नई दिल्ली, एजेंसियां। दिल्ली सरकार ने सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में पढ़ने वाले कक्षा 12वीं के विज्ञान वर्ग के छात्रों के लिए मुफ्त JEE और NEET कोचिंग की पहल शुरू की है। इसके तहत चयनित विद्यार्थियों को एक साल की आवासीय कोचिंग दी जाएगी। खास बात यह है कि कोचिंग के साथ विद्यार्थियों के रहने और खाने की व्यवस्था भी मुफ्त होगी। डक्षिणा फाउंडेशन के साथ मिलकर चलेगा कार्यक्रम यह कार्यक्रम दिल्ली सरकार और Dakshana Foundation के सहयोग से संचालित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य ऐसे मेधावी विद्यार्थियों को बेहतर तैयारी का अवसर देना है, जो आर्थिक कारणों से महंगी निजी कोचिंग का खर्च नहीं उठा पाते। कोचिंग में JEE और NEET की तैयारी के साथ नियमित मॉक टेस्ट और परीक्षा आधारित अभ्यास भी कराया जाएगा। चयन परीक्षा के आधार पर होगा चयन इस कार्यक्रम में विद्यार्थियों का चयन Joint Dakshana Selection Test (JDST) 2027 के माध्यम से किया जाएगा। दिल्ली के सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों को कक्षा 12वीं के विज्ञान वर्ग के पात्र विद्यार्थियों तक इस अवसर की जानकारी पहुंचाने के निर्देश दिए गए हैं। चयनित छात्रों को एक साल की आवासीय कोचिंग के दौरान पढ़ाई के साथ रहने और भोजन की सुविधा भी उपलब्ध कराई जाएगी। आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों को मिलेगा फायदा इस पहल से उन विद्यार्थियों को विशेष लाभ मिलने की उम्मीद है, जो डॉक्टर या इंजीनियर बनने का सपना देखते हैं लेकिन महंगी कोचिंग फीस के कारण तैयारी नहीं कर पाते। सरकार की इस पहल से सरकारी स्कूलों के प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को JEE और NEET जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए बेहतर संसाधन और विशेषज्ञ मार्गदर्शन मिलने का अवसर मिलेगा।
Parliament Session: संसद के मानसून सत्र में कई दिनों के गतिरोध के बाद मंगलवार को लोकसभा में लोक परीक्षा (अनुचित साधन निवारण) संशोधन विधेयक, 2026 पर चर्चा शुरू होने की संभावना है। पेपर लीक और परीक्षाओं में धांधली पर सख्त कार्रवाई का प्रावधान करने वाले इस विधेयक को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच तीखी बहस के आसार हैं। विपक्ष जहां छात्रों पर पुलिस कार्रवाई और NEET विवाद जैसे मुद्दे उठाने की तैयारी में है, वहीं सरकार परीक्षा प्रणाली में सुधार और पारदर्शिता के लिए उठाए गए कदमों का बचाव करेगी। लोकसभा में आज एंटी पेपर लीक बिल पर चर्चा लोकसभा में प्रस्तावित लोक परीक्षा (अनुचित साधन निवारण) संशोधन विधेयक, 2026 पर करीब छह घंटे चर्चा होने की संभावना है। संसद के पहले सप्ताह में लगातार हंगामे के कारण विधायी कार्य प्रभावित हुआ था, लेकिन अब प्रमुख राजनीतिक दलों की सहमति के बाद इस महत्वपूर्ण बिल पर बहस का रास्ता साफ हुआ है। प्रस्तावित विधेयक में पेपर लीक, परीक्षा में अनुचित साधनों के इस्तेमाल और संगठित परीक्षा घोटालों के खिलाफ सख्त सजा का प्रावधान किया गया है। बिल के अनुसार, सामान्य मामलों में दोषियों को 5 से 10 साल तक की जेल और 50 लाख रुपये तक जुर्माना हो सकता है। वहीं, संगठित पेपर लीक गिरोहों के मामलों में 7 साल तक की सजा और 10 करोड़ रुपये तक जुर्माने का प्रावधान प्रस्तावित है। सरकार और विपक्ष के बीच होगी जोरदार बहस विपक्ष इस दौरान NEET विवाद, छात्रों के विरोध प्रदर्शन, पुलिस कार्रवाई और परीक्षा प्रणाली में कथित अनियमितताओं का मुद्दा उठाने की तैयारी में है। दूसरी ओर सरकार का कहना है कि यह कानून परीक्षा प्रणाली को अधिक पारदर्शी, सुरक्षित और विश्वसनीय बनाने की दिशा में बड़ा कदम साबित होगा। संसद में शुरू