पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 की तैयारियों के बीच राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। Election Commission of India द्वारा दो चरणों में मतदान की घोषणा के साथ ही सभी दलों ने अपने-अपने उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया को अंतिम रूप देना शुरू कर दिया है।
राज्य में पहले चरण का मतदान 23 अप्रैल को होगा, जबकि पूरी चुनाव प्रक्रिया के बाद 4 मई को मतगणना के साथ नतीजे घोषित किए जाएंगे। इस बीच उम्मीदवारों की पहली सूची जारी होते ही राजनीतिक समीकरणों में बड़े बदलाव के संकेत मिलने लगे हैं।
Bharatiya Janata Party ने अपनी पहली सूची में 144 उम्मीदवारों के नाम घोषित किए हैं। इस सूची में कई नए चेहरों को मौका दिया गया है, जबकि कुछ मौजूदा विधायकों को टिकट नहीं मिलने से पार्टी के भीतर हलचल बढ़ गई है।
सबसे बड़ा राजनीतिक दांव तब देखने को मिला जब पार्टी ने Suvendu Adhikari को दो महत्वपूर्ण सीटों-भवानीपुर और नंदीग्राम-से उम्मीदवार बनाया। यह सीधा मुकाबला Mamata Banerjee के खिलाफ रणनीतिक चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।
इसके अलावा, अग्निमित्रा पॉल को आसनसोल दक्षिण, सुकुमार को कूचबिहार उत्तर (आरक्षित), साबित्री बर्मन को शीतलकुची और अजय रॉय को दिनहाटा से टिकट दिया गया है।
बीजेपी की सूची में सबसे ज्यादा चर्चा उन 8 मौजूदा विधायकों को लेकर है, जिन्हें इस बार टिकट नहीं मिला। पार्टी ने 144 में से 48 सीटों पर अपने मौजूदा विधायकों में से सिर्फ 40 को दोबारा मौका दिया है।
सूत्रों के अनुसार, जिन सीटों पर बदलाव हुआ है, उनमें उत्तर बंगाल, रारह बंगाल और दक्षिण बंगाल के क्षेत्र शामिल हैं।
सबसे चौंकाने वाला फैसला दक्षिण दिनाजपुर की बालुरघाट सीट को लेकर सामने आया, जहां 2021 में जीत दर्ज करने वाले अर्थशास्त्री अशोक लाहिड़ी को टिकट नहीं दिया गया। उनके कद और पार्टी में प्रभाव को देखते हुए यह फैसला राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है।
दूसरी ओर Communist Party of India (Marxist) (सीपीएम) ने 192 सीटों के लिए उम्मीदवारों की प्रारंभिक सूची जारी की है।
हालांकि, इस सूची के सामने आने के बाद पार्टी के भीतर कुछ सीटों को लेकर असहमति देखने को मिल रही है। खासकर मुर्शिदाबाद की रानीनगर सीट और टॉलीगंज सीट पर उम्मीदवार घोषित न होने से सवाल खड़े हो गए हैं।
पार्टी की आंतरिक नीति के तहत इस बार राज्य सचिव मंडल के अधिकांश सदस्य चुनाव नहीं लड़ेंगे। इसी कारण Mohammad Salim और Sujan Chakraborty जैसे नेताओं की उम्मीदवारी पर संशय बना हुआ है।
हालांकि, Minakshi Mukherjee को अपवाद के रूप में हुगली की उत्तरपाड़ा सीट से उम्मीदवार बनाया गया है।
राज्य में इस बार मुकाबला त्रिकोणीय होने की संभावना है। एक ओर All India Trinamool Congress लगातार सत्ता बरकरार रखने की कोशिश में है, तो वहीं बीजेपी बदलाव का दावा कर रही है। दूसरी ओर वाम मोर्चा भी अपनी खोई जमीन वापस पाने के लिए सक्रिय हो गया है।
