रांची: झारखंड को फाइलेरिया मुक्त बनाने की दिशा में स्वास्थ्य विभाग ने अभियान तेज कर दिया है. इसी कड़ी में रांची जिले में स्कूली बच्चों की नि:शुल्क फाइलेरिया जांच शुरू की गयी है. इसका उद्देश्य बीमारी के संक्रमण की समय रहते पहचान करना और इसके प्रसार को रोकना है. स्वास्थ्य विभाग की ओर से 10 अगस्त से 28 सितंबर तक विशेष जांच अभियान चलाया जा रहा है. अभियान के तहत रांची के सरकारी और गैर-सरकारी स्कूलों के साथ स्वास्थ्य केंद्रों में बच्चों की जांच की जा रही है. जिले के 365 स्कूलों में जांच का लक्ष्य रखा गया है. खास तौर पर कक्षा एक और दो में पढ़ने वाले बच्चों को जांच के दायरे में शामिल किया गया है. इसके लिए भारत सरकार और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा सत्यापित जांच किट का इस्तेमाल किया जा रहा है. शुरुआती दौर में आसानी से नहीं दिखते फाइलेरिया के लक्षण फाइलेरिया यानी हाथीपांव एक गंभीर बीमारी है, जिसका संक्रमण शुरुआती दौर में कई बार आसानी से नजर नहीं आता. यही वजह है कि समय पर जांच को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है. स्वास्थ्य विभाग का मानना है कि शुरुआती स्तर पर संक्रमण की पहचान होने से बीमारी को आगे फैलने से रोकने में मदद मिल सकती है. जांच अभियान के दौरान ओरमांझी, बुंडू, नामकुम, रातू और लापुंग समेत रांची के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यालयों में बच्चों की स्क्रीनिंग की जा रही है. अभिभावकों से बच्चों की जांच कराने की अपील स्वास्थ्य विभाग ने अभिभावकों और स्कूलों के प्रधानाचार्यों से अपील की है कि वे कक्षा पहली और दूसरी में पढ़ने वाले बच्चों की जांच जरूर कराएं. विभाग के अनुसार, बच्चों की एक छोटी-सी जांच भविष्य में बीमारी के बड़े खतरे को रोकने में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है. अधिकारियों का कहना है कि फाइलेरिया के खिलाफ लड़ाई केवल स्वास्थ्य विभाग तक सीमित नहीं है. परिवार, स्कूल और समाज की भागीदारी भी जरूरी है. समय पर जांच, जागरूकता और जरूरत के अनुसार दवाओं के सेवन से बीमारी के प्रसार पर प्रभावी तरीके से रोक लगायी जा सकती है. 2027-29 तक फाइलेरिया मुक्त झारखंड का लक्ष्य झारखंड सरकार ने 2027-2029 तक राज्य को फाइलेरिया मुक्त बनाने का लक्ष्य रखा है. इसी उद्देश्य से मास ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (MDA) अभियान के साथ-साथ अब बच्चों की जांच पर भी विशेष जोर दिया जा रहा है. स्वास्थ्य विभाग की कोशिश है कि अधिक से अधिक बच्चों की समय पर जांच हो और संभावित संक्रमण की पहचान शुरुआती चरण में ही कर ली जाए. अधिकारियों ने लोगों से अपील की है कि फाइलेरिया को लेकर किसी तरह की लापरवाही न बरतें और स्वास्थ्य विभाग के जांच अभियान में सहयोग करें.
धनबाद: कुपोषण उपचार केंद्रों (MTC) के संचालन में लापरवाही को लेकर धनबाद उपायुक्त आदित्य रंजन ने सख्त कार्रवाई की है. शुक्रवार को हुई समीक्षा बैठक में अपेक्षित प्रगति नहीं मिलने पर गोविंदपुर, झरिया, निरसा और बाघमारा के प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारियों (MOIC) का वेतन अगले आदेश तक रोकने का निर्देश दिया गया. CHO के प्रदर्शन पर भी जतायी नाराजगी बैठक के दौरान इन चारों प्रखंडों के आयुष्मान आरोग्य मंदिरों में कार्यरत सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारियों (CHO) के कामकाज की भी समीक्षा की गयी. खराब प्रदर्शन और कुपोषण से जुड़े कार्यों में अपेक्षित प्रगति नहीं होने पर उपायुक्त ने संबंधित CHO का वेतन भी अगले आदेश तक रोकने का निर्देश दिया. कुपोषित बच्चों के इलाज में लापरवाही बर्दाश्त नहीं उपायुक्त ने स्पष्ट किया कि कुपोषित बच्चों के उपचार और उन्हें बेहतर पोषण उपलब्ध कराने में किसी भी स्तर पर लापरवाही स्वीकार नहीं की जायेगी. उन्होंने अधिकारियों को MTC की नियमित मॉनिटरिंग करने और निर्धारित मानकों के अनुसार सेवाएं सुनिश्चित करने का निर्देश दिया. नियमित निगरानी के दिए निर्देश बैठक में MTC के संचालन में सुधार, कुपोषित बच्चों की पहचान, उपचार और पोषण सेवाओं की नियमित समीक्षा पर जोर दिया गया. उपायुक्त ने संबंधित अधिकारियों को अपनी जिम्मेदारियों का गंभीरता से निर्वहन करने और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार लाने का निर्देश दिया.