हुई NDA की 'मंगल मिलन' बैठक इधर, संसद परिसर में एनडीए संसदीय दल की साप्ताहिक 'मंगल मिलन' बैठक शुरू हो गई है। बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह समेत एनडीए के कई वरिष्ठ नेता मौजूद हैं। बैठक में संसद के मौजूदा सत्र की रणनीति, प्रमुख विधेयकों और विभिन्न राजनीतिक मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है। पहली बार NCPI को मिला न्योता इस बार की 'मंगल मिलन' बैठक की खास बात यह है कि पहली बार NCPI को भी एनडीए की संसदीय बैठक में शामिल होने का निमंत्रण दिया गया है। संसद पुस्तकालय भवन में आयोजित इस बैठक को आगामी विधायी एजेंडे और गठबंधन की रणनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। संसद के दोनों सदनों में आज की कार्यवाही पर सभी की नजर रहेगी, क्योंकि एंटी पेपर लीक बिल पर होने वाली चर्चा आने वाले समय में देश की परीक्षा व्यवस्था और शिक्षा प्रणाली के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
Exam Reform Task Force: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की परीक्षा प्रणाली को अधिक सुरक्षित, पारदर्शी और तकनीक आधारित बनाने के लिए हाई-पावर्ड टास्क फोर्स का गठन किया है। इस समिति की कमान इंफोसिस के सह-संस्थापक और देश के प्रमुख टेक्नोलॉजी विशेषज्ञ नंदन नीलेकणी को सौंपी गई है। NEET-UG और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक के मामलों के बाद सरकार ने परीक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार की दिशा में यह बड़ा कदम उठाया है। पीएम मोदी ने क्या कहा? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार (26 जुलाई 2026) को सोशल मीडिया पर जारी अपने संदेश में कहा कि सरकार भारतीय परीक्षा प्रणाली को पूरी तरह 'लीक-प्रूफ' बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने बताया कि दुनिया के जाने-माने टेक्नोलॉजी एक्सपर्ट नंदन नीलेकणी की अध्यक्षता में हाई-पावर्ड टास्क फोर्स बनाई गई है, जो परीक्षा प्रणाली को सुरक्षित, पारदर्शी और भरोसेमंद बनाने के लिए तकनीक आधारित समाधान सुझाएगी। पीएम मोदी ने कहा कि प्रतियोगी परीक्षाओं में युवाओं का विश्वास बहाल करना सरकार की प्राथमिकता है और इसके लिए आधुनिक तकनीक का अधिकतम उपयोग किया जाएगा। कौन हैं नंदन नीलेकणी? नंदन मोहनराव नीलेकणी का जन्म 2 जून 1955 को कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में हुआ था। उन्होंने IIT बॉम्बे से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में स्नातक की पढ़ाई पूरी की। वर्ष 1978 में उन्होंने पटनी कंप्यूटर सिस्टम्स से अपने करियर की शुरुआत की। साल 1981 में उन्होंने एन.आर. नारायण मूर्ति और अन्य सहयोगियों के साथ मिलकर इंफोसिस की स्थापना की। कंपनी के शुरुआती विकास में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही और वर्ष 2002 में वह इंफोसिस के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) बने। उनके नेतृत्व में इंफोसिस ने वैश्विक आईटी उद्योग में अपनी मजबूत पहचान बनाई। आधार परियोजना के प्रमुख वास्तुकार नंदन नीलेकणी का सबसे बड़ा योगदान भारत की आधार (Aadhaar) परियोजना को माना जाता है। वर्ष 2009 में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने उन्हें भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI) का अध्यक्ष नियुक्त किया था। उनके नेतृत्व में आधार दुनिया का सबसे बड़ा बायोमेट्रिक पहचान कार्यक्रम बना, जिसने सरकारी सेवाओं, सब्सिडी वितरण, बैंकिंग और डिजिटल गवर्नेंस को नई दिशा दी। आज आधार भारत के डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है। UPI और डिजिटल इंडिया में भी अहम भूमिका नंदन नीलेकणी