पश्चिम बंगाल में आगामी चुनावों से पहले प्रशासनिक स्तर पर बड़े बदलाव देखने को मिल रहे हैं। Election Commission of India ने देर रात एक अहम आदेश जारी करते हुए वरिष्ठ अधिकारी Indira Mukherjee समेत 15 IPS अधिकारियों को राज्य से बाहर भेजने का फैसला किया है। इस निर्णय ने राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में हलचल बढ़ा दी है। चुनाव से पहले सख्ती, लगातार फैसले Election Commission of India चुनाव को निष्पक्ष और पारदर्शी बनाने के लिए लगातार कदम उठा रहा है। इसी क्रम में पहले भी कई अधिकारियों का तबादला किया गया था, और अब उन्हें अन्य राज्यों में पर्यवेक्षक के रूप में भेजा जा रहा है। आदेश के मुताबिक, इन अधिकारियों को Tamil Nadu और Kerala समेत चार राज्यों में भेजा गया है, जहां विधानसभा चुनाव होने हैं। किन अधिकारियों को भेजा गया बाहर? इस सूची में कई वरिष्ठ और महत्वपूर्ण नाम शामिल हैं। इनमें Indira Mukherjee के अलावा राशिद मुनीर खान, संदीप कारा, प्रियब्रत रॉय, प्रवीण कुमार त्रिपाठी, मुरलीधर शर्मा, धृतिमान सरकार, अभिजीत बनर्जी, अमनदीप सिंह, आकाश मघरिया, आलोक राजोरिया और सैयद वकार राजा जैसे अधिकारी शामिल हैं। इसके अलावा, चुनाव घोषणा तक राज्य के गृह सचिव रहे Jagdish Prasad Meena को भी पर्यवेक्षक के रूप में Tamil Nadu भेजा गया है। बिना प्रशिक्षण भेजे जाने पर सवाल सबसे बड़ा सवाल इस फैसले को लेकर यह उठ रहा है कि जिन अधिकारियों को पर्यवेक्षक बनाकर भेजा गया है, उनमें से कई ने इसके लिए आवश्यक प्रशिक्षण भी नहीं लिया है। ऐसे में यह निर्णय जल्दबाजी में लिया गया कदम माना जा रहा है। प्रशासनिक जानकारों का मानना है कि चुनाव आयोग का उद्देश्य निष्पक्षता सुनिश्चित करना है, लेकिन प्रशिक्षण के बिना इतनी बड़ी जिम्मेदारी देना चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है। चुनावी माहौल में बढ़ी सियासी हलचल पश्चिम बंगाल में चुनावी माहौल पहले से ही गर्म है। ऐसे में बड़े पैमाने पर अधिकारियों का तबादला और राज्य से बाहर भेजा जाना राजनीतिक दलों के बीच नई बहस को जन्म दे सकता है। अब सभी की नजर इस बात पर है कि क्या यह कदम चुनाव प्रक्रिया को अधिक निष्पक्ष बनाएगा या फिर इससे नए विवाद खड़े होंगे।
कोलकाता, एजेंसियां। वेस्ट बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक माहौल गर्म हो गया है। BJP ने चुनाव को लेकर अपने उम्मीदवारों की पहली सूची जारी कर दी है। इस सूची में कुल 144 प्रत्याशियों के नाम शामिल हैं। पार्टी ने कई बड़े नेताओं को चुनावी मैदान में उतारा है, जिससे राज्य में सियासी मुकाबला और दिलचस्प हो गया है।सबसे बड़ी बात यह है कि भाजपा ने नेता प्रतिपक्ष सुवेंदु अधिकारी को दो सीटों नंदीग्राम और भवानीपुर से उम्मीदवार बनाया है। इन दोनों सीटों पर मुकाबला काफी अहम माना जा रहा है। नंदीग्राम और भवानीपुर सीट पर खास नजर नंदीग्राम सीट पहले भी राज्य की सबसे चर्चित सीटों में रही है। पिछले चुनाव में ममता बनर्जी ने इसी सीट से चुनाव लड़ा था और यहां उनका मुकाबला शुभेंदु अधिकारी से हुआ था। उस चुनाव में शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को