रांची के राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (RIMS) में विभागाध्यक्षों के रोटेशन की प्रक्रिया पर रोक लगाए जाने के बाद विवाद बढ़ गया है। संस्थान के करीब 60 डॉक्टरों ने इस फैसले का विरोध करते हुए स्वास्थ्य मंत्री और स्वास्थ्य सचिव को पत्र भेजा है। डॉक्टरों ने रोटेशन व्यवस्था को लागू करने की मांग करते हुए एनएमसी की गाइडलाइन, रिम्स शासी परिषद के पुराने फैसले और हाईकोर्ट के निर्देशों का हवाला दिया है। रिम्स शासी परिषद की 52वीं बैठक में वर्ष 2021 में विभागाध्यक्षों के रोटेशन का फैसला लिया गया था। इसके तहत प्रत्येक तीन वर्ष में विभागाध्यक्ष की जिम्मेदारी बदलने की व्यवस्था लागू की गयी थी। इसी आधार पर वर्ष 2021 से अलग-अलग विभागों में रोटेशन के तहत विभागाध्यक्षों की नियुक्ति की जा रही थी। प्रोफेसरों की बारी आते ही प्रक्रिया पर लगी रोक डॉक्टरों का आरोप है कि अब जब रोटेशन के तहत अन्य प्रोफेसरों को विभागाध्यक्ष बनने का अवसर मिलना था, तभी इस प्रक्रिया पर रोक लगा दी गयी। इससे कई डॉक्टरों में नाराजगी है। करीब 60 डॉक्टरों ने स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी और स्वास्थ्य सचिव डॉ. अजय कुमार सिंह को पत्र भेजकर मामले में हस्तक्षेप की मांग की है। डॉक्टरों ने अपने पत्र में कहा है कि एनएमसी की गाइडलाइन में विभागाध्यक्ष के पद पर रोटेशन व्यवस्था का प्रावधान है। साथ ही रिम्स की शासी परिषद भी पहले इस संबंध में निर्णय ले चुकी है। ऐसे में अचानक रोटेशन रोकने के फैसले पर उन्होंने सवाल उठाया है। 65वीं जीबी बैठक के बाद लिया गया फैसला सूत्रों के अनुसार, हाल में हुई रिम्स शासी परिषद की 65वीं बैठक में विभागाध्यक्षों के रोटेशन पर रोक लगाने का फैसला लिया गया। इसके बाद रोटेशन के तहत विभागाध्यक्षों की नयी अधिसूचना जारी नहीं करने का निर्देश रिम्स प्रबंधन को दिया गया है। बताया जा रहा है कि कुछ सीनियर डॉक्टरों ने रोटेशन व्यवस्था को लेकर आपत्ति जतायी थी। उनका कहना था कि वे अपने से जूनियर डॉक्टर के अधीन काम करने में असहज महसूस करेंगे। इसके बाद मामले ने तूल पकड़ा और रोटेशन प्रक्रिया पर रोक लगा दी गयी। हाईकोर्ट के निर्देश का भी दिया हवाला डॉक्टरों ने अपने पत्र में वर्ष 2022 में हाईकोर्ट की ओर से रोटेशन प्रक्रिया को लेकर दिये गये निर्देश का भी उल्लेख किया है। उनका कहना है कि जब एनएमसी की गाइडलाइन और रिम्स जीबी का फैसला पहले से मौजूद है, तो रोटेशन व्यवस्था को बीच में रोकना उचित नहीं है। अब 60 डॉक्टरों के पत्र के बाद रिम्स में विभागाध्यक्षों के रोटेशन को लेकर फैसला अहम हो गया है। डॉक्टरों ने जल्द से जल्द प्रक्रिया बहाल करने और पूर्व निर्धारित नियमों के अनुसार विभागाध्यक्षों की नियुक्ति करने की मांग की है।
रांची। राजधानी रांची में सरकारी एंबुलेंस सेवा गंभीर संकट से गुजर रही है। जिले को आवंटित 55 एंबुलेंसों में से 27 कंडम हो चुकी हैं, जबकि कई अन्य खराब हालत में विभिन्न अस्पतालों और सर्विस सेंटरों में खड़ी हैं। मेंटेनेंस के अभाव में कई एंबुलेंस जंग खा रही हैं और कुछ झाड़ियों से ढंक चुकी हैं। इसका सीधा असर मरीजों पर पड़ रहा है, जिन्हें अस्पताल पहुंचने या घर लौटने के लिए महंगी निजी एंबुलेंस सेवाओं का सहारा लेना पड़ रहा है। सर्विस सेंटर में महीनों से खड़ी हैं खराब एंबुलेंस