नई दिल्ली: अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू करने की मांग पर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना स्पष्ट रुख पेश किया है। सरकार ने अदालत को बताया कि SC-ST आरक्षण में OBC की तरह क्रीमी लेयर का सिद्धांत लागू नहीं किया जा सकता, क्योंकि इन वर्गों को मिलने वाला आरक्षण केवल आर्थिक आधार पर नहीं, बल्कि ऐतिहासिक, सामाजिक और संरचनात्मक पिछड़ेपन को ध्यान में रखकर दिया गया है। दरअसल, करीब दो महीने पहले सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर SC-ST आरक्षण में भी क्रीमी लेयर व्यवस्था लागू करने और आरक्षित वर्गों के भीतर आय आधारित उप-वर्गीकरण की मांग की गई थी। इस याचिका पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने अपना जवाब दाखिल किया। OBC तक ही सीमित है क्रीमी लेयर का प्रावधान केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में कहा कि क्रीमी लेयर का सिद्धांत अब तक केवल अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए लागू होता है। OBC आरक्षण में आर्थिक रूप से संपन्न परिवारों को आरक्षण का लाभ नहीं देने के लिए यह व्यवस्था बनाई गई थी, लेकिन SC और ST के मामले में आरक्षण का आधार अलग है। सरकार ने स्पष्ट किया कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण का उद्देश्य केवल आर्थिक असमानता दूर करना नहीं, बल्कि सदियों से चले आ रहे सामाजिक भेदभाव, ऐतिहासिक वंचना और सामाजिक पिछड़ेपन की भरपाई करना है। इसलिए केवल आय के आधार पर इन वर्गों के भीतर क्रीमी लेयर लागू करना उचित नहीं होगा। नीति में बदलाव से पहले जरूरी होगा व्यापक अध्ययन केंद्र ने अदालत को बताया कि यदि आरक्षित वर्गों के भीतर आय आधारित प्राथमिकता या उप-कोटा जैसी कोई व्यवस्था लागू करनी हो, तो इसके लिए व्यापक सामाजिक-आर्थिक अध्ययन, विश्वसनीय आंकड़ों का विश्लेषण और समग्र समीक्षा आवश्यक होगी। सरकार ने यह भी कहा कि इस तरह का कोई भी बड़ा बदलाव न्यायिक आदेश के बजाय नीति निर्माण और विधायी प्रक्रिया के माध्यम से होना चाहिए। संसद के अधिकार क्षेत्र का मामला सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने 15 जून 2026 को दिए अपने जवाब का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि SC-ST आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू करने का फैसला केवल संसद ही ले सकती है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया कि वह ऐसी याचिकाओं पर न्यायिक निर्देश जारी करने से परहेज करे, जिनका उद्देश्य देश की आरक्षण व्यवस्था में व्यापक नीतिगत बदलाव करना हो। सरकार का कहना है कि आरक्षण नीति में किसी भी प्रकार का परिवर्तन संवैधानिक, सामाजिक और विधायी पहलुओं को ध्यान में रखकर ही किया जाना चाहिए।
Mohammad Irfan Viral Video: दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए CJP (Cockroach Janta Party) आंदोलन के दौरान एक फेरीवाले मोहम्मद इरफान की बातें सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गईं। लोकतंत्र, संविधान और मजदूरों के अधिकारों पर उनकी बेबाक राय ने लोगों का ध्यान खींचा। अब कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी भी उनसे मिलने उनके घर पहुंचे। फेरी लगाकर करते हैं गुजारा, Google Voice Search से सीखा संविधान करीब 35 वर्षीय मोहम्मद इरफान दिल्ली की एक झुग्गी बस्ती में रहते हैं और फेरी लगाकर अपना जीवनयापन करते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, वह कभी स्कूल नहीं गए, लेकिन Google Voice Search के जरिए संविधान, लोकतंत्र और श्रमिकों के अधिकारों से जुड़ी जानकारी हासिल करते हैं। उनकी समझ और तर्कों ने CJP आंदोलन के दौरान लोगों को प्रभावित किया। राहुल गांधी ने की मुलाकात कांग्रेस ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर राहुल गांधी और मोहम्मद इरफान की मुलाकात का वीडियो साझा किया। पोस्ट में कांग्रेस ने लिखा कि "मोहम्मद इरफान जैसे लाखों युवा ही देश की असली उम्मीद हैं—जिज्ञासु, संवेदनशील और