आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में तनाव कई लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गया है। काम का दबाव, नींद की कमी और लगातार सोचते रहने की आदत शरीर और दिमाग दोनों को प्रभावित कर सकती है। ऐसे में योग और धीमी सांसों पर ध्यान देना तनाव से निपटने का एक आसान तरीका हो सकता है। हालांकि, योग का उद्देश्य शरीर में कॉर्टिसोल को पूरी तरह खत्म करना नहीं है। कॉर्टिसोल शरीर के लिए जरूरी हार्मोन है, जो तनाव प्रतिक्रिया, मेटाबॉलिज्म, सूजन और ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने में भूमिका निभाता है। नियमित योग अभ्यास शरीर की तनाव प्रतिक्रिया को बेहतर तरीके से संभालने में मदद कर सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, रोजाना केवल 5 से 10 मिनट का हल्का योग अभ्यास भी शरीर को रिलैक्स करने और मानसिक तनाव कम करने में मददगार हो सकता है। आइए जानते हैं ऐसे 7 योगासन, जिन्हें तनाव के समय आजमाया जा सकता है। 1. बालासन यानी चाइल्ड पोज बालासन एक आरामदायक योगासन है, जिसे तनाव और थकान के दौरान किया जा सकता है। कैसे करें: घुटनों के बल बैठकर कूल्हों को एड़ियों की तरफ ले जाएं। घुटनों को अपनी सुविधा के अनुसार थोड़ा अलग रखें। शरीर को धीरे-धीरे आगे की ओर झुकाएं। माथे को जमीन या कुशन पर टिकाएं। हाथों को आगे फैलाएं या शरीर के पास आराम से रखें। कुछ देर सामान्य और धीमी सांस लेते रहें। फायदा: यह शरीर पर ज्यादा दबाव डाले बिना आराम करने का मौका देता है। इससे मानसिक तनाव के दौरान शरीर और दिमाग को शांत महसूस करने में मदद मिल सकती है। 2. मार्जरी आसन-बिटिलासन यानी कैट-काउ पोज यह योगासन सांस और शरीर की गतिविधि को एक साथ जोड़ता है। तनाव के समय इसे धीरे-धीरे करना बेहतर माना जाता है। कैसे करें: हाथों और घुटनों के बल आ जाएं। हथेलियां कंधों के नीचे और घुटने कूल्हों के नीचे रखें। सांस लेते हुए पेट को नीचे की ओर ले जाएं और छाती को ऊपर उठाएं। सांस छोड़ते हुए पीठ को गोल करें और ठुड्डी को हल्का अंदर की ओर करें। इस प्रक्रिया को 5 से 10 बार धीरे-धीरे दोहराएं। फायदा: सांस के साथ नियंत्रित मूवमेंट शरीर में जमा तनाव को कम करने और मन को शांत करने में मदद कर सकता है। 3. विपरीत करणी यानी लेग्स-अप-द-वॉल पोज यह एक आसान और कम मेहनत वाला योगासन है, जिसमें पैरों को दीवार के सहारे ऊपर रखा जाता है। कैसे करें: दीवार के पास एक तरफ बैठें। धीरे से पीठ के बल लेटते हुए दोनों पैरों को दीवार पर ऊपर करें। शरीर को ऐसी स्थिति में रखें जिसमें आपको आराम महसूस हो। हाथों को शरीर के दोनों तरफ रखें। कंधों और जबड़े को ढीला छोड़ते हुए सामान्य सांस लें। कुछ मिनट इसी स्थिति में आराम करें। फायदा: इस मुद्रा में शरीर को स्थिर रखने और सांस पर ध्यान देने से तनावपूर्ण स्थिति से बाहर आने में मदद मिल सकती है। 4. पश्चिमोत्तानासन यानी सीटेड फॉरवर्ड बेंड यह आसन शरीर को धीरे-धीरे आगे की ओर झुकाने पर आधारित है। इसे करते समय अपनी क्षमता से ज्यादा खिंचाव देने से बचना चाहिए। कैसे करें: दोनों पैर सामने की ओर सीधे करके बैठें। जरूरत महसूस हो तो घुटनों को थोड़ा मोड़ लें। रीढ़ को सीधा रखते हुए कूल्हों से आगे की ओर झुकें। हाथों को जांघों, पिंडलियों, टखनों या पैरों पर आराम से रखें। कुछ धीमी सांसों तक इसी स्थिति में रहें। फायदा: यह शरीर में तनाव के कारण पैदा हुई मांसपेशियों की जकड़न को कम करने में मदद कर सकता है। इस आसन में पैरों के पंजों को छूना जरूरी नहीं है। 5. शवासन यानी कॉर्प्स पोज शवासन बेहद सरल योग मुद्रा है, लेकिन मानसिक और शारीरिक आराम के लिए इसे काफी उपयोगी माना जाता है। कैसे करें: पीठ के बल आराम से लेट जाएं। पैरों के बीच थोड़ा अंतर रखें। हाथों को शरीर से थोड़ा दूर रखें और हथेलियों को ऊपर की ओर रखें। आंखें बंद कर सकते हैं। कंधे, जबड़े, पेट, हाथ और पैरों को ढीला छोड़ दें। सांस को सामान्य रखें और ध्यान धीरे-धीरे सांसों पर लाएं। फायदा: इसमें शरीर को किसी खास मुद्रा में बनाए रखने की जरूरत नहीं होती। इससे तनाव और मांसपेशियों के खिंचाव को कम करने में मदद मिल सकती है। 6. सेतु बंधासन यानी ब्रिज पोज सेतु बंधासन में शरीर के निचले हिस्से को सक्रिय रखते हुए छाती को हल्का स्ट्रेच किया जाता है। कैसे करें: पीठ के बल लेटकर घुटनों को मोड़ें। दोनों पैरों को जमीन पर कूल्हों की चौड़ाई के बराबर रखें। हाथों को शरीर के दोनों तरफ रखें। पैरों पर दबाव डालते हुए कूल्हों को धीरे-धीरे ऊपर उठाएं। घुटनों को सामने की ओर रखें। कुछ सांसों तक रुकने के बाद धीरे-धीरे वापस नीचे आएं। फायदा: यह छाती और शरीर के निचले हिस्से को स्ट्रेच करने के साथ तनाव और बेचैनी को संभालने में मदद कर सकता है। 7. उत्तानासन यानी स्टैंडिंग फॉरवर्ड बेंड उत्तानासन में खड़े होकर शरीर के ऊपरी हिस्से को आगे की तरफ झुकाया जाता है। इसे करते समय घुटनों को हल्का मोड़ना बिल्कुल ठीक है। कैसे करें: पैरों को कूल्हों की चौड़ाई के बराबर रखकर खड़े हों। घुटनों को थोड़ा ढीला रखें। कूल्हों से आगे की ओर झुकें। सिर और गर्दन को आराम की स्थिति में छोड़ दें। हाथों को नीचे लटका रहने दें या जरूरत हो तो किसी सपोर्ट का इस्तेमाल करें। कुछ सांसों के बाद धीरे-धीरे वापस खड़े हों। फायदा: यह शरीर में मौजूद मांसपेशियों के तनाव को कम करने और थकान की भावना को संभालने में मदद कर सकता है। सिर्फ कॉर्टिसोल कम करना योग का मकसद नहीं आजकल कॉर्टिसोल को लेकर काफी चर्चा होती है, लेकिन शरीर को स्वस्थ रखने के लिए इस हार्मोन की सामान्य भूमिका महत्वपूर्ण है। इसलिए योग को केवल कॉर्टिसोल का स्तर कम करने के तरीके के तौर पर देखना सही नहीं होगा। योग का ज्यादा महत्वपूर्ण फायदा यह है कि यह व्यक्ति को सांस, शरीर की गतिविधियों और वर्तमान क्षण पर ध्यान केंद्रित करने में मदद कर सकता है। नियमित अभ्यास से तनाव को संभालने की क्षमता बेहतर हो सकती है। 