रांची। झारखंड के रेल यात्रियों और इलाज के लिए लंबी दूरी की यात्रा करने वाले मरीजों को बड़ी राहत मिलने जा रही है। दक्षिण पूर्व रेलवे ने यात्रियों की लंबे समय से चली आ रही मांग को स्वीकार करते हुए दो महत्वपूर्ण ट्रेनों के टिकट कोटे में बदलाव किया है।
नए प्रावधानों के तहत रांची- लोकमान्य तिलक टर्मिनस एक्सप्रेस में कोडरमा तक के यात्रियों को जनरल वेटिंग लिस्ट (जीएनडब्ल्यूएल) की सुविधा मिलेगी, जबकि हटिया- एसएमवीटी बेंगलुरु सुपरफास्ट एक्सप्रेस से काटपाडी (वेल्लोर) जाने वाले यात्रियों को भी अब जीएनडब्ल्यूएल कोटे का लाभ मिलेगा।
इससे झारखंड के हजारों यात्रियों, विशेषकर इलाज के लिए वेल्लोर जाने वाले मरीजों और उनके परिजनों को कन्फर्म टिकट मिलने की संभावना बढ़ेगी। जेडआरयूसीसी के सदस्य अरुण जोशी ने बताया कि यात्रियों की इस लंबे समय से लंबित मांग को हाल में कोलकाता में हुई बैठक में हमने प्रमुखता से उठाया था, जिसके बाद रेलवे प्रशासन ने इसे मंजूरी दी है।
12 अगस्त से ट्रेन संख्या 18609 रांची-लोकमान्य तिलक टर्मिनस एक्सप्रेस में कोडरमा तक यात्रा करने वाले यात्रियों को भी जनरल वेटिंग लिस्ट (जीएनडब्ल्यूएल) का लाभ मिलेगा। अब तक यह सुविधा केवल दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन तक उपलब्ध थी।
वहीं, 18 अगस्त से हटिया-एसएमवीटी बेंगलुरु सुपरफास्ट एक्सप्रेस (12835) में काटपाडी (वेल्लोर) तक यात्रा करने वाले झारखंड के यात्रियों को भी जीएनडब्ल्यूएल कोटा मिलेगा। अभी तक उन्हें पीक्यूडब्ल्यूएल के तहत टिकट मिलती थी, जिससे वेटिंग क्लियर होने की संभावना बहुत कम रहती थी।
रांची रेल मंडल की सीनियर डीसीएम श्रेया सिंह ने बताया कि हटिया-बेंगलुरु एक्सप्रेस और रांची-एलटीटी एक्सप्रेस में किए गए संशोधन से वेल्लोर और मुंबई रूट पर यात्रियों को कन्फर्म टिकट मिलने की संभावना बढ़ जाएगी तथा प्रतीक्षा सूची का दबाव कम होगा।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
रांची। झारखंड शिक्षक पात्रता परीक्षा (JTET) के आयोजन में लगातार हो रही देरी पर झारखंड हाईकोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है। राज्य में करीब नौ साल से JTET परीक्षा आयोजित नहीं होने के मामले में अदालत ने स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग के सचिव को शोकॉज नोटिस जारी किया है। नौ साल से परीक्षा का इंतजार JTET का आयोजन लंबे समय से नहीं होने के कारण शिक्षक बनने की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, झारखंड गठन के बाद अब तक JTET का आयोजन केवल दो बार हुआ है और 2016 के बाद परीक्षा नहीं हुई। इस देरी का सीधा असर शिक्षक नियुक्ति की प्रक्रिया पर भी पड़ रहा है। अभ्यर्थी लगातार परीक्षा आयोजित कराने की मांग कर रहे हैं। हाईकोर्ट ने मांगा जवाब मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सरकार से JTET को लेकर देरी का कारण और परीक्षा आयोजित करने की स्थिति स्पष्ट करने को कहा। शिक्षा सचिव से इस संबंध में जवाब मांगा गया है। इससे पहले हाईकोर्ट ने सरकार को मार्च 2026 तक JTET आयोजित कराने का निर्देश दिया था और JTET होने तक नई सहायक शिक्षक नियुक्ति प्रक्रिया पर रोक लगाने का आदेश भी दिया था। भाषा विवाद से भी अटकी प्रक्रिया JTET 2026 की प्रक्रिया में भोजपुरी, अंगिका और मगही जैसी क्षेत्रीय भाषाओं को शामिल करने को लेकर भी विवाद सामने आया है। इसी भाषा विवाद के कारण परीक्षा की नियमावली और आवेदन प्रक्रिया प्रभावित होने की रिपोर्टें सामने आई थीं। अब हाईकोर्ट की सख्ती के बाद शिक्षा विभाग को परीक्षा में देरी को लेकर अपना पक्ष स्पष्ट करना होगा। अभ्यर्थियों की नजर अदालत के अगले आदेश और सरकार की कार्रवाई पर है।
