पटना, एजेंसियां। बिहार में शिक्षक भर्ती की तैयारी के बीच शिक्षा विभाग ने सभी जिलों से खाली पड़े शिक्षक पदों की रिपोर्ट मांगी है। जिलों से रिक्तियों का नया आंकड़ा मिलने के बाद भर्ती में शामिल किए जाने वाले पदों की संख्या बढ़ने की संभावना है। इसी प्रक्रिया के चलते शिक्षक भर्ती का आधिकारिक नोटिफिकेशन जारी होने में थोड़ी देरी हो सकती है। सभी जिलों से मांगा गया रिक्तियों का ब्योरा शिक्षा विभाग की ओर से जिलों को अपने यहां खाली पड़े शिक्षक पदों का विस्तृत ब्योरा उपलब्ध कराने को कहा गया है। इसमें विभिन्न विद्यालयों और विषयों के अनुसार रिक्त पदों की जानकारी शामिल की जा सकती है। विभाग का उद्देश्य भर्ती प्रक्रिया शुरू करने से पहले रिक्त पदों का अद्यतन आंकड़ा तैयार करना है, ताकि अधिक से अधिक खाली पदों को भर्ती प्रक्रिया में शामिल किया जा सके। बढ़ सकती है शिक्षक भर्ती में पदों की संख्या जिलों से मिलने वाली रिपोर्ट के आधार पर शिक्षक भर्ती में पहले अनुमानित पदों की तुलना में अधिक रिक्तियां शामिल होने की संभावना है। इससे बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों को सरकारी शिक्षक बनने का अवसर मिल सकता है। हालांकि, अंतिम पद संख्या जिलों से प्राप्त आंकड़ों और विभागीय स्वीकृति के बाद ही स्पष्ट होगी। नोटिफिकेशन में हो सकती है थोड़ी देरी रिक्त पदों का नया आंकड़ा तैयार करने की प्रक्रिया के कारण शिक्षक भर्ती का नोटिफिकेशन निर्धारित समय से थोड़ा आगे खिसक सकता है। विभाग की कोशिश है कि सभी जिलों की रिक्तियों को मिलाकर भर्ती का विस्तृत प्रस्ताव तैयार किया जाए। अभ्यर्थियों को सलाह दी गई है कि वे आधिकारिक भर्ती विज्ञापन जारी होने तक पदों की संख्या और आवेदन की तारीख को अंतिम न मानें। अभ्यर्थियों के लिए महत्वपूर्ण अपडेट शिक्षक भर्ती की तैयारी कर रहे उम्मीदवारों के लिए यह खबर राहत देने वाली हो सकती है, क्योंकि रिक्तियों की संख्या बढ़ने पर चयन के अवसर भी बढ़ सकते हैं। हालांकि, विषयवार पद, कुल रिक्तियां, शैक्षणिक योग्यता, परीक्षा पैटर्न और आवेदन की अंतिम तारीख आधिकारिक नोटिफिकेशन जारी होने के बाद ही निश्चित मानी जाएगी।
रांची। झारखंड शिक्षक पात्रता परीक्षा (JTET) के आयोजन में लगातार हो रही देरी पर झारखंड हाईकोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है। राज्य में करीब नौ साल से JTET परीक्षा आयोजित नहीं होने के मामले में अदालत ने स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग के सचिव को शोकॉज नोटिस जारी किया है। नौ साल से परीक्षा का इंतजार JTET का आयोजन लंबे समय से नहीं होने के कारण शिक्षक बनने की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, झारखंड गठन के बाद अब तक JTET का आयोजन केवल दो बार हुआ है और 2016 के बाद परीक्षा नहीं हुई। इस देरी का सीधा असर शिक्षक नियुक्ति की प्रक्रिया पर भी पड़ रहा है। अभ्यर्थी लगातार परीक्षा आयोजित कराने की मांग कर रहे हैं। हाईकोर्ट ने मांगा जवाब मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सरकार से JTET को लेकर देरी का कारण और परीक्षा आयोजित करने की स्थिति स्पष्ट करने को कहा। शिक्षा सचिव से इस संबंध में जवाब मांगा गया है। इससे पहले हाईकोर्ट ने सरकार को मार्च 2026 तक JTET आयोजित कराने का निर्देश दिया था और JTET होने तक नई सहायक शिक्षक नियुक्ति