5 मिनट से करें शुरुआत अगर आपके पास लंबे योग सत्र के लिए समय नहीं है, तो शुरुआत केवल 5 से 10 मिनट से की जा सकती है। हल्की स्ट्रेचिंग, धीमी सांस और कुछ रिलैक्सिंग योगासन तनावपूर्ण दिन में शरीर को शांत होने का मौका दे सकते हैं। हालांकि, हर योग मुद्रा हर व्यक्ति के लिए समान रूप से उपयुक्त नहीं होती। अगर किसी आसन को करने में दर्द, असहजता या ज्यादा खिंचाव महसूस हो तो उसे जबरदस्ती नहीं करना चाहिए। खासकर पहले से किसी शारीरिक समस्या से जूझ रहे लोगों को योग शुरू करने से पहले विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहतर है। नोट: यह लेख उपलब्ध स्रोत की जानकारी पर आधारित है। योग किसी बीमारी का इलाज नहीं है; लगातार या गंभीर तनाव की स्थिति में योग्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना उचित है।
वॉशिंगटन, एजेंसियां। अमेरिका में सोशल मीडिया कंपनी Meta को युवाओं और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मामले में बड़ा झटका लगा है। अमेरिकी अदालत ने कंपनी पर करीब 56.7 करोड़ डॉलर (लगभग ₹4,700 करोड़) का जुर्माना लगाया है। मामला सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के इस्तेमाल और उससे बच्चों व युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों से जुड़ा है। Meta पर गंभीर आरोप मामले में आरोप लगाया गया कि Meta के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Facebook और Instagram के डिजाइन और कुछ फीचर्स युवाओं को लंबे समय तक प्लेटफॉर्म पर बनाए रखने में योगदान दे सकते हैं। याचिकाकर्ताओं और अभियोजन पक्ष की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि कंपनी को बच्चों और किशोरों पर सोशल मीडिया के संभावित मानसिक स्वास्थ्य प्रभावों की जानकारी थी, लेकिन जोखिमों को रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए गए। मानसिक स्वास्थ्य को लेकर बढ़ी चिंता सोशल मीडिया के अत्यधिक इस्तेमाल और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य के बीच संभावित संबंध को लेकर अमेरिका में लंबे समय से बहस चल रही है। विशेषज्ञों और अभिभावकों की ओर से खास तौर पर कम उम्र के बच्चों में सोशल मीडिया के इस्तेमाल को लेकर चिंता जताई जाती रही है। चिंताओं में चिंता, अवसाद, नींद में परेशानी और शरीर की छवि को लेकर नकारात्मक सोच जैसे संभावित प्रभाव शामिल हैं। हालांकि, किसी व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य पर सोशल मीडिया का प्रभाव कई कारकों पर निर्भर करता है। Meta के लिए बढ़ सकता है कानूनी दबाव इस मामले में भारी जुर्माना Meta के लिए आर्थिक नुकसान के साथ-साथ कानूनी और नियामकीय दबाव बढ़ाने वाला फैसला माना जा रहा है। कंपनी को अपने प्लेटफॉर्म के डिजाइन, बच्चों की सुरक्षा और कम उम्र के उपयोगकर्ताओं से जुड़े फीचर्स को लेकर अतिरिक्त जांच का सामना करना पड़ सकता है। अमेरिका में सोशल मीडिया कंपनियों के खिलाफ बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मामलों में पहले भी कानूनी कार्रवाई होती रही है। सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही पर बहस इस फैसले से सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही को लेकर बहस और तेज हो सकती है। खासकर बच्चों और किशोरों को लक्षित करने वाले फीचर्स तथा उन्हें लंबे समय तक प्लेटफॉर्म पर बनाए रखने वाली तकनीकों पर नियामकों की नजर बढ़ सकती है। Meta की ओर से फैसले के खिलाफ अपील या अन्य कानूनी विकल्प अपनाए जाने की स्थिति में मामले की आगे की दिशा तय होगी। फिलहाल यह फैसला सोशल मीडिया और बच्चों की सुरक्षा से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। कई लोग जीवन में बड़ी सफलता हासिल करने के बाद भी खुद को उसका हकदार नहीं मानते। उन्हें लगता है कि उनकी उपलब्धियां मेहनत या प्रतिभा की वजह से नहीं, बल्कि किस्मत या दूसरों की मदद से मिली हैं। अगर आपके मन में भी बार-बार ऐसे विचार आते हैं, तो यह इम्पोस्टर सिंड्रोम (Imposter Syndrome) का संकेत हो सकता है। यह कोई मानसिक बीमारी नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक स्थिति है, जो आत्मविश्वास, करियर, पढ़ाई और रिश्तों पर गहरा असर डाल सकती है। क्या है इम्पोस्टर सिंड्रोम? इम्पोस्टर सिंड्रोम ऐसी मानसिक स्थिति है, जिसमें व्यक्ति अपनी उपलब्धियों के बावजूद खुद को योग्य नहीं मानता। उसे हमेशा यह डर बना रहता है कि एक दिन लोग उसकी 'असलियत' जान जाएंगे और उसे अयोग्य समझेंगे। यह समस्या किसी भी उम्र के लोगों में हो सकती है, चाहे वे छात्र हों, नौकरीपेशा, डॉक्टर, इंजीनियर, कलाकार, उद्यमी या किसी भी क्षेत्र के सफल व्यक्ति। इन संकेतों से करें पहचान इस स्थिति से जूझ रहे लोग अक्सर अपनी सफलता का श्रेय खुद को नहीं देते, लगातार दूसरों से तुलना करते हैं और हर काम में पूर्णता (परफेक्शन) की उम्मीद रखते हैं। तारीफ मिलने पर असहज महसूस करना, छोटी-सी गलती पर खुद को असफल मान लेना, नई जिम्मेदारियों से डरना और हर समय अपनी कमियां उजागर होने का डर भी इसके प्रमुख लक्षण हैं। किन कारणों से बढ़ती है यह समस्या? विशेषज्ञों