लंदन: मैदान पर खराब प्रदर्शन और लगातार हार किसी भी टीम का मनोबल तोड़ सकती है, लेकिन जब हार के साथ-साथ ड्रेसिंग रूम की अंदरूनी कलह भी सुर्खियां बनने लगे, तो हालात और गंभीर हो जाते हैं। इन दिनों इंग्लैंड में खेले जा रहे महिला टी20 विश्व कप में Pakistan women's national cricket team का प्रदर्शन निराशाजनक रहा है। टीम लगातार हार झेल रही है और अब खिलाड़ियों, कप्तान तथा टीम प्रबंधन के बीच मतभेदों की खबरें भी सामने आने लगी हैं।
हालांकि Pakistan Cricket Board ने इन रिपोर्ट्स पर कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है, लेकिन पाकिस्तानी मीडिया और सोशल मीडिया पर चल रही चर्चाएं टीम के भीतर बढ़ते असंतोष और अनुशासन संबंधी समस्याओं की ओर इशारा कर रही हैं।
पाकिस्तान महिला टीम का अभियान इस टूर्नामेंट में बेहद खराब रहा है। लीड्स में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ मिली हार टीम की लगातार चौथी शिकस्त थी। लगातार हार के कारण टीम अंक तालिका में संघर्ष करती नजर आ रही है।
स्थिति इतनी खराब हो चुकी है कि विश्व कप से पहले आयरलैंड और वेस्टइंडीज के साथ खेली गई त्रिकोणीय सीरीज में भी टीम जीत दर्ज नहीं कर सकी थी। पिछले कुछ वर्षों में पाकिस्तान महिला क्रिकेट का प्रदर्शन लगातार गिरा है और बड़े टूर्नामेंटों में टीम उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पाई है।
विश्लेषकों का मानना है कि मैदान पर खराब प्रदर्शन के पीछे केवल तकनीकी कमियां नहीं, बल्कि टीम के भीतर बढ़ता असंतोष भी एक बड़ा कारण बनता जा रहा है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, बांग्लादेश के खिलाफ मुकाबले से पहले टीम होटल में हुई एक घटना ने माहौल को और तनावपूर्ण बना दिया।
बताया जा रहा है कि कप्तान Fatima Sana ने सीनियर खिलाड़ी Aliya Riaz के पति के टीम होटल में ठहरने पर आपत्ति जताई थी। इसके बाद कथित तौर पर उन्हें होटल छोड़ने के लिए कहा गया।
मामले ने तब और तूल पकड़ लिया जब आलिया रियाज़ ने एक महत्वपूर्ण अभ्यास सत्र में हिस्सा नहीं लिया। कप्तान फातिमा सना इस व्यवहार को अनुशासनहीनता मानते हुए उन्हें प्लेइंग इलेवन से बाहर रखना चाहती थीं।
लेकिन टीम में मेंटर की भूमिका निभा रहे Wahab Riaz के हस्तक्षेप के बाद आलिया को अंतिम एकादश में जगह दी गई। रिपोर्ट्स के मुताबिक, बांग्लादेश से हार और खिलाड़ियों के खराब प्रदर्शन के बाद कप्तान और टीम प्रबंधन के बीच तनाव खुलकर सामने आ गया।
सूत्रों के हवाले से यह भी दावा किया जा रहा है कि टीम के भीतर कई समूह बन चुके हैं। कोचिंग स्टाफ और कुछ वरिष्ठ खिलाड़ियों के बीच तालमेल की कमी साफ दिखाई दे रही है।
कोचिंग स्टाफ का मानना है कि मैचों के लिए तैयार की गई रणनीतियां खिलाड़ियों द्वारा मैदान पर सही तरीके से लागू नहीं की जा रहीं। इससे टीम का प्रदर्शन लगातार प्रभावित हो रहा है।
क्रिकेट विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय टीम की सफलता के लिए ड्रेसिंग रूम का माहौल सकारात्मक होना बेहद जरूरी है। यदि खिलाड़ी और सपोर्ट स्टाफ एक ही दिशा में काम नहीं करते, तो उसका असर सीधे प्रदर्शन पर दिखाई देता है।
