रांची। झारखंड क्रिकेट के लिए गर्व की खबर है। भारतीय विकेटकीपर-बल्लेबाज ईशान किशन को दलीप ट्रॉफी 2026-27 के लिए ईस्ट जोन टीम का कप्तान बनाया गया है। 15 सदस्यीय टीम में झारखंड क्रिकेट एसोसिएशन (JSCA) के पांच खिलाड़ियों को जगह मिली है, जो राज्य के घरेलू क्रिकेट की मजबूत मौजूदगी को दर्शाता है।
बिहार के 15 वर्षीय बल्लेबाज वैभव सूर्यवंशी को ईस्ट जोन टीम का उपकप्तान नियुक्त किया गया है। कम उम्र में मिली यह जिम्मेदारी उनके शानदार प्रदर्शन का सम्मान मानी जा रही है। अब उन्हें नेतृत्व क्षमता दिखाने का भी बड़ा मौका मिलेगा।
ईस्ट जोन की टीम में कप्तान ईशान किशन के अलावा विकेटकीपर-बल्लेबाज कुमार कुशाग्र, ऑलराउंडर अनुकूल रॉय, बल्लेबाज विराट सिंह और युवा ओपनर शिखर मोहन को भी शामिल किया गया है। वहीं, शरनदीप सिंह को स्टैंडबाय खिलाड़ी बनाया गया है। टीम के कोच रतन कुमार और फिजियो रंचल चौधरी भी झारखंड से हैं, जिससे टीम में राज्य की भागीदारी और मजबूत हुई है।
ईशान किशन को कप्तानी मिलना सिर्फ उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि झारखंड क्रिकेट के लिए भी बड़ी सफलता माना जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में राज्य के खिलाड़ियों ने घरेलू क्रिकेट में लगातार बेहतरीन प्रदर्शन किया है, जिसका असर अब राष्ट्रीय स्तर पर टीम चयन में भी साफ दिखाई दे रहा है।
युवा बल्लेबाज शिखर मोहन ने पिछले रणजी ट्रॉफी सत्र में 613 रन बनाकर चयनकर्ताओं का ध्यान खींचा था। वहीं, कुमार कुशाग्र ने अपनी विकेटकीपिंग और बल्लेबाजी से प्रभावित किया। अनुकूल रॉय और विराट सिंह भी लंबे समय से घरेलू क्रिकेट में लगातार अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं। अब इन खिलाड़ियों को मोहम्मद शमी और मुकेश कुमार जैसे अनुभवी खिलाड़ियों के साथ खेलने का मौका मिलेगा, जिससे उनके खेल को और मजबूती मिलने की उम्मीद है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
सिर्फ 6 सेंटीमीटर से चूके गोल्ड, लगातार दूसरे कॉमनवेल्थ गेम्स में रजत पदक ग्लासगो, एजेंसियां। भारत के स्टार लंबी कूद एथलीट मुरली श्रीशंकर ने 2026 कॉमनवेल्थ गेम्स में पुरुषों की लंबी कूद स्पर्धा में रजत पदक (सिल्वर मेडल) जीत लिया। श्रीशंकर ने अपने सर्वश्रेष्ठ प्रयास में 8.09 मीटर की छलांग लगाई, लेकिन स्वर्ण पदक से केवल 6 सेंटीमीटर पीछे रह गए। यह कॉमनवेल्थ गेम्स में उनका लगातार दूसरा रजत पदक है। रोमांचक मुकाबले में बेहद मामूली अंतर से चूके गोल्ड श्रीशंकर शुरुआती तीन राउंड के बाद बढ़त पर थे, लेकिन चौथे राउंड में जमैका के ताजे गेल ने 8.15 मीटर की छलांग लगाकर स्वर्ण पदक अपने नाम कर लिया। वहीं, स्कॉटलैंड के स्टीफन मैकेंज़ी ने 8.08 मीटर के साथ कांस्य पदक जीता। श्रीशंकर का प्रदर्शन पूरे मुकाबले में बेहद शानदार रहा और वह अंत तक स्वर्ण की दौड़ में बने रहे। भारत के पदक अभियान को मिली मजबूती मुरली श्रीशंकर के रजत पदक से कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत के पदकों की संख्या में इजाफा हुआ। एथलेटिक्स में उनका यह प्रदर्शन भारतीय दल के लिए बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है और इससे पदक तालिका में भारत की स्थिति और मजबूत हुई है। श्रीशंकर बोले- सिल्वर से खुश हूं, लेकिन लक्ष्य गोल्ड था पदक जीतने के बाद श्रीशंकर ने कहा कि वह रजत पदक से खुश हैं, लेकिन उनका लक्ष्य स्वर्ण पदक जीतना था। उन्होंने कहा कि भविष्य की प्रतियोगिताओं में वह और बेहतर प्रदर्शन कर देश के लिए गोल्ड जीतने की कोशिश करेंगे।
