Péter Magyar

Bihar Panchayat Election 2026 may face delays as delimitation, reservation, voter lists and polling preparations take nearly a year.
बिहार पंचायत चुनाव 2026: चुनाव से पहले होगा बड़ा बदलाव, परिसीमन में लग सकता है एक साल; उम्मीदवारों का बढ़ेगा इंतजार

Bihar Panchayat Election 2026: बिहार में आगामी त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव की तैयारी शुरू हो गई है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे संभावित उम्मीदवारों को अभी लंबा इंतजार करना पड़ सकता है। राज्य निर्वाचन आयोग ने पंचायत चुनाव से पहले परिसीमन की प्रशासनिक प्रक्रिया शुरू करने की कवायद तेज कर दी है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, परिसीमन से लेकर मतदाता सूची, मतदान केंद्र और आरक्षण रोस्टर तैयार करने तक की पूरी प्रक्रिया में करीब एक साल लगने की संभावना है। इसका सीधा मतलब है कि पंचायत चुनाव की प्रक्रिया तत्काल शुरू होने की संभावना कम है। चुनाव से पहले कई महत्वपूर्ण चरण पूरे करने होंगे और प्रत्येक चरण के बाद प्रशासनिक स्तर पर सत्यापन तथा आपत्तियों के निपटारे की प्रक्रिया भी पूरी की जाएगी। पहले परिसीमन, उसके बाद पंचायत चुनाव राज्य निर्वाचन आयोग पंचायत चुनाव क्षेत्रों के नए सिरे से सीमांकन की तैयारी कर रहा है। इसके लिए आयोग पहले विस्तृत दिशा-निर्देश तैयार करेगा। इसके बाद जिला निर्वाचन पदाधिकारी सह जिलाधिकारी के माध्यम से अलग-अलग जिलों में परिसीमन की प्रक्रिया पूरी कराई जाएगी। जानकारों के अनुसार केवल परिसीमन की प्रक्रिया में ही छह महीने या उससे अधिक समय लग सकता है। इसके बाद आरक्षण, मतदाता सूची और मतदान केंद्रों से संबंधित तैयारियां पूरी करने में अतिरिक्त समय लगेगा। यानी संभावित प्रत्याशियों को मुखिया, सरपंच, पंचायत समिति सदस्य, जिला परिषद सदस्य समेत अन्य पदों के चुनाव को लेकर अभी धैर्य रखना पड़ सकता है। 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर होगा आकलन परिसीमन की प्रक्रिया में वर्ष 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर गांवों की जनसंख्या और भौगोलिक स्थिति का आकलन किया जाएगा। इसके बाद बिहार पंचायत राज अधिनियम, 2006 के प्रावधानों के तहत विभिन्न पंचायत क्षेत्रों की सीमाएं निर्धारित की जाएंगी। इसमें ग्राम पंचायत क्षेत्र, प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्र, पंचायत समिति और जिला परिषद क्षेत्रों का सीमांकन शामिल होगा। परिसीमन के बाद संबंधित क्षेत्रों के मानचित्र तैयार किए जाएंगे। ग्रामीण क्षेत्रों में सीईबी ले-आउट मैप तैयार करने के साथ प्रखंडवार जनसंख्या और मतदाता संबंधी आंकड़ों को भी व्यवस्थित किया जाएगा। आपत्ति और सुझाव का भी मिलेगा मौका पंचायत क्षेत्रों का प्रारंभिक सीमांकन पूरा होने के बाद इसे अंतिम रूप देने से पहले आम लोगों से आपत्ति और सुझाव मांगे जाएंगे। इसके लिए गजट का प्रकाशन किया जाएगा। लोग निर्धारित प्रक्रिया के तहत परिसीमन से जुड़ी आपत्तियां और सुझाव दर्ज करा सकेंगे। प्राप्त आपत्तियों का निपटारा करने के बाद परिसीमन को अंतिम रूप दिया जाएगा। इस पूरी प्रक्रिया के कारण पंचायत चुनाव की समयसीमा आगे बढ़ सकती है। परिसीमन के बाद तैयार होगा नया आरक्षण रोस्टर परिसीमन पूरा होने के बाद पंचायत चुनाव के लिए नया आरक्षण रोस्टर तैयार किया जाएगा। इसमें विभिन्न पंचायत पदों पर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अत्यंत पिछड़ा वर्ग और महिलाओं के लिए आरक्षण का निर्धारण किया जाएगा। इसका असर संभावित उम्मीदवारों की चुनावी तैयारी पर भी पड़ेगा। जिस सीट पर कोई व्यक्ति चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहा है, परिसीमन और नए आरक्षण रोस्टर के बाद उस सीट की स्थिति बदल सकती है। इसलिए संभावित प्रत्याशियों के लिए सिर्फ क्षेत्र की सीमाओं में होने वाले बदलाव ही नहीं, बल्कि आरक्षण की स्थिति भी महत्वपूर्ण होगी। मतदाता सूची और बूथ निर्धारण भी बाकी परिसीमन के बाद चुनाव आयोग को मतदाता सूची को अंतिम रूप देने और मतदान केंद्रों का निर्धारण करने समेत कई अन्य प्रक्रियाएं पूरी करनी होंगी। प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि नए पंचायत क्षेत्रों के अनुसार मतदाता सूची और मतदान केंद्रों की व्यवस्था सही तरीके से तैयार हो। इन सभी प्रक्रियाओं के पूरा होने के बाद ही चुनाव कार्यक्रम को अंतिम रूप देने की दिशा में आगे बढ़ा जा सकेगा। जिलाधिकारियों की होगी अहम भूमिका परिसीमन की पूरी प्रक्रिया में जिलाधिकारियों की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। राज्य निर्वाचन आयोग के दिशा-निर्देश और निगरानी में जिला निर्वाचन पदाधिकारी सह जिलाधिकारी पंचायत क्षेत्रों के सीमांकन और नए क्षेत्रों की घोषणा से जुड़ा काम पूरा कराएंगे। आयोग स्तर पर बैठकों का दौर शुरू हो चुका है और संबंधित अधिकारियों को प्रक्रिया को निर्धारित मानकों के अनुसार आगे बढ़ाने की तैयारी की जा रही है। अक्टूबर-नवंबर में चुनाव की संभावना पर सवाल परिसीमन, आपत्तियों के निपटारे, आरक्षण रोस्टर, मतदाता सूची और मतदान केंद्रों के निर्धारण जैसी प्रक्रियाओं को देखते हुए फिलहाल अक्टूबर-नवंबर में पंचायत चुनाव कराना मुश्किल माना जा रहा है। हालांकि अंतिम चुनाव कार्यक्रम और तारीखों की घोषणा राज्य निर्वाचन आयोग की ओर से आधिकारिक रूप से की जाएगी। इसलिए फिलहाल किसी निश्चित चुनाव तिथि को लेकर दावा करना जल्दबाजी होगी। संभावित उम्मीदवारों के लिए क्या मायने? पंचायत चुनाव की तैयारी कर रहे लोगों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि परिसीमन और आरक्षण की प्रक्रिया पूरी होने तक अपनी सीट को लेकर अंतिम स्थिति स्पष्ट नहीं मानी जा सकती। क्षेत्र की सीमा बदल सकती है, नए पंचायत क्षेत्र बन सकते हैं और आरक्षण रोस्टर के कारण किसी पद की चुनावी स्थिति भी बदल सकती है। ऐसे में उम्मीदवारों को आयोग और जिला प्रशासन की आधिकारिक घोषणाओं पर नजर रखनी होगी।  