पाकिस्तानी क्रिकेट में ड्रेसिंग रूम विवाद कोई नई बात नहीं है। इससे पहले भी कई बड़े टूर्नामेंटों के दौरान टीम के भीतर मतभेद और गुटबाजी की खबरें सामने आती रही हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब टीम लगातार हारती है, तो आंतरिक मतभेद और अधिक उभरकर सामने आते हैं। यही वजह है कि मौजूदा विश्व कप में खराब प्रदर्शन के साथ-साथ ड्रेसिंग रूम विवाद भी चर्चा का विषय बन गया है।
टीम की मौजूदा स्थिति के लिए कई क्रिकेट जानकार Pakistan Cricket Board की नीतियों को भी जिम्मेदार मान रहे हैं।
पिछले कुछ वर्षों में महिला टीम के कोचिंग सेटअप में लगातार बदलाव किए गए हैं। कभी विदेशी कोचों को जिम्मेदारी दी गई, तो कभी स्थानीय दिग्गजों को मौका मिला। लेकिन लगातार बदलती रणनीतियों और नेतृत्व के कारण टीम में स्थिरता नहीं बन पाई।
विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी टीम को सफलता दिलाने के लिए लंबी अवधि की योजना और स्थिर नेतृत्व जरूरी होता है। बार-बार बदलाव करने से खिलाड़ियों का आत्मविश्वास और टीम संस्कृति दोनों प्रभावित होते हैं।
विश्व कप में पाकिस्तान महिला टीम के सामने अब केवल मैच जीतने की चुनौती नहीं है, बल्कि टीम के भीतर भरोसा और एकजुटता बनाए रखने की भी बड़ी जिम्मेदारी है।
यदि ड्रेसिंग रूम विवादों को समय रहते नहीं सुलझाया गया, तो इसका असर भविष्य के टूर्नामेंटों पर भी पड़ सकता है। आने वाले दिनों में PCB और टीम प्रबंधन इस स्थिति से कैसे निपटते हैं, इस पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
कोलकाता, एजेंसियां। भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान और पूर्व BCCI अध्यक्ष सौरव गांगुली तथा उनकी पत्नी डोना गांगुली को जान से मारने की धमकी मिलने का मामला सामने आया है। धमकी भरे पत्र मिलने के बाद गांगुली की ओर से कोलकाता पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई है। पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी है। छह महीने से मिल रहे थे धमकी भरे पत्र रिपोर्टों के मुताबिक, गांगुली और उनकी पत्नी को पिछले करीब छह महीनों से धमकी भरे पत्र मिल रहे थे। शुरुआत में इन पत्रों को गंभीरता से नहीं लिया गया, लेकिन 10 अगस्त को मिले दो पत्रों में कथित तौर पर जान से मारने की स्पष्ट धमकी दी गई। इसके बाद परिवार ने पुलिस से संपर्क किया। धमकी भरे पत्रों में सौरव गांगुली और डोना गांगुली दोनों को निशाना बनाए जाने की बात सामने आई है। कोलकाता पुलिस ने शुरू की जांच शिकायत मिलने के बाद कोलकाता पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी है। पुलिस अधिकारी धमकी भरे पत्रों के स्रोत का पता लगाने के लिए कूरियर और डिलीवरी ट्रेल की जांच कर रहे हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए सुरक्षा एजेंसियां भी सक्रिय हो गई हैं। पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि पत्र किसने भेजे और धमकी देने के पीछे क्या मकसद था। सुरक्षा