नई दिल्ली: फुकेट से दिल्ली आ रही एअर इंडिया की फ्लाइट AI-2379 को उड़ान के दौरान बेहद तेज टर्बुलेंस का सामना करना पड़ा। प्राथमिक जांच में सामने आया है कि विमान कुछ ही सेकेंड में तेजी से नीचे आया। करीब 36 हजार फीट की ऊंचाई पर उड़ रहे विमान की ऊंचाई में 30 सेकेंड के भीतर लगभग 425 फीट की कमी दर्ज की गई।
इस दौरान विमान की वर्टिकल स्पीड करीब माइनस 1600 फीट प्रति मिनट तक पहुंच गई। अचानक विमान के नीचे आने से सीट बेल्ट नहीं लगाए बैठे कई यात्री अपनी सीट से उछल गए और छत से जा टकराए। कुछ यात्रियों के सीटों और गलियारे में गिरने की भी जानकारी सामने आई।
प्राथमिक जांच के अनुसार, घटना के समय विमान ओडिशा के रेंगाली जलाशय के ऊपर लगभग 36 हजार फीट की ऊंचाई पर करीब 480 नॉट की रफ्तार से उड़ रहा था।
सुबह करीब 9:33:17 बजे विमान को अचानक तेज झटका लगा। इसके बाद विमान लगभग 175 फीट नीचे आया। अगले करीब 30 सेकेंड में इसकी कुल ऊंचाई में लगभग 425 फीट की कमी दर्ज की गई।
इसी दौरान विमान की गति भी करीब 22 नॉट कम हो गई। जांच में दर्ज आंकड़े बताते हैं कि टर्बुलेंस का असर कुछ ही क्षणों में विमान की ऊंचाई और गति दोनों पर पड़ा।
विमान की लंबवत गति माइनस 1600 फीट प्रति मिनट तक पहुंचने के कारण केबिन में कुछ समय के लिए यात्रियों को भारहीनता जैसी स्थिति महसूस हो सकती है।
ऐसी परिस्थिति में जो यात्री सीट बेल्ट नहीं लगाए होते हैं, उनके शरीर को अचानक ऊपर की ओर उछाल मिल सकता है। यही वजह है कि घटना के दौरान कई यात्री सीटों से उठकर छत से टकरा गए और कुछ नीचे गिर पड़े।
टर्बुलेंस के दौरान केबिन में अफरातफरी की स्थिति बन गई थी। कई यात्रियों के घायल होने की जानकारी सामने आई थी। हालांकि विमान बाद में सुरक्षित रूप से दिल्ली पहुंच गया।
एविएशन विशेषज्ञों के अनुसार, मानसून के दौरान हल्का और मध्यम टर्बुलेंस आम स्थिति हो सकती है। लेकिन क्यूम्यलोनिंबस यानी सीबी बादलों के आसपास हवा के बेहद तेज ऊपर-नीचे प्रवाह के कारण गंभीर टर्बुलेंस भी पैदा हो सकता है।
ऐसे एयर करंट में विमान को अचानक ऊपर-नीचे होने वाली तेज गति का सामना करना पड़ सकता है। इससे विमान की ऊंचाई और एयरस्पीड में कुछ समय के लिए तेजी से बदलाव संभव है।
विशेषज्ञ ऐसी स्थिति को तेज रफ्तार कार के अचानक गहरे गड्ढे में जाने जैसा बताते हैं। हालांकि विमान के लिए ऐसी स्थिति अलग तरह की होती है और पायलट इसके लिए निर्धारित सुरक्षा प्रक्रियाओं का पालन करते हैं।
इस घटना से एक बार फिर विमान में सीट बेल्ट लगाए रखने की जरूरत सामने आई है। टर्बुलेंस कब और कितनी तेजी से आएगा, इसका सटीक अनुमान हमेशा संभव नहीं होता।
इसी कारण यात्रियों को सीट बेल्ट संकेत बंद होने के बाद भी अपनी सीट पर बेल्ट बांधे रखने की सलाह दी जाती है, खासकर लंबी उड़ानों के दौरान। अचानक टर्बुलेंस की स्थिति में यही छोटा-सा सुरक्षा उपाय गंभीर चोट से बचा सकता है।
प्राथमिक जांच में सामने आई जानकारी के अनुसार:
प्राथमिक जांच के ये आंकड़े बताते हैं कि घटना के दौरान टर्बुलेंस काफी तेज था। हालांकि अंतिम जांच के बाद ही घटना की पूरी तकनीकी तस्वीर और उसके कारणों को लेकर अधिक स्पष्ट जानकारी सामने आएगी।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा के नए पुलिस महानिदेशक (DGP) के चयन की प्रक्रिया पर फिलहाल रोक लगा दी है। अदालत ने संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) को नए DGP के लिए तीन अधिकारियों के पैनल को अंतिम रूप देने वाली बैठक को 18 अगस्त तक स्थगित करने का निर्देश दिया है। चयन प्रक्रिया को लेकर उठे सवाल यह मामला ओडिशा के नए DGP की नियुक्ति प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता पी. चिदंबरम ने दलील दी कि चयन प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के प्रकाश सिंह मामले में दिए गए दिशा-निर्देशों के अनुरूप नहीं है। उन्होंने एक अधिकारी को हाल में पदोन्नति दिए जाने पर भी सवाल उठाया। हालांकि, ओडिशा के महाधिवक्ता ने नियमों के उल्लंघन के आरोपों से इनकार किया। एमिकस क्यूरी ने भी प्रक्रिया पर जताई आपत्ति सुप्रीम कोर्ट ने मामले में एमिकस क्यूरी राजू रामचंद्रन की राय भी ली। उन्होंने याचिकाकर्ता की दलीलों का समर्थन करते हुए कहा कि DGP चयन प्रक्रिया में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्देशों का पालन नहीं किया गया है। इसके बाद अदालत ने UPSC को चयन प्रक्रिया आगे बढ़ाने से रोकने का निर्देश दिया। 18 अगस्त को होगी अगली सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने मामले की अगली सुनवाई 18 अगस्त 2026 को निर्धारित की है। मौजूदा ओडिशा DGP वाई.बी. खुरानिया 16 अगस्त को सेवानिवृत्त होने वाले हैं। ऐसे में नए DGP की नियुक्ति तक राज्य में कार्यवाहक DGP की व्यवस्था किए जाने की संभावना है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने नए DGP की नियुक्ति रद्द नहीं की है, बल्कि UPSC को चयन पैनल को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया 18 अगस्त तक रोकने को कहा है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने शुक्रवार, 14 अगस्त 2026 को NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के छात्रों के खिलाफ बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) की कार्रवाई पर कड़ी नाराजगी जताई। CJI ने सवाल उठाया कि छात्रों के शांतिपूर्ण विरोध के मामले में बार काउंसिल को हस्तक्षेप करने का अधिकार किसने दिया? कोर्ट ने BCI की कार्रवाई को अनुचित बताते हुए छात्रों और फैकल्टी के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई पर अंतरिम रोक लगा दी। CJI ने कहा- छात्रों को विरोध करने का अधिकार सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने कहा कि अगर छात्र किसी मुद्दे पर अपनी आवाज उठा रहे हैं और उनका विरोध शांतिपूर्ण है, तो उन्हें ऐसा करने का अधिकार है। उन्होंने यह भी कहा कि यह मामला उनके और NALSAR के छात्रों के बीच संवाद से जुड़ा था और BCI को इसमें अनावश्यक रूप से हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए था। BCI ने पहले लिया था बड़ा फैसला विवाद की शुरुआत NALSAR के 2026 बैच के छात्रों की उस मुहिम से हुई थी, जिसमें उन्होंने CJI सूर्यकांत को विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि बनाए जाने का विरोध किया था। इसके बाद BCI ने राज्य बार काउंसिलों को 2026 बैच के छात्रों का अधिवक्ता के रूप में नामांकन रोकने का निर्देश दिया था। BCI ने वापस लिया अपना आदेश विवाद बढ़ने के बाद BCI ने अपने शुरुआती आदेश को वापस ले लिया। BCI ने बाद में कहा कि जांच में NALSAR के 2026 बैच के छात्रों की किसी गड़बड़ी या आंदोलन में भूमिका नहीं मिली, इसलिए उनके खिलाफ आगे कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी। सुप्रीम कोर्ट ने छात्रों को दी राहत सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल BCI या किसी अन्य बार काउंसिल की ओर से NALSAR छात्रों और फैकल्टी के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने BCI से इस मामले पर जवाब भी मांगा है। सुनवाई के अंत में CJI सूर्यकांत ने NALSAR के छात्रों को भविष्य में सुप्रीम कोर्ट बार से जुड़ने का निमंत्रण भी दिया।
नई दिल्ली, एजेंसियां। 15 अगस्त भारत के इतिहास का बेहद खास दिन है। स्वतंत्रता दिवस के मौके पर अगर आप घूमने का प्लान बना रहे हैं, तो इस बार ऐसी जगहों का रुख कर सकते हैं, जिनका सीधा संबंध देश के स्वतंत्रता आंदोलन से रहा है। इन ऐतिहासिक स्थलों की यात्रा आपको पर्यटन के साथ-साथ आजादी की लड़ाई और स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष को करीब से समझने का मौका भी देगी। 1. लाल किला, दिल्ली दिल्ली का लाल किला स्वतंत्रता दिवस का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है। हर साल 15 अगस्त को प्रधानमंत्री यहीं से देश को संबोधित करते हैं। आजादी के जश्न के दौरान लाल किले का माहौल खास आकर्षण का केंद्र रहता है। 2. जलियांवाला बाग, अमृतसर अमृतसर का जलियांवाला बाग 13 अप्रैल 1919 की भयावह घटना की याद दिलाता है। ब्रिटिश सैनिकों की गोलीबारी में बड़ी संख्या में निहत्थे लोग मारे गए थे। आज यह स्थल उन शहीदों की स्मृति में एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय स्मारक है। 3. सेल्युलर जेल, अंडमान ‘काला पानी’ के नाम से प्रसिद्ध सेल्युलर जेल में अंग्रेजों ने कई स्वतंत्रता सेनानियों को कैद रखा था। आज यह राष्ट्रीय स्मारक स्वतंत्रता सेनानियों के कठिन संघर्ष और बलिदान की कहानी बताता है। 4. साबरमती आश्रम, अहमदाबाद महात्मा गांधी से जुड़ा साबरमती आश्रम स्वतंत्रता आंदोलन की महत्वपूर्ण जगहों में शामिल है। 1930 में गांधीजी ने यहीं से ऐतिहासिक दांडी मार्च की शुरुआत की थी। आश्रम में उनके जीवन और सत्याग्रह से जुड़ी कई यादें मौजूद हैं। 5. दांडी, गुजरात दांडी मार्च का अंतिम पड़ाव रहा दांडी नमक सत्याग्रह के इतिहास से जुड़ा है। यहां स्थित नेशनल साल्ट सत्याग्रह मेमोरियल 1930 के आंदोलन और ब्रिटिश नमक कानून के विरोध की कहानी को सामने रखता है। 6. अगस्त क्रांति मैदान, मुंबई 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन से अगस्त क्रांति मैदान का गहरा संबंध है। इसी आंदोलन के दौरान देशभर में ‘करो या मरो’ का संदेश गूंजा था। 