प्रक्रिया पर रोक लगाने का आदेश भी दिया था। भाषा विवाद से भी अटकी प्रक्रिया JTET 2026 की प्रक्रिया में भोजपुरी, अंगिका और मगही जैसी क्षेत्रीय भाषाओं को शामिल करने को लेकर भी विवाद सामने आया है। इसी भाषा विवाद के कारण परीक्षा की नियमावली और आवेदन प्रक्रिया प्रभावित होने की रिपोर्टें सामने आई थीं। अब हाईकोर्ट की सख्ती के बाद शिक्षा विभाग को परीक्षा में देरी को लेकर अपना पक्ष स्पष्ट करना होगा। अभ्यर्थियों की नजर अदालत के अगले आदेश और सरकार की कार्रवाई पर है।
पटना, एजेंसियां। बिहार के सरकारी स्कूलों में शनिवार को हाफ-डे व्यवस्था आज, 8 अगस्त 2026 से फिर लागू हो गई है। शिक्षा विभाग के फैसले के अनुसार अब सोमवार से शुक्रवार तक स्कूल सामान्य समय के अनुसार चलेंगे, जबकि शनिवार को विद्यार्थियों के लिए आधे दिन की कक्षाएं संचालित होंगी। शनिवार को आधे दिन ही होगी पढ़ाई नई व्यवस्था के तहत शनिवार को विद्यार्थियों को पूरे दिन स्कूल में नहीं रहना होगा। शिक्षा विभाग ने शनिवार को हाफ-डे और नो-बैग डे के रूप में संचालित करने की योजना बनाई है। इस दौरान पढ़ाई के साथ खेल, कला, प्रश्नोत्तरी, कहानी और अन्य सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों पर भी जोर दिया जाएगा। सोमवार से शुक्रवार सामान्य समय शनिवार के अलावा सोमवार से शुक्रवार तक सरकारी स्कूलों में नियमित कक्षाएं चलेंगी। नई व्यवस्था का उद्देश्य विद्यार्थियों और शिक्षकों पर पढ़ाई का अतिरिक्त दबाव कम करना तथा शनिवार को गतिविधि आधारित शिक्षण के लिए इस्तेमाल करना बताया गया है। छात्रों को मिलेगा गतिविधियों के लिए समय शिक्षा विभाग की नई पहल में शनिवार को केवल पारंपरिक पढ़ाई के बजाय खेलकूद, कला, रचनात्मक गतिविधियों, कहानी-कथन और प्रश्नोत्तरी जैसी गतिविधियों को शामिल करने पर जोर है। सरकार का उद्देश्य विद्यार्थियों के लिए शनिवार के स्कूल दिवस को अधिक रोचक और तनावमुक्त बनाना है।
पटना, एजेंसियां। बिहार के सरकारी स्कूलों में शनिवार को अब आधे दिन की पढ़ाई होगी। शिक्षा विभाग ने यह व्यवस्था 8 अगस्त 2026 से लागू करने का निर्णय लिया है। शनिवार को स्कूलों में ‘नो बैग डे’ के तहत पढ़ाई के साथ रचनात्मक और सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों पर भी जोर दिया जाएगा। शनिवार को 9:30 बजे से दोपहर तक चलेगा स्कूल नई व्यवस्था के अनुसार सोमवार से शुक्रवार तक सरकारी स्कूलों में कक्षाएं सुबह 9:30 बजे से शाम 4 बजे तक चलेंगी। वहीं शनिवार को स्कूल सुबह 9:30 बजे से दोपहर 1 बजे तक संचालित होंगे। कक्षा 1 से 8 तक के विद्यार्थियों के लिए शैक्षणिक और सह-पाठ्यक्रम गतिविधियां दोपहर तक चलेंगी। इसके बाद मध्याह्न भोजन दिया जाएगा और विद्यार्थियों की छुट्टी होगी। ‘नो बैग डे’ में होंगी रचनात्मक गतिविधियां शनिवार को विद्यार्थियों पर नियमित पढ़ाई और किताबों का बोझ कम रखने की योजना है। इस दिन संगीत, नाटक, कला और अन्य रचनात्मक गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाएगा। शिक्षा विभाग का उद्देश्य बच्चों के सर्वांगीण विकास के साथ स्कूल में सीखने के माहौल को अधिक रुचिकर बनाना है। इसके लिए कला और संगीत में प्रशिक्षित शिक्षकों की भी भूमिका तय की जाएगी। शिक्षकों के लिए भी तय किए गए काम विद्यार्थियों की छुट्टी के बाद शिक्षक अपने शैक्षणिक और प्रशासनिक कार्य पूरे