सहरसा। बिहार के सहरसा-मानसी रेलखंड पर स्थित सिमरी बख्तियारपुर रेलवे स्टेशन पर बुधवार सुबह उस समय अफरा-तफरी मच गई, जब हटिया-कोसी एक्सप्रेस के एक कोच के ब्रेक पैड में अचानक आग लग गई। ट्रेन के रुकते ही बोगी के नीचे से आग की लपटें और घना धुआं निकलने लगा। हालांकि रेलवे कर्मचारियों और फायर ब्रिगेड की तत्परता से करीब आधे घंटे की मशक्कत के बाद आग पर काबू पा लिया गया। राहत की बात यह रही कि किसी यात्री के घायल होने की सूचना नहीं है।
ट्रेन संख्या 18625 हटिया-कोसी एक्सप्रेस अपने निर्धारित समय से करीब 1 घंटे 13 मिनट की देरी से सुबह 5:30 बजे सिमरी बख्तियारपुर स्टेशन पहुंची थी। ट्रेन के रुकते ही थर्ड एसी कोच के पहिए के पास ब्रेक पैड से आग और तेज धुआं निकलने लगा।
घटना को देखते ही रेलवे कर्मचारियों ने तुरंत यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ आग बुझाने की कार्रवाई शुरू की।
रेलवे के तकनीकी कर्मचारियों की शुरुआती जांच में सामने आया कि ब्रेक ब्लॉक जाम होने के कारण अत्यधिक घर्षण पैदा हुआ। इसके चलते ब्रेक पैड काफी गर्म होकर जलने लगा और आग की लपटें निकलने लगीं।
रेलवे कर्मचारियों ने छह अग्निशामक यंत्रों और स्थानीय फायर ब्रिगेड की मदद से आग पर काबू पाया। करीब आधे घंटे बाद स्थिति पूरी तरह सामान्य हो गई।
सुरक्षा के मद्देनजर प्रभावित एसी कोच के यात्रियों को मानसी स्टेशन तक दूसरे कोच में शिफ्ट कर दिया गया। तकनीकी जांच और आवश्यक कार्रवाई पूरी होने के बाद ट्रेन को सुबह 6:13 बजे आगे रवाना कर दिया गया।
फायर ब्रिगेड के फायरमैन संतोष कुमार ने बताया कि जब टीम मौके पर पहुंची, तब बोगी के नीचे ब्रेक पैड अत्यधिक गर्म होकर लाल हो चुका था और उससे धुआं तथा आग निकल रही थी।
सिमरी बख्तियारपुर रेलवे स्टेशन पर ट्रेन में आग लगने की यह हाल के दिनों में दूसरी बड़ी घटना बताई जा रही है। इससे पहले 3 अगस्त 2026 को प्लेटफॉर्म नंबर-2 पर खड़ी समस्तीपुर-सहरसा पैसेंजर मेमू ट्रेन के इंजन में भीषण आग लग गई थी।
लगातार सामने आ रही ऐसी घटनाओं के बाद रेलवे की सुरक्षा और तकनीकी जांच व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। मामले में रेलवे अधिकारियों की ओर से विस्तृत जांच की जा रही है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
भागलपुर। बिहार और झारखंड के यात्रियों के लिए रेलवे से बड़ी राहत की खबर है। भागलपुर-मुजफ्फरपुर जनसेवा एक्सप्रेस को साहिबगंज तक विस्तारित करने की तैयारी पूरी कर ली गई है। पूर्व रेलवे ने ट्रेन के विस्तार का प्रस्ताव, नई समय-सारिणी और परिचालन योजना रेलवे बोर्ड को भेज दी है। अंतिम मंजूरी मिलते ही ट्रेन नए शेड्यूल के तहत चलने लगेगी। साहिबगंज से मुजफ्फरपुर तक सीधी ट्रेन करीब 35 वर्षों से भागलपुर और मुजफ्फरपुर के बीच चल रही जनसेवा एक्सप्रेस के विस्तार के बाद झारखंड के साहिबगंज और बिहार के उत्तर भाग के बीच सीधा रेल संपर्क मजबूत होगा। प्रस्ताव लागू होने पर ट्रेन साहिबगंज से चलकर पीरपैंती, कहलगांव और भागलपुर होते हुए मुजफ्फरपुर तक जाएगी। इससे संताल परगना क्षेत्र के यात्रियों को मुजफ्फरपुर और उत्तर बिहार के अन्य इलाकों तक पहुंचने में सुविधा होगी। सप्ताह में पांच दिन साहिबगंज से चलेगी रेलवे के प्रस्ताव के अनुसार ट्रेन सप्ताह में पांच दिन साहिबगंज से संचालित होगी। सोमवार, बुधवार, गुरुवार, शनिवार और रविवार को यह साहिबगंज से मुजफ्फरपुर जाएगी। वहीं मंगलवार और शुक्रवार को ट्रेन की मौजूदा व्यवस्था बनी रहेगी और इसका परिचालन भागलपुर से