7. आगा खान पैलेस, पुणे भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी और कस्तूरबा गांधी समेत कई नेताओं को आगा खान पैलेस में नजरबंद रखा गया था। स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में इस जगह का विशेष महत्व है। 8. झांसी का किला, उत्तर प्रदेश झांसी का किला वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई की बहादुरी की याद दिलाता है। 1857 के विद्रोह के दौरान अंग्रेजों के खिलाफ उनके संघर्ष ने उन्हें भारतीय इतिहास की सबसे प्रसिद्ध वीरांगनाओं में शामिल कर दिया। 9. काकोरी, उत्तर प्रदेश काकोरी का नाम 1925 की काकोरी ट्रेन एक्शन से जुड़ा है। इस घटना ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ क्रांतिकारी आंदोलन को नई पहचान दी और कई क्रांतिकारियों के नाम इतिहास में दर्ज हुए। 10. चंपारण, बिहार चंपारण सत्याग्रह महात्मा गांधी के शुरुआती प्रमुख आंदोलनों में शामिल था। किसानों की समस्याओं को लेकर शुरू हुआ यह आंदोलन भारत के स्वतंत्रता संघर्ष में गांधीवादी सत्याग्रह की ताकत का महत्वपूर्ण उदाहरण बना। 11. बैरकपुर, पश्चिम बंगाल बैरकपुर का नाम मंगल पांडे और 1857 के विद्रोह से जुड़ा हुआ है। यहां की ऐतिहासिक घटनाओं ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ शुरुआती विद्रोह की कहानी को मजबूत किया। 12. चौरी चौरा, उत्तर प्रदेश 1922 की चौरी चौरा घटना ने असहयोग आंदोलन की दिशा को प्रभावित किया था। यह स्थान स्वतंत्रता आंदोलन के उस दौर की महत्वपूर्ण घटनाओं को समझने का अवसर देता है। 13. मणि भवन, मुंबई मुंबई का मणि भवन महात्मा गांधी के जीवन और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी महत्वपूर्ण जगह है। यहां गांधीजी के मुंबई प्रवास और उनके राजनीतिक-सामाजिक कार्यों से जुड़े इतिहास को देखा जा सकता है। 14. सेवाग्राम आश्रम, महाराष्ट्र वर्धा स्थित सेवाग्राम आश्रम गांधीजी के जीवन और विचारों से जुड़ा रहा है। यहां गांधीजी की सादगी और स्वतंत्रता आंदोलन में उनके योगदान को करीब से समझा जा सकता है। 15. राजघाट, दिल्ली दिल्ली का राजघाट महात्मा गांधी की समाधि है। शांत वातावरण वाला यह स्थल गांधीजी के सत्य और अहिंसा के विचारों को याद करने का महत्वपूर्ण स्थान है। 16. आनंद भवन, प्रयागराज प्रयागराज का आनंद भवन नेहरू परिवार और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास से जुड़ा है। यहां स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान हुए राजनीतिक घटनाक्रम और नेहरू परिवार से जुड़ी कई ऐतिहासिक यादें देखने को मिलती हैं। 17. नेताजी भवन, कोलकाता कोलकाता का नेताजी भवन सुभाष चंद्र बोस के जीवन और संघर्ष की यादों से जुड़ा है। नेताजी और आजाद हिंद फौज के इतिहास में रुचि रखने वाले लोगों के लिए यह एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल है। इस स्वतंत्रता दिवस इतिहास से जुड़ने का मौका भारत की आजादी केवल 15 अगस्त 1947 की एक तारीख नहीं, बल्कि दशकों तक चले आंदोलनों, संघर्षों और बलिदानों का परिणाम थी। देशभर में मौजूद ये ऐतिहासिक स्थल उस संघर्ष की अलग-अलग कहानियां आज भी लोगों तक पहुंचाते हैं। इस Independence Day इन जगहों की यात्रा करके देश के इतिहास को करीब से जानना एक यादगार अनुभव हो सकता है।