करेंगे। इसमें पाठ योजना तैयार करना, विद्यार्थियों के मूल्यांकन से जुड़े काम, अभिलेख अपडेट करना और जरूरत के अनुसार कमजोर विद्यार्थियों के लिए अतिरिक्त सहायता देना शामिल है। शिक्षकों के तबादले की प्रक्रिया भी तेज शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी के अनुसार शिक्षक स्थानांतरण प्रक्रिया के तहत 73,151 शिक्षकों ने समायोजन और युक्तिकरण के लिए आवेदन किया है। सामान्य शिक्षकों के लिए स्थानांतरण आवेदन का नया चरण 17 सितंबर से शुरू करने की बात कही गई है। विभाग का लक्ष्य पूरी स्थानांतरण प्रक्रिया को 31 अक्टूबर तक पूरा करना है।
पटना, एजेंसियां। बिहार में सरकारी शिक्षकों के स्थानांतरण को लेकर शिक्षा विभाग ने नई प्रक्रिया शुरू करने की तैयारी कर ली है। बिहार राज्य शिक्षक स्थानांतरण नियमावली 2026 के तहत शिक्षकों का ट्रांसफर अब ऑनलाइन माध्यम से किया जाएगा। इसके लिए आवेदन प्रक्रिया 29 जुलाई से ई-शिक्षाकोष (e-Shikshakosh) पोर्टल पर शुरू होगी। 5 साल की बाध्यता खत्म, शिक्षकों को मिलेगा विकल्प चुनने का मौका नई ट्रांसफर नीति में शिक्षकों को बड़ी राहत दी गई है। अब स्थानांतरण के लिए पहले जैसी 5 साल की अनिवार्यता को खत्म कर दिया गया है। शिक्षक अपनी पसंद के स्कूल और स्थान के लिए ऑनलाइन आवेदन कर सकेंगे। शिक्षकों को रिक्त पदों की सूची देखकर अपनी प्राथमिकता के आधार पर विकल्प चुनने का मौका मिलेगा। रिपोर्ट के अनुसार शिक्षक अधिकतम 30 विद्यालयों का विकल्प दे सकेंगे, जबकि जिला या प्रमंडल से बाहर स्थानांतरण चाहने वाले शिक्षक कई जिलों को प्राथमिकता के रूप में चुन पाएंगे। पूरी प्रक्रिया होगी ऑनलाइन शिक्षा विभाग ने स्थानांतरण प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए इसे पूरी तरह ऑनलाइन रखने का फैसला किया है। आवेदन, विकल्प चयन और आगे की प्रक्रिया ई-शिक्षाकोष पोर्टल के माध्यम से पूरी की जाएगी। ऑनलाइन व्यवस्था लागू होने से शिक्षकों को बार-बार विभागीय कार्यालयों के चक्कर लगाने से राहत मिलने की उम्मीद है। साथ ही स्थानांतरण प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखने में भी मदद मिलेगी। महिला और पुरुष शिक्षकों के लिए अलग-अलग प्रावधान नई नीति में महिला और पुरुष शिक्षकों की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग व्यवस्था की गई है। महिला शिक्षकों को नजदीकी क्षेत्र में पोस्टिंग देने को प्राथमिकता देने की बात कही गई है, जबकि पुरुष शिक्षकों के लिए भी जिला स्तर पर सुविधाजनक स्थानांतरण के विकल्प रखे गए हैं। सरकार का उद्देश्य शिक्षकों की व्यक्तिगत परेशानियों को कम करने के साथ-साथ स्कूलों में शिक्षकों की उपलब्धता को संतुलित करना है। सितंबर में शुरू होगी पारस्परिक स्थानांतरण प्रक्रिया सामान्य स्थानांतरण के बाद शिक्षकों के म्यूचुअल ट्रांसफर (आपसी स्थानांतरण) की प्रक्रिया भी शुरू की जाएगी। इसके लिए सितंबर में अलग चरण निर्धारित किया गया है, जिसमें जिला, प्रमंडल और राज्य स्तर की समितियां आवेदन की जांच करेंगी। नई ट्रांसफर नीति से राज्य के लाखों सरकारी शिक्षकों को राहत मिलने की उम्मीद है। अब शिक्षकों की नजर 29 जुलाई से शुरू होने वाली ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया और आगे जारी होने वाले विभागीय दिशा-निर्देशों पर है।