रांची के बजरा स्थित सर्विस सेंटर में दर्जनों 108 एंबुलेंस मरम्मत के इंतजार में लंबे समय से खड़ी हैं। कर्मचारियों के अनुसार, कई गाड़ियों को आए एक महीने से अधिक समय हो चुका है। राज्यभर में पहले से संचालित करीब 543 एंबुलेंसों में 80 से अधिक ऑफ रोड हो चुकी हैं। कई एंबुलेंसों में वेंटिलेटर खराब हैं या उपलब्ध ही नहीं हैं। आधे से अधिक वाहनों में इमरजेंसी किट नहीं है, जबकि कई एंबुलेंसों के शीशे टूटे हैं, मॉनिटर खराब हैं और दरवाजे रस्सी से बांधकर चलाए जा रहे हैं। पुरानी एजेंसी पर लापरवाही के आरोप, नई एजेंसी का इंतजार 108 एंबुलेंस सेवा का संचालन कर रही सम्मान फाउंडेशन पर समय पर मरम्मत और रखरखाव नहीं करने के आरोप लगे हैं। स्वास्थ्य विभाग ने संस्था का करार समाप्त कर दिया है, लेकिन नई एजेंसी के चयन तक संचालन की जिम्मेदारी उसी के पास है। विभाग का कहना है कि वर्तमान एजेंसी रखरखाव में अपेक्षित रुचि नहीं दिखा रही है, जिससे व्यवस्था और प्रभावित हुई है। 237 नई एंबुलेंस खरीदेगा स्वास्थ्य विभाग स्थिति सुधारने के लिए स्वास्थ्य विभाग ने 237 एडवांस लाइफ सपोर्ट (ALS) एंबुलेंस खरीदने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इस पर 100 करोड़ रुपये से अधिक खर्च होने का अनुमान है। स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी ने बताया कि 22 जुलाई को एंबुलेंस संचालन और प्रबंधन को लेकर समीक्षा बैठक बुलाई गई है। उन्होंने भरोसा जताया कि नई एजेंसी के चयन और नई एंबुलेंसों की खरीद के बाद आने वाले कुछ महीनों में 108 एंबुलेंस सेवा पहले से कहीं अधिक बेहतर और प्रभावी हो जाएगी।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल सरकार ने सरकारी अस्पतालों में भर्ती मरीजों और सरकारी स्कूलों के बच्चों के लिए भोजन व्यवस्था में बड़ा बदलाव किया है। सरकार ने मरीजों के भोजन पर होने वाला दैनिक खर्च लगभग दोगुना कर दिया है। वहीं, पीएम पोषण (मिड-डे मील) योजना के तहत प्राथमिक और प्री-प्राथमिक विद्यालयों के विद्यार्थियों के भोजन की लागत भी बढ़ा दी गई है। नई दरें 1 अगस्त से लागू होंगी। मरीजों के भोजन पर अब 110 रुपये खर्च राज्य सरकार के नए आदेश के अनुसार, सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में भर्ती मरीजों के दैनिक भोजन पर होने वाला खर्च 56.64 रुपये से बढ़ाकर 110 रुपये कर दिया गया है। सरकार का कहना है कि बढ़ी हुई राशि से मरीजों को अधिक पौष्टिक, संतुलित और बेहतर गुणवत्ता वाला भोजन उपलब्ध कराया जाएगा। इस संबंध में सोमवार को स्वास्थ्य विभाग ने आधिकारिक निर्देश जारी किया। स्कूलों में मिड-डे मील के लिए 10 रुपये पीएम पोषण योजना के तहत प्री-प्राथमिक और प्राथमिक विद्यालयों में मिलने वाले मिड-डे मील की प्रति छात्र लागत भी बढ़ा दी गई है। पहले प्रति छात्र भोजन पर 6.78 रुपये खर्च किए जाते थे, जिसे अब बढ़ाकर 10 रुपये कर दिया गया है। बढ़ी हुई 3.22 रुपये की अतिरिक्त राशि राज्य सरकार अपने बजट से वहन करेगी। सरकार का कहना है कि महंगाई बढ़ने के कारण मौजूदा राशि में गुणवत्तापूर्ण भोजन उपलब्ध कराना मुश्किल हो रहा था। 