कड़ी टक्कर देते हुए जीत हासिल की थी। हालांकि ममता बनर्जी ने भवानीपुर सीट से जीत दर्ज कर सरकार बनाई थी। इस बार भाजपा ने रणनीतिक दांव खेलते हुए शुभेंदु अधिकारी को दोनों सीटों से मैदान में उतार दिया है। इससे चुनावी मुकाबला और दिलचस्प होने की संभावना जताई जा रही है। अशोक डिंडा को फिर होंगे चुनावी मैदान में क्रिकेटर अशोक डिंडा को भाजपा ने फिर से मोयना विधानसभा सीट से मौका दिया है। इससे पहले भी डिंडा को भाजपा ने मोयना विधासभा से ही टिकट दिया था और उन्होंने 1260 वोटों से जीत दर्ज की थी। भाजपा की इस सूची में कई प्रमुख नेताओं को जगह दी गई है। पार्टी ने पूर्व प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष को खड़गपुर सदर सीट से उम्मीदवार बनाया है। नीचे सूची में देखें, किसे कहां से टिकट मिला है। क्र. विधानसभा का नाम उम्मीदवार का नाम 1 कूचबिहार उत्तर (अजा) सुकुमार रॉय 2 सीतलकुची (अजा) सावित्री बर्मन 3 दिनहाटा अजय रॉय 4 तूफानगंज मालती रावा रॉय 5 कुमारग्राम (अजजा) मनोज कुमार ओरांव 6 कालचीनी (अजजा) विशाल लामा 7 अलीपुरद्वार परितोष दास 8 फालाकाटा (अजा) दीपक बर्मन 9 डाबग्राम-फूलबाड़ी शिखा चटर्जी 10 नागराकाटा (अजजा) पुना भेंगरा 11 माटीगाड़ा-नक्सलबाड़ी (अजा) आनंदमय बर्मन 12 सिलीगुड़ी शंकर घोष 13 फांसीदेवा (अजजा) दुर्गा मुर्मू 14 गोलपोखर सरजीत बिस्वास 15 चाकुलिया मनोज जैन 16 करनदिघी बिराज बिस्वास 17 कलियागंज (अजा) उत्पल महाराज 18 रायगंज कौशिक चौधरी 19 कुशमंडी (अजा) तापस चंद्र रॉय 20 कुमारगंज शुभेंदु सरकार 21 बालुरघाट बिद्युत रॉय 22 तपन (अजजा) बुधराई टुडू 23 गंगारामपुर (अजा) सत्येंद्र नाथ राय 24 हरिरामपुर देबब्रत मजुमदार 25 हबीबपुर (अजजा) जोएल मुर्मू 26 गाजोल (अजा) चिन्मय देब बर्मन 27 चंचल रतन दास 28 मालतीपुर आशीष दास 29 रतुआ अभिषेक सिंघानिया 30 मानिकचक गौर चंद्र मंडल 31 मालदा (अजा) गोपाल चंद्र साहा 32 मोथाबाड़ी निबारण घोष 33 सुजापुर अभिराज चौधरी 34 सुती महाबीर घोष 35 रघुनाथगंज सुरजीत पोद्दार 36 लालगोला अमर कुमार दास 37 भगवानगोला भास्कर सरकार 38 मुर्शिदाबाद गौरी शंकर घोष 39 रेजिनगर बापन घोष 40 बेलडांगा भरत कुमार झावर 41 बहरामपुर सुब्रत मित्रा 42 हरिहरपाड़ा तन्मय बिस्वास 43 नउदा राणा मंडल 44 डोमकल नंद दुलाल पाल 45 जलंगी नबा कुमार सरकार 46 करीमपुर समरेंद्रनाथ घोष 47 पलासीपाड़ा अनिमा दत्ता 48 कालीगंज बापन घोष 49 राणाघाट उत्तर पश्चिम पार्थसारथी चटर्जी 50 राणाघाट उत्तर पूर्व (अजा) असीम बिस्वास 51 चकदहा बंकिम चंद्र घोष 52 हरिनघाटा (अजा) असीम कुमार सरकार 53 बदुरिया सुकृति सरकार 54 अमडंगा अरिंदम डे 55 नैहाटी सौमित्र चटर्जी 56 भाटपाड़ा पवन कुमार सिंह 57 बारानगर सजल घोष 58 देंगंगा तरुण कांति घोष 59 बशीरहाट उत्तर नारायण चन्द्र मंडल 60 बसंती (अजा) बिकास सरदार 61 कुलतली (अजा) माधवी महलदर 62 पाथरप्रतिमा असित कुमार हल्दर 63 काकद्वीप दीपांकर जना 64 रायदिघी पलाश राणा 65 कैनिंग पूर्व असीम सपुई 66 डायमंड हार्बर दीपक कुमार हल्दर 67 बिष्णुपुर (अजा) अग्निश्वर नस्कर 68 बज बज तरुण कुमार अदाक 69 मेटियाब्रुज वीर