के अनुसार, इम्पोस्टर सिंड्रोम के पीछे कई मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारण हो सकते हैं। बचपन में लगातार तुलना होना, केवल बेहतरीन प्रदर्शन पर ही सराहना मिलना, परफेक्शन की आदत, नई नौकरी या प्रमोशन जैसी परिस्थितियां और सोशल मीडिया पर दूसरों की सफलता से खुद की तुलना करना इस समस्या को बढ़ा सकते हैं। मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ सकता है असर अगर यह भावना लंबे समय तक बनी रहे, तो व्यक्ति तनाव, चिंता, आत्मविश्वास में कमी और बर्नआउट जैसी समस्याओं का शिकार हो सकता है। कुछ लोग खुद को साबित करने के लिए जरूरत से ज्यादा काम करने लगते हैं, जबकि कई लोग असफलता के डर से नए अवसरों से दूर रहने लगते हैं। कैसे पाएं इम्पोस्टर सिंड्रोम से राहत? विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि अपनी छोटी-बड़ी उपलब्धियों को स्वीकार करें और उन्हें लिखकर रखें। नकारात्मक विचार आने पर खुद से पूछें कि क्या उसके पीछे कोई ठोस प्रमाण है। दूसरों से तुलना करने के बजाय अपनी प्रगति पर ध्यान दें और गलतियों को सीखने का अवसर मानें। अपनी भावनाएं किसी भरोसेमंद दोस्त, परिवार के सदस्य, मेंटर या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से साझा करने से भी मदद मिल सकती है। कब लें विशेषज्ञ की सलाह? यदि खुद को अयोग्य समझने की भावना लंबे समय तक बनी रहे और इसका असर आपके काम, पढ़ाई, रिश्तों या रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ने लगे, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। लगातार तनाव, चिंता, उदासी या आत्मविश्वास में गंभीर कमी महसूस होने पर मनोवैज्ञानिक या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर विकल्प हो सकता है। समय पर सही सहायता मिलने से इस स्थिति से बाहर निकलना आसान हो सकता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। डिजिटल युग में मोबाइल फोन, लैपटॉप और इंटरनेट ने जीवन को आसान बनाया है, लेकिन इनका अत्यधिक उपयोग मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर भी डाल रहा है। लगातार स्क्रीन से जुड़े रहने, सोशल मीडिया के बढ़ते इस्तेमाल और ऑनलाइन काम के दबाव के कारण लोगों में डिजिटल स्ट्रेस तेजी से बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि समय रहते इसके लक्षणों को पहचानकर डिजिटल आदतों में संतुलन लाना जरूरी है। विशेषज्ञों के अनुसार, लंबे समय तक स्क्रीन देखने से मानसिक थकान, आंखों में तनाव, सिरदर्द, नींद की समस्या और एकाग्रता में कमी जैसी दिक्कतें हो सकती हैं। वहीं, मोबाइल पर लगातार आने वाले नोटिफिकेशन, ईमेल और सोशल मीडिया अलर्ट दिमाग को लगातार सक्रिय रखते हैं, जिससे तनाव और बेचैनी बढ़ सकती है। सोशल मीडिया का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल भी डिजिटल स्ट्रेस का एक बड़ा कारण माना जाता है। दूसरों की जीवनशैली और उपलब्धियों से लगातार तुलना करने की प्रवृत्ति आत्मविश्वास में कमी, चिंता और असंतोष जैसी भावनाओं को जन्म दे सकती है। इसके अलावा, वर्क फ्रॉम होम और ऑनलाइन कार्य संस्कृति के कारण ऑफिस और निजी जीवन के बीच की दूरी कम हो गई है, जिससे लोग हर समय ऑनलाइन रहने का दबाव महसूस करते हैं। डिजिटल स्ट्रेस के सामान्य लक्षणों में बार-बार मोबाइल चेक करने की इच्छा, चिड़चिड़ापन, बेचैनी, ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई, नींद प्रभावित होना, मानसिक थकान और काम में रुचि कम होना शामिल हैं। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि स्क्रीन टाइम सीमित रखें, अनावश्यक नोटिफिकेशन बंद करें, सोशल मीडिया का संतुलित उपयोग करें और नियमित अंतराल पर डिजिटल ब्रेक लेकर मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखें।
आज के दौर में स्मार्टफोन हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। कामकाज, पढ़ाई, बैंकिंग, मनोरंजन और लोगों से जुड़े रहने तक लगभग हर काम मोबाइल के जरिए होने लगा है। हालांकि, जब इसका इस्तेमाल जरूरत से बढ़कर आदत और फिर लत में बदल जाता है, तो इसका असर मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर पड़ने लगता है। विशेषज्ञों के अनुसार, कई लोग बिना समझे ही मोबाइल एडिक्शन का शिकार हो जाते हैं। यदि आपके व्यवहार में भी कुछ खास बदलाव दिखाई दे रहे हैं, तो समय रहते सावधान होना जरूरी है। बार-बार मोबाइल देखने की आदत अगर बिना किसी जरूरी कॉल, मैसेज या नोटिफिकेशन के भी आप हर थोड़ी देर में फोन अनलॉक करके देखते रहते हैं, तो यह मोबाइल पर बढ़ती निर्भरता का संकेत हो सकता है। धीरे-धीरे यह आदत आपकी एकाग्रता और उत्पादकता को भी प्रभावित कर सकती है। फोन दूर होने पर बेचैनी महसूस होना कुछ लोगों को मोबाइल कुछ समय के लिए भी अपने पास न होने पर घबराहट, चिड़चिड़ापन या बेचैनी होने लगती है। यदि आपके साथ भी ऐसा होता है, तो यह मोबाइल की लत का स्पष्ट संकेत माना जा सकता है। सुबह उठते ही और रात को सोने से पहले फोन इस्तेमाल करना यदि आपकी सुबह की शुरुआत मोबाइल देखने से होती है और रात को सोने से पहले भी लंबे समय तक स्क्रीन पर नजरें टिकी रहती हैं, तो यह आदत धीरे-धीरे नुकसान पहुंचा सकती है। देर रात तक स्क्रीन देखने से नींद की गुणवत्ता प्रभावित होती है और शरीर को पर्याप्त आराम नहीं मिल पाता। काम, पढ़ाई और परिवार से ज्यादा मोबाइल को प्राथमिकता देना जब सोशल मीडिया, वीडियो देखने या मोबाइल गेम्स की वजह से पढ़ाई, नौकरी या परिवार के साथ बिताने वाला समय कम होने लगे, तो