अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को बड़ा राजनीतिक झटका लगा है। अमेरिकी संसद के दोनों सदनों ने एक ऐसे प्रस्ताव को मंजूरी दी है, जिसमें ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य कार्रवाई को सीमित करने और राष्ट्रपति की युद्ध संबंधी शक्तियों पर नियंत्रण लगाने की मांग की गई है। खास बात यह रही कि ट्रंप की अपनी रिपब्लिकन पार्टी के कई सांसदों ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन किया। सीनेट में 50-48 वोट से पारित हुआ प्रस्ताव अमेरिकी सीनेट में युद्ध शक्तियों (War Powers) से जुड़े इस प्रस्ताव के पक्ष में 50 वोट पड़े, जबकि 48 सांसदों ने इसका विरोध किया। मतदान के दौरान रिपब्लिकन पार्टी के चार सीनेटरों ने पार्टी लाइन से हटकर प्रस्ताव के समर्थन में मतदान किया। वहीं, दो रिपब्लिकन सांसद मतदान के समय अनुपस्थित रहे। यह प्रस्ताव राष्ट्रपति को कांग्रेस की मंजूरी के बिना किसी बड़े सैन्य संघर्ष को आगे बढ़ाने से रोकने की मंशा से लाया गया है। प्रस्ताव के पारित होने को ट्रंप प्रशासन की विदेश और सुरक्षा नीति के लिए एक राजनीतिक चुनौती माना जा रहा है। हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में भी मिला समर्थन इससे पहले अमेरिकी संसद के निचले सदन हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में भी यह प्रस्ताव पारित हो चुका है। वहां इसके समर्थन में 215 वोट पड़े, जबकि विरोध में 208 सांसदों ने मतदान किया। हाउस में भी चार रिपब्लिकन सांसदों ने डेमोक्रेट्स के साथ मिलकर प्रस्ताव का समर्थन किया था। ट्रंप की पार्टी में बढ़ी असहमति रिपब्लिकन पार्टी के भीतर इस मुद्दे पर मतभेद खुलकर सामने आए हैं। कई सांसदों का मानना है कि कांग्रेस की मंजूरी के बिना राष्ट्रपति को व्यापक सैन्य कार्रवाई का अधिकार नहीं होना चाहिए। दूसरी ओर ट्रंप समर्थक नेताओं का कहना है कि राष्ट्रपति को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में त्वरित निर्णय लेने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। क्या ट्रंप पर पड़ेगा कोई असर? हालांकि यह प्रस्ताव राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, लेकिन इसका तत्काल कानूनी प्रभाव सीमित है। यह एक ‘कॉनकरेंट रिजॉल्यूशन’ है, जिसे राष्ट्रपति के हस्ताक्षर की आवश्यकता नहीं होती और यह सीधे कानून का रूप भी नहीं लेता। व्हाइट हाउस ने प्रस्ताव को प्रतीकात्मक बताते हुए कहा है कि इसका प्रशासन की सैन्य नीति पर कोई बाध्यकारी प्रभाव नहीं पड़ेगा। प्रशासन का तर्क है कि राष्ट्रपति की संवैधानिक शक्तियों को इस तरह के प्रस्तावों से सीमित नहीं किया जा सकता। अदालत तक पहुंच सकता है मामला संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रपति और कांग्रेस की युद्ध संबंधी शक्तियों को लेकर लंबे समय से विवाद बना हुआ है। ऐसे में यदि इस प्रस्ताव को लेकर टकराव बढ़ता है तो मामला अदालतों तक पहुंच सकता है। व्हाइट हाउस पहले ही इस तरह के प्रस्तावों की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठा चुका है। ईरान के साथ जारी है कूटनीतिक बातचीत यह राजनीतिक घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते को लेकर बातचीत जारी है। दोनों देशों के बीच हाल के हफ्तों में कई दौर की वार्ताएं हुई हैं और कूटनीतिक प्रयास तेज हुए हैं। ऐसे में अमेरिकी संसद का यह संदेश संकेत देता है कि कांग्रेस का एक बड़ा वर्ग मध्य पूर्व में किसी नए सैन्य संघर्ष से बचने के पक्ष में है। अमेरिकी राजनीति में बढ़ी हलचल विश्लेषकों का मानना है कि प्रस्ताव के पक्ष में रिपब्लिकन सांसदों का मतदान ट्रंप के लिए केवल राजनीतिक झटका नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर बढ़ती असहमति का संकेत भी है। आने वाले दिनों में ईरान नीति और सैन्य शक्तियों के मुद्दे पर अमेरिका की राजनीति में बहस और तेज होने की संभावना है।
अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच अमेरिकी सीनेट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सैन्य शक्तियों को सीमित करने से जुड़े एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। इस प्रस्ताव का उद्देश्य ईरान के खिलाफ किसी भी बड़े सैन्य अभियान में राष्ट्रपति की स्वतंत्र कार्रवाई पर नियंत्रण सुनिश्चित करना है। यह फैसला ऐसे समय आया है जब ट्रंप प्रशासन ईरान के साथ संभावित शांति समझौते और क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर कूटनीतिक प्रयासों में भी जुटा हुआ है। 50-48 वोट से पारित हुआ प्रस्ताव मंगलवार को हुए मतदान में प्रस्ताव के पक्ष में 50 और विरोध में 48 वोट पड़े। दिलचस्प बात यह रही कि राष्ट्रपति ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के चार सांसदों—रैंड पॉल, सुसान कॉलिन्स, लिसा मर्कोव्स्की और बिल कैसिडी—ने डेमोक्रेट सांसदों के साथ मिलकर प्रस्ताव का समर्थन किया। वहीं, डेमोक्रेट सांसद जॉन फेटरमैन ने प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया। इस मतदान ने अमेरिकी राजनीति में ईरान नीति को लेकर दोनों दलों के भीतर मौजूद मतभेदों को भी उजागर कर दिया। प्रतिनिधि सभा से भी मिल चुकी है मंजूरी इससे पहले अमेरिकी प्रतिनिधि सभा (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स) भी इस प्रस्ताव को मंजूरी दे चुकी है। वहां यह प्रस्ताव 215-208 वोटों से पारित हुआ था। हाउस में भी कुछ रिपब्लिकन सांसदों ने पार्टी लाइन से अलग जाकर इसका समर्थन किया था। प्रस्ताव पारित होने के बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर इसकी आलोचना करते हुए समर्थक सांसदों को निशाने पर लिया था। क्या है इस प्रस्ताव का उद्देश्य? यह प्रस्ताव अमेरिकी संविधान में राष्ट्रपति और कांग्रेस के बीच युद्ध संबंधी शक्तियों के संतुलन से जुड़ा हुआ है। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि राष्ट्रपति किसी बड़े सैन्य संघर्ष में देश को शामिल करने से पहले कांग्रेस की स्वीकृति प्राप्त करें। अमेरिका में लंबे समय से यह बहस चलती रही है कि सैन्य कार्रवाई जैसे महत्वपूर्ण फैसलों में कांग्रेस की भूमिका को मजबूत किया जाना चाहिए, ताकि युद्ध संबंधी निर्णयों पर लोकतांत्रिक नियंत्रण बना रहे। क्या ट्रंप प्रशासन पर पड़ेगा कोई असर? राजनीतिक रूप से यह प्रस्ताव महत्वपूर्ण माना जा रहा है, लेकिन कानूनी दृष्टि से इसका प्रभाव सीमित है। यह एक "कॉनकरेंट रिजॉल्यूशन" है, जिसे कानून का दर्जा प्राप्त नहीं होता और न ही इसके लिए राष्ट्रपति की मंजूरी आवश्यक होती है। व्हाइट हाउस का कहना है कि इस प्रस्ताव का प्रशासन की सैन्य नीति पर कोई बाध्यकारी प्रभाव नहीं पड़ेगा। प्रशासन के अनुसार, यह केवल एक प्रतीकात्मक राजनीतिक संदेश है। व्हाइट हाउस ने बताया प्रतीकात्मक कदम व्हाइट हाउस के अधिकारियों ने प्रस्ताव को महज राजनीतिक अभिव्यक्ति बताया है। उनका कहना है कि राष्ट्रपति की संवैधानिक शक्तियों पर इसका कोई प्रत्यक्ष असर नहीं पड़ेगा और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े फैसले पहले की तरह कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में रहेंगे। प्रशासन ने यह भी दावा किया कि वर्तमान में ईरान के साथ किसी सक्रिय सैन्य संघर्ष की स्थिति नहीं है और हालिया युद्धविराम के बाद तनाव में कमी आई है। कांग्रेस में बढ़ रही सैन्य कार्रवाई को लेकर चिंता सीनेट में हुए इस मतदान ने संकेत दिया है कि कांग्रेस के कई सदस्य मध्य पूर्व में संभावित सैन्य तनाव को लेकर चिंतित हैं। सांसदों का एक वर्ग मानता है कि बिना कांग्रेस की मंजूरी के बड़े सैन्य कदम उठाने से क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ सकती है और अमेरिका लंबे संघर्ष में उलझ सकता है। इसी वजह से हाल के महीनों में ईरान से जुड़े युद्ध शक्तियों के मुद्दे पर कांग्रेस में कई बार बहस और मतदान हो चुके हैं। अमेरिका-ईरान वार्ता पर बनी हुई है नजर सीनेट के इस फैसले के बावजूद अमेरिका और ईरान के बीच कूटनीतिक बातचीत जारी है। दोनों देशों के बीच हाल में हुई वार्ताओं को क्षेत्रीय तनाव कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि सीनेट का यह प्रस्ताव भले ही कानूनी रूप से बाध्यकारी न हो, लेकिन यह स्पष्ट संकेत देता है कि अमेरिकी संसद का एक बड़ा वर्ग ईरान के खिलाफ किसी भी संभावित सैन्य कार्रवाई पर अधिक राजनीतिक और संसदीय निगरानी चाहता है।