व्यवस्था भी बढ़ाई गई सौरव गांगुली देश के चर्चित क्रिकेट चेहरों में शामिल हैं और उनकी पत्नी डोना गांगुली भी सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रही हैं। लगातार धमकी मिलने के कारण पुलिस मामले को गंभीरता से ले रही है और परिवार की सुरक्षा व्यवस्था की भी समीक्षा की जा रही है। फिलहाल पुलिस धमकी देने वाले व्यक्ति या समूह की पहचान करने में जुटी है। जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट हो पाएगा कि धमकी के पीछे कौन है और इसका वास्तविक उद्देश्य क्या था।
कोलंबो, एजेंसियां। श्रीलंका के खिलाफ टेस्ट सीरीज शुरू होने से पहले भारतीय टीम के अंतिम एकादश में जगह को लेकर चर्चा तेज हो गई है। सरफराज खान और ध्रुव जुरेल के बीच मध्यक्रम में स्थान को लेकर चयन का पेच फंसता दिखाई दे रहा है। साई सुदर्शन के चोटिल होकर सीरीज से बाहर होने के बाद सरफराज खान को उनकी जगह भारतीय टेस्ट टीम में शामिल किया गया है। सरफराज की वापसी से बढ़ी प्रतिस्पर्धा साई सुदर्शन के दाएं पैर के अंगूठे में चोट के कारण सीरीज से बाहर होने के बाद बीसीसीआई ने सरफराज खान को टीम में शामिल किया। लंबे समय बाद टेस्ट टीम में लौटे सरफराज के सामने अब सीधे प्लेइंग-11 में जगह बनाने की चुनौती है। रिपोर्टों के मुताबिक सरफराज को श्रीलंका की स्पिन-अनुकूल परिस्थितियों में उनकी बल्लेबाजी शैली के कारण फायदा मिल सकता है। वह स्पिन गेंदबाजी के खिलाफ स्वीप और अलग-अलग क्षेत्रों में शॉट खेलने के लिए जाने जाते हैं। गॉल की पिच पर यह क्षमता भारतीय टीम के लिए उपयोगी साबित हो सकती है। ध्रुव जुरेल भी मजबूत दावेदार दूसरी ओर, ध्रुव जुरेल का दावा भी कमजोर नहीं है। विकेटकीपर-बल्लेबाज जुरेल ने भारत के लिए टेस्ट क्रिकेट में दबाव की परिस्थितियों में अच्छा प्रदर्शन किया है। इसके अलावा हाल ही में गॉल में इंडिया ए की ओर से खेलते हुए उन्होंने नाबाद 141 रन की पारी भी खेली थी। यही वजह है कि जुरेल को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। अगर टीम प्रबंधन अतिरिक्त विकेटकीपिंग विकल्प और जुरेल की हालिया फॉर्म को प्राथमिकता देता है, तो उन्हें सरफराज पर बढ़त मिल सकती है। गॉल की पिच बनाएगी चयन का समीकरण गॉल में स्पिन गेंदबाजों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। जैसे-जैसे टेस्ट आगे बढ़ता है, पिच पर टर्न और असमान उछाल बल्लेबाजों की चुनौती बढ़ा सकता है। भारतीय टीम ने अभ्यास के दौरान भी स्पिन के खिलाफ बल्लेबाजी पर विशेष ध्यान दिया है। इसी परिस्थिति को देखते हुए टीम प्रबंधन के सामने सवाल सिर्फ यह नहीं है कि सरफराज और जुरेल में बेहतर बल्लेबाज कौन है, बल्कि यह भी है कि श्रीलंका की परिस्थितियों में कौन सा बल्लेबाजी विकल्प ज्यादा उपयोगी रहेगा। प्लेइंग-11 पर अंतिम फैसला बाकी सरफराज के टेस्ट करियर में अब तक 371 रन हैं, जबकि जुरेल ने 478 रन बनाए हैं। दोनों के आंकड़ों में बहुत बड़ा अंतर नहीं है, लेकिन दोनों की भूमिका और बल्लेबाजी शैली अलग है। मोहम्मद कैफ ने भी गॉल की परिस्थितियों को देखते हुए सरफराज को जुरेल पर प्राथमिकता देने का समर्थन किया है। हालांकि, अंतिम फैसला कप्तान शुभमन गिल, मुख्य कोच और टीम प्रबंधन को लेना है। भारत और श्रीलंका के बीच पहला टेस्ट 15 अगस्त से शुरू होना है और उससे पहले अंतिम एकादश को लेकर यह मुकाबला चर्चा का बड़ा विषय बना हुआ है।
