भोपाल, एजेंसियां। राजधानी भोपाल में देर रात से हो रही तेज बारिश के बीच जिला प्रशासन ने विद्यार्थियों की सुरक्षा को देखते हुए बड़ा फैसला लिया है। कलेक्टर के निर्देश पर सोमवार को नर्सरी से कक्षा 12वीं तक के सभी विद्यार्थियों का अवकाश घोषित किया गया है। यह आदेश जिले के सभी सरकारी, निजी और अनुदान प्राप्त स्कूलों पर लागू होगा।
भोपाल में लगातार बारिश के कारण कई इलाकों में जलभराव की स्थिति बन गई है। निचले क्षेत्रों में पानी भरने से लोगों को आवागमन में परेशानी हो रही है। ऐसे हालात को देखते हुए प्रशासन ने बच्चों को स्कूल आने-जाने में होने वाली संभावित परेशानी और जोखिम से बचाने के लिए छुट्टी का आदेश जारी किया।
जिला शिक्षा अधिकारी के आदेश के अनुसार, आज नर्सरी से लेकर कक्षा 12वीं तक के विद्यार्थियों को स्कूल नहीं बुलाया जाएगा। सरकारी स्कूलों के अलावा निजी और अनुदान प्राप्त विद्यालय भी इस आदेश के दायरे में हैं।
विद्यार्थियों के लिए स्कूल बंद रहेंगे, लेकिन शिक्षकों और अन्य स्कूल कर्मचारियों को निर्धारित समय पर विद्यालय पहुंचना होगा। स्कूल प्रबंधन को जिला प्रशासन के निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने को कहा गया है।
लगातार बारिश के कारण भोपाल के कई हिस्सों में सड़कों पर पानी जमा हो गया है। इससे यातायात प्रभावित हुआ है और लोगों को आने-जाने में परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। प्रशासन जलभराव वाले और निचले इलाकों की स्थिति पर नजर बनाए हुए है। फिलहाल बारिश का दौर जारी है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
जलपाईगुड़ी, एजेंसियां। पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले में बांग्लादेशी बदमाशों द्वारा कथित तौर पर अगवा किए गए भारतीय किसान दीपांकर गोप की 48 घंटे बाद भी घर वापसी नहीं हो सकी है। किसान के परिजन और स्थानीय ग्रामीण लगातार सीमा पर इंतजार कर रहे हैं। मामले को लेकर ग्रामीणों में नाराजगी बढ़ती जा रही है और उन्होंने केंद्र सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। शनिवार को हुआ था किसान का अपहरण बताया गया कि शनिवार को राजगंज ब्लॉक के कुकुर जन इलाके में चाय किसान दीपांकर गोप का कथित तौर पर बांग्लादेशी बदमाशों ने अपहरण कर लिया। इससे पहले सीमा क्षेत्र में चाय की तस्करी के प्रयास को BSF ने नाकाम किया था और इस मामले में एक बांग्लादेशी नागरिक को गिरफ्तार किया गया था। आरोप है कि इसी कार्रवाई के बाद बदले की भावना से किसान को अगवा किया गया। सीमा पर इंतजार करते रहे परिजन दीपांकर के परिवार की चिंता लगातार बढ़ती जा रही है। रविवार शाम ग्रामीणों ने चौलहाटी BSF शिविर के सामने प्रदर्शन भी किया। प्रदर्शन के दौरान स्थानीय जनप्रतिनिधियों और प्रशासन के अधिकारियों को भी लोगों के विरोध का सामना करना पड़ा। पति की रिहाई की उम्मीद में पहुंची पत्नी दीपांकर की पत्नी महामाया गोप अपने ससुर और दो बेटों के साथ सीमा द्वार संख्या 28 पर पति की वापसी की उम्मीद में पहुंचीं। उन्हें उम्मीद थी कि भारत-बांग्लादेश सीमा पर अधिकारियों की बैठक के बाद उनके पति