वॉशिंगटन: अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के पाकिस्तान के प्रति नरम रुख और "हम पाकिस्तान से प्यार करते हैं" वाले बयान ने अमेरिका की घरेलू राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। वेंस के बयान के बाद दो रिपब्लिकन सीनेटरों ने पाकिस्तान और कतर की भूमिका पर सवाल उठाते हुए दोनों देशों पर आतंकवादियों को पनाह देने और चरमपंथी संगठनों को समर्थन देने के आरोप लगाए हैं। रिक स्कॉट बोले- पाकिस्तान और कतर का आतंकियों को शरण देने का इतिहास Rick Scott ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए कहा कि दुनिया को अब यह समझ जाना चाहिए कि अमेरिका के असली सहयोगी कौन हैं। उन्होंने लिखा, "कतर और पाकिस्तान का आतंकवादियों को पनाह देने का लंबा इतिहास रहा है। दोनों देश सार्थक शांति स्थापित करने के बजाय ईरान के दशकों पुराने आतंकी नेटवर्क को बढ़ावा देने में अधिक रुचि रखते हैं।" स्कॉट ने यह भी कहा कि ईरान के साथ ऐसा समझौता संभव है जो सभी पक्षों के हित में हो, लेकिन किसी भी स्थिति में तेहरान को परमाणु हथियार विकसित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। जेडी वेंस के बयान से बढ़ा विवाद विवाद की शुरुआत उस समय हुई जब JD Vance ने स्विट्जरलैंड में अमेरिका, पाकिस्तान और कतर के प्रतिनिधियों के साथ बातचीत के दौरान कहा था कि "हम पाकिस्तान से प्यार करते हैं।" वेंस उस समय ईरान के साथ संभावित शांति समझौते की तकनीकी और कूटनीतिक बारीकियों पर चर्चा कर रहे थे। उनके इस बयान के बाद रिपब्लिकन पार्टी के भीतर ही पाकिस्तान को लेकर मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। टिम शीही ने दिलाई ओसामा बिन लादेन की याद Tim Sheehy ने भी पाकिस्तान की आलोचना करते हुए कहा कि अमेरिका को उसके अतीत को नहीं भूलना चाहिए। फॉक्स न्यूज को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा, "हमें यह याद रखना चाहिए कि पाकिस्तान ने एक दशक तक ओसामा बिन लादेन को अपने यहां छिपाकर रखा था।" शीही ने यह भी आरोप लगाया कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने अतीत में ऐसे तत्वों को समर्थन दिया, जिन्होंने अमेरिकी हितों के खिलाफ काम किया। UAE, इजरायल और सऊदी अरब को बातचीत में शामिल करने की मांग सीनेटर शीही ने कहा कि यदि पाकिस्तान और कतर को मध्यस्थ की भूमिका दी जा रही है, तो अमेरिका को अपने पारंपरिक सहयोगियों को भी वार्ता प्रक्रिया में शामिल करना चाहिए। उन्होंने कहा, "संयुक्त अरब अमीरात, इजरायल और सऊदी अरब मध्य पूर्व में अमेरिका के सबसे विश्वसनीय सहयोगी हैं। किसी भी शांति प्रक्रिया में उनकी भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए।" कतर पर भी लगाए गंभीर आरोप शीही ने कतर पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वह वर्षों से विभिन्न चरमपंथी संगठनों के लिए वित्तीय नेटवर्क और मनी लॉन्ड्रिंग का केंद्र रहा है। उन्होंने कहा, "यह मान लेना कि पाकिस्तान और कतर पूरी तरह निष्पक्ष मध्यस्थ की भूमिका निभाएंगे, वास्तविकता से दूर है।" अमेरिका में पाकिस्तान की भूमिका पर फिर छिड़ी बहस रिपब्लिकन सांसदों के बयानों से साफ है कि अमेरिका में पाकिस्तान की भूमिका को लेकर पुराने सवाल एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गए हैं। जेडी वेंस के हालिया बयान के बाद वॉशिंगटन में यह बहस तेज हो गई है कि मध्य पूर्व की नई कूटनीतिक पहल में पाकिस्तान और कतर की भूमिका कितनी प्रभावी और निष्पक्ष मानी जा सकती है।
वॉशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने कतर की ओर से उपहार में मिले 400 मिलियन डॉलर मूल्य के विशेष बोइंग 747 विमान का अनावरण करते हुए इसे अपना नया अस्थायी 'एयर फोर्स वन' घोषित किया है। ट्रंप ने इस विमान को "दुनिया का सबसे आलीशान विमान" बताया और कहा कि यह अगले कुछ वर्षों तक राष्ट्रपति की आधिकारिक हवाई यात्राओं की जिम्मेदारी संभालेगा। यह घोषणा ऐसे समय में हुई है, जब 35 वर्षों तक अमेरिकी राष्ट्रपतियों की सेवा करने वाले पुराने एयर फोर्स वन विमान को हाल ही में रिटायर किया गया है। अगले NATO शिखर सम्मेलन में इसी विमान से जाएंगे ट्रंप राष्ट्रपति ट्रंप अगले महीने North Atlantic Treaty Organization के अंकारा शिखर सम्मेलन में इसी विमान से यात्रा करेंगे। यह विमान तब तक अस्थायी राष्ट्रपति विमान के रूप में