अयोध्या, एजेंसियां। श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के दान राशि में कथित हेराफेरी के मामले में विशेष जांच दल (SIT) की जांच लगातार आगे बढ़ रही है। इस बीच ट्रस्ट से जुड़े रामशंकर यादव उर्फ टिन्नू यादव के अचानक सार्वजनिक रूप से सामने आकर बयान देने से मामले ने नया मोड़ ले लिया है। पिछले कई दिनों से चुप्पी साधे टिन्नू के वीडियो बयान और मीडिया इंटरव्यू के बाद इस पूरे घटनाक्रम को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। सूत्रों का मानना है कि यह कदम किसी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हो सकता है।
सूत्रों के मुताबिक जांच के दायरे में ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय, ट्रस्टी अनिल मिश्रा, टिन्नू यादव और मंदिर निर्माण से जुड़े गोपाल राव सहित कई लोग हैं। जांच एजेंसियां दान राशि के प्रबंधन, उसकी गणना और निगरानी से जुड़े सभी पहलुओं की पड़ताल कर रही हैं। बताया जा रहा है कि एसआईटी कई अधिकारियों और कर्मचारियों से बार-बार पूछताछ कर रही है।
जांच के दौरान एसआईटी को ऐसे संकेत मिले हैं जिनसे सीसीटीवी फुटेज से कथित छेड़छाड़ की आशंका जताई जा रही है। हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है। इसके अलावा दान राशि की गणना प्रक्रिया में शामिल बैंक कर्मियों की भूमिका और संभावित लापरवाही की भी जांच की जा रही है। सूत्रों के अनुसार बैंक कर्मचारी ट्रस्ट पदाधिकारियों के दबाव में होने के कारण कई मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर सके।
एसआईटी अब तक 125 से अधिक लोगों से पूछताछ कर चुकी है और करीब 200 लोगों की सूची तैयार की गई है। टिन्नू यादव से भी लंबी पूछताछ हुई है, जिसमें उन्होंने दान राशि के प्रबंधन में अपनी भूमिका से इनकार करते हुए कुछ अन्य लोगों की जिम्मेदारी का उल्लेख किया है।
इसी बीच 19 जून को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का अयोध्या दौरा प्रस्तावित है। उनका यह दौरा ऐसे समय हो रहा है जब मंदिर की दान राशि में कथित गड़बड़ी की जांच जारी है। वहीं, इस मामले में एफआईआर दर्ज होगी या जांच पूरी होने के बाद आगे की कार्रवाई होगी, इस पर अभी स्थिति स्पष्ट नहीं है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। भारतीय रेलवे में वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का मामला सामने आया है। रिपोर्टों के अनुसार, 5 वरिष्ठ रेल अधिकारियों को अनिवार्य सेवानिवृत्ति (VRS) दी गई है। यह कार्रवाई अधिकारियों के प्रदर्शन और प्रशासनिक जिम्मेदारियों के निर्वहन से जुड़े मामलों के बीच की गई बताई जा रही है। वरिष्ठ अधिकारियों पर हुई कार्रवाई रेलवे में अधिकारियों के कामकाज और प्रदर्शन की लगातार समीक्षा की जाती है। इसी प्रक्रिया के तहत संबंधित अधिकारियों के सेवा रिकॉर्ड और प्रदर्शन का आकलन किया गया। इसके बाद पांच वरिष्ठ अधिकारियों को सेवा से समय से पहले हटाने का फैसला लिया गया। अनिवार्य सेवानिवृत्ति का प्रावधान सरकारी सेवा नियमों के तहत उपलब्ध है। इसका इस्तेमाल ऐसे मामलों में किया जा सकता है जहां सरकार किसी अधिकारी को निर्धारित उम्र या सेवा अवधि पूरी होने से पहले सार्वजनिक हित में सेवानिवृत्त करने का निर्णय लेती है। रेलवे में प्रदर्शन को लेकर सख्ती रेलवे देश के सबसे बड़े परिवहन नेटवर्क में शामिल है और यात्री सुरक्षा, ट्रेन संचालन तथा बुनियादी ढांचे से जुड़े कार्यों में अधिकारियों की जिम्मेदारी महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में रेलवे प्रशासन की ओर से अधिकारियों के कामकाज की निगरानी और जवाबदेही पर लगातार जोर दिया जा रहा है। लापरवाही या निर्धारित जिम्मेदारियों को ठीक से नहीं निभाने के मामलों में विभागीय स्तर पर कार्रवाई की जा सकती है। अनिवार्य सेवानिवृत्ति का क्या मतलब है अनिवार्य सेवानिवृत्ति (Compulsory Retirement) सामान्य इस्तीफे या स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति से अलग होती है। इसमें सक्षम प्राधिकारी सरकारी सेवा नियमों के तहत किसी कर्मचारी या अधिकारी को निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार समय से पहले सेवानिवृत्त कर सकता है। हालांकि, किसी अधिकारी को अनिवार्य सेवानिवृत्ति दिया जाना अपने आप में आपराधिक दोष सिद्ध होने के बराबर नहीं है। इसलिए कार्रवाई के आधिकारिक कारण और संबंधित आदेश को देखकर ही इसे किसी विशेष लापरवाही या गलती से जोड़ना उचित होगा। रेलवे में जवाबदेही बढ़ाने का संदेश पांच वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ हुई कार्रवाई को रेलवे में जवाबदेही और प्रदर्शन को लेकर बढ़ती सख्ती के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। इससे