surbhi अगस्त 12, 2026 0
हंगरी के नए राष्ट्रपति एंड्रास बाका
हंगरी की संसद ने पूर्व सुप्रीम कोर्ट प्रमुख एंड्रास बाका को नया राष्ट्रपति चुना

बुडापेस्ट, एजेंसियां। हंगरी की संसद ने मंगलवार, 11 अगस्त 2026, को पूर्व सुप्रीम कोर्ट प्रमुख एंड्रास बाका (András Baka) को देश का नया राष्ट्रपति चुन लिया। 73 वर्षीय बाका इस पद के लिए एकमात्र उम्मीदवार थे और उन्हें 140 सांसदों का समर्थन मिला, जबकि 6 सांसदों ने विरोध में मतदान किया। विपक्षी फिडेज़ पार्टी ने मतदान का बहिष्कार किया।   विक्टर ओर्बान के आलोचक रहे हैं बाका     एंड्रास बाका को हंगरी के पूर्व प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बान के आलोचक के तौर पर जाना जाता है। वह 2009 में देश के सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख बने थे, लेकिन न्यायिक सुधारों को लेकर सरकार की आलोचना करने के बाद 2011 में उनका कार्यकाल समय से पहले समाप्त कर दिया गया था। बाद में यूरोपीय मानवाधिकार न्यायालय ने उनकी समयपूर्व बर्खास्तगी को उनके अधिकारों का उल्लंघन माना था।     पीटर मैज्यार की सरकार का बड़ा कदम     बाका का चुनाव प्रधानमंत्री पीटर मैज्यार की सरकार द्वारा ओर्बान-युग की संस्थागत व्यवस्था में बदलाव की कोशिश के बीच हुआ है। मैज्यार की Tisza पार्टी ने बाका को राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार बनाया था।   बाका ने अपने शुरुआती संबोधन में राजनीतिक बदलाव के दौरान बदले की राजनीति से बचने और देश के सभी नागरिकों का प्रतिनिधित्व करने की बात कही।   19 अगस्त को संभालेंगे राष्ट्रपति पद     संसद द्वारा चुने जाने के बावजूद बाका तुरंत राष्ट्रपति पद का कार्यभार नहीं संभालेंगे। रिपोर्टों के अनुसार वह 19 अगस्त 2026 को आधिकारिक रूप से पद ग्रहण करेंगे। हंगरी में राष्ट्रपति का पद मुख्य रूप से औपचारिक है, लेकिन राष्ट्रपति को कानूनों की समीक्षा करने समेत कुछ महत्वपूर्ण संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं।   यह चुनाव हंगरी की राजनीति में इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि बाका का राष्ट्रपति बनना ओर्बान युग के बाद संस्थागत बदलाव की दिशा में एक प्रतीकात्मक कदम के रूप में देखा जा रहा है।

ranjan kumar tiwari अगस्त 12, 2026 0
Hungary election victory celebration after Péter Magyar defeats Viktor Orbán ending 16 years of rule
हंगरी में सत्ता परिवर्तन: पीटर मैग्योर की ऐतिहासिक जीत, 16 साल बाद खत्म हुआ ओर्बन युग