उपयोग किया जाएगा, जब तक अमेरिकी वायु सेना के नए पीढ़ी के VC-25B विमान 2027-28 में सेवा में नहीं आ जाते। कतर के उपहार पर अमेरिका में छिड़ा विवाद ट्रंप ने मैरीलैंड स्थित Joint Base Andrews में लाल, सफेद, गहरे नीले और सुनहरे रंग से सजे इस विमान का अनावरण किया। इस विमान को लेकर अमेरिका में राजनीतिक विवाद भी खड़ा हो गया है। अमेरिकी नियमों के अनुसार, किसी भी सरकारी अधिकारी को एक कैलेंडर वर्ष में किसी एक स्रोत से बिना मांगे अधिकतम 50 डॉलर तक का उपहार स्वीकार करने की अनुमति है। ऐसे में 400 मिलियन डॉलर के इस विमान को स्वीकार किए जाने पर विपक्ष और नैतिकता विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं। ट्रंप बोले- इतना बड़ा प्रस्ताव ठुकराना मूर्खता होती आलोचनाओं पर प्रतिक्रिया देते हुए ट्रंप ने कहा कि इतने बड़े प्रस्ताव को ठुकराना "मूर्खता" होती। वहीं, United States Department of Defense के प्रवक्ता शॉन पार्नेल ने कहा कि कतर से विमान स्वीकार करने की प्रक्रिया सभी संघीय नियमों और प्रावधानों के अनुरूप पूरी की गई है। राष्ट्रपति विमान में बदलने पर आएगा 1 अरब डॉलर तक का खर्च विमान की मूल कीमत 400 मिलियन डॉलर है, लेकिन इसे राष्ट्रपति की सुरक्षा जरूरतों के अनुरूप पूरी तरह तैयार करने में भारी खर्च आने का अनुमान है। रिपोर्टों के मुताबिक, इस बोइंग 747 को पूर्ण राष्ट्रपति विमान में बदलने के लिए लगभग 1 अरब डॉलर का अतिरिक्त खर्च आ सकता है। इसमें उन्नत संचार प्रणाली, मिसाइल रक्षा तकनीक, साइबर सुरक्षा उपकरण और विशेष कमांड सुविधाएं शामिल की जाएंगी। उधर, नए VC-25B विमानों की डिलीवरी में देरी के कारण उनकी कुल परियोजना लागत भी बढ़कर लगभग 5 अरब डॉलर तक पहुंच चुकी है। 'दुनिया का सबसे आलीशान विमान' अनावरण समारोह के दौरान ट्रंप ने कतर के अमीर का धन्यवाद करते हुए कहा, "इसे दुनिया का सबसे आलीशान विमान माना जाता है। जब इसे बनाया गया था, तब इसे ऐसे स्तर पर तैयार किया गया था, जो शायद फिर कभी देखने को न मिले।" उन्होंने यह भी कहा कि कई विदेशी नेताओं के पास अमेरिका से अधिक आधुनिक सरकारी विमान हैं और अमेरिका को भी अपने राष्ट्रपति बेड़े को उसी स्तर पर बनाए रखना चाहिए। क्यों खास है यह विमान? कीमत: लगभग 400 मिलियन डॉलर मॉडल: विशेष रूप से तैयार किया गया बोइंग 747 भूमिका: अस्थायी एयर फोर्स वन उपयोग अवधि: 2027-28 तक अनुमानित रूपांतरण लागत: लगभग 1 अरब डॉलर पहली प्रमुख यात्रा: अंकारा में NATO शिखर सम्मेलन कतर से मिले इस लग्जरी विमान के अनावरण ने अमेरिकी राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है। एक ओर ट्रंप इसे अमेरिकी प्रतिष्ठा और आधुनिकता की जरूरत बता रहे हैं, तो दूसरी ओर विपक्ष इसे उपहार नीति, नैतिकता और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा संवेदनशील मुद्दा मान रहा है।
वॉशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और एनबीसी न्यूज की वरिष्ठ पत्रकार क्रिस्टेन वेल्कर के बीच हुए एक तीखे टीवी इंटरव्यू ने अमेरिका की राजनीतिक और मीडिया दुनिया में नई बहस छेड़ दी है। इंटरव्यू के दौरान दोनों के बीच कई मुद्दों पर तीखी नोकझोंक हुई और आखिरकार ट्रंप बातचीत बीच में ही छोड़कर स्टूडियो से बाहर निकल गए। इस घटना के बाद क्रिस्टेन वेल्कर एक बार फिर सुर्खियों में आ गई हैं। इंटरव्यू में क्या हुआ? एनबीसी के लोकप्रिय राजनीतिक कार्यक्रम ‘Meet the Press’ में बातचीत की शुरुआत विदेश नीति और ईरान से जुड़े मुद्दों पर हुई। चर्चा के दौरान ट्रंप ने एक बार फिर 2020 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव को "धांधली वाला चुनाव" बताया और दावा किया कि उनके पास इसके पर्याप्त सबूत हैं। जब क्रिस्टेन वेल्कर ने उनसे सबूतों के बारे में पूछा तो ट्रंप ने कैलिफोर्निया में देर से पूरी हुई मतगणना का उदाहरण दिया। वेल्कर ने चुनावी प्रक्रिया और नियमों का हवाला देकर उनकी बात को चुनौती दी। इसके बाद माहौल और गर्म हो गया। ट्रंप ने मीडिया पर निशाना साधते हुए कहा कि अमेरिकी मीडिया संस्थान भ्रष्ट हैं। इसी दौरान उन्होंने वेल्कर से कहा कि "या तो आप भ्रष्ट हैं या फिर मूर्ख।" बहस के बाद इंटरव्यू छोड़कर चले गए ट्रंप करीब एक घंटे तक चली बातचीत के दौरान दोनों के बीच कई