नई दिल्ली, एजेंसियां। NEET Re-Exam 2026 में शामिल होने वाले अभ्यर्थियों की सुविधा के लिए भारतीय रेलवे ने विशेष व्यवस्था की है। परीक्षा के दौरान यात्रियों की बढ़ती संख्या को देखते हुए रेलवे ने 20 और 21 जून को प्रयागराज रामबाग से गोरखपुर के बीच विशेष अनारक्षित परीक्षा ट्रेन चलाने का निर्णय लिया है। इसके साथ ही 21 जून को वाराणसी सिटी स्टेशन पर तीन नियमित ट्रेनों का अतिरिक्त ठहराव भी दिया गया है, ताकि परीक्षार्थियों को अपने परीक्षा केंद्र तक पहुंचने में किसी तरह की परेशानी न हो।
वाराणसी मंडल के जनसंपर्क अधिकारी अशोक कुमार के अनुसार, गाड़ी संख्या 05162 प्रयागराज रामबाग–वाराणसी–गोरखपुर अनारक्षित परीक्षा विशेष ट्रेन 20 जून की रात 8 बजे प्रयागराज रामबाग से रवाना होगी। यह ट्रेन झूसी, ज्ञानपुर रोड, बनारस, वाराणसी, वाराणसी सिटी, सारनाथ, औड़िहार, नंदगंज, गाजीपुर सिटी, यूसुफपुर, बलिया, सुरेमनपुर, छपरा, शामकौड़िया, मसरख, दिघवा दुबौली, गोपालगंज, थावे, सासामुसा, तमकुही रोड, पडरौना, कप्तानगंज और पिपराइच जैसे प्रमुख स्टेशनों पर रुकते हुए अगले दिन सुबह 9 बजे गोरखपुर पहुंचेगी।
रेलवे ने बताया कि इस विशेष ट्रेन के सभी डिब्बे अनारक्षित (Unreserved) होंगे, जिससे अधिक से अधिक अभ्यर्थी और उनके अभिभावक आसानी से यात्रा कर सकेंगे। इसके अलावा 21 जून को गाड़ी संख्या 19489, 11071 और 15268 का वाराणसी सिटी स्टेशन पर अतिरिक्त ठहराव भी दिया गया है।
रेल प्रशासन का कहना है कि इन विशेष व्यवस्थाओं का उद्देश्य परीक्षार्थियों को समय पर परीक्षा केंद्र तक पहुंचाना और यात्रा के दौरान भीड़भाड़ की समस्या को कम करना है। रेलवे ने अभ्यर्थियों और उनके परिजनों से अपील की है कि वे विशेष परीक्षा ट्रेन और अतिरिक्त ठहराव की सुविधा का लाभ उठाएं, ताकि बिना किसी असुविधा के समय पर अपने गंतव्य तक पहुंच सकें।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
कोलकाता, एजेंसियां। देशभर के करोड़ों किसानों के लिए बड़ी खुशखबरी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार, 20 जून को प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-Kisan) योजना की 23वीं किस्त जारी कर दी। पश्चिम बंगाल के हुगली जिले स्थित तारकेश्वर से आयोजित कार्यक्रम में प्रधानमंत्री ने डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) के माध्यम से 9.44 करोड़ से अधिक पात्र किसानों के बैंक खातों में ₹18,880 करोड़ से ज्यादा की राशि ट्रांसफर की। प्रत्येक लाभार्थी किसान के खाते में ₹2,000 की किस्त भेजी गई। सरकार के अनुसार सरकार के अनुसार, PM-Kisan योजना के तहत पात्र किसानों को हर वर्ष ₹6,000 की आर्थिक सहायता तीन समान किस्तों में प्रदान की जाती है। योजना की शुरुआत से अब तक किसानों को कुल ₹4.46 लाख करोड़ से अधिक की राशि वितरित की जा चुकी है। इसका उद्देश्य किसानों की आय बढ़ाना और कृषि कार्यों में आर्थिक सहयोग उपलब्ध कराना है। जिन किसानों को अब तक किस्त प्राप्त नहीं हुई है, वे PM-Kisan की आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर 'Beneficiary Status' या 'Know Your Status' विकल्प के माध्यम से अपनी भुगतान स्थिति जांच सकते हैं। इसके लिए मोबाइल नंबर या रजिस्ट्रेशन नंबर की आवश्यकता होगी। किन किसानों को लाभ मिलेगा ? सरकार ने स्पष्ट किया है कि केवल उन्हीं किसानों को किस्त का लाभ मिलेगा, जिन्होंने e-KYC पूरा किया है, भूमि रिकॉर्ड (Land Seeding) का सत्यापन कराया है तथा बैंक खाते को आधार और DBT से लिंक कराया है। इनमें किसी भी प्रकार की त्रुटि होने पर किस्त अटक सकती है। यदि किसी लाभार्थी को भुगतान नहीं मिला है, तो उसे e-KYC, आधार-बैंक लिंकिंग, NPCI मैपिंग और भूमि रिकॉर्ड की स्थिति की जांच करने की सलाह दी गई है। आवश्यक सुधार के बाद आगामी किस्तों का लाभ आसानी से प्राप्त किया जा सकेगा।
नई दिल्ली, एजेंसियां। बैंकिंग सेक्टर में नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए अच्छी खबर है। बैंक ऑफ बड़ौदा (Bank of Baroda) ने 5000 अप्रेंटिस पदों पर भर्ती परीक्षा के लिए एडमिट कार्ड जारी कर दिया है। जिन उम्मीदवारों ने इस भर्ती के लिए आवेदन किया था, वे अब बैंक की आधिकारिक वेबसाइट bankofbaroda.bank.in पर जाकर अपना हॉल टिकट डाउनलोड कर सकते हैं। अभ्यर्थियों को सलाह दी गई है कि परीक्षा से पहले एडमिट कार्ड डाउनलोड कर उसमें दर्ज सभी जानकारियों की जांच कर लें। ऐसे डाउनलोड करें एडमिट कार्ड उम्मीदवार सबसे पहले बैंक ऑफ बड़ौदा की आधिकारिक वेबसाइट पर जाएं। होमपेज पर Bank of Baroda Apprentice Admit Card 2026 लिंक पर क्लिक करें। इसके बाद अपना रजिस्ट्रेशन नंबर और पासवर्ड या जन्मतिथि दर्ज कर लॉगिन करें। सबमिट करते ही एडमिट कार्ड स्क्रीन पर दिखाई देगा। इसे डाउनलोड कर प्रिंटआउट सुरक्षित रख लें। 21 जून को होगी ऑनलाइन परीक्षा बैंक ऑफ बड़ौदा अप्रेंटिस भर्ती 2026 के लिए ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया 19 मई से शुरू हुई थी, जबकि आवेदन की अंतिम तिथि बढ़ाकर 15 जून 2026 कर दी गई थी। इसी दिन तक आवेदन शुल्क जमा करने की भी अंतिम तिथि निर्धारित थी। भर्ती परीक्षा का आयोजन 21 जून 2026 को किया जाएगा, जबकि एडमिट कार्ड 19 जून को जारी कर दिए गए हैं। 100 अंकों की होगी परीक्षा, नहीं होगी नेगेटिव मार्किंग चयन प्रक्रिया के तहत अभ्यर्थियों को 60 मिनट की ऑनलाइन वस्तुनिष्ठ (MCQ) परीक्षा देनी होगी। परीक्षा में कुल 100 प्रश्न पूछे जाएंगे, जिनके लिए 100 अंक निर्धारित हैं। खास बात यह है कि गलत उत्तर देने पर किसी प्रकार की नेगेटिव मार्किंग नहीं होगी। परीक्षा में चार विषयों जनरल एवं फाइनेंशियल अवेयरनेस, क्वांटिटेटिव एंड रीजनिंग एप्टीट्यूड, कंप्यूटर नॉलेज और जनरल इंग्लिश से 25-25 प्रश्न पूछे जाएंगे। प्रत्येक सेक्शन 25 अंकों का होगा। उम्मीदवारों को सलाह दी गई है कि वे परीक्षा केंद्र पर समय से पहुंचें और एडमिट कार्ड के साथ निर्धारित पहचान पत्र अवश्य लेकर जाएं।
