रांची। झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों पर होने वाले चुनाव को लेकर कांग्रेस ने अपने विधायकों को एकजुट रखने की पुख्ता तैयारी कर ली है। पार्टी किसी भी तरह की चूक नहीं चाहती। इससे बचने के लिए पार्टी विधायकों पर विशेष नजर बनाए हुए है और संगठन के वरिष्ठ नेताओं को अहम जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष केशव महतो कमलेश, विधायक दल के नेता प्रदीप यादव समेत कई वरिष्ठ नेताओं को विधायकों के साथ लगातार संपर्क में रहने और मतदान प्रक्रिया को लेकर समन्वय बनाए रखने का निर्देश दिया गया है। साथ ही विधायकों की समस्याओं और सुझावों को पार्टी आलाकमान तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी तय की गई है। मुख्यमंत्री आवास में रात्रिभोज कांग्रेस को झामुमो के समर्थन के बाद अपने उम्मीदवार की जीत को लेकर भरोसा है। हालांकि पार्टी किसी भी तरह की ढिलाई नहीं बरतना चाहती और हर विधायक के साथ लगातार संवाद बनाए हुए है। राजनीतिक गलियारों में मुख्यमंत्री आवास पर लगातार दो दिनों तक आयोजित रात्रिभोज की चर्चा भी तेज है। माना जा रहा है कि इन बैठकों के जरिए गठबंधन दलों के बीच बेहतर समन्वय और एकजुटता का संदेश देने की कोशिश की जा रही है। कांग्रेस के वरिष्ठ पर्यवेक्षक आ रहे रांची राज्यसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस के वरिष्ठ पर्यवेक्षक अजय शर्मा, नासिर हुसैन और प्रदेश प्रभारी के रांची पहुंचने की संभावना है। सूत्रों के मुताबिक मुख्यमंत्री के साथ रात्रिभोज के दौरान उनकी महत्वपूर्ण बैठक भी हो सकती है, जिसमें चुनावी रणनीति और गठबंधन की मजबूती पर चर्चा होगी। विधायकों के संपर्क में प्रदीप यादव विधायक दल के नेता प्रदीप यादव लगातार कांग्रेस विधायकों के संपर्क में हैं। पार्टी नेतृत्व की कोशिश है कि मतदान के दौरान कोई भी विधायक पार्टी लाइन से अलग न जाए। यही वजह है कि रांची से लेकर नई दिल्ली तक कांग्रेस नेतृत्व पूरी तरह सक्रिय नजर आ रहा है।
रांची। झारखंड की सियासत में इस वक्त सबसे बड़ा सवाल तैर रहा है—क्या झारखंड मुक्ति मोर्चा, अपनी सहयोगी पार्टी कांग्रेस को राज्यसभा की एक सीट देगी? निर्वाचन आयोग ने झारखंड की दो राज्यसभा सीटों पर 18 जून को चुनाव कराने का एलान कर दिया है। अधिसूचना 1 जून को जारी होने वाली है। एक तरफ जहां सत्ताधारी 'इंडिया' गठबंधन के पास नंबर गेम में पूरी ताकत है, वहीं पर्दे के पीछे शह और मात का ऐसा खेल शुरू हो चुका है, जिसने रांची से लेकर दिल्ली तक हलचल तेज कर दी है। इस बीच, भारतीय जनता पार्टी ने केवल 21 विधायक होने के बावजूद अपना उम्मीदवार उतारने का एलान करके सबको चौंका दिया है। बीजेपी के इस कदम से सत्ताधारी गठबंधन में ऐसी खलबली मची है कि झामुमो को सीधे चुनाव आयोग का दरवाजा खटखटाना पड़ा है। आइए देखते हैं इस पूरे सियासी गणित और सीट शेयरिंग के पेच पर हमारी यह विशेष ग्राउंड रिपोर्ट। राज्यसभा की 2 सीटों के लिए होंगे चुनाव झारखंड की दो राज्यसभा सीटें खाली हो रही हैं। पहली सीट झारखंड के आंदोलनकारी नेता और झामुमो के सर्वेसर्वा रहे स्वर्गीय शिबू सोरेन के निधन के बाद खाली हुई है। वहीं दूसरी सीट बीजेपी के निवर्तमान सांसद दीपक प्रकाश की है, जिनका कार्यकाल 21 जून को समाप्त हो रहा है। जीत के लिए 28 वोट की जरूरत नियमों के मुताबिक, इस