बार तीखी बहस हुई। अंत में ट्रंप ने बातचीत समाप्त करने का फैसला करते हुए कहा कि अब उनके लिए काफी हो चुका है। उन्होंने अपना माइक्रोफोन उतारा और इंटरव्यू बीच में ही छोड़ दिया। स्टूडियो से बाहर जाते समय उन्होंने मीडिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए कहा कि बेईमान प्रेस किसी भी देश के लिए अच्छी नहीं होती। कौन हैं क्रिस्टेन वेल्कर? क्रिस्टेन वेल्कर अमेरिका की सबसे प्रतिष्ठित राजनीतिक पत्रकारों में से एक मानी जाती हैं। उनका जन्म 1 जुलाई 1976 को हुआ था। वह वर्तमान में NBC News की वरिष्ठ पत्रकार और अमेरिका के चर्चित राजनीतिक कार्यक्रम ‘Meet the Press’ की होस्ट हैं। सितंबर 2023 में उन्होंने इस कार्यक्रम की कमान संभाली थी। इससे पहले वह NBC के ‘Weekend Today’ शो की सह-एंकर भी रह चुकी हैं। हार्वर्ड से पढ़ाई, व्हाइट हाउस तक का सफर क्रिस्टेन ने अपनी शुरुआती पढ़ाई फिलाडेल्फिया के जर्मनटाउन फ्रेंड्स स्कूल से की। बाद में उन्होंने प्रतिष्ठित Harvard University से अमेरिकी इतिहास में स्नातक की डिग्री हासिल की। पत्रकारिता में उनका करियर स्थानीय टीवी स्टेशनों से शुरू हुआ। कई क्षेत्रीय चैनलों में काम करने के बाद वह 2005 में NBC से जुड़ीं। 2011 में उन्हें व्हाइट हाउस संवाददाता बनाया गया और उन्होंने कई अमेरिकी राष्ट्रपतियों के कार्यकाल को करीब से कवर किया। 2020 की राष्ट्रपति बहस से मिली बड़ी पहचान क्रिस्टेन वेल्कर को अंतरराष्ट्रीय पहचान 2020 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के दौरान मिली, जब उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप और Joe Biden के बीच अंतिम राष्ट्रपति बहस का संचालन किया था। कोविड-19 महामारी के दौर में आयोजित उस बहस में उनके संतुलित और सख्त संचालन की व्यापक सराहना हुई थी। कई मीडिया विश्लेषकों ने उन्हें निष्पक्ष और प्रभावी मॉडरेटर बताया था। ट्रंप से पहले भी कई बार हो चुकी है टक्कर यह पहली बार नहीं है जब क्रिस्टेन वेल्कर और ट्रंप आमने-सामने आए हों। पिछले कुछ वर्षों में वह कई बार ट्रंप का इंटरव्यू कर चुकी हैं। मई 2025 में भी उन्होंने ट्रंप से अमेरिकी संविधान और राष्ट्रपति की शक्तियों को लेकर सवाल पूछे थे, जिनके जवाबों ने काफी विवाद पैदा किया था। ताजा इंटरव्यू अब तक का सबसे तीखा माना जा रहा है। फिर चर्चा में क्यों हैं वेल्कर? ताजा इंटरव्यू के बाद अमेरिकी मीडिया और सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है। समर्थक जहां इसे पत्रकारिता की स्वतंत्रता का उदाहरण बता रहे हैं, वहीं ट्रंप समर्थक इसे पक्षपातपूर्ण पत्रकारिता करार दे रहे हैं। फिलहाल इतना तय है कि ट्रंप के वॉकआउट के बाद क्रिस्टेन वेल्कर एक बार फिर अमेरिकी राजनीति और मीडिया विमर्श के केंद्र में आ गई हैं।
Donald Trump ने एक बार फिर Cameron Hamilton पर भरोसा जताते हुए उन्हें Federal Emergency Management Agency (FEMA) का नेतृत्व करने के लिए नामित किया है। यह फैसला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि पिछले साल ट्रंप प्रशासन ने ही हैमिल्टन को FEMA के अस्थायी प्रमुख पद से हटा दिया था। क्यों हटाए गए थे हैमिल्टन? रिपोर्ट्स के मुताबिक, हैमिल्टन को उस समय हटाया गया था जब उन्होंने FEMA के अस्तित्व और उसकी जरूरत का सार्वजनिक रूप से समर्थन किया था। उस दौरान ट्रंप प्रशासन लगातार संकेत दे रहा था कि FEMA को खत्म या कमजोर किया जा सकता है। ट्रंप पहले भी एजेंसी की कार्यप्रणाली की आलोचना करते रहे हैं और कई बार इसे “अप्रभावी” बता चुके हैं। अब क्यों हुई वापसी? अगर सीनेट उनके नामांकन को मंजूरी देती है, तो हैमिल्टन: आपदा प्रबंधन मामलों में ट्रंप के मुख्य सलाहकार होंगे Markwayne Mullin के साथ मिलकर काम करेंगे प्राकृतिक आपदाओं और आपात स्थितियों के लिए FEMA की तैयारी संभालेंगे विशेषज्ञों का मानना है कि यह नियुक्ति ट्रंप प्रशासन की रणनीति में बदलाव का संकेत हो सकती है, क्योंकि अमेरिका में गर्मियों के दौरान तूफान, बाढ़ और जंगल की आग जैसी आपदाओं का खतरा बढ़ जाता है। चुनौतीपूर्ण होगी जिम्मेदारी हैमिल्टन ऐसे समय FEMA की कमान संभालने जा रहे हैं जब एजेंसी के भीतर लगातार अस्थिरता बनी हुई है। जनवरी 2025 से अब तक एजेंसी तीन अस्थायी प्रमुख