बहादुर सिंह 70 भवानीपुर शुभेंदु अधिकारी 71 रासबिहारी स्वपन दास गुप्ता 72 हावड़ा उत्तर उमेश राय 73 शिबपुर रूद्रनील घोष 74 उलबेरिया दक्षिण मंगलानंद पुरी महाराज 75 अमता अमित सामंत 76 डोमजूर गोबिंद हाजरा 77 सप्तग्राम स्वराज घोष 78 तारकेश्वर संतु पान 79 पुरसुराह बिमान घोष 80 आरामबाग (अजा) हेमंत बाग 81 गोघाट (अजा) प्रशांत दिघर 82 खानाकुल सुशांत घोष 83 पंसकुरा पूर्व सुब्रत मैती 84 पंसकुरा पश्चिम सिंतु सेनापति 85 मोयना अशोक डिंडा 86 महिषादल सुभाष पांजा 87 हल्दिया (अजा) प्रदीप कुमार बिजली 88 नंदीग्राम शुभेंदु अधिकारी 89 पटाशपुर तपन मैती 90 कांथी उत्तर सुमिता सिन्हा 91 कांथी दक्षिण अरूप कुमार दास 92 रामनगर चंद्र शेखर मंडल 93 दांतन अजीत कुमार जना 94 नयाग्राम (अजजा) अमिया किस्कू 95 गोपीबल्लभपुर राजेश महतो 96 झारग्राम लक्ष्मीकांत साहू 97 केशियारी (अजजा) भद्रा हेम्ब्रम 98 खड़गपुर सदर दिलीप घोष 99 नारायणगढ़ राम प्रसाद गिरि 100 सबंग अमल पांडा 101 खड़गपुर तपन भुया 102 डेबरा शुभाशीष ओम 103 दासपुर तपन दत्ता 104 घाटाल (अजा) शीतल कपाट 105 चंद्रकोना (अजा) सुकांत दोलुई 106 सालबोनी बिमान महतो 107 केशपुर (अजा) शुभेंदु सामंत 108 बिनपुर (अजजा) प्रणत टुडू 109 बांदवान (अजजा) लबसेन बास्के 110 बलरामपुर जलधर महतो 111 मानबाजार (अजजा) मैना मुर्मू 112 काशीपुर कमलकांत हंसदा 113 पारा (अजा) नदियार चंद बाउरी 114 रघुनाथपुर (अजा) मामोनी बाउरी 115 साल्टोरा (अजा) चंदना बाउरी 116 छतना सत्यनारायण मुखोपाध्याय 117 रानीबांध (अजजा) क्षुदिराम टुडू 118 रायपुर (अजजा) क्षेत्र मोहन हंसदा 119 तालडांगरा सौविक पात्रा 120 बरजोड़ा बिलेश्वर सिंघा 121 ओंदा अमरनाथ शाखा 122 कटुलपुर (अजा) लक्ष्मीकांत मजुमदार 123 इंदस (अजा) निर्मल कुमार धारा 124 सोनामखी (अजा) दिबाकर घरामी 125 रैना (अजा) सुभाष पात्रा 126 जमालपुर (अजा) अरुण हल्दर 127 मोटेश्वर सैकत पंजा 128 बर्धमान उत्तर (अजा) संजय दास 129 भातर सोमेन करफा 130 केतुग्राम अनादि घोष (मथुरा) 131 औसग्राम (अजा) कलिता माझी 132 पांडबेश्वर जितेंद्र कुमार तिवारी 133 दुर्गापुर पूर्व चंद्र शेखर बनर्जी 134 दुर्गापुर पश्चिम लक्ष्मण चंद घोरुई 135 जामुारिया बिजन मुखर्जी 136 आसनसोल दक्षिण अग्निमित्रा पॉल 137 आसनसोल उत्तर कृष्णेंदु मुखर्जी 138 कुल्टी अजय कुमार पोद्दार 139 दुबराजपुर (अजा) अनुप कुमार साहा 140 सूरी जगन्नाथ चट्टोपाध्याय 141 बोलपुर दिलीप कुमार घोष 142 नानूर (अजा) खोकन दास 143 मयूरेश्वर दुध कुमार मंडल 144 हंसन निखिल बनर्जी दो चरणों में होंगे चुनाव Election Commission of India ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव दो चरणों में कराने का फैसला किया है। राज्य में 23 अप्रैल और 29 अप्रैल को मतदान होगा। वहीं मतगणना 4 मई को की जाएगी।पश्चिम बंगाल के साथ ही Assam, Kerala, Tamil Nadu और Puducherry में भी इसी दौरान चुनाव होंगे। पिछले चुनाव का परिणाम 2021 के विधानसभा चुनाव में All India Trinamool Congress ने बड़ी जीत दर्ज की थी। ममता बनर्जी के नेतृत्व में पार्टी ने 215 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी, जबकि भाजपा को 77 सीटें मिली थीं और वह मुख्य विपक्षी दल बनी थी। अब 2026 के चुनाव में भाजपा अपने प्रदर्शन को बेहतर करने के लक्ष्य के साथ मैदान में उतरी है। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक इस बार राज्य में मुकाबला और भी कड़ा होने की संभावना है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 की तैयारियों के बीच राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। Election Commission of India द्वारा दो चरणों में मतदान की घोषणा के साथ ही सभी दलों ने अपने-अपने उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया को अंतिम रूप देना शुरू कर दिया है। राज्य में पहले चरण का मतदान 23 अप्रैल को होगा, जबकि पूरी चुनाव प्रक्रिया के बाद 4 मई को मतगणना के साथ नतीजे घोषित किए जाएंगे। इस बीच उम्मीदवारों की पहली सूची जारी होते ही राजनीतिक समीकरणों में बड़े बदलाव के संकेत मिलने लगे हैं। बीजेपी की पहली सूची: 144 उम्मीदवार, कई बड़े फैसले Bharatiya Janata Party ने अपनी पहली सूची में 144 उम्मीदवारों के नाम घोषित किए हैं। इस सूची में कई नए चेहरों को मौका दिया गया है, जबकि कुछ मौजूदा विधायकों को टिकट नहीं मिलने से पार्टी के भीतर हलचल बढ़ गई है। सबसे बड़ा राजनीतिक दांव तब देखने को मिला जब पार्टी ने Suvendu Adhikari को दो महत्वपूर्ण सीटों-भवानीपुर और नंदीग्राम-से उम्मीदवार बनाया। यह सीधा मुकाबला Mamata Banerjee के खिलाफ रणनीतिक चुनौती के रूप में देखा जा रहा है। इसके अलावा, अग्निमित्रा पॉल को आसनसोल दक्षिण, सुकुमार को कूचबिहार उत्तर (आरक्षित), साबित्री बर्मन को शीतलकुची और अजय रॉय को दिनहाटा से टिकट दिया गया है। 8 मौजूदा विधायकों का टिकट कटा बीजेपी की सूची में सबसे ज्यादा चर्चा उन 8 मौजूदा विधायकों को लेकर है, जिन्हें इस बार टिकट नहीं मिला। पार्टी ने 144 में से 48 सीटों पर अपने मौजूदा विधायकों में से सिर्फ 40 को दोबारा मौका दिया है। सूत्रों के अनुसार, जिन सीटों पर बदलाव हुआ है, उनमें उत्तर बंगाल, रारह बंगाल और दक्षिण बंगाल के क्षेत्र शामिल हैं। सबसे चौंकाने वाला फैसला दक्षिण दिनाजपुर की बालुरघाट सीट को लेकर सामने आया, जहां 2021 में जीत दर्ज करने वाले अर्थशास्त्री अशोक लाहिड़ी को टिकट नहीं दिया गया। उनके कद और पार्टी में प्रभाव को देखते हुए यह फैसला राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है। वाम मोर्चे में भी असमंजस, CPM की सूची पर उठे सवाल दूसरी ओर Communist Party of India (Marxist) (सीपीएम) ने 192 सीटों के लिए उम्मीदवारों की प्रारंभिक सूची जारी की है। हालांकि, इस सूची के सामने आने के बाद पार्टी के भीतर कुछ सीटों को लेकर असहमति देखने को मिल रही है। खासकर मुर्शिदाबाद की रानीनगर सीट और टॉलीगंज सीट पर उम्मीदवार घोषित न होने से सवाल खड़े हो गए हैं। पार्टी की आंतरिक नीति के तहत इस बार राज्य सचिव मंडल के अधिकांश सदस्य चुनाव नहीं लड़ेंगे। इसी कारण Mohammad Salim और Sujan Chakraborty जैसे नेताओं की उम्मीदवारी पर संशय बना हुआ है। हालांकि, Minakshi Mukherjee को अपवाद के रूप में हुगली की उत्तरपाड़ा