चुनाव में जीत के लिए एक उम्मीदवार को कम से कम 28 प्रथम वरीयता के वोटों यानी First Preference Votes की जरूरत है। झारखंड विधानसभा में विधायकों की कुल संख्या 81 है। अब जरा नजर डालिए विधानसभा के मौजूदा नंबर गेम पर। विधानसभा का नंबर गेम कुल सीटें: 81 जीत के लिए जरूरी वोट (प्रति सीट): 28 सत्तारूढ़ 'इंडिया' (INDIA) गठबंधन: 56 विधायक झामुमो (JMM): 34 कांग्रेस (Congress): 16 राजद (RJD): 04 माले (CPI-ML): 02 (बाहरी समर्थन) विपक्षी एनडीए (NDA) गठबंधन: 24 विधायक भाजपा (BJP): 21 आजसू (AJSU): 01 जदयू (JD-U): 01 लोजपा-आर (LJP-R): 01 इंडी गठबंधन के पास 56 वोट गणित बिल्कुल साफ है। 'इंडिया' गठबंधन के पास कुल 56 विधायक हैं। यानी 28 गुणा 2 बराबर 56! सत्तारूढ़ गठबंधन चाहे तो बेहद आसानी से दोनों की दोनों सीटें अपनी झोली में डाल सकता है। लेकिन, पेच यहीं फंसता है। सवाल यह है कि ये दो सीटें गठबंधन के अंदर किस-किसके खाते में जाएंगी? क्या झामुमो अपनी सहयोगी कांग्रेस को एक सीट सौंपेगी, या अपनी पार्टी की ताकत के दम पर दोनों सीटों पर खुद के उम्मीदवार उतारेगी? कांग्रेस का एक सीट पर दावा इस पूरे मामले पर कांग्रेस का रुख साफ है। कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ताओं का कहना है कि वे इस बार एक सीट पर अपना दावा ठोक रहे हैं और इसके लिए गठबंधन के शीर्ष नेताओं से बातचीत हो रही है। लेकिन, झामुमो के अंदरूनी सूत्रों का मानना है कि चूंकि एक सीट झामुमो के अपने नेता शिबू सोरेन की रही है, इसलिए उस पर झामुमो का स्वाभाविक दावा है। वहीं दूसरी सीट पर भी 34 विधायकों के साथ सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते झामुमो अपना दावा छोड़ना नहीं चाहती। इस संबंध में कांग्रेस प्रवक्ता राकेश सिन्हा का कहना है कि "गठबंधन में सभी सहयोगियों का सम्मान होता है। कांग्रेस ने हमेशा राज्य के विकास और गठबंधन धर्म का पालन किया है। हमारा लक्ष्य स्पष्ट है कि हम एक सीट पर चुनाव लड़ें, इसके लिए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन जी और झामुमो के नेतृत्व के साथ जल्द ही समन्वय बैठक होगी और कोई बीच का रास्ता निकाल लिया जाएगा।" वहीं, झारखंड मुक्ति मोर्चा के महासचिव सह केंद्रीय प्रवक्ता सुप्रियो भट्टाचार्य का कहना है कि "संख्या बल किसके पास है, यह पूरा देश देख रहा है। हमारे पास 56 विधायकों का अटूट बहुमत है। उम्मीदवार कौन होगा, यह गठबंधन के नेता बैठकर तय करेंगे। लेकिन, यह तय है कि दोनों सीटें 'इंडिया' गठबंधन ही जीतेगा। बीजेपी के पास नंबर नहीं हैं, फिर भी वो उम्मीदवार उतारने की बात कर रहे हैं, जो उनके मंसूबों को साफ करता है।" बीजेपी की एंट्री से खेल हुआ रोचको कांग्रेस और झामुमो अभी आपसी सीट शेयरिंग का फॉर्मूला सुलझा भी नहीं पाए थे कि बीजेपी ने इस रेस में एंट्री मारकर खेल को सस्पेंस से भर दिया है। बीजेपी प्रदेश चुनाव समिति की बैठक में प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू और नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी की मौजूदगी में यह फैसला लिया गया कि बीजेपी अपना प्रत्याशी मैदान में उतारेगी। बीजेपी के रणनीतिकारों का मानना है कि उनके पास अपने और सहयोगियों के मिलाकर 24 वोट हैं और उन्हें जीत के लिए सिर्फ 4 और वोटों की दरकार है। बीजेपी का यह आत्मविश्वास