को रिहा कर दिया जाएगा। हालांकि, बैठक के बाद जब अधिकारी बिना दीपांकर के लौटे तो परिवार को निराशा हाथ लगी। बताया गया कि दीपांकर की रिहाई के लिए कथित तौर पर फिरौती की मांग की जा रही है। यह जानकारी मिलने के बाद उनकी पत्नी के बेहोश होने की बात सामने आई है। रिहाई के बदले रखी गई कथित शर्त परिजनों के अनुसार, अपहरणकर्ताओं ने दीपांकर को वापस भेजने के बदले सीमा क्षेत्र से गिरफ्तार किए गए एक बांग्लादेशी नागरिक को वापस भेजने की कथित शर्त रखी है। इस मुद्दे पर BSF और बांग्लादेश बॉर्डर गार्ड (BGB) के अधिकारियों के बीच कई दौर की बातचीत हो चुकी है, लेकिन अब तक कोई समाधान नहीं निकल पाया है। गृह मंत्री से हस्तक्षेप की मांग दीपांकर के पिता और ग्रामीणों ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मामले में हस्तक्षेप करने की मांग की है। ग्रामीणों का कहना है कि सरकार को कूटनीतिक और सुरक्षा स्तर पर तत्काल कार्रवाई कर किसान की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित करनी चाहिए। BSF से गश्त बढ़ाने की मांग घटना के बाद स्थानीय लोगों में सीमा सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी नाराजगी है। ग्रामीणों ने सीमा क्षेत्र में BSF की गश्त फिर से बढ़ाने की मांग की है। उनका आरोप है कि गश्त कम होने से सीमा पार से होने वाली गतिविधियों को बढ़ावा मिल सकता है। फिलहाल दीपांकर गोप की सुरक्षित वापसी को लेकर परिवार और ग्रामीणों की निगाहें भारत-बांग्लादेश सीमा पर चल रही बातचीत पर टिकी हैं।
नई दिल्ली, एजेंसियां। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) के निदेशक राहुल नवीन का कार्यकाल एक साल के लिए बढ़ा दिया है। कैबिनेट की नियुक्ति समिति (ACC) ने उनके कार्यकाल में विस्तार को मंजूरी दे दी है। सरकारी आदेश के मुताबिक राहुल नवीन अब 13 अगस्त 2027 तक ED निदेशक के पद पर बने रहेंगे। हालांकि, आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया है कि उनका सेवा विस्तार उनकी सेवानिवृत्ति की तारीख 31 जुलाई 2027 के बाद या अगले आदेश तक, जो भी पहले हो, उसी के अनुसार प्रभावी रहेगा। पहली बार मिला सेवा विस्तार 1993 बैच के इंडियन रेवेन्यू सर्विस (IRS) अधिकारी राहुल नवीन सितंबर 2023 से ED का नेतृत्व कर रहे हैं। उन्हें 15 सितंबर 2023 को ED निदेशक का अतिरिक्त प्रभार दिया गया था। इसके बाद 14 अगस्त 2024 को उन्हें पूर्णकालिक ED निदेशक नियुक्त किया गया। अब यह उनका पहला सेवा विस्तार है। ED में 2019 में शामिल हुए थे राहुल नवीन राहुल नवीन नवंबर 2019 में प्रवर्तन निदेशालय में स्पेशल डायरेक्टर (OSD) के तौर पर शामिल हुए थे। उस समय उन्हें Financial Action Task Force (FATF) के साथ भारत के आपसी मूल्यांकन से जुड़े एजेंसी के काम की जिम्मेदारी दी गई थी। ED देश में वित्तीय अपराधों और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े मामलों की जांच करता है। एजेंसी Prevention of Money Laundering Act (PMLA), Foreign Exchange Management Act (FEMA) और Fugitive Economic Offenders Act (FEOA) समेत विभिन्न कानूनों के तहत