सीट से उम्मीदवार बनाया गया है। चुनाव कार्यक्रम: महत्वपूर्ण तारीखें अधिसूचना जारी: 30 मार्च 2026 नामांकन: 30 मार्च से 6 अप्रैल नामांकन जांच: 7 अप्रैल नाम वापसी की अंतिम तारीख: 9 अप्रैल मतदान (पहला चरण): 23 अप्रैल मतगणना: 4 मई 2026 राजनीतिक तस्वीर: त्रिकोणीय मुकाबले की तैयारी राज्य में इस बार मुकाबला त्रिकोणीय होने की संभावना है। एक ओर All India Trinamool Congress लगातार सत्ता बरकरार रखने की कोशिश में है, तो वहीं बीजेपी बदलाव का दावा कर रही है। दूसरी ओर वाम मोर्चा भी अपनी खोई जमीन वापस पाने के लिए सक्रिय हो गया है। उम्मीदवारों की पहली सूची के बाद यह साफ हो गया है कि इस चुनाव में रणनीतिक बदलाव, नए चेहरे और अंदरूनी समीकरण बड़ी भूमिका निभाने वाले हैं।
कोलकाता: Election Commission of India ने पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए बड़ा प्रशासनिक कदम उठाया है। चुनाव की तारीखों के ऐलान के कुछ ही घंटों बाद आयोग ने राज्य के मुख्य सचिव नंदिनी चक्रवर्ती और गृह विभाग के शीर्ष अधिकारी को उनके पद से हटा दिया। आयोग ने नंदिनी चक्रवर्ती की जगह दुष्यंत नरियाला को राज्य का नया मुख्य सचिव नियुक्त किया है। वहीं संघमित्रा घोष को गृह एवं पर्वतीय मामलों के विभाग का नया प्रधान सचिव बनाया गया है। चुनाव आयोग के आदेश के मुताबिक ये नियुक्तियां तत्काल प्रभाव से लागू होंगी। निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने की कोशिश चुनाव आयोग का कहना है कि यह फैसला निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव प्रक्रिया सुनिश्चित करने के लिए लिया गया है। चुनावी माहौल के बीच प्रशासनिक स्तर पर इस तरह का फेरबदल राज्य की राजनीतिक गतिविधियों को भी प्रभावित कर सकता है। चुनावी प्रचार में प्रमुख मुद्दे बंगाल में इस बार चुनाव प्रचार कई बड़े मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमता नजर आ रहा है। इनमें सबसे प्रमुख है ‘बंगाली अस्मिता’ का सवाल। सत्तारूढ़ All India Trinamool Congress और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भाजपा पर लगातार बंगाली पहचान पर हमले का आरोप लगाती रही हैं। दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी के नेता अवैध घुसपैठ और कानून-व्यवस्था के मुद्दों को चुनावी एजेंडे में प्रमुखता से उठा रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी हाल की रैलियों में इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया है। मतुआ समुदाय और वोट बैंक की राजनीति राज्य की लगभग 50 विधानसभा सीटों पर प्रभाव रखने वाला मतुआ समुदाय भी इस चुनाव में अहम भूमिका निभा सकता है। 2021 के विधानसभा चुनाव में इस समुदाय के समर्थन से भाजपा को कई सीटों पर फायदा मिला था, जबकि तृणमूल कांग्रेस भी इस वोट बैंक को साधने की कोशिश में जुटी है। मतदाता सूची में बड़े बदलाव चुनाव से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के बाद लगभग 63.66 लाख नाम हटाए जाने की खबर ने भी राजनीतिक माहौल को गर्मा दिया है। इससे राज्य के कुल मतदाताओं की संख्या लगभग 7.66 करोड़ से घटकर करीब 7.04 करोड़ रह गई है। विश्लेषकों का मानना है कि मतदाता सूची में हुए इन बदलावों से कई क्षेत्रों में चुनावी समीकरण बदल सकते हैं, जिससे राजनीतिक दलों को अपनी रणनीति नए सिरे से बनानी पड़ रही है।