सोनम वांगचुक

Yogendra Yadav Anjali Bhardwaj
पेपर लीक के खिलाफ जंतर-मंतर पर आंदोलन तेज, योगेंद्र यादव और अंजलि भारद्वाज ने दिया समर्थन

नई दिल्ली, एजेंसियां। राजधानी के जंतर-मंतर पर परीक्षा पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर चल रहे आंदोलन को मंगलवार को सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव और अंजलि भारद्वाज का समर्थन मिला। दोनों नेताओं ने प्रदर्शन स्थल पर पहुंचकर छात्रों और युवाओं से मुलाकात की तथा परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता, जवाबदेही और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग दोहराई। आंदोलन के दौरान केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग भी उठाई गई।   अंजलि भारद्वाज ने कहा अंजलि भारद्वाज ने कहा कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि छात्रों और शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक को पेपर लीक जैसी गंभीर समस्या के समाधान के लिए भूख हड़ताल का सहारा लेना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि छात्र केवल अपने भविष्य के लिए नहीं, बल्कि देश की शिक्षा व्यवस्था को निष्पक्ष और पारदर्शी बनाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।   उन्होंने दावा किया कि वर्ष 2002 से 2026 के बीच देशभर में 45 बड़े पेपर लीक के मामले सामने आए, लेकिन केवल दो मामलों में ही दोषियों को सजा मिल सकी। उनके अनुसार, जब तक दोषियों के खिलाफ प्रभावी कानूनी कार्रवाई नहीं होगी, तब तक ऐसी घटनाओं पर रोक लगाना मुश्किल होगा।   योगेंद्र यादव ने कहा वहीं, योगेंद्र यादव ने कहा कि जंतर-मंतर का सीमित होता प्रदर्शन स्थल लोकतांत्रिक अधिकारों के सिकुड़ने का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि विरोध-प्रदर्शन के लिए सार्वजनिक स्थान लगातार कम होते जा रहे हैं, जो लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है। उन्होंने आंदोलन को जनता की आवाज बताते हुए छात्रों और सामाजिक संगठनों की सराहना की।   सोनम वांगचुक की सेहत लगातार बिगड़ रही है इस बीच भूख हड़ताल पर बैठे शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक की सेहत लगातार बिगड़ रही है। मेडिकल अपडेट के अनुसार उनका ब्लड शुगर घटकर 61 तक पहुंच गया है और पिछले तीन दिनों में उनका करीब 2.4 किलोग्राम वजन कम हुआ है। डॉक्टरों ने उनकी स्थिति को चिंताजनक बताया है। आंदोलनकारी छात्रों का कहना है कि जब तक परीक्षा प्रणाली को पारदर्शी बनाने और पेपर लीक रोकने के लिए ठोस एवं प्रभावी कदम नहीं उठाए जाते, तब तक उनका आंदोलन जारी रहेगा।

abhishek singh जुलाई 2, 2026 0
Sonam Wangchuk
भूख हड़ताल के तीसरे दिन सोनम वांगचुक का शुगर लेवल घटा

नई दिल्ली, एजेंसियां। नई दिल्ली में जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में चल रहा विरोध प्रदर्शन मंगलवार को अपने 11वें दिन में पहुंच गया। यह आंदोलन शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था में सुधार, परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता, पर्यावरण संरक्षण और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर चलाया जा रहा है। इसी प्रदर्शन के तहत पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल का आज तीसरा दिन है। लगातार उपवास के चलते उनका ब्लड शुगर लेवल घटकर 66 तक पहुंच गया है, जो सामान्य स्तर से काफी नीचे है। इससे उनके समर्थकों और डॉक्टरों की चिंता बढ़ गई है। सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके के अनुसार, वांगचुक पिछले तीन दिनों से सिर्फ पानी और नमक के सहारे भूख हड़ताल पर हैं, और डॉक्टर नियमित रूप से उनकी नाड़ी, ब्लड प्रेशर तथा अन्य स्वास्थ्य संकेतकों की निगरानी कर रहे हैं। उन्होंने आगाह किया कि यदि स्थिति और बिगड़ती है तो मामला गंभीर हो सकता है।   छात्र, शिक्षक, युवा और सामाजिक कार्यकर्ता आंदोलन के 11वें दिन भी बड़ी संख्या में छात्र, शिक्षक, युवा और सामाजिक कार्यकर्ता धरना स्थल पर पहुंचे और शांतिपूर्ण तरीके से नारेबाजी करते हुए सरकार से ठोस कदम उठाने की अपील की। आयोजकों का कहना है कि यह आंदोलन किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं, बल्कि देश के छात्रों और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा है।   प्रदर्शनकारी परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता   प्रदर्शनकारी परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, पेपर लीक पर सख्त कार्रवाई और सरकारी भर्तियों में जवाबदेही की मांग के साथ-साथ पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के मुद्दों को भी उठा रहे हैं। उनका कहना है कि अच्छी शिक्षा और सुरक्षित पर्यावरण दोनों देश के विकास के लिए जरूरी हैं। धरना स्थल पर रोज विभिन्न राज्यों से लोग पहुंचकर समर्थन दे रहे हैं, कुछ सांकेतिक उपवास रख रहे हैं तो कुछ कई दिनों से डटे हुए हैं। आयोजकों ने स्पष्ट किया है कि जब तक सरकार मांगों पर गंभीरता से विचार नहीं करती, आंदोलन जारी रहेगा।

