इटावा। उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में शादी के महज 20 दिन बाद एक युवक की आत्महत्या और उसकी पत्नी के आत्महत्या के प्रयास का मामला सामने आया है। परिजनों का आरोप है कि युवक ने अपनी पत्नी को कथित प्रेमी के साथ भागने की कोशिश करते हुए पकड़ लिया था, जिसके बाद मानसिक तनाव में आकर उसने फंदा लगाकर जान दे दी। वहीं पति की मौत की सूचना मिलने पर पत्नी ने भी नींद की गोलियां खाकर आत्महत्या का प्रयास किया।
मृतक के परिजनों का दावा है कि बाजार के दौरान पत्नी ने अपने कथित प्रेमी को लोकेशन भेजकर बुलाया था। आरोप है कि युवक के लस्सी लेने जाते ही प्रेमी बाइक लेकर पहुंचा और पत्नी उसके साथ जाने लगी, लेकिन पति ने मौके पर दोनों को देख लिया। इस दौरान कथित प्रेमी फरार हो गया और घटना के बाद दोनों के बीच विवाद हुआ।
परिजनों के अनुसार, घटना के अगले दिन युवक ने गांव के पास पेड़ से फंदा लगाकर आत्महत्या कर ली। सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची, शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेजा और जांच शुरू कर दी।
पति की मौत की खबर मिलने के बाद पत्नी ने कथित तौर पर नींद की गोलियां खा लीं। उसे जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां इलाज के दौरान हंगामे की स्थिति बन गई। सुरक्षा के मद्देनजर अस्पताल में महिला पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई है।
परिजनों का कहना है कि दोनों परिवारों के बीच विवाद सुलझाने की बातचीत चल रही थी और स्टांप पेपर पर समझौते की तैयारी भी थी। हालांकि इससे पहले ही युवक ने आत्मघाती कदम उठा लिया।
पुलिस का कहना है कि प्रथम दृष्टया मामला पारिवारिक विवाद से जुड़ा प्रतीत होता है। वायरल वीडियो, परिजनों के आरोप, दोनों पक्षों के बयान और अन्य साक्ष्यों के आधार पर जांच की जा रही है। जांच पूरी होने के बाद आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फेसबुक अकाउंट पर पोस्ट किया गया एक वीडियो मंगलवार को कुछ समय के लिए Meta प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया। यह वीडियो प्रधानमंत्री मोदी के Gen Z यानी युवा पीढ़ी को संबोधित संदेश से जुड़ा था। वीडियो हटने के बाद सोशल मीडिया पर चर्चा तेज हो गई, जिसके बाद Meta ने सफाई देते हुए कहा कि यह कार्रवाई गलती से हुई थी और वीडियो को दोबारा बहाल कर दिया गया। Meta ने बताया तकनीकी गलती Meta ने स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री मोदी के वीडियो को हटाना जानबूझकर नहीं किया गया था। कंपनी के अनुसार यह एक मॉडरेशन एरर था, जिसके कारण वीडियो कुछ समय के लिए उपलब्ध नहीं रहा। बाद में जांच के बाद वीडियो को फिर से बहाल कर दिया गया। वीडियो हटाए जाने के बाद राजनीतिक और सोशल मीडिया हलकों में इस मुद्दे को लेकर चर्चा शुरू हो गई थी। कई लोगों ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की कंटेंट मॉडरेशन प्रक्रिया पर सवाल उठाए, जबकि Meta ने इसे सामान्य तकनीकी समस्या बताया। युवाओं को संबोधित था प्रधानमंत्री का वीडियो रिपोर्ट्स के अनुसार यह वीडियो प्रधानमंत्री मोदी के युवाओं और खासकर Gen Z से संवाद से जुड़ा था। वीडियो में प्रधानमंत्री ने युवाओं से जुड़े मुद्दों और हालिया घटनाक्रमों पर अपनी बात रखी थी। यही कारण था कि वीडियो हटने के बाद यह मामला तेजी से चर्चा में आ गया। सरकार ने Meta से मांगा जवाब प्रधानमंत्री के वीडियो के हटने के मामले को लेकर केंद्र सरकार ने भी Meta से स्पष्टीकरण मांगा। रिपोर्ट्स के मुताबिक इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय की ओर से Meta के अधिकारियों से इस मामले पर जवाब मांगा गया। सरकार की ओर से यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म अब राजनीतिक संवाद और सरकारी संदेशों के बड़े माध्यम बन चुके हैं। सोशल मीडिया कंटेंट मॉडरेशन पर फिर उठे सवाल इस घटना के बाद एक बार फिर सोशल मीडिया कंपनियों की कंटेंट मॉडरेशन नीति पर बहस शुरू हो गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि बड़े नेताओं और सार्वजनिक हस्तियों से जुड़े कंटेंट पर प्लेटफॉर्म को ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए ताकि गलत कार्रवाई से भ्रम की स्थिति पैदा न हो।
