युद्ध के साये में निभाया देश का बड़ा दायित्व
झारखंड के जमशेदपुर के रहने वाले सेकंड इंजीनियर Ansh Tripathi ने साहस और कर्तव्य की मिसाल पेश करते हुए खाड़ी क्षेत्र के तनावपूर्ण हालात के बीच खतरनाक Strait of Hormuz को पार किया। अंश Shipping Corporation of India के जहाज Shivalik LNG Carrier पर तैनात हैं और लगभग 46 हजार मीट्रिक टन LPG लेकर भारत लौट रहे हैं।
जहाज सोमवार 16 मार्च को Mundra Port (गुजरात) पहुंचने वाला है। अंश की सुरक्षित वापसी की खबर से उनके परिवार, दोस्तों और पूरे इलाके में खुशी की लहर दौड़ गई है।
अंश त्रिपाठी ने 26 नवंबर 2025 को जहाज ‘शिवालिक’ पर अपनी ड्यूटी जॉइन की थी। उस समय किसी को अंदाजा नहीं था कि यह मिशन इतना चुनौतीपूर्ण साबित होगा। जहाज को यूएई, कतर और सऊदी अरब से LPG लेकर भारत लौटना था।
13 मार्च का दिन सबसे कठिन था, क्योंकि इसी दिन जहाज को दुनिया के सबसे संवेदनशील समुद्री मार्गों में से एक होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरना था। उस समय क्षेत्र में बढ़े तनाव के कारण हर पल खतरे की आशंका बनी हुई थी।
जब जहाज ने सुरक्षित रूप से इस खतरनाक रास्ते को पार कर लिया, तब जाकर परिवार और देश के लोगों ने राहत की सांस ली।
अंश के पिता Mithilesh Kumar Tripathi, जो Uranium Corporation of India Limited से सेवानिवृत्त उप-प्रबंधक हैं, ने भावुक होकर बताया कि पिछले कई दिन उनके परिवार के लिए बेहद कठिन रहे।
उन्होंने कहा कि उन्हें हर पल यह डर सता रहा था कि कहीं युद्ध की स्थिति में उनका बेटा किसी खतरे का शिकार न हो जाए। लेकिन अब जब यह खबर मिली कि जहाज सुरक्षित होर्मुज पार कर चुका है, तो ऐसा लग रहा है जैसे सीने से भारी बोझ उतर गया हो।
अंश की मां Chanda Tripathi ने बताया कि पिछले एक सप्ताह से वे लगातार भगवान से बेटे की सलामती की प्रार्थना कर रही थीं।
उन्होंने कहा कि जब भी मीडिया में समुद्री तनाव की खबरें देखती थीं तो दिल घबरा जाता था। अब जब बेटे के सुरक्षित होने की खबर मिली है, तो उनकी आंखों में खुशी के आंसू हैं।
अंश की पत्नी Chanda Mishra Tripathi, जो Tata Steel में चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं, पिछले कई दिनों से लगातार चिंता में थीं।
उनका दो वर्षीय बेटा तनय अभी छोटा है, लेकिन घर के माहौल को देखकर वह भी पिता की कमी महसूस कर रहा था। अब परिवार उस पल का इंतजार कर रहा है जब अंश घर लौटेंगे और सब उनसे मिल सकेंगे।
अंश के घर पर इस समय रिश्तेदारों और परिचितों का जमावड़ा लगा हुआ है। फोन लगातार बज रहे हैं और हर कोई उनकी कुशलता के बारे में जानकारी ले रहा है।
जमशेदपुर के पारडीह स्थित आशियाना वुडलैंड में रहने वाला यह परिवार अब गर्व और खुशी दोनों महसूस कर रहा है।
युद्ध जैसे तनावपूर्ण हालात के बीच खतरनाक समुद्री मार्ग से होकर देश के लिए ऊर्जा की आपूर्ति सुनिश्चित करना आसान नहीं था। अंश त्रिपाठी की यह उपलब्धि केवल उनके परिवार ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए गर्व की बात बन गई है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
हजारीबाग। हजारीबाग में वन विभाग ने अवैध लकड़ी कारोबार के खिलाफ बड़ी कार्रवाई करते हुए बरकट्ठा वन परिसर क्षेत्र के सलैया मौजा में संचालित एक अवैध आरा मशीन पर छापेमारी की। गुप्त सूचना के आधार पर की गई इस कार्रवाई में विभागीय टीम ने आरा मशीन का पूरा सेट और 25 पीस चिरान पटरा जब्त किया। कार्रवाई के बाद इलाके में लकड़ी माफियाओं के बीच हड़कंप मच गया है। गुप्त सूचना पर हुई छापेमारी जानकारी के अनुसार, बरही प्रक्षेत्र के वन क्षेत्र पदाधिकारी को सूचना मिली थी कि सलैया मौजा में बिना अनुमति अवैध रूप से आरा मशीन चलाई जा रही है।