अपने अधिकारों व कर्तव्यों के प्रति सजग।" वीडियो में राहुल गांधी इरफान से बातचीत करते नजर आए। इस दौरान इलाके के लोगों ने भी उनका स्वागत किया। एक अन्य पोस्ट में कांग्रेस ने कहा कि इरफान जैसे युवाओं की आवाज देश के उन लाखों युवाओं की भावनाओं को सामने लाती है, जो रोजगार, शिक्षा और अवसरों को लेकर चिंतित हैं। पार्टी ने ऐसे युवाओं के साथ खड़े रहने का भरोसा भी जताया। भगत सिंह की कविताएं सुनाकर भी बटोरी सुर्खियां रिपोर्ट के अनुसार, बातचीत के दौरान मोहम्मद इरफान ने शहीद भगत सिंह की कविताओं की पंक्तियां भी सुनाईं। उनकी वैचारिक समझ और आत्मविश्वास ने कई लोगों को प्रभावित किया और सोशल मीडिया पर उनके वीडियो तेजी से वायरल होने लगे। CJP आंदोलन से मिली पहचान दिल्ली के जंतर-मंतर पर अभिजीत दिपके के नेतृत्व में हुए CJP आंदोलन के दौरान मोहम्मद इरफान ने एक इंटरव्यू दिया था। उसी इंटरव्यू के वायरल होने के बाद वह चर्चा में आ गए। अब उनकी कहानी सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक चर्चा का विषय बनी हुई है।
पंचायत और स्थानीय निकाय चुनाव में उम्मीदवारों के लिए दो बच्चों की सीमा तय करने वाले कानून पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए हैं। महाराष्ट्र सरकार की उस नीति की सुनवाई के दौरान अदालत ने पूछा कि जब देश में जन्म दर लगातार घट रही है, तो दो से अधिक बच्चों वाले लोगों को चुनाव लड़ने से वंचित रखने का औचित्य क्या है। मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि इस विषय पर पहले दिए गए अपने फैसले पर भी दोबारा विचार करने की आवश्यकता पड़ सकती है। पूर्व सरपंच की अयोग्यता को दी गई है चुनौती यह मामला महाराष्ट्र के काकोडा ग्राम पंचायत की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव से जुड़ा है। उन्हें महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम, 1959 की धारा 14(1)(j-1) के तहत तीसरे बच्चे के जन्म के बाद पद के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया था। यह प्रावधान 13 सितंबर 2000 से लागू है, जिसके अनुसार दो से अधिक जीवित बच्चे होने पर कोई व्यक्ति पंचायत और अन्य स्थानीय निकायों का चुनाव नहीं लड़ सकता। पुराने फैसले पर पुनर्विचार के संकेत सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2003 के जावेद बनाम हरियाणा सरकार मामले का भी उल्लेख किया। उस फैसले में अदालत ने हरियाणा के दो-बच्चे संबंधी कानून को संवैधानिक माना था। हालांकि, मौजूदा सुनवाई में अदालत ने कहा कि वर्तमान सामाजिक और जनसंख्या संबंधी परिस्थितियों को देखते हुए उस निर्णय की दोबारा समीक्षा की आवश्यकता हो सकती है। घटती जन्म दर पर अदालत की टिप्पणी सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि भारत में जन्म दर लगातार कम हो रही है। ऐसे में यह विचार करना जरूरी है कि दो से अधिक बच्चों वाले लोगों को चुनाव लड़ने से रोकने वाले कानून आज भी प्रासंगिक और संवैधानिक हैं या नहीं। अदालत ने संकेत दिया कि बदलती जनसंख्या परिस्थितियों के मद्देनजर इस नीति का नए सिरे से मूल्यांकन किया जाना चाहिए। सात राज्यों के कानूनों का होगा अध्ययन सुप्रीम कोर्ट ने मामले की विस्तृत सुनवाई करने का फैसला किया है। अदालत ने महाराष्ट्र सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता रुक्मिणी बोबडे को एमिकस क्यूरी (अदालत की सहायता करने वाली वकील) नियुक्त किया है। उन्हें उन सात राज्यों के कानूनों का अध्ययन करने का निर्देश दिया गया है, जहां दो से अधिक बच्चों वाले लोगों के पंचायत और स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लागू है। इसके साथ ही न्यायालय ने भारत में घटती जन्म दर से संबंधित अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों और उपलब्ध आंकड़ों का भी अध्ययन करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई में इन सभी पहलुओं पर विस्तार से विचार किया जाएगा।