यह गंभीर चेतावनी हो सकती है। ऐसी स्थिति में व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन दोनों प्रभावित हो सकते हैं। स्क्रीन टाइम कम करने में बार-बार असफल होना अगर आपने कई बार मोबाइल का इस्तेमाल कम करने का फैसला किया, लेकिन हर बार कुछ समय बाद फिर पहले जैसी आदत लौट आई, तो यह भी मोबाइल एडिक्शन का प्रमुख संकेत माना जाता है। मोबाइल की लत से हो सकते हैं ये नुकसान मोबाइल का अत्यधिक इस्तेमाल लंबे समय में कई स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म दे सकता है। इनमें शामिल हैं: आंखों में जलन, दर्द और सिरदर्द की समस्या। नींद की गुणवत्ता खराब होना और लगातार थकान महसूस होना। तनाव और मानसिक दबाव बढ़ना। ध्यान केंद्रित करने की क्षमता में कमी आना। पढ़ाई और कामकाज की कार्यक्षमता प्रभावित होना। परिवार और दोस्तों के साथ संबंधों पर नकारात्मक असर पड़ना। मोबाइल इस्तेमाल कैसे करें संतुलित? मोबाइल का उपयोग पूरी तरह बंद करना संभव नहीं है, लेकिन इसकी आदत को नियंत्रित किया जा सकता है। इसके लिए स्क्रीन टाइम की सीमा तय करें, सोने से कम से कम एक घंटा पहले फोन का इस्तेमाल बंद करें, अनावश्यक नोटिफिकेशन बंद रखें और खाली समय में किताब पढ़ने, व्यायाम करने या परिवार के साथ समय बिताने जैसी गतिविधियों को प्राथमिकता दें। अगर मोबाइल का अत्यधिक उपयोग आपकी दिनचर्या, मानसिक स्थिति या सामाजिक जीवन को लगातार प्रभावित कर रहा है, तो किसी मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ या काउंसलर से सलाह लेना भी लाभदायक हो सकता है।
आज के समय में मोबाइल, लैपटॉप और टैबलेट हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। काम, पढ़ाई और मनोरंजन के लिए स्क्रीन का इस्तेमाल करना आम बात है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि केवल स्क्रीन के सामने बिताया गया समय ही नहीं, बल्कि उसका इस्तेमाल कैसे किया जा रहा है, यह भी मानसिक स्वास्थ्य और याददाश्त पर बड़ा असर डालता है। क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट के अनुसार, स्क्रीन टाइम को मुख्य रूप से दो भागों में बांटा जा सकता है—Passive Screen Time और Active Screen Time। इनमें से पैसिव स्क्रीन टाइम दिमाग के लिए अधिक नुकसानदायक माना जाता है। क्या होता है Passive Screen Time? Passive Screen Time वह होता है, जिसमें व्यक्ति बिना किसी उद्देश्य के लगातार स्क्रीन पर समय बिताता रहता है। इसमें सोशल मीडिया पर लगातार स्क्रॉल करना, ऑटो-प्ले वीडियो देखते रहना या बैकग्राउंड में वीडियो चलाकर अन्य काम करना शामिल है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह का स्क्रीन इस्तेमाल दिमाग पर बहुत कम मानसिक दबाव डालता है, लेकिन धीरे-धीरे यह याददाश्त, एकाग्रता और निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है। कैसे प्रभावित होती है याददाश्त और फोकस? विशेषज्ञों का कहना है कि एक वयस्क व्यक्ति औसतन रोजाना 6 से 7 घंटे स्क्रीन पर बिताता है, जिसमें बड़ा हिस्सा पैसिव स्क्रीन टाइम का होता है। लगातार बिना सोचे-समझे कंटेंट देखने की आदत से कई समस्याएं हो सकती हैं, जैसे— ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई वर्किंग मेमोरी कमजोर होना मानसिक थकान बढ़ना किसी काम पर लंबे समय तक टिके रहने में परेशानी छोटी-छोटी बातों पर चिड़चिड़ापन विशेषज्ञ बताते हैं कि छोटे-छोटे वीडियो और लगातार मिलने वाली तुरंत संतुष्टि (Instant Gratification) दिमाग को इसी तरह के कंटेंट का आदी बना सकती है, जिससे ध्यान अवधि (Attention Span) धीरे-धीरे कम होने लगती है। Active Screen Time क्यों है बेहतर? Active Screen Time में व्यक्ति स्क्रीन का इस्तेमाल किसी उद्देश्य के साथ करता है। जैसे— नई स्किल सीखना ऑनलाइन कोर्स करना किताब पढ़ना नई भाषा सीखना पजल या ब्रेन गेम खेलना डिजिटल जर्नलिंग ऑनलाइन फिटनेस क्लास लेना क्रिएटिव कंटेंट बनाना ऐसी गतिविधियां दिमाग को सक्रिय रखती हैं और सोचने, समझने तथा समस्या सुलझाने की क्षमता को बेहतर बनाने में मदद कर सकती हैं। क्या स्क्रीन टाइम से बढ़ सकता है डिमेंशिया का खतरा? विशेषज्ञों के अनुसार, केवल स्क्रीन टाइम को डिमेंशिया का सीधा कारण नहीं माना जा सकता। हालांकि लंबे समय तक दिमाग को पर्याप्त मानसिक चुनौती न मिलने पर याददाश्त, ध्यान और सोचने की क्षमता कमजोर हो सकती है। दूसरी ओर, सीखने और दिमाग को सक्रिय रखने वाली गतिविधियां "कॉग्निटिव रिजर्व" को मजबूत बनाने में मदद करती हैं, जिससे उम्र बढ़ने के साथ मानसिक कार्यक्षमता को बनाए रखने में सहायता मिल सकती है। कैसे करें स्क्रीन का सही इस्तेमाल? अगर आप स्क्रीन का उपयोग करते हैं, तो इन बातों का ध्यान रखें— बिना उद्देश्य के लगातार स्क्रॉल करने से बचें। सोशल मीडिया इस्तेमाल के लिए समय सीमा तय करें। हर 30–45 मिनट बाद स्क्रीन से ब्रेक लें। स्क्रीन का उपयोग सीखने और नई स्किल विकसित करने के लिए करें। सोने से कम से कम एक घंटा पहले स्क्रीन का इस्तेमाल कम करें। निष्कर्ष स्क्रीन अपने आप में नुकसानदायक नहीं है। असली फर्क इस बात से पड़ता है कि आप उसका इस्तेमाल किस तरह करते हैं। यदि स्क्रीन का उपयोग केवल मनोरंजन और लगातार स्क्रॉलिंग तक सीमित है, तो यह आपकी याददाश्त, ध्यान और मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर डाल सकता है। वहीं, सीखने और रचनात्मक कार्यों के लिए किया गया स्क्रीन इस्तेमाल दिमाग को सक्रिय और स्वस्थ बनाए रखने में मदद कर सकता है। नोट: यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है। यदि आपको याददाश्त, ध्यान या मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी लगातार समस्या हो रही है, तो किसी योग्य डॉक्टर या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह अवश्य लें।