देख चुकी है। इसके चलते: प्रशासनिक असमंजस नीतिगत बदलाव आपदा तैयारी को लेकर चिंता जैसे मुद्दे सामने आए हैं। FEMA क्यों अहम है? Federal Emergency Management Agency अमेरिका में: तूफान बाढ़ भूकंप जंगल की आग अन्य प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए सबसे अहम संघीय एजेंसी मानी जाती है। यह एजेंसी राज्यों को राहत, बचाव और पुनर्वास में मदद करती है। क्या है ट्रंप प्रशासन की रणनीति? ट्रंप प्रशासन के भीतर लंबे समय से यह बहस चलती रही है कि: FEMA की भूमिका सीमित की जाए राज्यों को ज्यादा जिम्मेदारी दी जाए संघीय खर्च कम किया जाए हालांकि लगातार बढ़ती प्राकृतिक आपदाओं के खतरे के बीच FEMA को पूरी तरह खत्म करना आसान नहीं माना जा रहा। अब कैमरन हैमिल्टन की वापसी को इस रूप में देखा जा रहा है कि ट्रंप प्रशासन फिलहाल एजेंसी को खत्म करने के बजाय उसे अपने तरीके से पुनर्गठित करना चाहता है।
वॉशिंगटन: Donald Trump की लोकप्रियता में गिरावट के संकेत मिल रहे हैं। एक ताजा सर्वे के मुताबिक, अमेरिका में उनकी कुल अप्रूवल रेटिंग घटकर 37% रह गई है, जबकि 66% लोग उनकी आर्थिक नीतियों से असंतुष्ट हैं। सर्वे में क्या सामने आया? ‘वॉशिंगटन पोस्ट-एबीसी न्यूज-इप्सोस’ सर्वे के अनुसार: कुल अप्रूवल रेटिंग: 37% अस्वीकृति: 62% (अब तक का उच्च स्तर) अर्थव्यवस्था पर समर्थन: 34% महंगाई पर समर्थन: 27% जीवन-यापन लागत पर समर्थन: सिर्फ 23% रिपोर्ट बताती है कि फरवरी के मुकाबले ट्रंप की लोकप्रियता में गिरावट आई है और आर्थिक मुद्दों पर जनता का भरोसा कमजोर हुआ है। ईरान नीति पर भी जनता नाराज Iran के साथ बढ़ते तनाव का असर भी ट्रंप की छवि पर पड़ा है। 66% अमेरिकियों ने ईरान से निपटने के तरीके को गलत बताया सिर्फ 33% लोगों ने उनकी नीति का समर्थन किया यह संकेत देता है कि विदेश नीति, खासकर मध्य-पूर्व को लेकर ट्रंप की रणनीति पर सवाल उठ रहे हैं। महंगाई और ईंधन कीमतों का असर अमेरिका में बढ़ती महंगाई और ईंधन की कीमतों ने आम लोगों की जेब पर असर डाला है। इसका सीधा असर ट्रंप की लोकप्रियता पर दिख रहा है। महंगाई से जुड़े मुद्दों पर 76% लोगों ने असहमति जताई जीवन-यापन की लागत सबसे बड़ा चिंता का विषय बनकर उभरी आव्रजन पर मिला मिश्रित समर्थन हालांकि United States-मेक्सिको सीमा पर ट्रंप की नीतियों को कुछ हद तक समर्थन मिला है: 45% लोगों ने आव्रजन नीति को मंजूरी दी 54% लोग इससे असहमत रहे राजनीतिक दलों पर घटा भरोसा सर्वे में यह भी सामने आया कि बड़ी संख्या में अमेरिकी किसी भी राजनीतिक दल पर भरोसा नहीं कर रहे हैं: आव्रजन: 23% को किसी दल पर भरोसा नहीं अर्थव्यवस्था: 27% अपराध: 28% महंगाई: 33% AI मुद्दा: 51% लोगों को किसी दल पर भरोसा नहीं यह रुझान अमेरिकी राजनीति में बढ़ती निराशा और अविश्वास को दिखाता है। रिपब्लिकन समर्थकों में अब भी मजबूत पकड़ हालांकि आम जनता में गिरावट के बावजूद Republican Party के समर्थकों के बीच ट्रंप की पकड़ मजबूत बनी हुई है। 85% रिपब्लिकन समर्थक अब भी उनके साथ हैं चुनाव से पहले बढ़ी चुनौती नवंबर में होने वाले चुनाव से पहले यह सर्वे Donald Trump के लिए चेतावनी माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर आर्थिक हालात और महंगाई पर नियंत्रण नहीं हुआ, तो चुनावी असर साफ दिखाई दे सकता है।
Donald Trump और Pope Leo XIV के बीच विवाद अब खुलकर सामने आ गया है। ट्रंप ने खुद को Jesus Christ जैसा दिखाते हुए एक AI तस्वीर शेयर की, जिससे नया बवाल खड़ा हो गया है। AI फोटो से छिड़ा विवाद ट्रंप ने ‘ट्रुथ सोशल’ पर जो तस्वीर शेयर की, उसमें वे लंबे चोगे में एक बीमार व्यक्ति को हाथ लगाकर ठीक करते नजर आते हैं। बैकग्राउंड में अमेरिकी झंडा, मिलिट्री प्लेन और फरिश्तों जैसी छवियां दिखती हैं–जो बाइबिल में वर्णित चमत्कारों की ओर इशारा करती हैं। पोप पर ट्रंप का हमला ट्रंप ने पोप लियो XIV को विदेशी मामलों में “बेकार” और अपराध रोकने में “कमजोर” बताया। उनका कहना है कि चर्च को राजनीति से दूर रहकर शांति पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने यह भी दावा किया कि अगर वे राष्ट्रपति न होते, तो पोप इस पद तक नहीं पहुंच पाते। ईरान-वेनेजुएला पर टकराव ईरान और वेनेजुएला के मुद्दे पर दोनों के बीच मतभेद