नई दिल्ली, एजेंसियां। नीट-यूजी परीक्षा विवाद को लेकर हुए छात्र प्रदर्शनों के बाद बिहार और असम सरकार ने प्रदर्शनकारियों को बड़ी राहत देने का फैसला लिया है। दोनों राज्यों में आंदोलन के दौरान दर्ज एफआईआर और कानूनी कार्रवाई वापस लेने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। सरकारों ने कहा है कि छात्रों और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मामलों की समीक्षा कर उन्हें वापस लिया जाएगा।
बिहार सरकार ने नीट विवाद को लेकर हुए प्रदर्शनों में शामिल छात्रों और युवाओं के खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने की घोषणा की है। सरकार के अनुसार, आंदोलन से जुड़े मामलों में दर्ज एफआईआर, शिकायत और अन्य कानूनी कार्रवाई को खत्म करने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी।
इसके साथ ही प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिए गए कई युवाओं को रिहा करने की प्रक्रिया भी शुरू की गई है। सरकार ने कहा है कि छात्रों के हितों को ध्यान में रखते हुए यह फैसला लिया गया है।
बिहार के बाद असम सरकार ने भी नीट प्रदर्शन से जुड़े मामलों में राहत देने का निर्णय लिया है। असम सरकार ने आंदोलन में शामिल प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने और भविष्य में इस मामले को लेकर नई कानूनी कार्रवाई नहीं करने का आश्वासन दिया है। इस फैसले को छात्रों के आंदोलन के बाद सरकार की ओर से उठाया गया महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
नीट परीक्षा में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक के आरोपों को लेकर देश के कई हिस्सों में छात्रों ने प्रदर्शन किया था। प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांग परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता, दोषियों पर कार्रवाई और छात्रों पर दर्ज मामलों को वापस लेना थी। छात्र संगठनों का कहना था कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले कई युवाओं पर भी मामले दर्ज किए गए, जिससे उनके भविष्य पर असर पड़ सकता है।
नीट विवाद को लेकर विपक्षी दलों और छात्र संगठनों ने सरकार पर लगातार दबाव बनाया था। प्रदर्शनकारियों पर दर्ज मामलों को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे थे। अब बिहार और असम सरकार के इस फैसले के बाद छात्रों को राहत मिलने की उम्मीद है। हालांकि, परीक्षा में कथित गड़बड़ियों की जांच और सुधार की मांग अभी भी जारी है।
अब दोनों राज्यों में प्रशासनिक स्तर पर एफआईआर और अन्य मामलों की समीक्षा कर उन्हें वापस लेने की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। छात्रों और अभिभावकों की नजर इस बात पर है कि कितने मामलों में कार्रवाई वापस ली जाती है और कितने युवाओं को राहत मिलती है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
इटावा। उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में शादी के महज 20 दिन बाद एक युवक की आत्महत्या और उसकी पत्नी के आत्महत्या के प्रयास का मामला सामने आया है। परिजनों का आरोप है कि युवक ने अपनी पत्नी को कथित प्रेमी के साथ भागने की कोशिश करते हुए पकड़ लिया था, जिसके बाद मानसिक तनाव में आकर उसने फंदा लगाकर जान दे दी। वहीं पति की मौत की सूचना मिलने पर पत्नी ने भी नींद की गोलियां खाकर आत्महत्या का प्रयास किया। प्रेमी के साथ भागने का आरोप मृतक के परिजनों का दावा है कि बाजार के दौरान पत्नी ने अपने कथित प्रेमी को लोकेशन भेजकर बुलाया था। आरोप है कि युवक के लस्सी लेने जाते ही प्रेमी बाइक लेकर पहुंचा और पत्नी उसके साथ जाने लगी, लेकिन पति ने मौके पर दोनों को देख लिया। इस दौरान कथित प्रेमी फरार हो गया और घटना के बाद दोनों के बीच विवाद हुआ। पेड़ से लटका मिला युवक का शव परिजनों के अनुसार, घटना के अगले दिन युवक ने गांव के पास पेड़ से फंदा लगाकर आत्महत्या कर ली। सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची, शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेजा और जांच शुरू कर दी। पत्नी ने भी किया आत्महत्या का प्रयास पति की मौत की खबर मिलने के बाद पत्नी ने कथित तौर पर नींद की गोलियां खा लीं। उसे जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां इलाज के दौरान हंगामे की स्थिति बन गई। सुरक्षा के मद्देनजर अस्पताल में महिला पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई है। समझौते की भी चल रही थी तैयारी परिजनों का कहना है कि दोनों परिवारों के बीच विवाद सुलझाने की बातचीत चल रही थी और स्टांप पेपर पर समझौते की तैयारी भी थी। हालांकि इससे पहले ही युवक ने आत्मघाती कदम उठा लिया। पुलिस सभी पहलुओं की कर रही जांच पुलिस का कहना है कि प्रथम दृष्टया मामला पारिवारिक विवाद से जुड़ा प्रतीत होता है। वायरल वीडियो, परिजनों के आरोप, दोनों पक्षों के बयान और अन्य साक्ष्यों के आधार पर जांच की जा रही है। जांच पूरी होने के बाद आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