2017 के बाद पहली बार बढ़ीं दरें सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, भोजन पर होने वाले खर्च में आखिरी बार संशोधन वर्ष 2017 में किया गया था। लगभग नौ वर्ष बाद अब इन दरों में वृद्धि की गई है। सरकार का कहना है कि बदलती कीमतों और पोषण संबंधी जरूरतों को देखते हुए यह फैसला लिया गया है। सरकार ने बताया फैसले का उद्देश्य राज्य सरकार के मुताबिक, इस निर्णय का उद्देश्य सरकारी अस्पतालों में भर्ती मरीजों को बेहतर पोषण उपलब्ध कराना और सरकारी स्कूलों के बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण मिड-डे मील सुनिश्चित करना है। सरकार का मानना है कि संतुलित और पौष्टिक भोजन मरीजों के जल्द स्वस्थ होने में मदद करेगा, जबकि बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए भी बेहतर पोषण महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
अहमदाबाद, एजेंसियां। गुजरात की राजधानी अहमदाबाद ने पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में एक नया इतिहास रच दिया है। अहमदाबाद नगर निगम ने मात्र एक घंटे में 3.61 लाख पौधे लगाकर गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया। यह मेगा वृक्षारोपण अभियान 12 जुलाई को शहर के भदाज क्षेत्र में आयोजित किया गया, जिसमें 25,000 से अधिक स्वयंसेवकों ने हिस्सा लिया। मियावाकी तकनीक से लगाया गया मिनी जंगल इस अभियान में मियावाकी (Miyawaki) पद्धति का इस्तेमाल किया गया, जिसके तहत कम जगह में घने जंगल विकसित किए जाते हैं। लगभग 76,000 वर्ग मीटर क्षेत्र में 35 देशी प्रजातियों के पौधे लगाए गए। विशेषज्ञों का मानना है कि यह क्षेत्र आने वाले वर्षों में एक घने शहरी जंगल के रूप में विकसित होगा, जिससे जैव विविधता बढ़ेगी और शहर का हरित क्षेत्र मजबूत होगा। 'एक पेड़ मां के नाम' अभियान से प्रेरित पहल यह वृक्षारोपण अभियान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के "एक पेड़ मां के नाम" अभियान और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की "हरियाली लोकसभा" पहल के तहत आयोजित किया गया। कार्यक्रम में अमित शाह, गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल और कई जनप्रतिनिधि मौजूद रहे। इस अभियान का लक्ष्य गांधीनगर लोकसभा क्षेत्र में बड़े पैमाने पर हरित आवरण बढ़ाना है। पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ा कदम अहमदाबाद नगर निगम ने कहा कि यह रिकॉर्ड केवल संख्या का नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के प्रति जनभागीदारी का प्रतीक है। अभियान के तहत लगाए गए पौधे भविष्य में कार्बन उत्सर्जन कम करने, तापमान नियंत्रित रखने, जैव विविधता बढ़ाने और शहर को अधिक हरित एवं स्वच्छ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
रांची। रांची के एक निजी अस्पताल में इलाज के दौरान एक किशोर की मौत और परिजनों से करीब ₹22 लाख का बिल वसूले जाने के आरोपों के बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने मामले का संज्ञान लिया है। मुख्यमंत्री ने स्वास्थ्य विभाग को पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराने और यदि अस्पताल प्रबंधन की लापरवाही या अनियमितता सामने आती है तो सख्त कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। परिजनों ने लगाया लापरवाही और अधिक बिल वसूलने का आरोप मृतक किशोर के परिजनों का आरोप है कि अस्पताल ने इलाज में लापरवाही बरती और कई दिनों तक भर्ती रखने के बाद करीब 22 लाख रुपये का बिल थमा दिया। उनका कहना है कि