ने भारत के डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत बनाने में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। देश में यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) के विकास और डिजिटल भुगतान प्रणाली को बढ़ावा देने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। आज UPI दुनिया की सबसे सफल डिजिटल पेमेंट प्रणालियों में गिना जाता है और भारत की तकनीकी उपलब्धियों का प्रमुख उदाहरण है। परीक्षा सुधार में क्या होगी भूमिका? सरकार की ओर से गठित हाई-पावर्ड टास्क फोर्स का उद्देश्य परीक्षा प्रणाली में संरचनात्मक और तकनीकी सुधार करना है। समिति निम्नलिखित विषयों पर सुझाव देगी— प्रश्नपत्रों की सुरक्षा को मजबूत बनाना। पेपर लीक रोकने के लिए आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल। उम्मीदवारों की पहचान और परीक्षा प्रक्रिया को अधिक सुरक्षित बनाना। परीक्षा संचालन और मूल्यांकन प्रणाली में पारदर्शिता बढ़ाना। राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) को तकनीकी रूप से अधिक सक्षम बनाना। क्यों अहम है यह टास्क फोर्स? पिछले कुछ वर्षों में NEET-UG, UGC-NET और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक और अनियमितताओं के मामलों ने परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए हैं। ऐसे में सरकार को उम्मीद है कि नंदन नीलेकणी के तकनीकी अनुभव और डिजिटल गवर्नेंस की समझ से ऐसी प्रणाली विकसित की जा सकेगी, जिससे भविष्य में परीक्षाएं अधिक सुरक्षित, पारदर्शी और भरोसेमंद बन सकें।
पटना, एजेंसियां। शिक्षा सुधार, परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर शनिवार को बिहार बंद के दौरान छात्र संगठनों का प्रदर्शन तेज हो गया। विभिन्न छात्र संगठनों और युवा संगठनों के कार्यकर्ताओं ने पटना सहित कई जिलों में सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शन के चलते कई स्थानों पर यातायात प्रभावित हुआ और सुरक्षा के मद्देनज़र बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया। इन मांगों को लेकर किया गया बिहार बंद प्रदर्शनकारी छात्र संगठनों ने NEET और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं की निष्पक्ष जांच, पेपर लीक की घटनाओं पर सख्त कार्रवाई, परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग उठाई। उनका कहना है कि लगातार सामने आ रही परीक्षा संबंधी गड़बड़ियों से छात्रों का भविष्य प्रभावित हो रहा है। पटना समेत कई जिलों में प्रदर्शन बिहार बंद के दौरान पटना, आरा, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, गया और अन्य जिलों में प्रदर्शनकारियों ने रैलियां निकालीं और कई स्थानों पर सड़क जाम करने की कोशिश की। पुलिस ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात किए और कई इलाकों में यातायात को डायवर्ट किया। सरकार ने शांति बनाए रखने की अपील की प्रशासन ने प्रदर्शनकारियों से शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने की अपील की है। अधिकारियों का कहना है कि किसी भी तरह से सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने या कानून-व्यवस्था बिगाड़ने की अनुमति नहीं दी जाएगी। वहीं केंद्र सरकार का कहना है कि परीक्षा प्रणाली को अधिक पारदर्शी और सुरक्षित बनाने के लिए कई सुधारात्मक कदम पहले ही शुरू किए जा चुके हैं। राजनीतिक माहौल भी हुआ गर्म बिहार बंद और छात्र आंदोलन को लेकर राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है। विपक्ष ने सरकार पर छात्रों की मांगों की अनदेखी करने का आरोप लगाया है, जबकि सरकार का कहना है कि परीक्षा सुधारों के लिए ठोस कदम उठाए जा रहे हैं और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई जारी रहेगी।