और गहरा गया है। ट्रंप ने आरोप लगाया कि पोप अमेरिका के सख्त रुख की आलोचना कर रहे हैं, जबकि वे खुद राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी कदम उठा रहे हैं। कोविड और चर्च का मुद्दा ट्रंप ने कोविड काल का जिक्र करते हुए कहा कि उस समय धार्मिक संगठनों को दबाव झेलना पड़ा, लेकिन पोप इस मुद्दे पर खुलकर नहीं बोले। उन्होंने पोप के भाई लुईस की तारीफ करते हुए उन्हें ‘MAGA’ समर्थक बताया। ‘लेफ्ट’ नेताओं से करीबी पर सवाल ट्रंप ने पोप की कथित तौर पर वामपंथी नेताओं से नजदीकी पर भी सवाल उठाए और कहा कि इससे चर्च की छवि प्रभावित हो रही है। विवाद क्यों बढ़ा? दरअसल, पोप लगातार युद्ध के खिलाफ शांति और कूटनीति की बात कर रहे हैं, जबकि ट्रंप इसे अपनी नीतियों में दखल मानते हैं। 60 Minutes की एक रिपोर्ट में भी अमेरिकी चर्च नेताओं ने ट्रंप की नीतियों पर नैतिक सवाल उठाए हैं।
अमेरिका की राजनीति में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है, जहां Donald Trump के युद्ध संबंधी अधिकारों को सीमित करने की तैयारी हो रही है। United States Congress में एक प्रस्ताव लाया जा रहा है, जिसके तहत ईरान के खिलाफ किसी भी सैन्य कार्रवाई से पहले राष्ट्रपति को संसद की मंजूरी लेनी होगी। डेमोक्रेट्स का बड़ा कदम डेमोक्रेटिक पार्टी के वरिष्ठ नेता Chuck Schumer ने कहा कि मौजूदा हालात में कांग्रेस को अपने संवैधानिक अधिकारों को फिर से लागू करना चाहिए। उनका मानना है कि राष्ट्रपति द्वारा बिना अनुमति के युद्ध जैसे फैसले लेना लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ है। इसी कड़ी में हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में डेमोक्रेटिक नेता Hakeem Jeffries ने भी इस प्रस्ताव पर वोटिंग कराने की मांग की है। ट्रंप के बयान से बढ़ी चिंता हाल ही में Iran के साथ तनाव के बीच ट्रंप ने कड़ा रुख अपनाते हुए धमकी दी थी कि अगर Strait of Hormuz नहीं खोला गया तो अमेरिका बड़ा सैन्य हमला कर सकता है। उनके इस बयान ने वैश्विक स्तर पर चिंता बढ़ा दी। हालांकि बाद में अमेरिका और ईरान के बीच दो हफ्ते का सीजफायर हुआ, लेकिन ट्रंप की आक्रामक भाषा और नीति को लेकर विपक्ष लगातार हमलावर बना हुआ है। संविधान क्या कहता है? अमेरिकी संविधान के अनुसार युद्ध की घोषणा करने का अधिकार कांग्रेस के पास होता है, न कि राष्ट्रपति के पास। हालांकि, आपातकालीन स्थितियों में राष्ट्रपति सीमित समय के लिए सैन्य कार्रवाई कर सकते हैं। आरोप है कि ट्रंप इसी प्रावधान का इस्तेमाल कर लंबे समय तक सैन्य कार्रवाई जारी रखे हुए हैं। रिपब्लिकन बनाम डेमोक्रेट टकराव कांग्रेस में ट्रंप की पार्टी रिपब्लिकन के पास मामूली बहुमत है, जिसके चलते इस तरह के प्रस्ताव पहले भी पारित नहीं हो पाए हैं। लेकिन डेमोक्रेट्स लगातार इस मुद्दे को उठाकर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं। यह प्रस्ताव सिर्फ ईरान नीति तक सीमित नहीं, बल्कि अमेरिका में राष्ट्रपति और संसद के बीच शक्तियों के संतुलन की बड़ी बहस का हिस्सा है। आने वाले दिनों में यह तय होगा कि ट्रंप की सैन्य नीतियों पर लगाम लगती है या नहीं।
मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच अब अमेरिकी सत्ता के भीतर भी मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं। ईरान को लेकर संभावित सैन्य कार्रवाई और परमाणु कार्यक्रम के मुद्दे पर अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump और उनकी खुफिया प्रमुख Tulsi Gabbard के बीच सोच में अंतर सामने आया है। ट्रंप ने क्या कहा? राष्ट्रपति ट्रंप ने स्वीकार किया कि तुलसी गबार्ड का रुख ईरान के मामले में उनसे “थोड़ा नरम” है। हालांकि उन्होंने यह भी साफ किया कि उन्हें गबार्ड पर पूरा भरोसा है। ट्रंप ने कहा कि उनका रुख बेहद सख्त है और वह नहीं चाहते कि ईरान किसी भी हाल में परमाणु हथियार हासिल करे। उनके अनुसार, अगर ऐसा हुआ तो वैश्विक सुरक्षा को गंभीर खतरा हो सकता है। सरकार के भीतर बढ़ती असहमति रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका-इजरायल के संयुक्त अभियान को लेकर रिपब्लिकन नेताओं और प्रशासन के भीतर अलग-अलग राय सामने आ रही है। कुछ नेता सैन्य कार्रवाई के पक्ष में हैं वहीं, कुछ आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव को लेकर चिंतित हैं अमेरिकी उपराष्ट्रपति JD Vance ने भी इस मुद्दे पर अपेक्षाकृत सतर्क रुख अपनाया है। इस्तीफे से बढ़ी हलचल इस विवाद के बीच, नेशनल काउंटरटेररिज्म सेंटर के प्रमुख Joe Kent ने हाल ही में इस्तीफा दे दिया। बताया जा रहा है कि उन्होंने ईरान के खिलाफ युद्ध को लेकर अलग राय रखते हुए पद छोड़ा और कहा कि अमेरिका के लिए तत्काल कोई बड़ा खतरा नहीं है। ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर भ्रम अमेरिकी सरकार के भीतर ही ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर विरोधाभासी दावे सामने आए हैं: कुछ अधिकारियों का कहना है कि ईरान परमाणु हथियार बनाने के बेहद करीब है वहीं, अन्य का दावा है कि पिछले अभियानों में उसकी क्षमता काफी हद तक खत्म हो चुकी है दूसरी ओर, ईरान लगातार यह कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है। क्या आगे बढ़ेगा संघर्ष? विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के आंतरिक मतभेद अमेरिका की रणनीति को प्रभावित कर सकते हैं। हालांकि, यह भी संभव है कि इन चर्चाओं के बाद कोई कूटनीतिक समाधान या समझौता सामने आए।
वॉशिंगटन: ईरान के साथ जारी युद्ध अब चौथे सप्ताह में प्रवेश कर चुका है और इसके साथ ही अमेरिकी प्रशासन के भीतर फैसलों को लेकर सवाल और गहरे होते जा रहे हैं। इस बीच, अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump ने एक नया बयान देकर विवाद को और बढ़ा दिया है, जिसमें उन्होंने युद्ध की शुरुआत के लिए अपने रक्षा मंत्री Pete Hegseth की भूमिका की ओर इशारा किया है। “लेट्स डू इट” से शुरू हुआ विवाद टेनेसी में आयोजित एक राउंडटेबल चर्चा के दौरान ट्रंप ने कहा कि सैन्य कार्रवाई का सुझाव सबसे पहले हेगसेथ ने दिया था। ट्रंप के अनुसार, हेगसेथ ने कहा था कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने के लिए कार्रवाई जरूरी है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब युद्ध की शुरुआत को लेकर प्रशासन के भीतर अलग-अलग दावे सामने आ रहे हैं। किसी के अनुसार, इजरायल पहले ही हमले की तैयारी में था, जिससे अमेरिका की भागीदारी अनिवार्य हो गई, जबकि अन्य का दावा है कि ईरान परमाणु हथियार के करीब था। विरोधाभासी दावे और बढ़ती उलझन ट्रंप के बयान में लगातार बदलाव देखने को मिल रहा है। कुछ ही घंटे पहले उन्होंने दावा किया था कि ईरान की जवाबी कार्रवाई अप्रत्याशित थी, जबकि मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि संभावित हमलों को लेकर पहले से चेतावनी दी गई थी। इन विरोधाभासों ने प्रशासन की रणनीति और निर्णय प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। युद्ध का चेहरा बने हेगसेथ इस पूरे घटनाक्रम में Pete Hegseth लगातार अग्रिम पंक्ति में नजर आ रहे हैं। पेंटागन में उन्होंने ईरान के मिसाइल कार्यक्रम, ड्रोन उत्पादन और नौसैनिक शक्ति को कमजोर करने के लक्ष्य को दोहराया है। हालांकि, युद्ध की समयसीमा को लेकर उन्होंने कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया है। प्रशासन के भीतर मतभेद रिपोर्ट्स के अनुसार, उपराष्ट्रपति JD Vance इस सैन्य कार्रवाई को लेकर पूरी तरह सहमत नहीं थे, हालांकि उन्होंने सार्वजनिक रूप से कोई विरोध नहीं जताया है। वहीं, इजरायल के प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu और मीडिया उद्योगपति Rupert Murdoch जैसे प्रभावशाली व्यक्तियों के समर्थन की भी चर्चा है। इस बीच, राष्ट्रीय आतंकवाद निरोधक केंद्र के पूर्व प्रमुख जो केंट का इस्तीफा इस बात का संकेत है कि प्रशासन के भीतर मतभेद गहरे हैं। बातचीत पर भी असमंजस ट्रंप ने दावा किया है कि ईरान के साथ बातचीत की संभावना बनी हुई है और मध्यस्थता के लिए Jared Kushner तथा दूत स्टीव विटकॉफ सक्रिय हैं। हालांकि, ईरान ने इन दावों को सिरे से खारिज कर दिया है। अनिश्चितता बरकरार ट्रंप द्वारा तय की गई समयसीमा को भी आगे बढ़ा दिया गया है, जिससे यह स्पष्ट है कि युद्ध की दिशा और परिणाम दोनों ही अभी अनिश्चित हैं। लगातार बदलते बयान, विरोधाभासी दावे और कूटनीतिक अस्पष्टता इस संघर्ष को और जटिल बना रहे हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।