नई दिल्ली: दलित ईसाइयों को अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा दिए जाने की मांग एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में आ गई है। इस मुद्दे पर तेलंगाना की भारत राष्ट्र समिति (BRS) और आंध्र प्रदेश की वाईएसआर कांग्रेस पार्टी (YSRCP) ने न्यायमूर्ति के.जी. बालाकृष्णन आयोग के समक्ष अपने-अपने पक्ष रखे हैं। दोनों दलों ने आयोग को ज्ञापन सौंपकर दलित ईसाइयों को भी अनुसूचित जाति सूची में शामिल करने की सिफारिश करने का आग्रह किया। BRS प्रतिनिधिमंडल ने आयोग को सौंपा ज्ञापन मंगलवार को नई दिल्ली में बीआरएस के वरिष्ठ नेताओं के एक प्रतिनिधिमंडल ने आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति के.जी. बालाकृष्णन से मुलाकात की। प्रतिनिधिमंडल ने दलित ईसाइयों को एससी दर्जा देने की मांग करते हुए विस्तृत ज्ञापन सौंपा और कहा कि सामाजिक न्याय तथा समान अवसर के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए इस मुद्दे पर सकारात्मक निर्णय लिया जाना चाहिए। बीआरएस प्रतिनिधिमंडल में राज्यसभा सांसद वद्दिराजू रविचंद्र, पूर्व मंत्री कोप्पुला ईश्वर, पार्टी महासचिव आर.एस. प्रवीण कुमार और पूर्व निगम अध्यक्ष राजीव सागर समेत कई नेता शामिल थे। वाईएसआरसीपी ने भी उठाई समानता और सामाजिक न्याय की मांग बीआरएस से पहले वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के सांसद मद्दिला गुरुमूर्ति ने भी आयोग से मुलाकात कर दलित ईसाइयों को संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के दायरे में शामिल करने की मांग की थी। आयोग को सौंपे गए ज्ञापन में गुरुमूर्ति ने कहा कि दलित ईसाइयों को एससी सूची से बाहर रखना समानता, धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय जैसे संवैधानिक मूल्यों की भावना के विपरीत है। उन्होंने आयोग से इस विषय पर सकारात्मक सिफारिश करने का अनुरोध किया। आंध्र प्रदेश विधानसभा के प्रस्ताव का दिया हवाला वाईएसआरसीपी सांसद ने अपने ज्ञापन में 24 मार्च 2023 को आंध्र प्रदेश विधानसभा द्वारा पारित सर्वसम्मत प्रस्ताव का भी उल्लेख किया। उस प्रस्ताव में कहा गया था कि दलित ईसाई भी सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक रूप से उसी प्रकार वंचित हैं जैसे हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म से जुड़े अनुसूचित जाति समुदाय। पार्टी का तर्क है कि सामाजिक पिछड़ापन और भेदभाव धर्म परिवर्तन के बाद भी पूरी तरह समाप्त नहीं होता, इसलिए दलित ईसाइयों को भी समान संवैधानिक लाभ मिलना चाहिए। धर्म परिवर्तन से खत्म नहीं होती सामाजिक विषमता: तर्क आयोग के समक्ष प्रस्तुत पक्ष में कहा गया कि केवल धर्म परिवर्तन के आधार पर किसी समुदाय को अनुसूचित जाति के अधिकारों से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। दलित ईसाई आज भी कई क्षेत्रों में सामाजिक भेदभाव, आर्थिक पिछड़ेपन और शैक्षणिक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। वाईएसआरसीपी ने यह भी कहा कि एससी दर्जा न होने के कारण दलित ईसाई अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत मिलने वाले कई कानूनी संरक्षणों से भी वंचित रह जाते हैं। अनुच्छेद 341 के तहत संसद के पास है अधिकार ज्ञापन में संविधान के अनुच्छेद 341(2) का उल्लेख करते हुए कहा गया कि संसद को किसी समुदाय को अनुसूचित जाति सूची में शामिल करने अथवा उससे बाहर करने का अधिकार प्राप्त है। इसी आधार पर आयोग से आग्रह किया गया है कि वर्तमान सामाजिक वास्तविकताओं और संवैधानिक मूल्यों को ध्यान में रखते हुए दलित ईसाइयों को एससी दर्जा देने के पक्ष में अपनी सिफारिश प्रस्तुत करे। राष्ट्रीय स्तर पर फिर तेज हुई बहस बीआरएस और वाईएसआरसीपी की ओर से आयोग के समक्ष रखे गए पक्ष के बाद दलित ईसाइयों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने का मुद्दा एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गया है। अब नजर न्यायमूर्ति के.जी. बालाकृष्णन आयोग की सिफारिशों पर टिकी है, जो इस लंबे समय से लंबित सामाजिक और संवैधानिक प्रश्न पर आगे की दिशा तय कर सकती हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।