MBBS Abroad for Indian Students: भारत में मेडिकल सीट न मिलने या प्राइवेट कॉलेजों की महंगी फीस से परेशान छात्रों के लिए विदेश में MBBS एक बेहतर विकल्प बन सकता है। रूस, किर्गिस्तान, उज्बेकिस्तान, कजाकिस्तान और जॉर्जिया जैसे देशों में अपेक्षाकृत कम खर्च में मेडिकल शिक्षा उपलब्ध है। हालांकि, एडमिशन से पहले NMC और WDOMS की मान्यता, स्टूडेंट वीजा प्रक्रिया और भारत में लागू मेडिकल लाइसेंसिंग नियमों की जानकारी जरूर जांच लें। हर साल लाखों छात्र NEET परीक्षा पास करने के बावजूद सरकारी मेडिकल कॉलेज में सीट नहीं मिलने या निजी मेडिकल कॉलेजों की ऊंची फीस के कारण डॉक्टर बनने का सपना पूरा नहीं कर पाते। ऐसे में विदेश से MBBS करना भारतीय छात्रों के लिए एक किफायती और व्यवहारिक विकल्प बनकर सामने आया है। रूस, किर्गिस्तान, उज्बेकिस्तान, कजाकिस्तान और जॉर्जिया जैसे देशों की कई मेडिकल यूनिवर्सिटीज भारतीय छात्रों को अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाई, आधुनिक लैब, अस्पतालों में क्लिनिकल ट्रेनिंग और अंतरराष्ट्रीय स्तर की मेडिकल शिक्षा प्रदान करती हैं। इन देशों में भारत के कई प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों की तुलना में कम खर्च में MBBS की पढ़ाई पूरी की जा सकती है। कम बजट में MBBS कराने वाले 5 देश 1. रूस (Russia) अनुमानित कुल खर्च: लगभग ₹18–25 लाख 6 वर्षीय MBBS प्रोग्राम सरकारी मेडिकल यूनिवर्सिटी और बेहतर क्लिनिकल ट्रेनिंग के लिए लोकप्रिय। 2. किर्गिस्तान (Kyrgyzstan) अनुमानित कुल खर्च: लगभग ₹18–25 लाख 5–6 वर्षीय कोर्स कम फीस और रहने-खाने का अपेक्षाकृत कम खर्च। 3. उज्बेकिस्तान (Uzbekistan) अनुमानित कुल खर्च: लगभग ₹18–25 लाख भारतीय छात्रों के बीच तेजी से लोकप्रिय। सुरक्षित माहौल और अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाई। 4. कजाकिस्तान (Kazakhstan) अनुमानित कुल खर्च: लगभग ₹25–35 लाख आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर, बेहतर लैब और अस्पतालों में प्रशिक्षण। 5. जॉर्जिया (Georgia) अनुमानित कुल खर्च: लगभग ₹25–38 लाख यूरोपीय स्तर की मेडिकल शिक्षा और अंतरराष्ट्रीय एक्सपोजर। विदेश से MBBS करने के प्रमुख फायदे भारत के कई प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों की तुलना में कम खर्च। अधिकांश विश्वविद्यालयों में अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाई। आधुनिक अस्पतालों में क्लिनिकल ट्रेनिंग। पारदर्शी एडमिशन प्रक्रिया। अंतरराष्ट्रीय स्तर की मेडिकल शिक्षा। एडमिशन और स्टूडेंट वीजा प्रक्रिया विदेश में MBBS के लिए सबसे पहले NMC और WDOMS से मान्यता प्राप्त मेडिकल यूनिवर्सिटी का चयन करें। इसके बाद 10वीं-12वीं की मार्कशीट, NEET स्कोरकार्ड, पासपोर्ट और अन्य आवश्यक दस्तावेज जमा करें। आवेदन स्वीकृत होने पर विश्वविद्यालय Admission/Invitation Letter जारी करता है। इसी पत्र के आधार पर संबंधित देश के Embassy में Student Visa के लिए आवेदन किया जाता है। वीजा स्वीकृत होने के बाद छात्र अपनी यात्रा और विश्वविद्यालय में रिपोर्टिंग की प्रक्रिया पूरी कर सकते हैं। ध्यान रखें विदेश से MBBS करने का निर्णय लेने से पहले संबंधित विश्वविद्यालय की NMC मान्यता, WDOMS सूची, भारत में लागू FMGE/NExT नियम, इंटर्नशिप, भाषा, रहने का खर्च और लाइसेंसिंग प्रक्रिया की पूरी जानकारी अवश्य जांच लें। सही जानकारी और सही संस्थान का चयन आपके मेडिकल करियर की मजबूत शुरुआत बन सकता है।
