रांची। राजधानी रांची में रविवार को हुई महज दो घंटे की तेज बारिश ने नगर निगम की जल निकासी व्यवस्था की पोल खोल दी। शहर के कई प्रमुख मार्ग और निचले इलाके जलमग्न हो गए, जिससे लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। सेवा सदन रोड, हरमू करम चौक, करमटोली चौक, हरमू रोड, रातू रोड, पंडरा, पंचशील नगर और मौलाना आजाद कॉलोनी समेत कई इलाकों में सड़कें पानी में डूब गईं। कई स्थानों पर वाहनों की रफ्तार थम गई, जबकि पैदल चलना भी मुश्किल हो गया।
सबसे गंभीर स्थिति सेवा सदन रोड पर देखने को मिली, जहां कमर तक पानी भर गया। बारिश का पानी सेवा सदन अस्पताल और लक्ष्मी नारायण मंदिर परिसर तक पहुंच गया। अस्पताल में भर्ती मरीजों के परिजनों को दवा और भोजन पहुंचाने के लिए पानी से होकर गुजरना पड़ा। स्थानीय लोगों के अनुसार कुछ समय के लिए सड़क पूरी तरह नदी जैसी नजर आने लगी।
तेज बारिश के कारण शहर की अधिकांश नालियां उफान पर आ गईं और कई जगहों पर नालियों का गंदा पानी सड़कों पर बहने लगा। इससे आवागमन प्रभावित हुआ और लोगों को बदबू व जलभराव की समस्या का सामना करना पड़ा। दूसरी ओर शहर के तालाबों और जलाशयों का जलस्तर भी तेजी से बढ़ गया। स्थानीय नागरिकों ने आरोप लगाया कि हर साल मानसून से पहले जल निकासी व्यवस्था दुरुस्त करने के दावे किए जाते हैं, लेकिन पहली ही तेज बारिश में व्यवस्था ध्वस्त हो जाती है।
बारिश और तेज हवाओं का असर बिजली व्यवस्था पर भी पड़ा। कई इलाकों में बिजली के तार टूटने, ट्रांसफार्मर में खराबी और पेड़ गिरने से बिजली आपूर्ति बाधित रही। कोकर, अपर बाजार, हरमू, मोरहाबादी, बरियातू, कांके, टाटीसिलवे और टुपुदाना सहित कई क्षेत्रों में घंटों बिजली गुल रही। पारस अस्पताल और कटहल मोड़ इलाके के लोगों ने भी लंबे समय तक बिजली बाधित रहने की शिकायत की।
रविवार की बारिश ने एक बार फिर रांची की जल निकासी, सड़क निर्माण और बिजली व्यवस्था की तैयारियों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते स्थायी समाधान नहीं किया गया तो पूरे मानसून में शहरवासियों को इसी तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
रांची। झारखंड के नए महाधिवक्ता (एडवोकेट जनरल) रोहितश्य रॉय ने सोमवार को झारखंड हाईकोर्ट परिसर स्थित महाधिवक्ता कार्यालय में विधिवत पदभार ग्रहण किया। कार्यभार संभालने के बाद वरिष्ठ अधिवक्ताओं, वकीलों और अधिवक्ता लिपिकों ने उन्हें गुलदस्ते भेंट कर शुभकामनाएं दीं। हाईकोर्ट परिसर में दिनभर बधाई देने वालों का तांता लगा रहा। व्यक्तिगत कारणों से पूर्व महाधिवक्ता ने दिया इस्तीफा रोहितश्य रॉय की नियुक्ति ऐसे समय हुई है, जब पूर्व महाधिवक्ता राजीव रंजन ने रविवार को व्यक्तिगत कारणों का हवाला देते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। उनके त्यागपत्र के बाद झारखंड सरकार ने त्वरित कार्रवाई करते हुए रविवार देर शाम रोहितश्य रॉय को राज्य का नया महाधिवक्ता नियुक्त करने की अधिसूचना जारी कर दी। इसके बाद सोमवार को उन्होंने आधिकारिक रूप से पदभार ग्रहण किया। दो दशक से अधिक का कानूनी अनुभव रोहितश्य रॉय अपनी उत्कृष्ट विधिक समझ, निष्पक्ष पेशेवर आचरण और न्याय व्यवस्था के प्रति समर्पण के लिए जाने जाते हैं। दो दशक से अधिक लंबे कानूनी अनुभव के दौरान उन्होंने झारखंड हाईकोर्ट सहित विभिन्न न्यायिक मंचों पर प्रभावशाली पैरवी कर अपनी अलग पहचान बनाई है। बार और बेंच, दोनों के बीच उनकी साख एक सक्षम और भरोसेमंद अधिवक्ता के रूप में रही है। रांची से शुरू हुआ सफर, 2003 में की वकालत की शुरुआत 14 मई 1980 को जन्मे रोहितश्य रॉय वरिष्ठ अधिवक्ता स्वर्गीय वीरेन्द्र नाथ राय (बीरू बाबू) के पुत्र हैं। उनकी प्रारंभिक शिक्षा रांची के संत जेवियर स्कूल, डोरंडा में हुई। इसके बाद उन्होंने पुणे विश्वविद्यालय से संबद्ध सिम्बायोसिस लॉ कॉलेज से विधि की पढ़ाई पूरी की और वर्ष 2003 में एलएलबी की डिग्री प्राप्त की। उसी वर्ष उन्होंने झारखंड हाईकोर्ट में वकालत शुरू की। अपनी मेहनत, कानूनी दक्षता और प्रभावी पैरवी के दम पर उन्होंने राज्य के प्रमुख अधिवक्ताओं में अपनी जगह बनाई। अब महाधिवक्ता के रूप में उनकी नियुक्ति से राज्य की न्यायिक व्यवस्था में उनके अनुभव का लाभ मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।