पणजी, एजेंसियां। गोवा निवेश प्रोत्साहन एवं सुविधा बोर्ड ने करीब ₹622 करोड़ के निवेश प्रस्तावों को मंजूरी दी है। इन परियोजनाओं के शुरू होने के बाद राज्य में लगभग 3,180 नई नौकरियां पैदा होने की संभावना जताई गई है। मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत की अध्यक्षता में हुई बोर्ड बैठक में इन प्रस्तावों को मंजूरी दी गई। किन क्षेत्रों में आएंगे नए प्रोजेक्ट मंजूर किए गए निवेश प्रस्तावों में मैन्युफैक्चरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स, हॉस्पिटैलिटी, शिक्षा, शिपबिल्डिंग और उभरती हुई टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों को शामिल किया गया है। इनमें ऑटोमोबाइल कंपोनेंट निर्माण, ऑप्टिकल इंस्ट्रूमेंट्स, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट सेंटर और ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (GCC) से जुड़े प्रोजेक्ट शामिल हैं। स्थानीय युवाओं को मिलेगा रोजगार का लाभ मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने कहा कि इन निवेश परियोजनाओं से गोवा में औद्योगिक विकास को बढ़ावा मिलेगा और स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। सरकार का लक्ष्य राज्य में निवेश के लिए बेहतर माहौल तैयार करना और उच्च गुणवत्ता वाले रोजगार उपलब्ध कराना है। सरकार की रोजगार बढ़ाने की योजना गोवा सरकार ने उद्योगों को आकर्षित करने के लिए नई औद्योगिक नीतियों और प्रोत्साहन योजनाओं पर भी चर्चा की है। सरकार का मानना है कि नए निवेश से राज्य की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी और युवाओं को राज्य के अंदर ही बेहतर करियर विकल्प मिल सकेंगे।
नई दिल्ली/लखनऊ, एजेंसियां। उत्तर प्रदेश की 69,000 शिक्षक भर्ती मामले में मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में महत्वपूर्ण सुनवाई होगी। सुनवाई से पहले राज्य सरकार ने अदालत में नया शपथपत्र दाखिल कर कहा है कि संशोधित मेरिट सूची में स्थान पाने वाले पात्र अभ्यर्थियों का समायोजन पहले से नियुक्त शिक्षकों को प्रभावित किए बिना किया जा सकता है। सरकार ने कोर्ट में रखा समायोजन का प्रस्ताव राज्य सरकार ने अपने चार पन्नों के शपथपत्र में कहा है कि समायोजन मौजूदा रिक्त पदों को ध्यान में रखते हुए किया जा सकता है। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि यह व्यवस्था भविष्य के मामलों में मिसाल नहीं बनेगी और सुप्रीम कोर्ट जो भी निर्देश देगा, उसका पालन किया जाएगा। खाली पदों पर नियुक्ति की तैयारी शपथपत्र के अनुसार, केवल वे अभ्यर्थी समायोजन के पात्र होंगे जो निर्धारित न्यूनतम योग्यता पूरी करते हैं। सरकार का कहना है कि इस प्रक्रिया से पहले से कार्यरत शिक्षकों की नियुक्ति प्रभावित नहीं होगी। आरक्षण प्रभावित अभ्यर्थियों ने जताई नाराजगी दूसरी ओर, आरक्षण प्रभावित अभ्यर्थियों ने सरकार के शपथपत्र पर असंतोष जताया है। उनका कहना है कि हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक के सभी याचिकाकर्ताओं को राहत दी जाए और भर्ती की मूल चयन सूची सार्वजनिक की जाए। आरक्षण घोटाले का आरोप दोहराया पिछड़ा दलित संयुक्त मोर्चा ने आरोप लगाया है कि भर्ती प्रक्रिया में लगभग 19,000 पदों पर आरक्षण से जुड़ी अनियमितताएं हुईं। संगठन ने मांग की है कि सभी आरक्षण प्रभावित अभ्यर्थियों को याची लाभ देकर मामले का स्थायी समाधान किया जाए। सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर टिकी निगाहें अब इस बहुचर्चित भर्ती मामले में सभी की नजर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर है। अदालत के निर्देश से यह तय होगा कि पात्र अभ्यर्थियों के समायोजन और भर्ती विवाद का समाधान किस दिशा में आगे बढ़ेगा।