लखनऊ, एजेंसियां। भारतीय तेज गेंदबाज भुवनेश्वर कुमार ने 2027 वनडे विश्व कप में खेलने की संभावनाओं को लेकर बड़ा बयान दिया है। लंबे समय से भारतीय टीम से बाहर चल रहे भुवनेश्वर ने साफ कहा है कि अगर चयनकर्ताओं की ओर से उन्हें टीम में वापसी का मौका मिलता है तो वह भारत के लिए खेलने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। विश्व कप खेलने के सवाल पर भुवी का जवाब 2027 वनडे विश्व कप में अपनी संभावित वापसी को लेकर पूछे गए सवाल पर भुवनेश्वर कुमार ने सकारात्मक रुख दिखाया। उन्होंने कहा कि अगर उन्हें भारतीय टीम में वापसी का मौका मिलता है तो वह इसे क्यों ठुकराएंगे। उन्होंने खुद को टीम में वापसी के लिए तैयार बताया। भुवनेश्वर का यह बयान ऐसे समय आया है जब 2027 विश्व कप के लिए भारतीय तेज गेंदबाजी विभाग में संभावित विकल्पों को लेकर चर्चा तेज है। 2026 आईपीएल में किया शानदार प्रदर्शन भुवनेश्वर कुमार ने आईपीएल 2026 में रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु (RCB) के लिए शानदार प्रदर्शन किया। उनके प्रदर्शन के बाद कई पूर्व क्रिकेटरों और विशेषज्ञों ने उन्हें 2027 वनडे विश्व कप के लिए भारतीय टीम में शामिल किए जाने की संभावना पर चर्चा शुरू की। रिपोर्टों के मुताबिक आईपीएल 2026 में भुवनेश्वर ने 28 विकेट हासिल किए। उनके अनुभव और नई गेंद के साथ प्रभावी गेंदबाजी को देखते हुए उन्हें भारतीय टीम के लिए संभावित विकल्प माना जा रहा है। 2022 के बाद नहीं खेले भारत के लिए भुवनेश्वर कुमार ने भारत के लिए अपना आखिरी अंतरराष्ट्रीय मुकाबला 2022 में खेला था। इसके बाद वह राष्ट्रीय टीम से बाहर रहे हैं। ऐसे में 2027 विश्व कप में उनकी वापसी के लिए चयनकर्ताओं के सामने उनकी मौजूदा फॉर्म और वनडे क्रिकेट में निरंतरता महत्वपूर्ण होगी। पूर्व क्रिकेटर रविचंद्रन अश्विन भी भुवनेश्वर को 2027 विश्व कप के लिए भारतीय टीम में शामिल करने के पक्ष में अपनी राय रख चुके हैं। अश्विन ने उनकी फिटनेस, अनुभव और पावरप्ले तथा डेथ ओवरों में गेंदबाजी की क्षमता को महत्वपूर्ण बताया था। वापसी के लिए घरेलू क्रिकेट भी अहम भुवनेश्वर की वापसी को लेकर सभी विशेषज्ञ एकमत नहीं हैं। पूर्व भारतीय क्रिकेटर आकाश चोपड़ा ने कहा है कि केवल टी20 प्रदर्शन के आधार पर उन्हें वनडे टीम में वापस लाना उचित नहीं होगा। उनके मुताबिक भुवनेश्वर के लिए नियमित 50 ओवर और प्रथम श्रेणी क्रिकेट खेलना महत्वपूर्ण होगा। अब भुवनेश्वर के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी फिटनेस और प्रदर्शन को लगातार बनाए रखना है। अगर वह घरेलू और अन्य प्रतिस्पर्धी क्रिकेट में अच्छा प्रदर्शन जारी रखते हैं, तो 2027 वनडे विश्व कप के लिए भारतीय टीम में वापसी की उनकी दावेदारी मजबूत हो सकती है।