और न्यूनतम तापमान 22 डिग्री तक पहुंच सकता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
रांची। राजधानी रांची के बिरसा मुंडा एथलेटिक्स स्टेडियम में इन दिनों 29वीं नेशनल सीनियर एथलेटिक्स फेडरेशन प्रतियोगिता आयोजित हो रही है। देशभर के राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी यहां अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर रहे हैं। ट्रैक पर रिकॉर्ड बन रहे हैं और खिलाड़ी बड़े अंतरराष्ट्रीय मंचों की तैयारी कर रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद 35 हजार दर्शक क्षमता वाला स्टेडियम ज्यादातर समय खाली नजर आता है। यह स्थिति केवल एक प्रतियोगिता में कम भीड़ का मामला नहीं है, बल्कि झारखंड में एथलेटिक्स के प्रति लोगों की सीमित रुचि और खेल संस्कृति की चुनौतियों को भी सामने लाती है। क्रिकेट-हॉकी से मजबूत जुड़ाव, एथलेटिक्स में कमी झारखंड में खेल प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है। क्रिकेट, फुटबॉल और हॉकी जैसे खेलों में राज्य के खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई है। यही कारण है कि जब भी इन खेलों की बड़ी प्रतियोगिताएं होती हैं, तो हजारों दर्शक स्टेडियम पहुंचते हैं। लोगों का अपने स्थानीय खिलाड़ियों से भावनात्मक जुड़ाव भी मजबूत रहता है। इसके विपरीत एथलेटिक्स में यह जुड़ाव अभी तक विकसित नहीं हो पाया है। कई प्रतिभाशाली एथलीट संसाधनों की कमी, वैज्ञानिक प्रशिक्षण के अभाव और आर्थिक परेशानियों के कारण आगे नहीं बढ़ पाते। खिलाड़ियों की डाइट, मॉनिटरिंग और लगातार सपोर्ट सिस्टम जैसी बुनियादी जरूरतें आज भी चुनौती बनी हुई हैं। प्रचार-प्रसार और खेल संस्कृति की कमी झारखंड एथलेटिक्स एसोसिएशन के अध्यक्ष मधुकांत पाठक का कहना है कि एथलेटिक्स को गांव-गांव और घर-घर तक पहुंचाने की जरूरत है। उनके मुताबिक क्रिकेट की तुलना में एथलेटिक्स का मैनेजमेंट और आर्थिक ढांचा अभी कमजोर है। समर वेकेशन के कारण कई छात्र और स्थानीय खिलाड़ी भी प्रतियोगिता देखने नहीं पहुंच सके। वहीं अंतरराष्ट्रीय एथलीट रामचंद्र सांगा का मानना है कि एथलेटिक्स में अभी बहुत काम करने की जरूरत है। खिलाड़ियों को बेहतर सुविधाएं और लगातार प्रशिक्षण मिलेगा, तभी राज्य के खिलाड़ी राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना पाएंगे और दर्शकों का जुड़ाव बढ़ेगा। खेल व्यवस्था पर भी उठे सवाल विशेषज्ञों का मानना है कि एथलेटिक्स के लिए पर्याप्त प्रचार-प्रसार नहीं होने से आम लोगों को प्रतियोगिता की जानकारी तक नहीं मिल पाती। स्कूल और कॉलेज स्तर पर भी एथलेटिक्स को लेकर वह माहौल नहीं बन पाया है, जो क्रिकेट या हॉकी में दिखाई देता है। स्पष्ट है कि रांची के खाली स्टैंड्स सिर्फ दर्शकों की बेरुखी नहीं, बल्कि खेल व्यवस्था, संसाधनों की कमी और कमजोर खेल संस्कृति की कहानी भी बयान करते हैं। जब तक खिलाड़ियों को मजबूत आधार और स्थानीय पहचान नहीं मिलेगी, तब तक ट्रैक पर रिकॉर्ड बनते रहेंगे, लेकिन स्टैंड्स खाली ही नजर आएंगे।
रांची। झारखंड आंदोलन के प्रमुख नेता और शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्म भूषण से सम्मानित किया जाएगा। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू सोमवार को राष्ट्रपति भवन में आयोजित भव्य समारोह में देश की 131 प्रतिष्ठित हस्तियों को पद्म पुरस्कार प्रदान करेंगी। विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट योगदान देने वाली हस्तियों को यह सम्मान दिया जा रहा है। झारखंड आंदोलन के प्रमुख स्तंभ थे शिबू सोरेन झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक शिबू सोरेन को सार्वजनिक जीवन में उनके लंबे योगदान और झारखंड राज्य के गठन में निभाई गई ऐतिहासिक भूमिका के लिए यह सम्मान दिया जा रहा है। झारखंड में यह खबर लोगों के लिए गर्व और भावनात्मक जुड़ाव का विषय बनी हुई है। उन्हें “दिशोम गुरु” के नाम से भी जाना जाता था। शिबू सोरेन ने आदिवासी समाज के अधिकारों, जल-जंगल-जमीन की रक्षा और अलग झारखंड राज्य की मांग को लेकर लंबे समय तक संघर्ष किया। उन्होंने ग्रामीण और आदिवासी इलाकों की आवाज को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई थी। राजनीतिक जीवन में निभाई कई अहम भूमिकाएं शिबू सोरेन कई बार लोकसभा और राज्यसभा के सदस्य रहे। इसके अलावा वे झारखंड के मुख्यमंत्री भी बने और केंद्र सरकार में मंत्री पद की जिम्मेदारी भी संभाली। राजनीतिक जीवन में कई उतार-चढ़ाव आने के बावजूद उन्होंने हमेशा आदिवासी समाज और झारखंड के हितों को प्राथमिकता दी। उनके मरणोपरांत पद्म भूषण से सम्मानित किए जाने को केवल एक राजनीतिक सम्मान नहीं, बल्कि झारखंड आंदोलन और आदिवासी संघर्ष की राष्ट्रीय पहचान के रूप में देखा जा रहा है। राज्यभर में उनके समर्थकों और झारखंड मुक्ति मोर्चा के कार्यकर्ताओं के बीच इस खबर को लेकर खास उत्साह और भावनात्मक माहौल है। राष्ट्रपति भवन में होने वाले इस समारोह में देशभर की कई बड़ी हस्तियों को भी सम्मानित किया जाएगा, लेकिन झारखंड के लिए शिबू सोरेन को मिलने वाला यह सम्मान विशेष महत्व रखता है।
रांची। हेमंत सोरेन सरकार ने फिर एक बार प्रशासनिक स्तर पर बड़ा फेरबदल करते हुए कई IAS अधिकारियों का तबादला और नई पोस्टिंग की है। इससे जुड़ी अधिसूचना जारी कर दी गई है। जारी अधिसूचना के मुताबिक 2012 बैच के IAS अधिकारी संदीप सिंह को नया उत्पाद कमिश्नर नियुक्त किया गया है। वहीं 2013 बैच के IAS अधिकारी आदित्य आनंद को लेबर कमिश्नर की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इसके अलावा 2015 बैच की IAS अधिकारी जाधव विजया नारायण राव को योजना एवं विकास विभाग में अपर सचिव बनाया गया है। प्रशासनिक हलकों में इस बदलाव को सरकार की नई रणनीति और विभागीय कार्यों में तेजी लाने के प्रयास के तौर पर देखा जा रहा है। इन्हें मिला अतिरिक्त प्रभार वहीं बोकारो के डीसी अजय नाथ झा को जियाडा के डायरेक्टर का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है।