उम्मीदवारों की पहली सूची के बाद यह साफ हो गया है कि इस चुनाव में रणनीतिक बदलाव, नए चेहरे और अंदरूनी समीकरण बड़ी भूमिका निभाने वाले हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की 82वीं जयंती पर कांग्रेस नेताओं ने वीर भूमि पहुंचकर उन्हें श्रद्धांजलि दी। कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी, लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने राजीव गांधी की समाधि पर पुष्पांजलि अर्पित की। वीर भूमि पर कांग्रेस नेताओं ने किया नमन 20 अगस्त को राजीव गांधी की जयंती के अवसर पर सुबह कांग्रेस के वरिष्ठ नेता वीर भूमि पहुंचे। सोनिया गांधी के नेतृत्व में नेताओं ने पूर्व प्रधानमंत्री को श्रद्धांजलि दी और उनके सार्वजनिक जीवन तथा देश के लिए किए गए कार्यों को याद किया। राहुल गांधी ने पिता को किया याद राहुल गांधी ने अपने पिता राजीव गांधी को याद करते हुए कहा कि उनके दिए संस्कार और उनकी यादें उनके लिए ताकत हैं। उन्होंने राजीव गांधी के एकजुट और प्रगतिशील भारत के सपने को आगे बढ़ाने का संकल्प दोहराया। खड़गे ने राजीव गांधी के योगदान को याद किया कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने राजीव गांधी की विरासत को याद करते हुए युवा शक्ति, तकनीकी प्रगति और नए विचारों में उनके विश्वास का उल्लेख किया। कांग्रेस ने उन्हें आधुनिक भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला नेता बताया। प्रधानमंत्री मोदी और उपराष्ट्रपति ने भी दी श्रद्धांजलि राजीव गांधी की जयंती पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने भी उन्हें श्रद्धांजलि दी। दोनों ने पूर्व प्रधानमंत्री के सार्वजनिक जीवन और राष्ट्र के लिए योगदान को याद किया।
नई दिल्ली, एजेंसियां। केंद्रीय मंत्रिमंडल की 19 अगस्त 2026 को हुई बैठक में केंद्रीय मंत्रियों के सोशल मीडिया प्रदर्शन की समीक्षा की गई और उन्हें डिजिटल प्रदर्शन का रिपोर्ट कार्ड दिया गया। रिपोर्ट में सोशल मीडिया पर मंत्रियों की सक्रियता, पोस्ट की संख्या, लोगों की प्रतिक्रिया, लाइक्स और फॉलोअर्स समेत कई मानकों का आकलन किया गया। इस आकलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सबसे आगे रहे। 1 मई से 15 अगस्त तक के प्रदर्शन का आकलन रिपोर्ट के लिए 1 मई से 15 अगस्त 2026 तक की सोशल मीडिया गतिविधियों का विश्लेषण किया गया। इसमें मंत्रियों के Facebook, X और Instagram जैसे प्रमुख प्लेटफॉर्म पर प्रदर्शन को देखा गया। पोस्ट की औसत संख्या, कुल एंगेजमेंट, प्रति पोस्ट औसत एंगेजमेंट, लाइक्स और फॉलोअर्स जैसे आंकड़ों को मूल्यांकन में शामिल किया गया। युवाओं से जुड़ने पर जोर प्रधानमंत्री मोदी ने मंत्रियों से सोशल मीडिया पर अपनी मौजूदगी और जनता से सीधे संवाद को और मजबूत करने को कहा। खास तौर पर Gen Z और Gen Alpha जैसे युवा वर्ग तक पहुंच बढ़ाने पर जोर दिया गया है। इसके अलावा मंत्रियों को विश्वविद्यालयों और सरकारी स्कूलों में जाकर युवाओं से संवाद करने का निर्देश भी दिया गया। केवल फॉलोअर्स नहीं, एंगेजमेंट भी महत्वपूर्ण रिपोर्ट कार्ड में सिर्फ फॉलोअर्स की संख्या को आधार नहीं बनाया गया। मंत्रियों के पोस्ट पर लोगों की वास्तविक भागीदारी और प्रतिक्रिया को भी महत्वपूर्ण मानदंड बनाया गया। सरकार की डिजिटल रणनीति का उद्देश्य सोशल मीडिया को जनता और खासकर युवा मतदाताओं से संवाद का प्रभावी माध्यम बनाना है। PM मोदी सोशल मीडिया पहुंच में शीर्ष पर रिपोर्ट के अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केंद्रीय मंत्रियों के बीच सोशल मीडिया पहुंच के मामले में पहला स्थान हासिल किया। यह समीक्षा ऐसे समय हुई है जब सरकार युवाओं के साथ डिजिटल माध्यमों से संवाद बढ़ाने और सोशल मीडिया पर अपनी पहुंच मजबूत करने पर विशेष ध्यान दे रही है।