उचित इलाज नहीं मिलने के कारण किशोर की जान चली गई। घटना के बाद अस्पताल परिसर में परिजनों ने विरोध प्रदर्शन भी किया। स्वास्थ्य विभाग को जांच कर रिपोर्ट देने के निर्देश मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद स्वास्थ्य विभाग ने मामले की जांच शुरू कर दी है। अधिकारियों को अस्पताल के इलाज, बिलिंग प्रक्रिया और चिकित्सकीय रिकॉर्ड की समीक्षा कर जल्द रिपोर्ट सौंपने को कहा गया है। यदि जांच में किसी प्रकार की अनियमितता या मेडिकल प्रोटोकॉल के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो संबंधित अस्पताल के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। निजी अस्पतालों की जवाबदेही पर फिर उठे सवाल इस घटना के बाद राज्य में निजी अस्पतालों की कार्यप्रणाली और इलाज की लागत को लेकर बहस तेज हो गई है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि गंभीर मामलों में पारदर्शिता, समय पर इलाज और उचित बिलिंग सुनिश्चित करना आवश्यक है। सरकार ने संकेत दिए हैं कि दोषी पाए जाने पर किसी भी स्तर पर कार्रवाई से पीछे नहीं हटेगी।
रांची। रांची जिले के तमाड़ प्रखंड के बेलबेड़ा गांव में मलेरिया का संक्रमण तेजी से फैलने के बाद स्वास्थ्य विभाग ने विशेष निगरानी और रोकथाम अभियान शुरू कर दिया है। अराहंगा पंचायत के टुंगरी टोला में 27 जून से चलाए जा रहे विशेष स्क्रीनिंग अभियान के तहत अब तक 336 लोगों की जांच की गई है, जिनमें 160 लोग मलेरिया पॉजिटिव पाए गए हैं। इनमें 16 मरीजों में बुखार, सिरदर्द, कमजोरी और अन्य लक्षण मिले हैं, जबकि बाकी संक्रमितों का भी नियमित स्वास्थ्य परीक्षण और उपचार किया जा रहा है। मेडिकल टीम कर रही लगातार निगरानी सीएचसी प्रभारी डॉ. सावित्री कुजूर ने बताया कि संक्रमण को नियंत्रित करने के लिए स्वास्थ्य विभाग पूरी तरह सतर्क है। मेडिकल टीम रोजाना प्रभावित गांवों का दौरा कर रही है और मौके पर ही मलेरिया रोधी दवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। उन्होंने कहा कि समय पर जांच और इलाज से बीमारी पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता है। बिना लक्षण वाले लोगों की भी हो रही जांच अराहंगा की सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी (सीएचओ) अनुलता भुतकुंवर ने बताया कि मेडिकल टीम केवल बुखार या अन्य लक्षण वाले लोगों की ही नहीं, बल्कि बिना लक्षण वाले ग्रामीणों की भी जांच कर रही है। इसका उद्देश्य संक्रमण की शुरुआती अवस्था में पहचान कर समय रहते इलाज शुरू करना है। शुरुआत में कुछ ग्रामीण जांच से हिचकिचा रहे थे, लेकिन जागरूकता अभियान के बाद अब लोग स्वयं आगे आकर जांच करा रहे हैं। सावधानी बरतने की अपील स्वास्थ्य विभाग की टीम घर-घर जाकर दवा वितरण के साथ लोगों को मच्छरदानी के नियमित उपयोग, साफ-सफाई बनाए रखने और घर के आसपास पानी जमा नहीं होने देने की सलाह दे रही है। विभाग ने लोगों से अपील की है कि बुखार, ठंड लगना, सिरदर्द या कमजोरी जैसे लक्षण दिखाई देने पर तुरंत नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र में जांच कराएं। अधिकारियों के अनुसार, प्रभावित क्षेत्र में स्क्रीनिंग, निगरानी और उपचार अभियान तब तक जारी रहेगा, जब तक संक्रमण पूरी तरह नियंत्रण में नहीं आ जाता।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।