सप्ताह की शुरुआत अक्सर कई कर्मचारियों के लिए तनाव और लंबे टू-डू लिस्ट के साथ होती है। दो दिन की छुट्टी के बाद अचानक काम के मोड में लौटना कई लोगों को भारी लगता है। ऐसे में अब एक नया वर्कप्लेस ट्रेंड 'Bare Minimum Mondays' तेजी से लोकप्रिय हो रहा है, जिसका उद्देश्य सोमवार के तनाव को कम करते हुए पूरे सप्ताह की उत्पादकता को बेहतर बनाना है। क्या है Bare Minimum Mondays? Bare Minimum Mondays का मतलब काम से बचना या आलस करना नहीं है। इसका उद्देश्य सोमवार को केवल सबसे जरूरी और उच्च प्राथमिकता वाले कार्य पूरे करना है, जबकि कम महत्वपूर्ण कामों, गैर-जरूरी बैठकों और अन्य गतिविधियों को सप्ताह के बाकी दिनों के लिए छोड़ दिया जाता है। इस तरीके से कर्मचारी बिना अधिक दबाव महसूस किए धीरे-धीरे पूरे सप्ताह की गति बना सकते हैं। कैसे अपनाएं Bare Minimum Mondays? 1. सबसे जरूरी काम पहले करें सोमवार की शुरुआत उन कार्यों से करें जिनकी समय-सीमा नजदीक हो या जिनका प्रभाव सबसे अधिक हो। बाकी कम जरूरी कार्य बाद में किए जा सकते हैं। 2. सोमवार का शेड्यूल हल्का रखें पूरे दिन को लगातार मीटिंग्स और भारी कामों से भरने के बजाय सीमित कार्य रखें। इससे मानसिक दबाव कम होता है और फोकस बेहतर रहता है। 3. गैर-जरूरी मीटिंग्स से बचें केवल उन्हीं बैठकों में शामिल हों जो वास्तव में आवश्यक हों। इससे महत्वपूर्ण कार्यों पर अधिक समय दिया जा सकता है। 4. वास्तविक लक्ष्य तय करें ऐसी टू-डू लिस्ट बनाएं जिसे कार्य समय के भीतर आसानी से पूरा किया जा सके। छोटे और पूरे होने वाले लक्ष्य आत्मविश्वास बढ़ाते हैं। 5. बीच-बीच में ब्रेक लें लगातार काम करने की बजाय छोटे-छोटे ब्रेक लें। कुछ मिनट टहलना या स्ट्रेचिंग करना मानसिक थकान कम करने और एकाग्रता बढ़ाने में मदद कर सकता है। क्या हैं इसके फायदे? यदि इस तरीके को सही ढंग से अपनाया जाए तो इसके कई फायदे हो सकते हैं। सोमवार की चिंता और तनाव कम हो सकता है। कार्यस्थल पर बर्नआउट का जोखिम घट सकता है। जरूरी कार्यों पर बेहतर फोकस बना रहता है। पूरे सप्ताह के लिए सकारात्मक कार्य गति (Momentum) बनती है। काम की गुणवत्ता और उत्पादकता में सुधार हो सकता है। क्या यह तरीका सभी के लिए उपयुक्त है? Bare Minimum Mondays हर पेशे में लागू नहीं किया जा सकता। स्वास्थ्य सेवाओं, आपातकालीन सेवाओं, कस्टमर सपोर्ट, रिटेल और ऐसे क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों के लिए यह मॉडल व्यावहारिक नहीं है, क्योंकि वहां तत्काल प्रतिक्रिया और तय समय पर काम करना जरूरी होता है। हालांकि, जिन कर्मचारियों के पास अपने कार्यों की प्राथमिकता तय करने की स्वतंत्रता होती है, वे इस रणनीति का उपयोग करके सप्ताह की शुरुआत अधिक संतुलित और कम तनावपूर्ण बना सकते हैं। निष्कर्ष Bare Minimum Mondays का उद्देश्य कम काम करना नहीं, बल्कि स्मार्ट तरीके से काम की प्राथमिकता तय करना है। सोमवार को केवल आवश्यक कार्यों पर ध्यान देकर कर्मचारी मानसिक दबाव कम कर सकते हैं, बेहतर फोकस बनाए रख सकते हैं और पूरे सप्ताह अधिक प्रभावी ढंग से काम कर सकते हैं।
Weekend Therapy: सिर्फ छुट्टी नहीं, खुद को रीचार्ज करने का मौका है वीकेंड पूरे सप्ताह ऑफिस, पढ़ाई, बिजनेस और घरेलू जिम्मेदारियों के बीच लोग शारीरिक और मानसिक रूप से थक जाते हैं। ऐसे में वीकेंड केवल आराम का दिन नहीं, बल्कि खुद को फिर से ऊर्जा से भरने का अवसर भी होता है। हालांकि कई लोग शनिवार और रविवार का ज्यादातर समय मोबाइल चलाने या देर तक सोने में बिताते हैं, जिससे शरीर और दिमाग को वास्तविक आराम नहीं मिल पाता। यदि आप वीकेंड का सही उपयोग करें तो आने वाले सप्ताह की शुरुआत नई ऊर्जा और सकारात्मक सोच के साथ कर सकते हैं। 1. पूरी करें अधूरी नींद, लेकिन जरूरत से ज्यादा नहीं कामकाजी दिनों में अक्सर पर्याप्त नींद नहीं मिल पाती। वीकेंड पर शरीर को आराम देने के लिए अच्छी और गहरी नींद लेना जरूरी है। हालांकि बहुत ज्यादा देर तक सोना भी नुकसानदायक हो सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार सामान्य समय से एक-दो घंटे अधिक आराम करना शरीर और दिमाग को तरोताजा रखने के लिए पर्याप्त होता है। अच्छी नींद मानसिक तनाव कम करने और एकाग्रता बढ़ाने में मदद करती है। 2. कुछ घंटों के लिए करें डिजिटल डिटॉक्स मोबाइल, लैपटॉप और टीवी की स्क्रीन आज हमारी जिंदगी का बड़ा हिस्सा बन चुकी हैं। लगातार सोशल मीडिया और ईमेल्स देखने से दिमाग को आराम नहीं मिल पाता। वीकेंड पर कम से कम चार से पांच घंटे के लिए फोन और अन्य डिजिटल डिवाइस से दूरी बनाएं। डिजिटल डिटॉक्स से आंखों को आराम मिलता है और मानसिक तनाव भी कम होता है। 3. प्रकृति के करीब बिताएं समय बंद कमरों और व्यस्त शहरों की जिंदगी से निकलकर थोड़ी देर प्रकृति के बीच समय बिताना मानसिक स्वास्थ्य के लिए बेहद फायदेमंद है। सुबह या शाम किसी पार्क में टहलना, हरियाली के बीच बैठना या ताजी हवा में गहरी सांस लेना मन को शांति देता है। प्रकृति के संपर्क में रहने से सकारात्मक भावनाएं बढ़ती हैं और तनाव कम होता है। 