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। Election Commission of India ने राज्य में दो चरणों में मतदान कराने का ऐलान किया है, जिसके बाद राजनीतिक माहौल गर्म हो गया है। चुनावी मैदान में सत्तारूढ़ All India Trinamool Congress और भारतीय जनता पार्टी के बीच सीधी टक्कर देखने को मिल रही है। पिछले कुछ वर्षों से भाजपा राज्य की सत्ता हासिल करने के लिए पूरी ताकत लगा रही है, जबकि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस अपनी पकड़ बरकरार रखने की कोशिश में है। ऐसे में इस बार का चुनावी मुकाबला बेहद दिलचस्प माना जा रहा है। पहला चरण: कड़ा मुकाबला 23 अप्रैल को होने वाले पहले चरण में 152 सीटों पर मतदान होगा। अगर 2021 के विधानसभा चुनाव के नतीजों को आधार माना जाए तो इन सीटों में से लगभग 92 सीटों पर तृणमूल कांग्रेस को बढ़त मिली थी, जो करीब 60.5 प्रतिशत के बराबर है। वहीं भाजपा ने 59 सीटों पर जीत दर्ज की थी, जो लगभग 38.8 प्रतिशत हिस्सेदारी बनती है, जबकि एक सीट अन्य दलों के खाते में गई थी। यह इलाका राजनीतिक रूप से मिश्रित माना जाता है। उत्तर, पश्चिम और मध्य पश्चिम बंगाल के कई क्षेत्रों में तृणमूल और भाजपा दोनों का प्रभाव रहा है। यही वजह है कि इस चरण को भाजपा के लिए अपेक्षाकृत अनुकूल माना जा रहा है, जहां पार्टी अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश करेगी। दूसरा चरण: TMC का मजबूत गढ़ दूसरा चरण 29 अप्रैल को होगा, जिसमें 142 सीटों पर मतदान होना है। इन सीटों में से लगभग 123 सीटों पर तृणमूल कांग्रेस का दबदबा रहा है, जो करीब 86.6 प्रतिशत हिस्सेदारी बनाता है। इसके मुकाबले भाजपा को केवल 18 सीटों पर जीत मिली थी, जबकि एक सीट अन्य दलों के खाते में गई थी। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक यह क्षेत्र तृणमूल कांग्रेस का पारंपरिक गढ़ माना जाता है। यहीं से ममता बनर्जी को लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी दिलाने में बड़ी मदद मिली थी। भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती विश्लेषकों का मानना है कि दूसरे चरण में भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती तृणमूल के मजबूत वोट बैंक में सेंध लगाना होगा। महिलाओं, अल्पसंख्यकों और सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों का बड़ा वर्ग लंबे समय से तृणमूल कांग्रेस के साथ जुड़ा रहा है, जिससे पार्टी की पकड़ मजबूत बनी हुई है। दो हिस्सों में बंटा चुनावी मैदान दो चरणों में होने वाला यह चुनाव पश्चिम बंगाल को लगभग दो अलग-अलग चुनावी मैदानों में बांटता नजर आ रहा है। पहले चरण में जहां मुकाबला कड़ा दिखाई देता है, वहीं दूसरे चरण में तृणमूल कांग्रेस का पलड़ा भारी माना जा रहा है। ऐसे में आने वाले दिनों में दोनों प्रमुख दलों की रणनीति और चुनावी अभियान इन्हीं चरणों के हिसाब से तय होने की संभावना है।