यहां जंगलों से काटकर लाई गई लकड़ियों को चिरान कर तैयार किया जा रहा था। सूचना मिलते ही वन विभाग की टीम ने त्वरित कार्रवाई करते हुए मौके पर छापेमारी की। प्रभारी वनपाल के नेतृत्व में चला अभियान इस कार्रवाई का नेतृत्व प्रभारी वनपाल पंकज कुमार ने किया। छापेमारी के दौरान विभागीय टीम ने मशीन सेट और तैयार लकड़ी के पटरे जब्त किए। अभियान में वनरक्षी राजेंद्र कुमार, अमन कुमार, सिकंदर कुमार, कृष्णा प्रसाद, सिकंदर नायक, भोला कुमार, विद्याभूषण, गोपी पासवान, वीरेंद्र कुमार, संजीत कुमार, आशीष कुमार और चेतन कुमार सहित कई कर्मी शामिल रहे। अवैध कारोबारियों में बढ़ी दहशत स्थानीय लोगों का कहना है कि क्षेत्र में लंबे समय से चोरी-छिपे लकड़ी कटाई और चिरान का कारोबार चल रहा था। हालांकि हाल के दिनों में वन विभाग की लगातार सक्रियता के कारण अवैध कारोबारियों पर दबाव बढ़ा है। दोषियों पर होगी सख्त कार्रवाई वन विभाग ने साफ कहा है कि जंगलों की अवैध कटाई और वन संपदा की लूट किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं की जाएगी। विभाग ने बताया कि मामले में शामिल लोगों की पहचान की जा रही है और उनके खिलाफ वन अधिनियम के तहत केस दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। वन अधिकारियों के मुताबिक आने वाले दिनों में भी क्षेत्र में लगातार छापेमारी अभियान चलाकर अवैध आरा मशीनों और लकड़ी कारोबार पर कार्रवाई जारी रहेगी।
रांची। ग्रामीण विकास विभाग के अंतर्गत झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी (JSLPS) एवं द नज इंस्टीट्यूट द्वारा रांची स्थित प्रोजेक्ट भवन सभागार में आयोजित कार्यक्रम में “झारखंड समावेशी आजीविका योजना (JH-SAY)” का औपचारिक शुभारंभ ग्रामीण विकास मंत्री दीपिका पांडेय सिंह ने किया। इस अवसर पर झारखंड में अल्ट्रा पुअर ग्रेजुएशन अप्रोच (UPAJ) के अनुभवों, उपलब्धियों एवं उसके व्यापक सामाजिक प्रभावों को भी साझा किया गया। मौके पर ग्रामीण विकास मंत्री दीपिका पांडेय सिंह ने कहा कि आज का दिन झारखंड के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक है। एक ओर राज्य एक सफल मॉडल के अनुभवों को साझा कर रहा है, वहीं दूसरी ओर अति-गरीब एवं वंचित परिवारों के सशक्तिकरण हेतु एक नई समावेशी योजना की शुरुआत भी कर रहा है। उन्होंने कहा कि झारखंड ने समावेशी विकास के क्षेत्र में जो मॉडल तैयार किया है, वह अब पूरे देश के लिए उदाहरण बन चुका है। 4000 गरीब परिवारों तक पहुंची योजना मंत्री दीपिका पांडेय सिंह ने कहा कि UPAJ परियोजना, दीनदयाल अंत्योदय योजना–राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (DAY-NRLM) के अंतर्गत ग्रेजुएशन अप्रोच का देश का पहला पायलट प्रोजेक्ट था। इसे झारखंड में विशेष रूप से अति-गरीब एवं विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) समुदायों के सशक्तिकरण के उद्देश्य से प्रारंभ किया गया था। इस परियोजना के माध्यम से पूर्वी सिंहभूम, गोड्डा एवं पलामू जिलों के 4 प्रखंडों में 4,000 अति-गरीब परिवारों तक महिला सामुदायिक संस्थाओं के माध्यम से पहुंच बनाई गई। उन्होंने कहा कि झारखंड में इस योजना की सफलता ने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। झारखंड से प्रेरणा के बाद पूरे देश में लागू मंत्री ने कहा कि राज्य में मिले सकारात्मक परिणामों के बाद भारत सरकार ने इस मॉडल को स्वीकार करते हुए इसे देशभर में लागू करने का निर्णय लिया। वर्ष 2025 में इसे DAY-NRLM के अंतर्गत एक उप-योजना के रूप में पूरे देश में प्रारंभ किया गया। मंत्री ने कहा कि झारखंड को इस योजना के प्रथम एवं द्वितीय चरण में कुल 41,000 अति-गरीब परिवारों को शामिल करने की जिम्मेदारी मिली है, जो राज्य के लिए गर्व और उपलब्धि का विषय है। अगले चरण में 6 जिलों के 16 हजार