दिल्ली के जंतर-मंतर पर 20 जुलाई को हुए CJP (Cockroach Janta Party) के 'संसद चलो' मार्च के दौरान हुई हिंसा के मामले में दिल्ली पुलिस ने जांच तेज कर दी है। पुलिस ने दावा किया है कि प्रदर्शन में शामिल 2,873 लोगों की पहचान कर ली गई है। इनमें से 989 लोगों का आपराधिक रिकॉर्ड सामने आया है। फेशियल रिकग्निशन सिस्टम से हुई पहचान दिल्ली पुलिस के मुताबिक, प्रदर्शन में शामिल लोगों की पहचान फेशियल रिकग्निशन सिस्टम (FRS) और अन्य तकनीकी माध्यमों की मदद से की गई। जांच में सामने आया कि कई लोग पहले से विभिन्न आपराधिक मामलों में आरोपी रह चुके हैं। हत्या, पॉक्सो और लूट जैसे मामलों के आरोपी शामिल होने का दावा पुलिस का कहना है कि चिन्हित किए गए 989 लोगों में हत्या, यौन अपराध, POCSO और लूट जैसे गंभीर मामलों के आरोपी भी शामिल हैं। पुलिस के अनुसार, इनमें से कुछ लोग आंदोलन स्थल पर कई बार देखे गए और उनके खिलाफ पहले से संगीन मामले दर्ज हैं। 20 जुलाई की हिंसा में 118 पुलिसकर्मी घायल दिल्ली पुलिस के अनुसार, 20 जुलाई को प्रदर्शन के दौरान हुई झड़पों में 118 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए थे। घायलों में स्पेशल कमिश्नर, जॉइंट कमिश्नर, एडिशनल कमिश्नर, डीसीपी, एडिशनल डीसीपी और एसीपी रैंक के अधिकारी, साथ ही कई महिला पुलिसकर्मी भी शामिल थीं। करीब 60 प्रदर्शनकारी भी हुए घायल पुलिस के मुताबिक, झड़प के दौरान करीब 60 प्रदर्शनकारी भी घायल हुए थे। हिंसा के दौरान पुलिस वाहनों में तोड़फोड़ और सुरक्षाकर्मियों पर हमला किए जाने के आरोप लगाए गए हैं। मामले की जांच जारी दिल्ली पुलिस ने बताया कि घटना से जुड़े विभिन्न मामलों में अलग-अलग एफआईआर दर्ज कर जांच की जा रही है। पुलिस का कहना है कि तकनीकी और डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर आगे भी कार्रवाई जारी रहेगी। वहीं, इन दावों पर संबंधित पक्षों की प्रतिक्रिया और जांच की न्यायिक प्रक्रिया अभी जारी है।
Mohammad Irfan Viral Video: दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए CJP (Cockroach Janta Party) आंदोलन के दौरान एक फेरीवाले मोहम्मद इरफान की बातें सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गईं। लोकतंत्र, संविधान और मजदूरों के अधिकारों पर उनकी बेबाक राय ने लोगों का ध्यान खींचा। अब कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी भी उनसे मिलने उनके घर पहुंचे। फेरी लगाकर करते हैं गुजारा, Google Voice Search से सीखा संविधान करीब 35 वर्षीय मोहम्मद इरफान दिल्ली की एक झुग्गी बस्ती में रहते हैं और फेरी लगाकर अपना जीवनयापन करते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, वह कभी स्कूल नहीं गए, लेकिन Google Voice Search के जरिए संविधान, लोकतंत्र और श्रमिकों के अधिकारों से जुड़ी जानकारी हासिल करते हैं। उनकी समझ और तर्कों ने CJP आंदोलन के दौरान लोगों को प्रभावित किया। राहुल गांधी ने की मुलाकात कांग्रेस ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर राहुल गांधी और मोहम्मद इरफान की मुलाकात का वीडियो साझा किया। पोस्ट में कांग्रेस ने लिखा कि "मोहम्मद इरफान जैसे लाखों युवा ही देश की असली उम्मीद हैं—जिज्ञासु, संवेदनशील और अपने अधिकारों व कर्तव्यों के प्रति सजग।" वीडियो में राहुल गांधी इरफान से बातचीत करते नजर आए। इस दौरान इलाके के लोगों ने भी उनका स्वागत किया। एक अन्य पोस्ट में कांग्रेस ने कहा कि इरफान जैसे युवाओं की आवाज देश के उन लाखों युवाओं की भावनाओं को सामने लाती है, जो रोजगार, शिक्षा और अवसरों को लेकर चिंतित हैं। पार्टी ने ऐसे युवाओं के साथ खड़े रहने का भरोसा भी जताया। भगत सिंह की कविताएं सुनाकर भी बटोरी सुर्खियां रिपोर्ट के अनुसार, बातचीत के दौरान मोहम्मद इरफान ने शहीद भगत सिंह की कविताओं की पंक्तियां भी सुनाईं। उनकी वैचारिक समझ और आत्मविश्वास ने कई लोगों को प्रभावित किया और सोशल मीडिया पर उनके वीडियो तेजी से वायरल होने लगे। CJP आंदोलन से मिली पहचान दिल्ली के जंतर-मंतर पर अभिजीत दिपके के नेतृत्व में हुए CJP आंदोलन के दौरान मोहम्मद इरफान ने एक इंटरव्यू दिया था। उसी इंटरव्यू के वायरल होने के बाद वह चर्चा में आ गए। अब उनकी कहानी सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक चर्चा का विषय बनी हुई है।