अन्य अधिकारियों को भी अपने कार्यों और जिम्मेदारियों के प्रति अधिक सतर्क रहने का संदेश मिल सकता है। हालांकि, इस मामले में पांचों अधिकारियों के नाम, पद और अनिवार्य सेवानिवृत्ति के विस्तृत कारणों की पुष्टि संबंधित आधिकारिक आदेश से करना जरूरी है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। संसद के मानसून सत्र में विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) संशोधन विधेयक, 2026 को लेकर सियासी हलचल बढ़ने की संभावना है। केंद्र सरकार इस विधेयक को सोमवार को लोकसभा में आगे बढ़ाने की तैयारी में है। विधेयक का उद्देश्य विदेशी चंदे से जुड़े संगठनों की संपत्तियों और फंड के प्रबंधन को लेकर मौजूदा नियमों को और मजबूत करना है। FCRA नियमों में बड़े बदलाव का प्रस्ताव FCRA संशोधन विधेयक में ऐसे संगठनों की विदेशी फंड से बनाई गई संपत्तियों को लेकर नया प्रावधान प्रस्तावित है, जिनका FCRA पंजीकरण रद्द, निलंबित या नवीनीकरण नहीं किया गया हो। इसके लिए केंद्र सरकार द्वारा एक नामित प्राधिकरण नियुक्त करने का प्रस्ताव है, जिसे ऐसी संपत्तियों को अपने नियंत्रण में लेने, उनका प्रबंधन करने या जरूरत पड़ने पर उन्हें बेचने की शक्ति मिल सकती है। मार्च में लोकसभा में पेश हो चुका है विधेयक Foreign Contribution (Regulation) Amendment Bill, 2026 को सरकार ने 25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किया था। अब मानसून सत्र में इस पर आगे की विधायी प्रक्रिया होने की संभावना है। विधेयक विदेशी अंशदान से जुड़ी निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने और FCRA प्रमाणपत्र समाप्त होने की स्थिति में संगठनों की संपत्तियों को लेकर स्पष्ट व्यवस्था बनाने पर केंद्रित है। विपक्ष और संगठनों की आपत्तियों से बढ़ सकती है सियासत विधेयक के प्रावधानों को लेकर कुछ विपक्षी दलों, चर्च संगठनों और गैर-सरकारी संस्थाओं ने आपत्ति जताई है। दूसरी ओर, केंद्र सरकार का कहना है कि प्रस्तावित बदलाव विदेशी फंडिंग की निगरानी और पारदर्शिता मजबूत करने के उद्देश्य से हैं और इन्हें किसी विशेष धार्मिक या सामाजिक समुदाय को निशाना बनाने के लिए नहीं लाया जा रहा है। संसद में टकराव के आसार FCRA संशोधन विधेयक को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच संसद में तीखी बहस होने के आसार हैं। विदेशी फंड प्राप्त करने वाले NGO, चैरिटी और अन्य संस्थाओं पर इसके संभावित प्रभाव को लेकर भी चर्चा तेज हो सकती है। सरकार जहां इसे निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने वाला कदम बता रही है, वहीं विरोध करने वाले संगठन इसके तहत सरकारी अधिकार बढ़ने को लेकर चिंता जता रहे हैं।
अहमदाबाद, एजेंसियां। गुजरात में लगातार हो रही भारी बारिश के बीच मौसम विभाग ने कई इलाकों के लिए अत्यधिक भारी बारिश की चेतावनी जारी की है। अहमदाबाद, आनंद, अरावली, भरूच, भावनगर, बोटाद, गांधीनगर, कच्छ, खेड़ा, मेहसाणा, मोरबी, पाटन, साबरकांठा, सुरेंद्रनगर और वडोदरा समेत कई जिलों में मौसम को लेकर प्रशासन को सतर्क किया गया है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने गुजरात क्षेत्र के लिए 1 अगस्त को अत्यधिक भारी बारिश और 2 अगस्त को भारी बारिश का पूर्वानुमान जारी किया है। भारी बारिश से जलभराव और बाढ़ का खतरा मौसम विभाग की चेतावनी के बाद गुजरात के निचले इलाकों में जलभराव और स्थानीय बाढ़ का खतरा बढ़ गया है। भारी बारिश से सड़क यातायात प्रभावित होने और कुछ इलाकों में सामान्य जनजीवन बाधित होने की आशंका है। प्रशासन संवेदनशील क्षेत्रों पर लगातार नजर बनाए हुए है। अहमदाबाद समेत कई जिलों में रेड अलर्ट अहमदाबाद और गुजरात के कई अन्य जिलों में अत्यधिक भारी बारिश को लेकर रेड अलर्ट की स्थिति बनी हुई है। अधिकारियों ने लोगों से मौसम की स्थिति को देखते हुए सावधानी बरतने और जरूरत नहीं होने पर जलभराव वाले इलाकों में जाने से बचने की अपील की है। वडोदरा में राहत और बचाव अभियान तेज वडोदरा में भारी बारिश के कारण स्थिति गंभीर बनी हुई है। प्रशासन ने बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों से 320 लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया है, जिनमें 47 गर्भवती महिलाएं भी शामिल हैं। राहत एवं बचाव दल संवेदनशील इलाकों में सक्रिय हैं और स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है। अगले 24 घंटे गुजरात के लिए अहम IMD के अनुसार गुजरात क्षेत्र और सौराष्ट्र-कच्छ में 1 अगस्त को अत्यधिक भारी बारिश का खतरा है, जबकि 2 अगस्त को भी भारी बारिश जारी रहने की संभावना है। इसके साथ ही गरज-चमक और बिजली गिरने की घटनाओं को लेकर भी सावधानी बरतने की जरूरत है।