रांची। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश कार्यालय में सोमवार को प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू की अध्यक्षता में प्रदेश पदाधिकारियों की बैठक हुई। इसमें संगठन महामंत्री कर्मवीर सिंह, नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी समेत सभी प्रदेश पदाधिकारी मौजूद रहे। बैठक में संगठनात्मक गतिविधियों की समीक्षा के साथ आगामी कार्यक्रमों और पार्टी की रणनीतियों पर विस्तार से चर्चा की गई। बैठक के बाद पत्रकारों से बातचीत करते हुए प्रदेश महामंत्री अमर कुमार बाउरी ने बताया कि राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के निर्देशानुसार अब प्रत्येक माह की 15 तारीख को प्रदेश पदाधिकारियों की बैठक होगी। उन्होंने कहा कि आज की बैठक में पूर्व में किए गए कार्यों की समीक्षा की गई और आने वाले कार्यक्रमों को लेकर रूपरेखा तय की गई। एसआईआर को बूथ स्तर तक मजबूत करने पर जोर एसआईआर पर अमर बाउरी ने कहा कि भाजपा ने अपने सभी जिलों में प्रशिक्षण कार्यक्रम पूरा कर लिया है, जबकि सरकार की ओर से अभी प्रशिक्षण का कार्य पूरा नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि बूथ स्तर तक एसआईआर को प्रभावी ढंग से लागू करवाना भाजपा की प्राथमिकताओं में शामिल है और इसके लिए संगठन स्तर पर लगातार काम किया जा रहा है। राज्यसभा चुनाव में जीत का दावा राज्यसभा चुनाव को लेकर भाजपा प्रदेश महामंत्री ने दावा किया कि पार्टी का उम्मीदवार पूर्ण बहुमत के साथ जीत हासिल करेगा। उन्होंने कांग्रेस के बयानों पर पलटवार करते हुए कहा कि यदि कांग्रेस के पास पर्याप्त संख्या बल है, तो उसे किसी प्रकार की चिंता नहीं होनी चाहिए। बाउरी ने कहा कि भाजपा राज्यसभा चुनाव को लेकर पूरी तरह आश्वस्त है और पार्टी का प्रत्याशी विजयी होगा।
देवघर। सावन महीने की शुरुआत से पहले देवघर के प्रसिद्ध घोरमारा पेड़ा कारोबारियों की चिंता बढ़ गई है। बाबा बैद्यनाथ धाम आने वाले श्रद्धालुओं के बीच घोरमारा का पेड़ा अपनी गुणवत्ता और स्वाद के लिए खास पहचान रखता है। हर वर्ष सावन के दौरान यहां करोड़ों रुपये का कारोबार होता है, लेकिन पिछले दो वर्षों से सड़क निर्माण कार्य और बढ़ती लागत के कारण व्यापारियों को आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। सड़क निर्माण से कारोबार पर असर व्यापारियों का कहना है कि दुमका-देवघर राष्ट्रीय राजमार्ग निर्माण के चलते पिछले वर्ष श्रद्धालुओं के आवागमन पर प्रतिबंध लगाया गया था और वैकल्पिक मार्ग से यात्रा कराई गई थी। इससे बड़ी संख्या में श्रद्धालु घोरमारा से होकर नहीं गुजर सके, जिसके कारण पेड़ा बिक्री में भारी गिरावट आई। इस वर्ष भी सड़क निर्माण कार्य जारी है, जिससे कारोबारियों को आशंका है कि कहीं फिर से वैसी ही व्यवस्था लागू न हो जाए। हालांकि प्रशासन की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक निर्देश जारी नहीं किया गया है। बढ़ती लागत से बढ़ी परेशानी पेड़ा कारोबारियों का कहना है कि गैस सिलेंडर की कीमतों में लगातार वृद्धि ने उत्पादन लागत बढ़ा दी है। कई दुकानदारों को गैस की कमी के कारण ब्लैक में सिलेंडर खरीदना पड़ रहा है। जो सिलेंडर पहले लगभग एक हजार रुपये में मिलता था, उसकी कीमत अब दो हजार से ढाई हजार रुपये तक पहुंच गई है। ऐसे में मौजूदा सरकारी दर पर पेड़ा बेचना उनके लिए घाटे का सौदा बनता जा रहा है। सरकारी दर बढ़ाने की मांग घोरमारा पेड़ा संघ के अध्यक्ष अश्वनी मंडल ने प्रशासन से पेड़े के सरकारी मूल्य में कम से कम 50 रुपये प्रति किलो की बढ़ोतरी की मांग की है। वर्तमान में पेड़े का सरकारी दर 360 से 400 रुपये प्रति किलो निर्धारित है। व्यापारियों का कहना है कि बढ़ती लागत को देखते हुए दर में संशोधन आवश्यक है। घोरमारा में करीब 200 से 250 परिवार सीधे तौर पर पेड़ा कारोबार से जुड़े हैं और सावन के दौरान होने वाली कमाई ही उनकी सालभर की आय का प्रमुख स्रोत होती है। ऐसे में कारोबारियों ने प्रशासन से सड़क निर्माण के दौरान विशेष सुविधाएं उपलब्ध कराने और उनकी मांगों पर शीघ्र निर्णय लेने की अपील की है।