झामुमो के खेमे में डर पैदा करने के लिए काफी था। यही वजह रही कि झामुमो महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य ने सीधे मुख्य चुनाव आयुक्त को पत्र लिखकर केंद्रीय जांच एजेंसियों (CBI, ED, CVC) और राज्य के एंटी-करप्शन ब्यूरो को चुनाव के दौरान विशेष सतर्कता बरतने की मांग कर डाली। झामुमो को अंदेशा है कि बीजेपी यहाँ 'बिहार फॉर्मूला' दोहरा सकती है। क्या है बिहार फॉर्मूला? हाल ही में बिहार में राज्यसभा की पांच सीटों पर चुनाव के दौरान एनडीए के पास चार सीटों का स्पष्ट बहुमत था, जबकि राजद के पास एक सीट का सुरक्षित आंकड़ा (41 विधायक) था। लेकिन, बीजेपी ने पांचवें उम्मीदवार के तौर पर एक बड़ा दांव खेला। ऐन वक्त पर कांग्रेस और राजद के कुछ विधायकों की अनुपस्थिति और क्रॉस-वोटिंग के कारण एनडीए वह पांचवीं सीट भी झटकने में कामयाब रहा था। बीजेपी के मूवमेंट पर झामुमो की नजर बीजेपी के इसी 'सीक्रेट प्लान' और हॉर्स ट्रेडिंग की आशंका से सत्ताधारी दल फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है। बीजेपी के प्रदेश महामंत्री अमर कुमार बाउरी ने झामुमो के इन आरोपों को पूरी तरह निराधार बताया है। उनका कहना है कि लोकतंत्र में हर पार्टी को चुनाव लड़ने का अधिकार है और अगर गठबंधन को अपने विधायकों पर इतना ही भरोसा है, तो वे डरे हुए क्यों हैं? क्या होगा असर लेकिन, इस शोर के बीच बड़ा सवाल वही खड़ा है—क्या झामुमो कांग्रेस को सीट देगा? राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो इसके तीन मुख्य पहलू हैं: विधानसभा चुनाव का असर: पिछले विधानसभा चुनाव में झामुमो ने 34 सीटें जीतकर प्रचंड प्रदर्शन किया है, जबकि कांग्रेस 16 सीटों पर सिमट गई थी। झामुमो इस वक्त खुद को 'बड़े भाई' की मजबूत भूमिका में देख रहा है। सहानुभूति और हक: एक सीट शिबू सोरेन की थी, जिसे झामुमो किसी भी कीमत पर अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहेगा। कांग्रेस का दबाव: कांग्रेस आलाकमान का दबाव है कि राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन को मजबूत दिखाने के लिए झारखंड में उसे एक सीट मिलनी चाहिए। यदि झामुमो कांग्रेस को नजरअंदाज करता है, तो दोनों दलों के बीच मनमुटाव बढ़ सकता है, जिसका असर सरकार चलाने पर भी पड़ सकता है। विपक्ष इसी अंदरूनी कलह और असंतोष की दरार में अपनी जीत की उम्मीदें तलाश रहा है। यदि झामुमो दोनों सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारता है, तो नाराज कांग्रेस विधायकों के टूटने या क्रॉस वोटिंग का खतरा बढ़ जाएगा। और अगर झामुमो एक सीट कांग्रेस को दे देता है, तो गठबंधन पूरी तरह सुरक्षित होकर दोनों सीटें आसानी से निकाल सकता है। ..तो कुल मिलाकर तस्वीर यह है कि संख्या बल के आधार पर पलड़ा भले ही झामुमो और कांग्रेस के गठबंधन का भारी हो, लेकिन बीजेपी के दांव ने इस चुनाव को बेहद दिलचस्प बना दिया है। क्या मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन बड़ा दिल दिखाते हुए कांग्रेस को एक सीट सौंपेंगे और गठबंधन को सुरक्षित करेंगे? या फिर झामुमो दोनों सीटों पर अड़कर एक बड़ा सियासी जोखिम उठाएगा? 1 जून को नोटिफिकेशन जारी होने के बाद नामांकन के साथ ही इस सस्पेंस से पूरी तरह पर्दा उठ जाएगा।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।