Rahul Gandhi on UGC-NET: कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने UGC-NET परीक्षा में कथित पेपर लीक और परीक्षा प्रक्रिया में गड़बड़ियों को लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने दावा किया कि परीक्षा से पहले एक पीडीएफ वायरल हुई थी, जिसमें शामिल कई प्रश्न वास्तविक परीक्षा से मेल खाते थे। सरकार या राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) की ओर से राहुल गांधी के इन दावों पर तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। UGC-NET को लेकर राहुल गांधी का दावा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर साझा किए गए अपने पोस्ट में राहुल गांधी ने कहा कि हाल ही में आयोजित UGC-NET परीक्षा को लेकर सामने आए आरोप बेहद गंभीर हैं। उनका दावा है कि परीक्षा से पहले करीब 100 पन्नों की एक पीडीएफ प्रसारित हुई थी, जिसमें ऐसे प्रश्न थे जो बाद में परीक्षा में पूछे गए सवालों से काफी हद तक मेल खाते थे। राहुल गांधी के मुताबिक, यह पीडीएफ प्रश्नपत्र तैयार करने की प्रक्रिया से जुड़ी थी और इसकी जानकारी केवल राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) के पास होनी चाहिए थी। '90 सवाल असली पेपर से मेल खाते थे' राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि वायरल पीडीएफ में मौजूद लगभग 90 प्रश्न UGC-NET के समाजशास्त्र (Sociology) विषय के वास्तविक प्रश्नपत्र से मेल खाते थे। उन्होंने यह भी दावा किया कि यही प्रश्नपत्र बिहार, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान जैसे राज्यों में करीब 2.25 लाख रुपये में बेचे जाने की बात सामने आई है। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। अन्य परीक्षाओं को लेकर भी लगाए आरोप कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि कथित तौर पर इसी नेटवर्क ने CSIR-NET, HTET और ADA जैसी आगामी परीक्षाओं के प्रश्नपत्र उपलब्ध कराने का भी दावा किया था। उन्होंने कहा कि यदि ये आरोप सही साबित होते हैं तो यह देश की परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े करता है। केंद्र सरकार पर साधा निशाना राहुल गांधी ने कहा कि NEET और UGC-NET जैसी परीक्षाओं में लगातार विवाद सामने आने के बावजूद सरकार प्रभावी कदम उठाती नहीं दिख रही है। उन्होंने कहा कि लाखों छात्र वर्षों तक मेहनत करते हैं, लेकिन पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ियों के आरोप उनकी मेहनत और भविष्य दोनों पर असर डालते हैं। छात्रों से एकजुट होने की अपील अपने संदेश के अंत में राहुल गांधी ने छात्रों से एकजुट होकर अपनी आवाज उठाने की अपील की। उन्होंने कहा कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार और परीक्षा प्रणाली को पारदर्शी बनाने के लिए छात्रों और युवाओं की सामूहिक आवाज सबसे महत्वपूर्ण है। आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार फिलहाल राहुल गांधी के लगाए गए आरोपों पर राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA), शिक्षा मंत्रालय या केंद्र सरकार की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। यदि इस मामले में कोई नई जानकारी या आधिकारिक प्रतिक्रिया आती है, तो उसके बाद स्थिति और स्पष्ट हो सकेगी।
नई दिल्ली, एजेंसियां। नई दिल्ली स्थित एआईसीसी मुख्यालय इंदिरा भवन में गुरुवार को कांग्रेस की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। बैठक की अध्यक्षता कांग्रेस अध्यक्ष Mallikarjun Kharge ने की। इसमें लोकसभा में विपक्ष के नेता Rahul Gandhi, महासचिव Priyanka Gandhi Vadra, संगठन महासचिव K. C. Venugopal, जयराम रमेश समेत पार्टी के कई वरिष्ठ नेता, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और राज्य प्रभारी शामिल हुए। आपात बैठक क्यों बुलाई गई? यह बैठक ऐसे समय में हुई है जब देश