4. अपने शौक को दें समय भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग अक्सर अपने पसंदीदा शौक भूल जाते हैं। वीकेंड पर कुछ समय उन गतिविधियों के लिए निकालें जो आपको खुशी देती हैं। चाहे किताब पढ़ना हो, संगीत सुनना, पेंटिंग करना, गार्डनिंग करना या कोई नया हुनर सीखना—अपनी पसंद का काम करने से मन प्रसन्न रहता है और मानसिक दबाव कम होता है। 5. मसाज और गुनगुने पानी से दें शरीर को राहत लगातार काम करने से शरीर की मांसपेशियों में खिंचाव और थकान महसूस हो सकती है। ऐसे में गुनगुने पानी से स्नान करना या हल्के तेल से मसाज करना फायदेमंद साबित हो सकता है। इसके अलावा गुनगुने पानी में सेंधा नमक डालकर कुछ देर पैर डुबोकर बैठने से भी शरीर को आराम मिलता है। यह तरीका ब्लड सर्कुलेशन बेहतर करने और शारीरिक थकान कम करने में मदद करता है। 6. परिवार और दोस्तों के साथ बिताएं क्वालिटी टाइम काम का दबाव और व्यस्त दिनचर्या कई बार लोगों को भावनात्मक रूप से भी थका देती है। वीकेंड पर परिवार, दोस्तों या प्रियजनों के साथ समय बिताना मानसिक स्वास्थ्य के लिए बेहद जरूरी है। खुलकर बातचीत करना, हंसी-मजाक करना और पुरानी यादें साझा करना तनाव कम करने का प्रभावी तरीका माना जाता है। छोटी-छोटी आदतें बदल सकती हैं आपका पूरा वीकेंड वीकेंड का सही इस्तेमाल केवल आराम करने के लिए नहीं, बल्कि खुद को मानसिक और शारीरिक रूप से बेहतर बनाने के लिए भी किया जा सकता है। यदि आप अच्छी नींद, डिजिटल डिटॉक्स, प्रकृति के साथ समय, अपनी हॉबी, रिलैक्सेशन और अपनों के साथ बातचीत जैसी आदतों को अपनाते हैं, तो न सिर्फ आपकी थकान दूर होगी बल्कि आप नए सप्ताह की शुरुआत भी अधिक उत्साह और ऊर्जा के साथ कर पाएंगे।
King’s College London और University of Porto के वैज्ञानिकों की नई रिसर्च में यह सामने आया है कि दिमाग में मौजूद Histamine केवल एलर्जी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानसिक स्वास्थ्य, याददाश्त, भावनाओं और व्यवहार को भी गहराई से प्रभावित कर सकता है। शोधकर्ताओं ने पहली बार ऐसा विस्तृत “Brain Histamine Map” तैयार किया है, जो यह दिखाता है कि जीवन के अलग-अलग चरणों में Histamine से जुड़े जीन दिमाग के विकास, सोचने-समझने की क्षमता और मानसिक बीमारियों से कैसे जुड़े होते हैं। Histamine सिर्फ एलर्जी तक सीमित नहीं आमतौर पर Histamine को एलर्जी से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन वैज्ञानिकों के अनुसार यह दिमाग में एक महत्वपूर्ण न्यूरोमॉड्यूलेटर की तरह काम करता है। यह कई जरूरी कार्यों में भूमिका निभाता है, जैसे: भावनाओं को नियंत्रित करना नींद और जागने का चक्र याददाश्त व्यवहारिक लचीलापन सीखने की क्षमता लाखों डेटा पॉइंट्स का किया गया विश्लेषण इस रिसर्च में वैज्ञानिकों ने कई आधुनिक तकनीकों और डेटा सेट्स का इस्तेमाल किया। अध्ययन में शामिल थे: 49,495 brain cell nuclei का RNA sequencing analysis 24 से 57 वर्ष की उम्र के postmortem brain samples गर्भावस्था के 8 सप्ताह से लेकर 40 वर्ष तक के developmental brain data PET imaging और neurotransmitter receptor mapping इन सभी डेटा को मिलाकर वैज्ञानिकों ने दिमाग में Histamine सिस्टम का विस्तृत अध्ययन किया। मानसिक बीमारियों से मिला सीधा संबंध रिसर्च में पाया गया कि Histamine receptors का संबंध कई मानसिक और न्यूरोलॉजिकल समस्याओं से हो सकता है। वैज्ञानिकों ने Histamine expression patterns को इन स्थितियों से जुड़ा पाया: Attention Deficit Hyperactivity Disorder Major Depressive Disorder Schizophrenia Anorexia Nervosa शोधकर्ताओं के अनुसार दिमाग के frontal और limbic क्षेत्रों में Histamine activity ज्यादा देखी गई, जबकि occipital cortex में इसका स्तर कम पाया गया। उम्र के साथ बदलता है Histamine सिस्टम अध्ययन में यह भी सामने आया कि: Histidine decarboxylase नामक enzyme का स्तर शुरुआती विकास में सबसे ज्यादा था जबकि H3 receptor expression उम्र बढ़ने के साथ adulthood तक बढ़ता गया इससे संकेत मिलता है कि Histamine सिस्टम जीवनभर दिमाग के विकास और कार्यप्रणाली को प्रभावित कर सकता है। भविष्य में नई मानसिक स्वास्थ्य थेरेपी का रास्ता वैज्ञानिकों का मानना है कि यह रिसर्च मानसिक बीमारियों के इलाज में नई संभावनाएं खोल सकती है। यह “Brain Histamine Atlas” भविष्य में: Depression ADHD Schizophrenia Neurodevelopmental disorders के लिए targeted therapies विकसित करने में मदद कर सकता है। हालांकि विशेषज्ञों ने यह भी स्पष्ट किया कि अभी और रिसर्च की जरूरत है, ताकि यह समझा जा सके कि Histamine signaling को नियंत्रित करके मानसिक स्वास्थ्य उपचार को कितना बेहतर बनाया जा सकता है।
मानसिक स्वास्थ्य उपचार के क्षेत्र में उभर रही साइकेडेलिक थेरेपी को लेकर मीडिया कवरेज पर एक नई रिसर्च ने महत्वपूर्ण सवाल खड़े किए हैं। Natural Language Processing के जरिए किए गए इस विश्लेषण में पाया गया कि 2017 से 2024 के बीच साइकेडेलिक उपचारों को पारंपरिक दवाओं की तुलना में अधिक सकारात्मक तरीके से प्रस्तुत किया गया। साइकेडेलिक थेरेपी को मिला ज्यादा सकारात्मक कवरेज अध्ययन में 6,805 मीडिया पब्लिकेशंस का विश्लेषण किया गया, जिसमें पाया गया कि डिप्रेशन और Post-Traumatic Stress Disorder जैसे मानसिक रोगों के इलाज में उपयोग होने वाली साइकेडेलिक थेरेपी को अधिक सकारात्मक भावनाओं और भाषा के साथ जोड़ा गया। इसके विपरीत, FDA-स्वीकृत एंटीडिप्रेसेंट दवाओं को अक्सर जोखिम, साइड इफेक्ट्स और नकारात्मक पहलुओं के संदर्भ में दिखाया गया। इससे यह संकेत मिलता है कि पारंपरिक उपचारों को अपेक्षाकृत अधिक आलोचनात्मक नजर से प्रस्तुत