ढाका, एजेंसियां। भारत के प्रस्तावित सितंबर 2026 बांग्लादेश दौरे को लेकर भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) और बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड (BCB) के बीच बातचीत जारी है। दोनों बोर्ड तीन वनडे और तीन टी20 मैचों की द्विपक्षीय सीरीज आयोजित करने की संभावनाओं पर काम कर रहे हैं। हालांकि, अंतिम फैसला दोनों देशों की सरकारों की मंजूरी और सुरक्षा संबंधी औपचारिकताओं के बाद ही लिया जाएगा। तमीम इकबाल बोले- सुरक्षा को लेकर कोई चिंता नहीं BCB अध्यक्ष तमीम इकबाल ने कहा कि "बांग्लादेश पूरी तरह सुरक्षित देश है। भारतीय टीम के लिए कभी कोई सुरक्षा खतरा नहीं रहा।" उन्होंने भरोसा जताया कि भारत का दौरा दोनों देशों के क्रिकेट संबंधों को और मजबूत करेगा तथा बोर्ड इस सीरीज को सफल बनाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहा है। सरकारी मंजूरी के बाद होगा अंतिम ऐलान तमीम ने बताया कि सीरीज को अंतिम रूप देने के लिए BCCI के साथ लगातार संपर्क बना हुआ है। हालांकि, कार्यक्रम की आधिकारिक घोषणा तभी होगी जब दोनों देशों की सरकारों से आवश्यक मंजूरी मिल जाएगी। क्रिकेट जगत की नजर फैसले पर यदि यह दौरा तय कार्यक्रम के अनुसार होता है, तो भारत और बांग्लादेश के बीच लंबे समय बाद द्विपक्षीय सफेद गेंद (व्हाइट-बॉल) सीरीज खेली जाएगी। क्रिकेट प्रशंसकों के साथ-साथ दोनों बोर्ड भी इस सीरीज को लेकर सकारात्मक रुख अपनाए हुए हैं।
ग्लासगो, एजेंसियां। कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारतीय मुक्केबाजों ने शानदार प्रदर्शन करते हुए नया इतिहास रच दिया है। भारत के 10 मुक्केबाजों ने अपने-अपने वर्ग के सेमीफाइनल में जगह बना ली है, जिसके साथ ही देश के लिए कम से कम 10 पदक पक्के हो गए हैं। कॉमनवेल्थ बॉक्सिंग में सेमीफाइनल में पहुंचने वाले सभी खिलाड़ियों को कम से कम कांस्य पदक सुनिश्चित होता है। इस उपलब्धि के साथ भारत ने बर्मिंघम 2022 में मिले 7 पदकों का रिकॉर्ड भी पीछे छोड़ दिया। एक ही दिन में छह मुक्केबाजों ने पक्का किया पदक बुधवार को सचिन सिवाच, अंकुश यादव, नरेंद्र बेरवाल, जैसमीन लम्बोरिया, साक्षी चौधरी और अरुंधति चौधरी ने अपने-अपने क्वार्टर फाइनल मुकाबले जीतकर सेमीफाइनल में प्रवेश किया। इससे पहले लवलीना बोर्गोहैन, मीनाक्षी, पूतुल सोनोवाल और संजू भी अंतिम चार में जगह बना चुके थे। इन सभी खिलाड़ियों ने भारत के लिए पदक सुनिश्चित कर दिए हैं। अब गोल्ड मेडल पर नजर भारतीय मुक्केबाज अब सेमीफाइनल और फाइनल मुकाबलों में उतरेंगे, जहां उनका लक्ष्य कांस्य को स्वर्ण में बदलना होगा। मुक्केबाजी में भारत के पास इस बार कई स्वर्ण पदक जीतने का सुनहरा अवसर माना जा रहा है। भारत के पदक अभियान को मिली बड़ी मजबूती भारतीय मुक्केबाजों के इस ऐतिहासिक प्रदर्शन से कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत के कुल पदकों की उम्मीदें काफी बढ़ गई हैं। एथलेटिक्स और वेटलिफ्टिंग के साथ अब मुक्केबाजी भी भारत के लिए सबसे सफल खेलों में शामिल हो गई है।