ही होगा। यानी सप्ताह के दो दिन ट्रेन भागलपुर से चलेगी, जबकि पांच दिन इसे साहिबगंज तक विस्तारित किया जाएगा। ट्रेन का बदलेगा नंबर विस्तार के बाद जनसेवा एक्सप्रेस के लिए 13411/13412 नया ट्रेन नंबर प्रस्तावित किया गया है। रेलवे के अनुसार इसके लिए अतिरिक्त रेक की जरूरत नहीं होगी। ट्रेन का प्राथमिक रखरखाव मंगलवार और शुक्रवार को भागलपुर में ही किया जाएगा। इससे मौजूदा संसाधनों का इस्तेमाल करते हुए संचालन जारी रखा जा सकेगा। क्या होगा प्रस्तावित टाइम टेबल? प्रस्ताव के मुताबिक मुजफ्फरपुर से चलने वाली ट्रेन रात 11:05 बजे रवाना होगी और सुबह करीब 6 बजे भागलपुर पहुंचेगी। साहिबगंज जाने वाले दिनों में ट्रेन सुबह 6:15 बजे भागलपुर से रवाना होकर 7:50 बजे साहिबगंज पहुंचेगी। वापसी में ट्रेन साहिबगंज से दोपहर 12:20 बजे खुलेगी और करीब 1:45 बजे भागलपुर पहुंचेगी। इसके बाद दोपहर 2:05 बजे भागलपुर से मुजफ्फरपुर के लिए रवाना होगी। कहलगांव और पीरपैंती के यात्रियों को भी फायदा साहिबगंज और भागलपुर के बीच कहलगांव और पीरपैंती में ट्रेन के ठहराव का प्रस्ताव है। इससे इन क्षेत्रों के यात्रियों को भी उत्तर बिहार की ओर जाने के लिए बेहतर रेल सुविधा मिलेगी। रेल कनेक्टिविटी बढ़ने से शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार और रोजगार के सिलसिले में आने-जाने वाले यात्रियों को विशेष फायदा होने की उम्मीद है। रेलवे बोर्ड की मंजूरी का इंतजार पूर्व रेलवे ने ट्रेन के विस्तार से जुड़ा पूरा प्रस्ताव रेलवे बोर्ड को भेज दिया है। अब अंतिम स्वीकृति का इंतजार है। मंजूरी मिलते ही जनसेवा एक्सप्रेस नए शेड्यूल के अनुसार साहिबगंज से संचालित की जाएगी। यह विस्तार बिहार और झारखंड के बीच सीधा रेल संपर्क मजबूत करने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।
Bihar Politics: बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में जीत के बाद जन सुराज की राजनीतिक सक्रियता और बढ़ती दिखाई दे रही है। अब पार्टी की नजर बिहार विधान परिषद की शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों की खाली हुई आठ सीटों पर बताई जा रही है। खास तौर पर तीन ऐसी सीटें जन सुराज के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं, जहां पिछले चुनाव में दलीय उम्मीदवारों को निर्दलीय प्रत्याशियों से हार का सामना करना पड़ा था। बांकीपुर की जीत ने जन सुराज और प्रशांत किशोर के राजनीतिक प्रभाव को लेकर बिहार की सियासत में नई चर्चा छेड़ दी है। इसी बीच आगामी विधान परिषद चुनाव को लेकर संभावित रणनीति ने NDA, RJD, कांग्रेस और अन्य दलों के भीतर भी राजनीतिक मंथन तेज कर दिया है। आठ शिक्षक-स्नातक सीटों पर जन सुराज की नजर बिहार विधान परिषद की शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों की कुल आठ सीटों पर चुनाव होना है। जन सुराज इन सभी सीटों पर अपनी राजनीतिक संभावनाओं का आकलन कर रहा है। हालांकि पार्टी की ओर से अभी उम्मीदवारों और चुनावी रणनीति को लेकर अंतिम घोषणा नहीं की गई है। पार्टी के भीतर होने वाली बैठक के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि जन सुराज सभी सीटों पर सीधे चुनाव लड़ेगा या कुछ चुनिंदा क्षेत्रों पर विशेष फोकस करेगा। लेकिन पिछले चुनाव के नतीजों को देखते हुए तीन सीटें जन सुराज के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं—सारण शिक्षक, तिरहुत स्नातक और दरभंगा स्नातक निर्वाचन क्षेत्र। सारण शिक्षक सीट पर सबसे ज्यादा फोकस सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र जन सुराज की संभावित रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र माना जा रहा है। पिछले चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार अफाक अहमद ने जीत दर्ज कर राजनीतिक दलों को चौंका दिया था। अफाक अहमद को 3,055 वोट मिले थे, जबकि महागठबंधन के आनंद पुष्कर को 2,381 वोट मिले। जयराम यादव को 2,080 वोट मिले थे। इसके अलावा चंद्रमा सिंह, रंजीत कुमार, नवल किशोर सिंह और धर्मेंद्र कुमार भी मैदान में थे। अफाक अहमद को जन सुराज का समर्थन प्राप्त था। उनकी जीत को पार्टी के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक उपलब्धि के तौर पर देखा गया था। अब आगामी चुनाव में उस प्रदर्शन को दोहराना जन सुराज के लिए बड़ी चुनौती होगी। तिरहुत स्नातक सीट भी अहम तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में भी पिछले चुनाव का परिणाम काफी चर्चित रहा था। यहां निर्दलीय शिक्षक नेता वंशीधर ब्रजवासी ने जीत दर्ज कर राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों को पीछे छोड़ दिया था। जन सुराज के उम्मीदवार विनायक विजेता दूसरे स्थान पर रहे थे। दोनों के बीच 10,915 मतों का अंतर रहा। RJD के गोपी किशन तीसरे स्थान पर रहे, जबकि JDU के अभिषेक झा चौथे स्थान पर चले गए। इस चुनाव में पहली वरीयता के मतों से परिणाम तय नहीं हुआ था और दूसरी वरीयता के मतों की गिनती के बाद विजेता का फैसला हुआ था। इस बार जन सुराज इस सीट पर पहले के अनुभव और संगठनात्मक तैयारी के आधार पर अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर सकता है। दरभंगा स्नातक सीट पर भी नजर दरभंगा स्नातक निर्वाचन क्षेत्र भी उन सीटों में शामिल है जहां पिछले चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार ने दलीय प्रत्याशियों को मात दी थी। निर्दलीय सर्वेश कुमार ने 15,595 वोट हासिल कर जीत दर्ज की थी। JDU के प्रत्याशी डॉ. दिलीप कुमार 11,676 वोट के साथ दूसरे स्थान पर रहे, जबकि RJD के अनिल कुमार झा तीसरे स्थान पर रहे। जन सुराज से जुड़े सूत्रों के अनुसार पार्टी इस बार रणनीतिक तैयारी के साथ मैदान में उतरने की योजना बना रही है। बांकीपुर की जीत के बाद पार्टी अपने संगठन और राजनीतिक पहुंच को विधान परिषद चुनाव में भी आजमाना चाहती है। NDA और महागठबंधन के लिए क्यों महत्वपूर्ण है चुनाव? शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्र परंपरागत रूप से राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण रहे हैं। इन क्षेत्रों में शिक्षित मतदाता, शिक्षक और पेशेवर वर्ग चुनावी परिणाम को प्रभावित करते हैं। पिछले चुनावों में कई सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवारों के प्रदर्शन ने यह संकेत दिया कि मजबूत स्थानीय पकड़ और व्यक्तिगत लोकप्रियता के आधार पर दलीय उम्मीदवारों को चुनौती दी जा सकती है। ऐसे में यदि जन सुराज इन सीटों पर प्रभावी तरीके से चुनाव लड़ता है तो NDA और महागठबंधन दोनों के सामने नई चुनौती खड़ी हो सकती है। बांकीपुर की जीत के बाद बढ़ी उम्मीदें बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में जीत के बाद जन सुराज के कार्यकर्ताओं और समर्थकों का उत्साह बढ़ा है। पार्टी अब विधानसभा चुनावी राजनीति के साथ-साथ विधान परिषद के चुनावी क्षेत्रों में भी अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश करती नजर आ रही है। हालांकि विधान परिषद के शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों की चुनावी गणित विधानसभा चुनाव से अलग होती है। यहां मतदाता समूह सीमित और विशिष्ट होता है तथा स्थानीय मुद्दों, उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़ और संगठन की सक्रियता का विशेष महत्व रहता है। इसलिए बांकीपुर की जीत का सीधा असर MLC चुनाव में कितना दिखाई देगा, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा। अब उम्मीदवारों और रणनीति पर नजर फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि जन सुराज इन आठ सीटों में से कितनी सीटों पर उम्मीदवार उतारेगा और किन क्षेत्रों को प्राथमिकता देगा। सारण शिक्षक, तिरहुत स्नातक और दरभंगा स्नातक सीटों के पिछले नतीजे पार्टी के लिए उत्साह बढ़ाने वाले जरूर हैं, लेकिन इस बार NDA, RJD, कांग्रेस और अन्य दल भी पूरी तैयारी के साथ मैदान में उतरेंगे। ऐसे में आगामी विधान परिषद चुनाव बिहार की बदलती राजनीतिक तस्वीर में एक और महत्वपूर्ण मुकाबला साबित हो सकता है।
बिहार की राजनीति में प्रशांत किशोर ने बांकीपुर के युवाओं को लेकर बड़ा रोजगार वादा किया है। जनता को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि यदि वह बांकीपुर से विधायक बनते हैं, तो क्षेत्र के कम से कम 10 हजार पढ़े-लिखे बेरोजगार युवाओं को निजी क्षेत्र में नौकरी दिलाने की व्यवस्था करने की कोशिश करेंगे। प्रशांत किशोर ने कहा कि उनका फोकस सिर्फ चुनाव जीतने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि क्षेत्र के युवाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा करने पर भी रहेगा। उन्होंने बांकीपुर के पढ़े-लिखे बेरोजगार युवाओं को निजी कंपनियों में रोजगार से जोड़ने की बात कही। 10 हजार युवाओं को रोजगार दिलाने का लक्ष्य जनता को संबोधित करते हुए प्रशांत किशोर ने बांकीपुर के कम से कम 10 हजार युवाओं को प्राइवेट सेक्टर में नौकरी दिलाने की व्यवस्था करने का ऐलान किया। उन्होंने कहा कि इसके लिए रोजगार उपलब्ध कराने वाली निजी कंपनियों और युवाओं के बीच संपर्क स्थापित करने की कोशिश की जाएगी। उनके इस ऐलान के बाद बांकीपुर के युवाओं के बीच रोजगार का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आ गया है। खासकर पढ़े-लिखे बेरोजगार युवाओं के लिए निजी क्षेत्र में नौकरी उपलब्ध कराने का दावा कितना प्रभावी होगा, यह आगे देखने वाली बात होगी। रोजगार के मुद्दे पर फोकस बिहार में बेरोजगारी और युवाओं के लिए रोजगार के अवसर लंबे समय से राजनीतिक बहस के प्रमुख मुद्दों में शामिल रहे हैं। ऐसे में प्रशांत किशोर का यह ऐलान बांकीपुर के मतदाताओं के बीच रोजगार को केंद्र में लाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि 10 हजार युवाओं को निजी क्षेत्र में रोजगार दिलाने के लक्ष्य को हासिल करने के लिए किस तरह की योजना बनाई जाएगी, किन कंपनियों से संपर्क किया जाएगा और नौकरी के लिए किन योग्यताओं को आधार बनाया जाएगा, इसकी विस्तृत जानकारी अभी सामने नहीं आई है। वीडियो में क्या बोले प्रशांत किशोर? जनता को संबोधित करते हुए प्रशांत किशोर ने बांकीपुर के पढ़े-लिखे बेरोजगार युवाओं के लिए रोजगार की व्यवस्था करने की बात कही। उन्होंने कम से कम 10 हजार युवाओं को निजी क्षेत्र में नौकरी दिलाने की कोशिश का भरोसा जताया। अब इस घोषणा के बाद बांकीपुर के युवाओं की प्रतिक्रिया और राजनीतिक स्तर पर इसकी चर्चा पर नजर रहेगी। साथ ही यह भी महत्वपूर्ण होगा कि चुनावी वादे के रूप में किए गए इस ऐलान को आगे चलकर किस तरह की ठोस योजना में बदला जाता है।