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा के 26वें चुनाव की तैयारियां अब अंतिम चरण में पहुंच चुकी हैं। राज्य की राजनीतिक हलचल के बीच सभी की नजरें चुनाव आयोग की ओर टिकी हैं, जो जल्द ही मतदान की तारीखों का ऐलान कर सकता है। इसी बीच मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने संकेत दिया है कि 15 या 16 मार्च को पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा संभव है। दरअसल, चुनाव आयोग की फुल बेंच हाल ही में दो दिनों तक पश्चिम बंगाल में चुनावी तैयारियों की समीक्षा करने के बाद दिल्ली लौट चुकी है। इसके बाद राज्य की राजनीति में चुनाव कार्यक्रम को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं। विभिन्न राजनीतिक दल अपने-अपने अनुमान लगा रहे हैं, जबकि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी इस पर खुलकर टिप्पणी की है। चुनाव आयोग और भाजपा पर साधा निशाना अभिषेक बनर्जी के अनुरोध पर धरना समाप्त करने के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि आयोग अब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रभाव में काम कर रहा है। ममता बनर्जी ने कहा कि अक्सर देखा गया है कि भाजपा की बड़ी राजनीतिक सभाओं के बाद ही चुनाव कार्यक्रम घोषित किया जाता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रस्तावित ब्रिगेड परेड ग्राउंड रैली 14 मार्च को है, और संभव है कि उसके बाद ही चुनाव की तारीखों का ऐलान किया जाए। मुख्यमंत्री ने कहा, “अगर ब्रिगेड की बैठक के बाद भी चुनाव की घोषणा होती है तो इसमें चिंता की कोई बात नहीं है। हमने पहले भी देखा है कि बड़ी रैली के बाद ही चुनाव कार्यक्रम घोषित किया जाता है।” सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई का भी जिक्र ममता बनर्जी ने इस मुद्दे से जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई का भी जिक्र किया। उन्होंने दावा किया कि सुनवाई के दौरान अदालत ने चुनाव आयोग को कड़ी टिप्पणी करते हुए फटकार लगाई है। मुख्यमंत्री के अनुसार, अदालत के आदेश में सभी बातें लिखित रूप में नहीं हैं, लेकिन वीडियो रिकॉर्डिंग में इसे देखा जा सकता है। उन्होंने कहा कि इस मामले की अगली सुनवाई 25 तारीख को निर्धारित है। ममता बनर्जी ने इसे अपनी कानूनी और राजनीतिक लड़ाई की “महत्वपूर्ण जीत” बताया और कहा कि इससे चुनाव आयोग के सामने कई सवाल खड़े हो गए हैं। चुनावी माहौल गर्म पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक माहौल लगातार गर्म होता जा रहा है। राज्य में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC )और भाजपा (BJP) के बीच तीखी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा देखने को मिल रही है। ऐसे में अब सभी की नजरें चुनाव आयोग पर टिकी हैं, जो किसी भी समय पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की तारीखों की औपचारिक घोषणा कर सकता है। चुनाव कार्यक्रम घोषित होते ही राज्य में आचार संहिता लागू हो जाएगी और राजनीतिक दल पूरी ताकत के साथ चुनावी मैदान में उतर जाएंगे।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।