की राजनीति में कई महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आ रहे हैं। हालिया विधानसभा चुनावों के नतीजों, विपक्षी दलों में बढ़ती राजनीतिक गतिविधियों और तृणमूल कांग्रेस (TMC) में कथित अंदरूनी खींचतान के बीच कांग्रेस नेतृत्व ने स्थिति की समीक्षा की। बताया जा रहा है कि बैठक में कुछ टीएमसी सांसदों के अलग रुख अपनाने और विपक्षी एकजुटता पर पड़ने वाले संभावित असर पर भी चर्चा हुई। भाजपा के अभियान का जवाब देने की तैयारी बैठक में केंद्र सरकार के 12 वर्ष पूरे होने पर भारतीय जनता पार्टी द्वारा चलाए जा रहे प्रचार अभियान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने के रिकॉर्ड से जुड़े राजनीतिक विमर्श का जवाब देने की रणनीति पर भी विचार किया गया। कांग्रेस नेतृत्व ने जनता के बीच अपनी राजनीतिक और वैचारिक बात प्रभावी ढंग से पहुंचाने पर जोर दिया। INDIA गठबंधन को मजबूत करने पर फोकस बैठक में विपक्षी गठबंधन INDIA को और मजबूत बनाने, क्षेत्रीय दलों के साथ समन्वय बढ़ाने तथा दल-बदल की बढ़ती घटनाओं पर भी चर्चा हुई। कांग्रेस नेताओं ने राज्यों में सहयोगी दलों के साथ बेहतर तालमेल स्थापित करने की जरूरत पर बल दिया। गौरतलब है कि हाल ही में INDIA गठबंधन की बैठक में यह निर्णय लिया गया था कि सभी सहयोगी दल हर दो महीने में बैठक करेंगे। गठबंधन की अगली बैठक अगस्त में हैदराबाद में प्रस्तावित है। इसके अलावा विपक्ष ने मतदाता सूची, चुनावी अनियमितताओं, NEET और CBSE से जुड़े मुद्दों पर भी सरकार को घेरने की रणनीति तैयार की है।
नई दिल्ली: परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और छात्रों से जुड़े मुद्दों को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने केंद्र सरकार के खिलाफ अपना विरोध और तेज कर दिया है। संगठन के संस्थापक अभिजीत दीपके ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग करते हुए 13 जून तक का अल्टीमेटम दिया है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि निर्धारित समय सीमा तक कोई कार्रवाई नहीं हुई तो देशभर में चरणबद्ध आंदोलन शुरू किया जाएगा। परीक्षाओं में गड़बड़ी का लगाया आरोप बुधवार को मीडिया से बातचीत के दौरान अभिजीत दीपके ने आरोप लगाया कि नीट (NEET), सीबीएसई (CBSE) और सीयूईटी (CUET) जैसी महत्वपूर्ण परीक्षाओं में सामने आई कथित गड़बड़ियों ने लाखों छात्रों को प्रभावित किया है। उन्होंने कहा कि छात्रों के भविष्य से जुड़े मामलों में जवाबदेही तय होना आवश्यक है और सरकार को इस मुद्दे को गंभीरता से लेना चाहिए। दीपके ने कहा कि युवा वर्ग अब अपनी समस्याओं को लेकर मुखर हो रहा है और शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता तथा जवाबदेही की मांग कर रहा है। 13 जून तक का समय, फिर शुरू होगा आंदोलन सीजेपी के अनुसार, केंद्रीय शिक्षा मंत्री को 13 जून तक इस्तीफा देने का समय दिया गया है। मांग पूरी नहीं होने की स्थिति में संगठन देशभर में विरोध-प्रदर्शन शुरू करेगा। दीपके ने बताया कि आंदोलन की शुरुआत पुणे से की जाएगी, जहां 11 जून को शाम चार बजे शांतिपूर्ण प्रदर्शन आयोजित किया जाएगा। इसके बाद लखनऊ, अमृतसर, जयपुर, बेंगलुरु सहित कई प्रमुख शहरों में विरोध कार्यक्रम आयोजित करने की योजना है। 