abhishek singh जून 30, 2026 0
Sonam Wangchuk Ladakh protests
Sonam Wangchuk की रिहाई के बाद भी लद्दाख में क्यों जारी है विरोध? जानिए

लेह, एजेंसियां। लद्दाख में सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की रिहाई के बावजूद विरोध-प्रदर्शन थमने का नाम नहीं ले रहा है। 14 मार्च 2026 को उनकी रिहाई के बाद जहां लोगों ने खुशी जताई, वहीं 16 मार्च को एक बार फिर हजारों लोग सड़कों पर उतर आए। लेह एपेक्स बॉडी (LAB) और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA) ने लद्दाख बंद का आह्वान किया। लेह में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुआ, जबकि कारगिल में पूरी तरह शटडाउन देखा गया। संगठनों का कहना है कि उनकी मूल मांगों पर अभी तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है, इसलिए आंदोलन जारी रहेगा।   चार मुख्य मांगों को लेकर आंदोलन तेज   लद्दाख में विरोध-प्रदर्शन ‘चार-सूत्रीय एजेंडा’ को लेकर हो रहा है।  * पहली मांग है पूर्ण राज्य का दर्जा। लोग चाहते हैं कि लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश से राज्य बनाया जाए, ताकि वहां अपनी चुनी हुई सरकार और विधानसभा हो। * दूसरी बड़ी मांग है छठी अनुसूची में शामिल करना। इससे जनजातीय समाज को अपनी जमीन, जंगल और संस्कृति की कानूनी सुरक्षा मिल सकेगी। * तीसरी मांग है अलग पब्लिक सर्विस कमीशन की स्थापना, जिससे सरकारी नौकरियों में स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता मिल सके। * चौथी मांग के तहत लेह और कारगिल के लिए अलग-अलग लोकसभा सीटें बनाने की मांग उठाई जा रही है, ताकि संसद में क्षेत्र की आवाज और मजबूत हो सके।   2019 के बाद बदली स्थिति 31 अक्टूबर 2019 को लद्दाख को अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया था। इससे पहले यह जम्मू-कश्मीर का हिस्सा था। केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद यहां की प्रशासनिक व्यवस्था सीधे केंद्र सरकार के अधीन आ गई और यहां कोई विधानसभा नहीं है।यही कारण है कि अब स्थानीय लोग अपने राजनीतिक अधिकारों को मजबूत करने के लिए राज्य का दर्जा मांग रहे हैं। उनका मानना है कि चुनी हुई सरकार के बिना उनके मुद्दों को सही तरीके से नहीं उठाया जा सकता।   रिहाई से खुशी, लेकिन मांगों पर चुप्पी से नाराजगी सोनम वांगचुक की रिहाई को लेकर लोगों में खुशी जरूर है, लेकिन उनकी प्रमुख मांगों पर सरकार की ओर से कोई स्पष्ट आश्वासन नहीं मिलने से नाराजगी बनी हुई है। LAB और KDA ने साफ कर दिया है कि जब तक चारों मांगों पर ठोस कदम नहीं उठाए जाते, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।   आगे क्या? लद्दाख में जारी यह आंदोलन आने वाले समय में और तेज हो सकता है। यह सिर्फ एक व्यक्ति की रिहाई का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों से जुड़ा मामला बन चुका है।

Unknown मार्च 18, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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Deepshikha जून 26, 2026 0