कार्रवाई करती है। कई हाई-प्रोफाइल मामलों की जांच राहुल नवीन के कार्यकाल में ED ने कई चर्चित मामलों में जांच शुरू की या आगे बढ़ाई। इनमें I-PAC, रिलायंस अनिल अंबानी ग्रुप और ऑनलाइन मनी गेमिंग कंपनियों से जुड़े मामले शामिल हैं। एजेंसी ने रियल एस्टेट कंपनियों से जुड़े कथित धोखाधड़ी के मामलों में भी कार्रवाई की और PMLA के तहत जब्त संपत्तियों के जरिए पीड़ितों को राहत पहुंचाने की प्रक्रिया पर जोर दिया। अंतरराष्ट्रीय टैक्सेशन में विशेषज्ञता बिहार से ताल्लुक रखने वाले राहुल नवीन ने आयकर विभाग में करीब 30 वर्षों तक सेवा की है। उन्हें अंतरराष्ट्रीय टैक्सेशन, ट्रांसफर प्राइसिंग और डायरेक्ट टैक्सेशन से जुड़े मामलों का विशेषज्ञ माना जाता है। उन्होंने IIT कानपुर से B.Tech और M.Tech की पढ़ाई की है। इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया की Swinburne University of Technology से MBA किया है। उन्होंने प्रत्यक्ष कराधान और अंतरराष्ट्रीय टैक्सेशन से जुड़े विभिन्न विषयों पर किताबों, जर्नल और लेखों में भी योगदान दिया है। ED निदेशक का कार्यकाल मौजूदा नियमों के तहत ED निदेशक की नियुक्ति शुरुआती तौर पर दो साल के लिए की जा सकती है। इसके बाद कार्यकाल को अधिकतम तीन बार एक-एक साल के लिए बढ़ाया जा सकता है। राहुल नवीन को अब इसी व्यवस्था के तहत एक साल का सेवा विस्तार दिया गया है।
देहरादून, एजेंसियां। उत्तराखंड में सोमवार देर रात और तड़के भूकंप के झटकों से लोगों में दहशत फैल गई। उत्तरकाशी और टिहरी गढ़वाल में अलग-अलग समय पर धरती डोली। उत्तरकाशी में भूकंप की तीव्रता 4.2 और टिहरी में 2.0 मापी गई। हालांकि, दोनों स्थानों पर फिलहाल किसी तरह के जान-माल के नुकसान की सूचना नहीं है। उत्तरकाशी में 4.2 तीव्रता का तेज झटका उत्तरकाशी में सोमवार देर रात करीब 1:21 बजे भूकंप के तेज झटके महसूस किए गए। यमुना घाटी और गंगा घाटी समेत जिले के कई इलाकों में लोगों ने कंपन महसूस किया। झटका तेज होने के कारण कई लोग घबराकर अपने घरों से बाहर निकल आए और फोन कर एक-दूसरे से भूकंप की जानकारी लेने लगे। राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र के अनुसार, भूकंप की तीव्रता 4.2 रही और इसकी गहराई करीब 10 किलोमीटर थी। भूकंप का केंद्र उत्तरकाशी जिले में बड़कोट तहसील मुख्यालय के पास राजगढ़ी के आसपास बताया गया है। टिहरी में 2.0 तीव्रता का भूकंप इसके बाद टिहरी गढ़वाल के कीर्तिनगर और घनसाली क्षेत्र में भी भूकंप के हल्के झटके महसूस किए गए। यहां भूकंप की तीव्रता 2.0 रही और इसकी गहराई करीब 5 किलोमीटर दर्ज की गई। कम तीव्रता के इस भूकंप के कारण किसी तरह के नुकसान की सूचना नहीं है। प्रशासन ने की स्थिति की निगरानी उत्तरकाशी में भूकंप के झटके महसूस होने के बाद लोग कुछ समय के लिए घरों से बाहर निकल आए। जिला प्रशासन और आपातकालीन अधिकारियों ने स्थिति की जानकारी ली। फिलहाल दोनों जिलों में जान-माल के नुकसान की कोई सूचना नहीं है। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में भूकंप के झटकों को देखते हुए स्थानीय प्रशासन स्थिति पर नजर बनाए हुए है।