उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में व्यापारी विनीत राय हत्याकांड के मुख्य आरोपियों में शामिल एक लाख रुपये का इनामी बदमाश कमलेश चौधरी उर्फ कमलेश बिंद पुलिस मुठभेड़ में मारा गया। वह 29 मई को हुए चर्चित हत्याकांड के बाद से फरार चल रहा था और पुलिस उसकी लगातार तलाश कर रही थी।
पुलिस को सूचना मिली थी कि कमलेश कुर्था क्षेत्र में पवहारी बाबा आश्रम के पास छिपा हुआ है। इसके बाद पुलिस और स्वाट टीम ने इलाके में घेराबंदी कर तलाशी अभियान शुरू किया।
पुलिस अधीक्षक डॉ. इरज राजा के अनुसार, बुधवार देर रात बिना नंबर प्लेट की मोटरसाइकिल पर सवार एक संदिग्ध को रोकने का प्रयास किया गया। इस दौरान आरोपी ने पुलिस टीम पर फायरिंग शुरू कर दी।
जवाबी कार्रवाई में पुलिस ने भी गोली चलाई, जिसमें आरोपी घायल हो गया। बाद में उसकी पहचान कमलेश बिंद के रूप में हुई।
मुठभेड़ में घायल होने के बाद कमलेश को अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
इस दौरान स्वाट टीम प्रभारी और सब-इंस्पेक्टर रोहित मिश्रा भी गोली लगने से घायल हो गए। उनके कंधे में गोली लगी है और उनका इलाज जारी है।
पुलिस ने मुठभेड़ स्थल से एक अवैध .32 बोर पिस्तौल, कारतूस और एक मोटरसाइकिल बरामद की है। बरामद सामान को कब्जे में लेकर आगे की जांच की जा रही है।
पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, कमलेश के खिलाफ हत्या, हत्या के प्रयास, अपहरण, हमला, धमकी और शस्त्र अधिनियम सहित सात आपराधिक मामले दर्ज थे। उसका आपराधिक इतिहास वर्ष 2017 से जुड़ा हुआ था।
हत्याकांड के बाद पुलिस ने चारों नामजद आरोपियों पर इनाम घोषित किया था। कमलेश और मुख्य आरोपी शंकर पांडे पर एक-एक लाख रुपये का इनाम रखा गया था।
जांच के अनुसार, 29 मई की रात गाजीपुर के होटल व्यवसायी विनीत राय की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। प्रारंभिक जांच में एक करोड़ रुपये की रंगदारी मांगने का मामला सामने आया था।
बताया गया कि चार हमलावर दो मोटरसाइकिलों पर होटल पहुंचे थे। बीयर खरीदने के बहाने वे होटल के गेट तक पहुंचे और फिर विनीत राय पर ताबड़तोड़ गोलियां चला दीं।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, जान बचाने के लिए भागते समय भी हमलावरों ने विनीत राय पर कई राउंड फायरिंग की। गंभीर रूप से घायल व्यापारी को अस्पताल ले जाया गया, जहां इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई।
पुलिस के अनुसार, इस मामले के अन्य आरोपी शंकर पांडे, सोनू यादव और मोनू त्रिपाठी अभी भी फरार हैं। उनकी गिरफ्तारी के लिए लगातार छापेमारी की जा रही है और पुलिस विभिन्न स्थानों पर तलाश अभियान चला रही है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
चमोली। उत्तराखंड के चमोली जिले से मानवता को झकझोर देने वाली घटना सामने आई है। कोतवाली क्षेत्र के रांगतोली गांव में एक गोशाला के पास नवजात शिशु लावारिस हालत में मिला। उसके मुंह में रबर ठूंसी हुई थी। समय रहते ग्रामीणों और पुलिस की मदद से नवजात को अस्पताल पहुंचाया गया, जिससे उसकी जान बच गई। फिलहाल बच्चे का इलाज चल रहा है और पुलिस मामले की जांच कर रही है। महिला की नजर पड़ी, ग्रामीणों ने दी पुलिस को सूचना जानकारी के अनुसार, गुरुवार सुबह एक महिला गोशाला की ओर जा रही थी, तभी उसकी नजर नवजात पर पड़ी। महिला ने तुरंत ग्राम प्रधान संतोष गुसाईं और ग्राम प्रहरी को सूचना दी। इसके बाद ग्राम प्रधान ने मौके पर पहुंचकर पुलिस को घटना की जानकारी दी। मुंह में ठूंसी थी रबर, सांसें चलती मिलीं ग्राम प्रधान के अनुसार, जब वे मौके पर पहुंचे तो नवजात के मुंह में बाल बांधने वाली रबर ठूंसी हुई थी। रबर निकालने पर पता चला कि बच्चे की सांसें चल रही हैं। इसके बाद पुलिस ने तत्काल नवजात को जिला अस्पताल पहुंचाया, जहां प्राथमिक उपचार के बाद उसे बाल कल्याण समिति (CWC) की निगरानी में बेस अस्पताल श्रीकोट रेफर कर दिया गया। ग्रामीणों में आक्रोश, कड़ी कार्रवाई की मांग घटना के बाद पूरे क्षेत्र में आक्रोश का माहौल है। ग्रामीणों और स्थानीय महिलाओं ने इस घटना को बेहद अमानवीय बताते हुए दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि किसी नवजात को इस तरह असहाय अवस्था में छोड़ना गंभीर अपराध है। पुलिस ने शुरू की जांच पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी है और नवजात को वहां छोड़ने वाले व्यक्ति या लोगों की पहचान करने का प्रयास किया जा रहा है। आसपास के क्षेत्र के लोगों से पूछताछ की जा रही है और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जा रही है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू करने को लेकर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना रुख स्पष्ट किया है। केंद्र ने ऐसी व्यवस्था लागू करने की मांग वाली याचिका का विरोध करते हुए कहा कि SC/ST आरक्षण के लाभार्थियों को आर्थिक आधार पर अलग करने का मुद्दा नीति और कानून बनाने के क्षेत्र में आता है और इस पर फैसला संसद को करना है। केंद्र ने क्रीमी लेयर लागू करने की मांग का किया विरोध केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने जवाब में SC/ST समुदायों के भीतर आर्थिक आधार पर उप-कोटा या क्रीमी लेयर तय करने की मांग का विरोध किया। सरकार का तर्क है कि SC, ST और अन्य पिछड़े वर्गों के आरक्षण का आधार केवल आर्थिक स्थिति नहीं है। केंद्र के मुताबिक, इन समुदायों को ऐतिहासिक और सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ा है। इसलिए किसी व्यक्ति या परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार होने मात्र से सामाजिक भेदभाव की स्थिति समाप्त नहीं मानी जा सकती। संसद के अधिकार क्षेत्र का मामला बताया सरकार ने अदालत से कहा कि याचिका में मांगी गई राहत मुख्य रूप से नीतिगत विषय है। ऐसे मामलों में अदालत द्वारा सरकार या संसद को कोई विशेष नीति बनाने का निर्देश देना उचित नहीं होगा। केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से इस मामले में न्यायिक हस्तक्षेप से बचने का आग्रह किया है। सरकार का यह रुख इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि SC/ST आरक्षण में क्रीमी लेयर को लेकर पिछले कुछ वर्षों में व्यापक बहस चलती रही है। सवाल यह है कि आरक्षण का लाभ अपेक्षाकृत संपन्न वर्गों तक लगातार पहुंचने की स्थिति में क्या उसके भीतर अलग मानदंड बनाए जाने चाहिए। आर्थिक स्थिति को अकेला आधार मानने पर केंद्र की आपत्ति केंद्र ने कहा कि SC/ST समुदायों के संदर्भ में आरक्षण को केवल आय या आर्थिक स्थिति के आधार पर नहीं देखा जा सकता। सरकार के अनुसार, सामाजिक भेदभाव और ऐतिहासिक वंचना ऐसे कारक हैं जिन्हें आर्थिक स्थिति से अलग करके समझना जरूरी है। इस मामले में केंद्र का रुख यह है कि यदि SC/ST आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था में कोई बड़ा बदलाव किया जाना है तो उसके लिए उपयुक्त संवैधानिक और विधायी प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट में चल रही बहस का क्या मतलब? सुप्रीम कोर्ट में इस मुद्दे पर चल रही सुनवाई के बीच केंद्र के रुख से यह स्पष्ट हो गया है कि फिलहाल सरकार SC/ST आरक्षण में OBC की तरह क्रीमी लेयर व्यवस्था लागू करने के पक्ष में नहीं है। हालांकि, सिर्फ केंद्र के जवाब से SC/ST आरक्षण में कोई नया नियम लागू नहीं हुआ है। आगे अदालत की सुनवाई और उसके आदेश के आधार पर स्थिति स्पष्ट होगी।
नई दिल्ली, एजेंसियां। सुप्रीम कोर्ट ने दुष्कर्म के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे आसाराम को चिकित्सा आधार पर अंतरिम जमानत देने से इनकार कर दिया है। हालांकि, अदालत ने उसे जेल में 24 घंटे प्रशिक्षित निजी केयरटेकर रखने की अनुमति दी है। अदालत ने यह राहत उसकी स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों को देखते हुए दी है। मेडिकल आधार पर जमानत देने से इनकार आसाराम की ओर से खराब स्वास्थ्य का हवाला देते हुए अंतरिम जमानत की मांग की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया और फिलहाल उसे जेल से बाहर आने की अनुमति नहीं दी। आसाराम नाबालिग से यौन शोषण के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहा है। जेल में 24 घंटे केयरटेकर की अनुमति अदालत ने हालांकि आसाराम की स्वास्थ्य संबंधी देखभाल के लिए उसे अपनी पसंद का प्रशिक्षित केयरटेकर रखने की अनुमति दी है। यह केयरटेकर जेल में उसके साथ रहकर चौबीसों घंटे उसकी देखभाल कर सकेगा। अदालत का यह फैसला मेडिकल जरूरतों को ध्यान में रखते हुए सीमित राहत के तौर पर देखा जा रहा है। जमानत के लिए दोबारा रास्ता खुला रिपोर्टों के अनुसार, अंतरिम जमानत खारिज होने के बावजूद आगे उचित तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर राहत मांगने का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं हुआ है। फिलहाल आसाराम को जेल में ही रहना होगा और उसे दी गई राहत मुख्य रूप से उसकी चिकित्सा देखभाल तक सीमित है। पहले भी मिल चुकी है पैरोल इससे पहले राजस्थान हाईकोर्ट ने आसाराम को 20 दिनों की नियमित पैरोल देने का आदेश दिया था। यह उसके लिए पहली नियमित पैरोल थी। अदालत ने राज्य सरकार की ओर से पैरोल आवेदन खारिज किए जाने के फैसले को उचित नहीं माना था।