20 जून को दिल्ली कूच की तैयारी संगठन ने 20 जून को राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में बड़े प्रदर्शन की भी घोषणा की है। अभिजीत दीपके ने कहा कि यदि सरकार उनकी मांगों पर ध्यान नहीं देती है तो देशभर से छात्र और युवा दिल्ली पहुंचकर प्रदर्शन करेंगे। उन्होंने दावा किया कि वह स्वयं इस अभियान का नेतृत्व करेंगे और छात्रों से बड़ी संख्या में इसमें शामिल होने की अपील करेंगे। "एक करोड़ से अधिक छात्र प्रभावित" अभिजीत दीपके ने दावा किया कि विभिन्न प्रतियोगी और प्रवेश परीक्षाओं में सामने आई समस्याओं के कारण एक करोड़ से अधिक छात्र प्रभावित हुए हैं। उन्होंने कहा कि कई छात्र मानसिक तनाव और अनिश्चितता का सामना कर रहे हैं। उनके मुताबिक, छात्रों के हितों की रक्षा के लिए जवाबदेही तय करना जरूरी है और संबंधित अधिकारियों को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। जंतर-मंतर प्रदर्शन का भी किया जिक्र सीजेपी संस्थापक ने बताया कि 6 जून को दिल्ली के जंतर-मंतर पर भी विरोध प्रदर्शन आयोजित किया गया था, जहां शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग उठाई गई थी। उन्होंने कहा कि छात्रों के भविष्य से जुड़े मुद्दों पर व्यापक चर्चा और प्रभावी समाधान की आवश्यकता है। फिलहाल केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की ओर से इस अल्टीमेटम और आंदोलन की घोषणा पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। वहीं, संगठन ने संकेत दिया है कि यदि उनकी मांगें नहीं मानी गईं तो आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा।
नई दिल्ली, एजेंसियां। दिल्ली के जंतर-मंतर पर शनिवार को कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में छात्रों, युवाओं, अभिभावकों और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे उम्मीदवारों ने बड़ा प्रदर्शन किया। आंदोलन का नेतृत्व पार्टी के संस्थापक Abhijeet Dipke ने किया, जो अमेरिका से लौटने के बाद सीधे प्रदर्शन में शामिल हुए। भारी पुलिस सुरक्षा के बीच हुए इस प्रदर्शन का मुख्य मुद्दा शिक्षा व्यवस्था में सुधार, परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता और छात्रों पर बढ़ते मानसिक दबाव को लेकर था। धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग सबसे प्रमुख प्रदर्शनकारियों की सबसे बड़ी मांग केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की रही। उनका आरोप है कि नीट पेपर लीक, भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ियों और विभिन्न परीक्षा प्रणालियों में लगातार सामने आ रही समस्याओं ने छात्रों का भरोसा कमजोर किया है। जंतर-मंतर पर युवाओं ने "परीक्षा में पारदर्शिता" और "जवाबदेही तय करने" की मांग को जोरदार ढंग से उठाया। ये हैं आंदोलन की पांच प्रमुख मांगें CJP ने सरकार के सामने पांच प्रमुख मांगें रखीं। इनमें शिक्षा मंत्री का इस्तीफा, NEET, CUET, CBSE और SSC जैसी परीक्षाओं में निष्पक्ष एवं पारदर्शी व्यवस्था सुनिश्चित करना, डिजिटल शिक्षा प्रणाली को लागू करने से पहले उसकी सुरक्षा और प्रशिक्षण व्यवस्था मजबूत करना, मणिपुर में सामान्य शैक्षणिक माहौल बहाल करना तथा छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए राष्ट्रीय स्तर पर सहायता तंत्र विकसित करना शामिल है। मणिपुर और मानसिक स्वास्थ्य का मुद्दा भी उठा प्रदर्शन में मणिपुर के छात्रों की समस्याओं को भी प्रमुखता से उठाया गया। प्रतिभागियों का कहना था कि अशांत क्षेत्रों में पढ़ाई प्रभावित होने से हजारों छात्रों का भविष्य दांव पर लगा है। वहीं छात्रों में बढ़ते तनाव और आत्महत्या की घटनाओं पर चिंता जताते हुए मानसिक स्वास्थ्य सहायता प्रणाली की मांग की गई। प्रदर्शन के दौरान कई लोग कॉकरोच मास्क पहनकर पहुंचे। अभिजीत दीपके ने आंदोलन को शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक दायरे में रखने की अपील की। इस प्रदर्शन ने संकेत दिया कि शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था को लेकर युवाओं की नाराजगी अब सोशल मीडिया से निकलकर सड़कों तक पहुंच चुकी है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।