ब्रातिस्लावा/नई दिल्ली: प्रधानमंत्री Narendra Modi ने अपने स्लोवाकिया दौरे के दौरान भारतीय संस्कृति, परंपरा और ज्ञान-विज्ञान की समृद्ध विरासत को दुनिया के सामने पेश करते हुए वहां के शीर्ष नेताओं को विशेष भारतीय उपहार भेंट किए। इस दौरान उन्होंने स्लोवाकिया की संसद के स्पीकर Richard Rasi को बिहार-झारखंड का प्रसिद्ध पारंपरिक मिष्ठान 'ठेकुआ' और आयुर्वेद के दो प्राचीन ग्रंथ- 'सुश्रुत संहिता' और 'चरक संहिता' उपहार स्वरूप दिए। स्लोवाकिया पहुंचा बिहार-झारखंड का प्रसिद्ध ठेकुआ प्रधानमंत्री मोदी ने स्लोवाकिया के स्पीकर को बिहार और झारखंड की सांस्कृतिक पहचान माने जाने वाले ठेकुआ से परिचित कराया। ठेकुआ गेहूं के आटे, गुड़ या चीनी, घी और सौंफ से तैयार किया जाने वाला पारंपरिक मिष्ठान है, जिसे विशेष रूप से छठ पर्व के दौरान प्रसाद के रूप में बनाया जाता है। अपने विशिष्ट स्वाद, लंबे समय तक सुरक्षित रहने की क्षमता और सांस्कृतिक महत्व के कारण ठेकुआ बिहार और झारखंड की खान-पान परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। यह उपहार भारतीय लोक संस्कृति और त्योहारों की समृद्ध परंपरा का प्रतीक भी है। आयुर्वेद की धरोहर: सुश्रुत संहिता और चरक संहिता प्रधानमंत्री मोदी ने स्पीकर रिचर्ड राशी को भारतीय चिकित्सा विज्ञान की अमूल्य धरोहर 'सुश्रुत संहिता' और 'चरक संहिता' भी भेंट की। Sushruta Samhita को विश्व की सबसे प्राचीन शल्य चिकित्सा (सर्जरी) संबंधी पुस्तकों में गिना जाता है। इसके रचयिता Sushruta को शल्य चिकित्सा का जनक माना जाता है। इस ग्रंथ में सर्जिकल तकनीकों, उपकरणों, शरीर रचना विज्ञान, विष विज्ञान, पोषण और पुनर्निर्माण शल्य चिकित्सा (रिकंस्ट्रक्टिव सर्जरी) जैसे विषयों का विस्तृत वर्णन मिलता है। वहीं, Charaka Samhita आयुर्वेद की आधारभूत चिकित्सा पुस्तकों में से एक है। इसमें स्वास्थ्य, रोग, मानव शरीर की कार्यप्रणाली, चिकित्सा पद्धति और निवारक स्वास्थ्य उपायों का व्यवस्थित और वैज्ञानिक विवरण दिया गया है। यह ग्रंथ भारत की प्राचीन वैज्ञानिक और बौद्धिक विरासत का महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है। राष्ट्रपति को भेंट किए थेवा मोटिफ कफलिंक प्रधानमंत्री मोदी ने स्लोवाकिया के राष्ट्रपति Peter Pellegrini को हाथ से तैयार किए गए 'थेवा मोटिफ कफलिंक' उपहार में दिए। ये कफलिंक राजस्थान के Pratapgarh की प्रसिद्ध थेवा कला का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। थेवा कला में रंगीन कांच पर बारीक नक्काशी वाली सोने की पतली परतों को जड़कर आकर्षक डिजाइन तैयार किए जाते हैं। यह भारत की पारंपरिक हस्तशिल्प विरासत और उत्कृष्ट कारीगरी का प्रतीक मानी जाती है। भारतीय संस्कृति को वैश्विक मंच पर पहुंचाने की कूटनीतिक पहल प्रधानमंत्री मोदी अपने विदेशी दौरों के दौरान अक्सर भारतीय कला, संस्कृति, परंपरा और ज्ञान-विज्ञान से जुड़े विशेष उपहार विदेशी नेताओं को भेंट करते रहे हैं। स्लोवाकिया दौरे के दौरान दिए गए ये उपहार भी भारत की सांस्कृतिक विविधता, प्राचीन वैज्ञानिक विरासत और पारंपरिक हस्तशिल्प को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने की एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक पहल के रूप में देखे जा रहे हैं।