श्रीनगर, एजेंसियां। जम्मू-कश्मीर सरकार ने सरकारी स्कूलों की लाइब्रेरी में उपलब्ध कराई गई दो विवादित पुस्तकों में कथित रूप से अलगाववादी नेताओं और आतंकवादियों का महिमामंडन किए जाने के आरोपों के बाद बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने स्कूल शिक्षा विभाग के आठ अधिकारियों को निलंबित कर दिया है, एक संविदाकर्मी की सेवा समाप्त कर दी है और पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच के आदेश दिए हैं। साथ ही दोनों पुस्तकों को तत्काल प्रभाव से स्कूलों से वापस लेने का निर्देश भी जारी किया गया है। दो पुस्तकों पर उठे थे गंभीर सवाल विवाद उन दो पुस्तकों को लेकर खड़ा हुआ जिन्हें समग्र शिक्षा अभियान के तहत सरकारी स्कूलों की लाइब्रेरी में भेजा गया था। आरोप है कि इन पुस्तकों में कुछ अलगाववादी नेताओं और प्रतिबंधित संगठनों से जुड़े व्यक्तियों को सकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया था। मामला सामने आने के बाद सरकार ने पुस्तकों का वितरण तुरंत रोक दिया और उनकी समीक्षा शुरू कर दी। उच्चस्तरीय जांच के आदेश सरकार ने पूरे प्रकरण की विभागीय जांच शुरू कर दी है। जांच अधिकारी को 30 दिनों के भीतर रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए गए हैं। साथ ही विवादित पुस्तकों के लेखकों और प्रकाशकों को जम्मू-कश्मीर में भविष्य की शैक्षणिक प्रकाशन प्रक्रिया से ब्लैकलिस्ट करने का भी निर्णय लिया गया है। राजनीतिक प्रतिक्रिया तेज मामले के सामने आने के बाद विभिन्न राजनीतिक दलों ने शिक्षा व्यवस्था में ऐसी सामग्री शामिल होने पर सवाल उठाए। सरकार का कहना है कि स्कूलों में केवल तथ्यात्मक, संतुलित और राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप सामग्री ही उपलब्ध कराई जाएगी तथा जिम्मेदार पाए जाने वाले अधिकारियों के खिलाफ आगे भी कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
पटना ,एजेंसियां। बिहार में भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान के तहत निगरानी अन्वेषण ब्यूरो ने एक और कड़ी कार्रवाई करते हुए शिक्षा विभाग के वेतन सत्यापन कोषांग में कार्यरत अवर सचिव अमोद मिश्रा को 20 हजार रुपये की रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ लिया। यह कार्रवाई पटना के गर्दनीबाग इलाके में मिनिस्टर एन्क्लेव मोड़ के पास की गई। एरियर भुगतान के बदले मांगी जा रही थी रकम मामले में सामने आया है कि शिकायतकर्ता उमा शंकर उमरेबी (नालंदा जिला, नई सराय) ने आरोप लगाया था कि उनके एरियर भुगतान से जुड़े कार्य को आगे बढ़ाने के लिए उनसे अवर सचिव द्वारा 20 हजार रुपये की मांग की जा रही थी। इसके बाद उन्होंने इसकी शिकायत निगरानी ब्यूरो से की। जांच में शिकायत सही मिलने पर बिछाया गया ट्रैप शिकायत मिलने के बाद निगरानी विभाग ने मामले की प्रारंभिक जांच कराई, जिसमें आरोपों की पुष्टि हुई। इसके बाद टीम ने योजनाबद्ध तरीके से जाल बिछाया और जैसे ही रिश्वत की रकम ली गई, अधिकारी को मौके पर ही गिरफ्तार कर लिया गया। कार्रवाई के बाद दफ्तर में हड़कंप गिरफ्तारी के बाद संबंधित विभाग में अफरा-तफरी का माहौल बन गया। निगरानी टीम अब आगे की जांच में जुटी है और यह भी पता लगाया जा रहा है कि कहीं इस पूरे मामले में और लोग शामिल तो नहीं हैं।