रांची। झारखंड में JPSC और JSSC भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के खिलाफ चल रहे छात्र आंदोलन के दौरान शुक्रवार, 7 अगस्त को AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा पर स्याही फेंकने की घटना सामने आई। यह घटना उस समय हुई जब छात्र और विभिन्न संगठनों से जुड़े लोग रांची के बिरसा चौक से विधानसभा की ओर मार्च कर रहे थे। पुलिस ने स्याही फेंकने के आरोप में एक युवक को हिरासत में लिया है। बिरसा चौक के पास हुई घटना रिपोर्टों के मुताबिक, करीब एक हजार छात्रों और कार्यकर्ताओं का मार्च विधानसभा की ओर बढ़ रहा था। इसी दौरान भीड़ के बीच से एक व्यक्ति ने नेहा बोरा और कुछ महिला प्रदर्शनकारियों पर काली स्याही फेंक दी। घटना के बाद कुछ समय के लिए मौके पर हंगामा हुआ। पुलिस ने स्थिति को नियंत्रित किया और आरोपी युवक को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू की। पुलिस के अनुसार, अभी तक औपचारिक शिकायत नहीं मिलने के कारण एफआईआर दर्ज नहीं की गई थी। आरोपी ने बताई अलग वजह हिरासत में लिए गए युवक की पहचान अमरनाथ पांडेय के रूप में हुई है। उसने मीडिया से कहा कि वह नेहा बोरा द्वारा उमर खालिद के समर्थन किए जाने से नाराज था और इसी वजह से उसने स्याही फेंकी। हालांकि, नेहा बोरा और AISA की ओर से घटना को राजनीतिक रूप से प्रेरित हमला बताया गया है। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। JPSC-JSSC परीक्षा विवाद के बीच हुआ प्रदर्शन यह मार्च झारखंड में JPSC की 14वीं सिविल सेवा परीक्षा और JSSC-CGL समेत भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के खिलाफ चल रहे छात्र आंदोलन का हिस्सा था। प्रदर्शनकारी परीक्षाओं की पारदर्शिता को लेकर सवाल उठा रहे हैं और संबंधित परीक्षाओं को रद्द कर दोबारा कराने तथा जांच की मांग कर रहे हैं। नेहा बोरा ने घटना के बाद कहा कि स्याही फेंकने से वह डरने वाली नहीं हैं और छात्र आंदोलन जारी रहेगा। उन्होंने प्रदर्शन के दौरान महिला प्रतिभागियों को निशाना बनाए जाने पर भी सवाल उठाया। राजनीतिक और छात्र संगठनों ने की निंदा घटना के बाद CPI(ML) और विभिन्न छात्र संगठनों ने स्याही फेंकने की घटना की निंदा की और दोषी के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। वहीं, कुछ संगठनों की ओर से घटना को लेकर अलग दावे भी किए गए हैं। फिलहाल पुलिस हिरासत में लिए गए युवक से पूछताछ कर रही है। घटना के पीछे की पूरी वजह और किसी संगठन की कथित भूमिका की आधिकारिक पुष्टि जांच के बाद ही स्पष्ट होगी।
रांची। झारखंड में JPSC और JSSC भर्ती परीक्षाओं में कथित गड़बड़ी, पेपर लीक और परीक्षा प्रक्रिया को लेकर चल रहे छात्रों के आंदोलन के बीच भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने बड़ा ऐलान किया है। उन्होंने कहा है कि यदि 13 अगस्त 2026 तक राज्य सरकार छात्रों की मांगों पर कोई ठोस फैसला नहीं लेती है, तो वह खुद भूख हड़ताल पर बैठेंगे। छात्रों के समर्थन में आंदोलन में उतरने का ऐलान निशिकांत दुबे ने रांची में आंदोलन कर रहे JPSC-JSSC अभ्यर्थियों के समर्थन में यह घोषणा की। उन्होंने राज्य सरकार को 13 अगस्त तक का समय देते हुए कहा कि छात्रों के मुद्दों का समाधान नहीं होने पर वह आंदोलन में सीधे शामिल होंगे। इसके लिए उन्होंने भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष से अनुमति भी मांगी है। संसद में उठाएंगे JPSC-JSSC का मुद्दा भाजपा सांसद ने कहा कि झारखंड में भर्ती परीक्षाओं से जुड़े मामले को संसद में भी उठाया जाएगा। उन्होंने कथित अनियमितताओं की जांच की मांग करते हुए CBI जांच की मांग करने की बात कही है। अभ्यर्थी लंबे समय से परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता, कथित पेपर लीक और भर्ती से जुड़े विवादों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। रांची में छात्रों का प्रदर्शन और सत्याग्रह लगातार जारी है। सरकार के फैसले पर टिकी नजर अब सभी की नजर 13 अगस्त पर है। यदि सरकार और आंदोलनकारी छात्रों के बीच इस समयसीमा के भीतर कोई समाधान नहीं निकलता है, तो निशिकांत दुबे के भूख हड़ताल पर बैठने की घोषणा से झारखंड में भर्ती परीक्षाओं को लेकर राजनीतिक टकराव और तेज हो सकता है।