परिवारों तथा उसके बाद 25 हजार परिवारों को योजना से जोड़ा जाएगा। सीएम हेमंत के नेतृत्व में समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंच रहा लाभ उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली सरकार लगातार यह सुनिश्चित कर रही है कि विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। पहले ऐसे अनेक परिवार थे जो भूख, अभाव और असुरक्षा से संघर्ष कर रहे थे, लेकिन अब सरकार की नीतियों और योजनाओं के माध्यम से उनके जीवन में स्थायी बदलाव दिखाई दे रहा है। JSLPS के सहयोग से स्वरोजगार कार्यक्रम में डोली पहाड़िया की प्रेरणादायक कहानी भी साझा की गई। योजना से जुड़ने के बाद उनके परिवार के जीवन स्तर में उल्लेखनीय सुधार आया है। आज उनके बच्चे अंग्रेजी माध्यम विद्यालय में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। जिस परिवार को कभी भोजन की चिंता सताती थी, आज वही परिवार JSLPS के सहयोग से स्वरोजगार के माध्यम से आत्मनिर्भर बन चुका है। विभिन्न जिलों को राशि का चेक सौंपा गया इस अवसर पर विभिन्न जिलों के लिए “झारखंड समावेशी आजीविका योजना” के अंतर्गत स्वीकृति राशि के चेक भी वितरित किए गए। पूर्वी सिंहभूम में 13 करोड़ 92 लाख रुपये 4,800 परिवार, पलामू 11 करोड़ 2 लाख रुपये 3,800 परिवार, गोड्डा 9 करोड़ 57 लाख रुपये 3,300 परिवार, सिमडेगा 2 करोड़ 90 लाख रुपये 1,000 परिवार और सरायकेला-खरसावां 6 करोड़ 90 लाख रुपये 2,100 परिवारों के लिए स्वीकृत किए गए हैं। कार्यक्रम में ये रहे उपस्थित कार्यक्रम में JSLPS के प्रभारी मुख्य कार्यपालक पदाधिकारी (CEO) अरुण कुमार सिंह, द नज इंस्टीट्यूट के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर जॉन पाल सहित JSLPS के पदाधिकारी, सामुदायिक संस्थाओं के प्रतिनिधि, स्वयं सहायता समूहों की महिलाएं एवं विभिन्न जिलों से आए लाभुक परिवार उपस्थित थे।
रांची। रिम्स (Rajendra Institute of Medical Sciences) के पूर्व निदेशक और सीईओ डॉ. डी.के. सिंह के निधन से चिकित्सा जगत और रिम्स परिवार में शोक की लहर दौड़ गई है। उनके निधन की खबर 20 मई 2026 को सामने आई, जिसके बाद पूरे रिम्स परिसर में गमगीन माहौल देखा गया। रिम्स परिवार ने दी श्रद्धांजलि डॉ. डी.के. सिंह वर्ष 2018 से जून 2020 तक रिम्स के निदेशक रहे। बाद में AIIMS Bathinda के निदेशक पद पर चयन होने के बाद उन्होंने रिम्स से इस्तीफा दे दिया था। उनके निधन की सूचना मिलते ही रिम्स में शोक सभा आयोजित की गई, जहां चिकित्सकों, कर्मचारियों और अधिकारियों ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी। शोक सभा में दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की गई और उनके परिवार के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त की गई। ‘कुशल और अनुशासनप्रिय प्रशासक थे’ रिम्स के वर्तमान निदेशक Dr. Raj Kumar ने डॉ. डी.के. सिंह को याद करते हुए कहा कि वे एक कुशल, निडर और अनुशासनप्रिय प्रशासक थे। उन्होंने चिकित्सा विज्ञान, विशेषकर निश्चेतना विभाग में महत्वपूर्ण योगदान दिया। डॉ. राज कुमार ने कहा कि उनका व्यक्तित्व बेहद समावेशी था और वे सभी को साथ लेकर चलने में विश्वास रखते थे। कोरोना काल में निभाई अहम भूमिका ट्रॉमा एवं क्रिटिकल केयर विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. पी.के. भट्टाचार्य ने बताया कि डॉ. डी.के. सिंह ने रिम्स की अकादमिक संस्कृति को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाई। उनके कार्यकाल के दौरान ही कोरोना महामारी फैली थी। वर्ष 2020 में रिम्स में पहला कोरोना पॉजिटिव मामला सामने आने के बाद उन्होंने लगातार अस्पताल व्यवस्था को मजबूत करने और मरीजों को बेहतर इलाज उपलब्ध कराने के लिए विशेष प्रयास किए।