हंगरी की राजनीति में बड़ा उलटफेर हुआ है। 16 साल से सत्ता में काबिज Viktor Orbán को इस बार करारी हार का सामना करना पड़ा है। संसदीय चुनाव में Péter Magyar की ‘तिस्जा’ (Tisza) पार्टी ने ऐतिहासिक जीत दर्ज करते हुए सत्ता पर कब्जा कर लिया है। करीब 97% वोटों की गिनती के बाद सामने आए नतीजों के मुताबिक, तिस्जा पार्टी ने 199 सदस्यीय संसद में 138 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया है। पार्टी को कुल 53.6% वोट मिले, जबकि ओर्बन की ‘फिडेज’ (Fidesz) पार्टी 55 सीटों और 37.8% वोटों पर सिमट गई। 16 साल का ओर्बन युग खत्म Viktor Orbán साल 2010 से लगातार सत्ता में थे इस बार उनकी लोकप्रियता में भारी गिरावट दर्ज हुई हार के बाद ओर्बन ने परिणाम को “दर्दनाक” बताया अब विपक्ष में बैठकर राजनीति करने की बात कही बुडापेस्ट में नतीजों के बाद लोगों ने सड़कों और मेट्रो स्टेशनों पर जश्न मनाया। इस चुनाव में 77% से ज्यादा मतदान हुआ, जो हाल के वर्षों में एक रिकॉर्ड माना जा रहा है। कौन हैं पीटर मैग्योर? Péter Magyar हंगरी की राजनीति में तेजी से उभरे नए चेहरे हैं। उम्र: 45 साल पेशा: वकील पहले ओर्बन सरकार का हिस्सा रह चुके हैं 2024 में विवाद के बाद अलग होकर नई पार्टी बनाई उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कार्रवाई, न्यायपालिका में सुधार और पारदर्शिता बढ़ाने के वादों के साथ चुनाव लड़ा। चुनावी गणित (Election Breakdown) कुल सीटें: 199 तिस्जा पार्टी: 138 सीटें (53.6% वोट) फिडेज पार्टी: 55 सीटें (37.8% वोट) युवाओं का समर्थन ओर्बन को बेहद कम मिला 18–29 उम्र वर्ग के केवल 8% वोट वैश्विक राजनीति पर असर Viktor Orbán को लंबे समय से Vladimir Putin और Donald Trump का करीबी माना जाता था। उनकी हार को राष्ट्रवादी और दक्षिणपंथी राजनीति के लिए झटका माना जा रहा है रूस और अमेरिका के कुछ राजनीतिक समीकरण प्रभावित हो सकते हैं चुनाव से पहले JD Vance ने भी समर्थन देने की कोशिश की थी यूरोपियन यूनियन के साथ नए रिश्ते पीटर मैग्योर ने अपनी जीत के बाद स्पष्ट किया कि उनकी सरकार European Union के साथ मजबूत संबंध बनाएगी। EU से रुके हुए फंड को वापस लाने की कोशिश यूरोपियन पब्लिक प्रॉसिक्यूटर ऑफिस में शामिल होने की योजना लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने का वादा नई सरकार का एजेंडा भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़ी कार्रवाई न्यायपालिका और सरकारी संस्थाओं में सुधार पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाना पुराने अधिकारियों से इस्तीफे की मांग मैग्योर ने संकेत दिए हैं कि वे जल्द ही वारसॉ, वियना और ब्रुसेल्स का दौरा करेंगे ताकि अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत किया जा सके। ओर्बन पर लगे आरोप ओर्बन सरकार पर पिछले वर्षों में कई आरोप लगते रहे: मीडिया की स्वतंत्रता पर नियंत्रण लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करना EU के नियमों से टकराव यही कारण रहा कि इस बार जनता ने बदलाव के पक्ष में वोट किया। क्यों हुई ओर्बन की हार? विशेषज्ञों के अनुसार: युवाओं का समर्थन कम होना भ्रष्टाचार के आरोप EU के साथ खराब संबंध लंबे समय तक सत्ता में रहने की थकान इन सभी कारणों ने मिलकर सत्ता परिवर्तन का रास्ता तैयार किया।  

surbhi अप्रैल 13, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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भारत की हवाई ताकत को मिलेगा बड़ा बूस्ट? फ्रांस ने 114 राफेल फाइटर जेट का प्रस्ताव सौंपा, 94 विमान भारत में बनाने की योजना

surbhi अगस्त 7, 2026 0