किया जा रहा है। क्या पूरी तरह सकारात्मक है कवरेज? हालांकि स्टडी में यह भी सामने आया कि साइकेडेलिक उपचारों की कवरेज पूरी तरह एकतरफा नहीं है। कुछ रिपोर्ट्स में इनके जोखिम और नकारात्मक पहलुओं को भी उजागर किया गया। वहीं, पारंपरिक एंटीडिप्रेसेंट्स को ‘रिवॉर्ड’ यानी लाभ से जुड़े संदर्भों में भी दिखाया गया। मरीजों की सोच पर पड़ सकता है असर विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की असंतुलित मीडिया कवरेज मरीजों की सोच और फैसलों को प्रभावित कर सकती है। अगर किसी नए उपचार को अधिक सकारात्मक और पुराने उपचार को अधिक नकारात्मक रूप में दिखाया जाता है, तो मरीज पारंपरिक दवाओं से दूरी बना सकते हैं या नए विकल्पों से अवास्तविक उम्मीदें रख सकते हैं। डॉक्टरों के लिए बढ़ी जिम्मेदारी इस स्थिति में स्वास्थ्य विशेषज्ञों के लिए यह जरूरी हो जाता है कि वे मरीजों को संतुलित और साक्ष्य-आधारित जानकारी दें। इससे मरीज सही निर्णय ले सकेंगे और उपचार प्रक्रिया पर भरोसा बना रहेगा। संतुलित रिपोर्टिंग की जरूरत यह अध्ययन इस बात पर जोर देता है कि मानसिक स्वास्थ्य जैसे संवेदनशील विषयों पर मीडिया की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। जैसे-जैसे साइकेडेलिक थेरेपी पर रिसर्च आगे बढ़ेगी, वैसे-वैसे संतुलित और तथ्य-आधारित रिपोर्टिंग जरूरी होगी ताकि आम लोगों को सही और पूरी जानकारी मिल सके।
Meerut: उत्तर प्रदेश के मेरठ से एक बेहद चौंकाने और दिल दहला देने वाला मामला सामने आया है, जहां एक पिता अपनी ही बेटी की मौत के बाद करीब पांच महीनों तक उसकी सड़ी-गली लाश के साथ उसी घर में रहता रहा। इस घटना ने न सिर्फ इलाके के लोगों को झकझोर दिया है, बल्कि यह सवाल भी खड़े कर दिए हैं कि आखिर मानसिक और सामाजिक स्तर पर ऐसी स्थिति कैसे बनती है। बंद कमरे में छिपा था खौफनाक राज मेरठ के तेली मोहल्ले स्थित एक घर से जब तेज बदबू आने लगी, तो रिश्तेदारों को शक हुआ। उन्होंने तुरंत पुलिस को सूचना दी। जब पुलिस ने घर का दरवाजा खोलकर अंदर प्रवेश किया, तो सामने जो दृश्य था, उसने सभी को स्तब्ध कर दिया। कमरे के भीतर बिस्तर पर एक महिला की सड़ी हुई लाश पड़ी थी, जो काफी हद तक कंकाल में तब्दील हो चुकी थी। बेटी की मौत छिपाकर जी रहा था पिता जांच में पता चला कि मृतका प्रियंका बिस्वास थी, जिसकी मौत करीब पांच महीने पहले पीलिया के कारण हो गई थी। लेकिन पिता उदय भानु बिस्वास ने इस बात की जानकारी किसी को नहीं दी। वह लगातार रिश्तेदारों और परिचितों को यह कहता रहा कि उसकी बेटी देहरादून में अस्पताल में भर्ती है। उसने न तो अंतिम संस्कार किया और न ही किसी को सच्चाई बताई। बदबू छिपाने के लिए करता था परफ्यूम का इस्तेमाल इस मामले की सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि पिता लाश से आने वाली बदबू को छिपाने के लिए नियमित रूप से परफ्यूम छिड़कता रहा। घर के अंदर कचरे का ढेर लगा हुआ था और पूरा माहौल अस्वच्छ और भयावह बना हुआ था। इससे साफ है कि वह लंबे समय से इस स्थिति में जी रहा था। रिश्तेदारों ने खोला राज परिवार के लोगों को लंबे समय से पिता और बेटी के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल रही थी। जब उन्हें सूचना मिली कि उदय भानु मेरठ में देखा गया है, तो वे तुरंत पहुंचे और उससे पूछताछ की। सख्ती करने पर उसने पूरी सच्चाई बता दी। इसके बाद पुलिस को बुलाया गया और पूरे मामले का खुलासा हुआ। पुलिस कार्रवाई और जांच जारी पुलिस ने आरोपी पिता को हिरासत में ले लिया है और शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है। शुरुआती जांच में मौत की वजह बीमारी बताई जा रही है, लेकिन पुलिस अब इस बात की भी जांच कर रही है कि कहीं इसमें कोई और पहलू तो नहीं है। साथ ही पिता की मानसिक स्थिति का भी आकलन किया जा रहा है। मानसिक आघात बना वजह? जानकारी के मुताबिक उदय भानु पहले से ही मानसिक तनाव में था। उसकी पत्नी ने वर्ष 2013 में आत्महत्या कर ली थी, जिसके बाद वह और उसकी बेटी अकेले रहते थे। बेटी की मौत के बाद वह इस सदमे को स्वीकार नहीं कर पाया और इसी कारण उसने शव को घर में ही रखा। यह घटना मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक समर्थन की कमी को भी उजागर करती है।
मानसिक तनाव से निपटने में योग का बढ़ता महत्व आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में डिप्रेशन एक गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्या बनती जा रही है। यह किसी एक लिंग तक सीमित नहीं है, लेकिन अक्सर देखा जाता है कि पुरुष इस समस्या को खुलकर स्वीकार नहीं करते। समाज में बचपन से ही उन्हें मजबूत रहने और कमजोरी न दिखाने की सीख दी जाती है, जिसके कारण कई बार वे अपने मानसिक तनाव को दबा लेते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार यदि डिप्रेशन को शुरुआती चरण में ही पहचान कर उसका समाधान किया जाए, तो इससे बाहर निकलना संभव है। काउंसलिंग और चिकित्सकीय उपचार के साथ-साथ जीवनशैली में सकारात्मक बदलाव भी बहुत मददगार साबित होते हैं। इसी में योग एक प्रभावी तरीका माना जाता है, जो मन और शरीर दोनों को संतुलित करने में सहायक है। शोध में सामने आए योग के फायदे अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्था Harvard Medical School की मानसिक स्वास्थ्य रिपोर्ट के अनुसार नियमित योग अभ्यास कई तरह से मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है। शोध में पाया गया है कि योग- तनाव के प्रभाव को कम करता है डिप्रेशन और एंग्जायटी से उबरने में मदद करता है शरीर और मन को शांत रखता है ऊर्जा और सकारात्मकता बढ़ाता है एक अन्य अध्ययन में यह भी सामने आया कि योग के दौरान किए जाने वाले श्वास-प्रश्वास अभ्यास (Breathing Techniques) मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य दोनों के लिए बेहद लाभकारी होते हैं। रोज घर पर कर सकते हैं ये 7 योगासन 1. अधो मुख श्वानासन (Downward Facing Dog) यह आसन शरीर की मांसपेशियों को स्ट्रेच करता है और दिमाग में रक्त संचार बढ़ाकर तनाव कम करने में मदद करता है। 