बांका, एजेंसियां। बिहार में गर्मी के छुट्टी के ख़त्म होने के बाद सरकारी स्कूल के खुलने के साथ ही शिक्षा विभाग ने बड़ी कार्रवाई की है। बांका जिले में निरीक्षण के दौरान 487 शिक्षक बिना पूर्व सूचना के अनुपस्थित पाए गए। मामले को गंभीर मानते हुए जिला शिक्षा स्थापना कार्यालय ने सभी शिक्षकों को कारण बताओ नोटिस (Show Cause Notice) जारी कर जवाब मांगा है। निरीक्षण के दौरान सामने आई बड़ी लापरवाही शिक्षा विभाग की जांच के दौरान कई स्कूलों में शिक्षक ड्यूटी पर मौजूद नहीं मिले। अधिकारियों का कहना है कि बिना सूचना अनुपस्थित रहने वाले शिक्षकों से निर्धारित समय के भीतर स्पष्टीकरण मांगा गया है। संतोषजनक जवाब नहीं मिलने पर उन पर विभागीय कार्रवाई की जा सकती है। प्रधानाध्यापकों की जिम्मेदारी भी तय विभाग ने संबंधित स्कूलों के प्रधानाध्यापकों को भी निर्देश दिया है कि वे शिक्षकों की नियमित उपस्थिति सुनिश्चित करें। भविष्य में इस तरह की लापरवाही मिलने पर जिम्मेदारी तय की जाएगी। शिक्षा व्यवस्था सुधारने की पहल शिक्षा विभाग का कहना है कि सरकारी स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए नियमित मॉनिटरिंग की जा रही है। शिक्षकों की उपस्थिति पर विशेष निगरानी रखी जाएगी ताकि विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित न हो। आगे भी जारी रहेगा अभियान अधिकारियों के अनुसार, राज्य के अन्य जिलों में भी स्कूलों का औचक निरीक्षण जारी रहेगा। बिना सूचना अनुपस्थित पाए जाने वाले कर्मचारियों और शिक्षकों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
रांची। झारखंड शिक्षक पात्रता परीक्षा यानी जेटेट का विज्ञापन रद्द किया जायेगा। भोजपुरी, अंगिका और मगही भाषाओं को लेकर चल रहे विवाद के कारण यह फैसला लेना विवशता है। झारखंड एकेडमिक काउंसिल ने 21 अप्रैल से 21 मई तक आवेदन प्रक्रिया के लिए पिछले महीने विज्ञापन जारी किया था। यह विज्ञापन कैबिनेट की मंजूरी मिलने की उम्मीद में निकाला गया था, लेकिन गुरुवार को हुई बैठक में इस पर सहमति नहीं बन सकी। इसके चलते झारखंड शिक्षक पात्रता परीक्षा नियमावली 2026 को फिलहाल स्थगित कर दिया गया है। भाषा विवाद के कारण फंसा पेंचः स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की मंजूरी के बाद 26 मार्च को नियमावली 2026 की अधिसूचना जारी कर दी थी। साथ ही आवेदन की तारीखें भी घोषित कर दी गई थीं। हालांकि नियमावली में भोजपुरी, अंगिका और मगही जैसी प्रमुख क्षेत्रीय भाषाओं को शामिल नहीं किया गया, जबकि सीमित क्षेत्रों में बोली जाने वाली उड़िया को जगह दी गई। इस फैसले का राजनीतिक दलों और विभिन्न संगठनों ने विरोध किया। कैबिनेट बैठक में भी कई मंत्रियों ने इस पर आपत्ति जताई, लेकिन लंबी चर्चा के बावजूद अंतिम निर्णय नहीं हो सका। 10 साल से नहीं हुई परीक्षाः झारखंड में अब तक केवल 2012 और 2016 में ही शिक्षक पात्रता परीक्षा आयोजित हुई है। पिछले 10 वर्षों से जेटेट नहीं होने के कारण अभ्यर्थियों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। खासकर 2016 के बाद बीएड करने वाले उम्मीदवार न तो टीईटी दे पा रहे हैं और न ही शिक्षक नियुक्ति प्रक्रिया में शामिल हो पा रहे हैं। अब यदि सरकार 20 अप्रैल तक नियमावली को पुराने स्वरूप में लागू करती है, तो बिना इन भाषाओं के आवेदन शुरू हो जाएंगे, लेकिन यदि संशोधन कर भाषाओं को जोड़ा जाता है, तो विज्ञापन वापस लेना पड़ेगा।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।