मुंबई, एजेंसियां। महाराष्ट्र सरकार ने प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़े ‘महाराष्ट्र गवर्नमेंट रूल्स ऑफ बिजनेस, 2026’ में बदलाव किया है। नए नियमों के तहत मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को किसी भी मंत्री द्वारा लिए गए फैसले की समीक्षा करने और व्यापक जनहित में जरूरत पड़ने पर उसे बदलने या पलटने का अधिकार मिल गया है। मुख्यमंत्री को मिला हस्तक्षेप का अधिकार नए नियमों के अनुसार, यदि किसी मंत्री का निर्णय व्यापक जनहित के प्रतिकूल माना जाता है या उसमें स्पष्ट त्रुटि दिखाई देती है, तो मुख्यमंत्री उस फैसले में हस्तक्षेप कर सकते हैं। मुख्यमंत्री द्वारा किसी फैसले को बदलने की स्थिति में उसके कारणों को लिखित रूप में दर्ज करना अनिवार्य होगा। हालांकि, संबंधित विभाग के रोजमर्रा के कामकाज की प्राथमिक जिम्मेदारी उसी मंत्री के पास रहेगी। यानी नए प्रावधान से मंत्रियों की विभागीय जिम्मेदारी खत्म नहीं होती, लेकिन मुख्यमंत्री को उनके महत्वपूर्ण फैसलों पर अंतिम हस्तक्षेप का अधिकार मिलता है। कैबिनेट के भीतर शक्ति संतुलन पर बहस इस बदलाव के बाद महाराष्ट्र की राजनीति में कैबिनेट के भीतर शक्ति संतुलन को लेकर चर्चा तेज हो गई है। खास तौर पर महायुति सरकार में बीजेपी, शिवसेना और एनसीपी के मंत्रियों के बीच निर्णय लेने की प्रक्रिया पर इसका असर पड़ने की संभावना पर राजनीतिक बहस शुरू हो गई है। इस प्रावधान के समर्थकों का तर्क है कि इससे सरकार के महत्वपूर्ण फैसलों में जवाबदेही और समन्वय बढ़ सकता है, जबकि आलोचकों को आशंका है कि इससे राज्य की कैबिनेट व्यवस्था में निर्णय लेने की शक्ति मुख्यमंत्री कार्यालय के आसपास अधिक केंद्रित हो सकती है। पहले भी उठा था अधिकारों को लेकर विवाद यह बदलाव पूरी तरह नया मुद्दा नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार, करीब तीन साल पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के कार्यकाल में भी मंत्री के फैसले को मुख्यमंत्री द्वारा पलटने से जुड़ा विवाद सामने आया था। उस समय बॉम्बे हाई कोर्ट ने संबंधित निर्णय को रद्द कर दिया था। अब फडणवीस सरकार ने नियमों में स्पष्ट प्रावधान जोड़कर मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप की व्यवस्था की है। फैसलों पर मुख्यमंत्री की नजर बढ़ेगी नए नियम लागू होने के बाद महाराष्ट्र में विभागीय फैसलों की निगरानी में मुख्यमंत्री की भूमिका पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकती है। हालांकि, मुख्यमंत्री को किसी मंत्री के हर फैसले को मनमाने तरीके से बदलने की खुली छूट नहीं दी गई है—जनहित का आधार और लिखित कारण महत्वपूर्ण शर्तें हैं।