2. उत्तानासन (Standing Forward Fold) इस आसन से दिमाग शांत होता है और चिंता व मानसिक थकान कम होती है। 3. उत्कटासन (Chair Pose) यह आसन शरीर की ताकत बढ़ाता है और आत्मविश्वास को मजबूत करता है। 4. वीरभद्रासन-I (Warrior Pose) यह योगासन शरीर को संतुलित बनाता है और मानसिक दृढ़ता बढ़ाने में मदद करता है। 5. उर्ध्व मुख श्वानासन (Upward Facing Dog) यह आसन छाती को खोलता है और शरीर में ऊर्जा का संचार बढ़ाता है। 6. नौकासन (Boat Pose) यह आसन पेट की मांसपेशियों को मजबूत करता है और शरीर में स्थिरता लाता है। 7. सेतु बंधासन (Bridge Pose) यह आसन रीढ़ को मजबूत करता है और दिमाग को रिलैक्स करने में मदद करता है। नियमित अभ्यास से मिल सकते हैं बेहतर परिणाम योग विशेषज्ञों का कहना है कि इन आसनों का नियमित अभ्यास मानसिक तनाव को कम करने और शरीर को मजबूत बनाने में मदद कर सकता है। हालांकि गंभीर डिप्रेशन की स्थिति में पेशेवर चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है। योग को अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाकर व्यक्ति मानसिक संतुलन, सकारात्मक सोच और बेहतर शारीरिक स्वास्थ्य हासिल कर सकता है।
डिप्रेशन से जूझ रहे लोगों के लिए उम्मीद की नई किरण दुनियाभर में डिप्रेशन एक गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्या बन चुका है। हर साल करोड़ों लोग इससे प्रभावित होते हैं, लेकिन महंगी थेरेपी, सामाजिक झिझक और विशेषज्ञों की कमी के कारण बहुत से मरीज समय पर इलाज नहीं करा पाते। इसी बीच एक नई रिसर्च ने उम्मीद की किरण दिखाई है। जर्नल Nature Human Behaviour में प्रकाशित 2026 के अध्ययन के अनुसार, सिर्फ 10 मिनट के मनोवैज्ञानिक अभ्यास भी डिप्रेशन के लक्षणों को कम करने में मदद कर सकते हैं और इसका असर एक महीने तक बना रह सकता है। 10 मिनट के छोटे अभ्यास से दिखा असर इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने अमेरिका के 7,505 वयस्कों को शामिल किया, जो डिप्रेशन के लक्षणों से जूझ रहे थे। शोधकर्ताओं ने इन प्रतिभागियों को अलग-अलग डिजिटल मानसिक स्वास्थ्य अभ्यासों के समूहों में बांटा। हर अभ्यास 10 मिनट से कम समय का था और इसमें ऐसे व्यावहारिक कौशल सिखाए गए, जो आमतौर पर मनोचिकित्सा (Psychotherapy) में इस्तेमाल किए जाते हैं। इन अभ्यासों में शामिल थे: नकारात्मक विचारों को नए नजरिए से देखना लक्ष्य तय करना और प्रेरणा बढ़ाना दूसरों की मदद करके जीवन के अर्थ को समझना प्रतिभागियों की मानसिक स्थिति का आकलन अभ्यास के तुरंत बाद और फिर एक महीने बाद किया गया। दो तकनीकों ने दिखाया सबसे बेहतर परिणाम अध्ययन में पाया गया कि कुछ अभ्यासों से लोगों में तुरंत उम्मीद और प्रेरणा बढ़ी। लेकिन दो विशेष तकनीकों ने लंबे समय तक असर दिखाया: नकारात्मक विचारों को नए और सकारात्मक नजरिए से समझने की मानसिक तकनीक। ध्यान केंद्रित करना इन तकनीकों का उपयोग करने वाले प्रतिभागियों में एक महीने बाद भी डिप्रेशन के लक्षणों में औसतन 4% अधिक कमी देखी गई, जो कंट्रोल ग्रुप के मुकाबले बेहतर थी। छोटे उपाय भी बन सकते हैं बड़ी मदद शोधकर्ताओं के अनुसार यह सुधार भले ही छोटा लगे, लेकिन इसका महत्व काफी बड़ा है। क्योंकि ऐसे छोटे डिजिटल अभ्यास लाखों लोगों तक आसानी से पहुंच सकते हैं, खासकर उन लोगों तक जिन्हें मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध नहीं हैं। हालांकि वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया कि ये अभ्यास थेरेपी का विकल्प नहीं हैं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए शुरुआती सहायक उपकरण के रूप में देखे जाने चाहिए। अन्य शोध भी देते हैं इसी तरह के संकेत मानसिक स्वास्थ्य पर छोटे-छोटे अभ्यासों के सकारात्मक प्रभाव को लेकर पहले भी कई अध्ययन सामने आ चुके हैं। 2024 में British Journal of Health Psychology में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि रोजाना 10 मिनट की माइंडफुलनेस प्रैक्टिस से लोगों के मानसिक स्वास्थ्य में सुधार हुआ और डिप्रेशन व एंग्जायटी के लक्षण कम हुए। इसके अलावा National Institutes of Health की 2019 की समीक्षा में भी बताया गया कि शारीरिक गतिविधि और व्यायाम मूड बेहतर करने और डिप्रेशन के लक्षण घटाने में मदद कर सकते हैं। छोटे कदम भी बदल सकते हैं मानसिक स्थिति डिप्रेशन से जूझ रहे लोगों को अक्सर लगता है कि स्थिति से बाहर निकलना मुश्किल है। लेकिन यह नई रिसर्च बताती है कि छोटे-छोटे कदम भी बड़ा बदलाव ला सकते हैं। कभी-कभी सिर्फ 10 मिनट का मानसिक अभ्यास, नई सोच सीखना या किसी छोटे लक्ष्य पर काम करना भी मनोदशा को बेहतर बनाने की दिशा में पहला कदम बन सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि आने वाले समय में ऐसे छोटे लेकिन प्रभावी डिजिटल मानसिक स्वास्थ्य अभ्यास मानसिक स्वास्थ्य देखभाल का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकते हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।