रांची: झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) की सिविल सेवा परीक्षा से जुड़े कथित घोटाले की जांच में कई गंभीर आरोप सामने आए हैं। CID को दिए आरोपी अभय तिवारी के बयान के आधार पर JPSC के कुछ सदस्यों और तत्कालीन चेयरमैन की कथित भूमिका को लेकर सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि अभ्यर्थियों से लाखों रुपये लेकर परीक्षा और इंटरव्यू में मदद पहुंचाने की कोशिश की गई।
अभय तिवारी के कथित बयान के मुताबिक, JPSC की 11वीं से 13वीं सिविल सेवा परीक्षा में अभ्यर्थियों से कथित तौर पर अलग-अलग चरणों के लिए रकम तय की गई थी। सामान्य वर्ग के लिए प्रारंभिक परीक्षा में करीब 5 लाख रुपये और SC-ST अभ्यर्थियों के लिए 2 से 3 लाख रुपये का कथित रेट बताया गया। वहीं अंतिम चयन तक पहुंचाने के लिए रकम 60 से 70 लाख रुपये तक होने का दावा किया गया है।
हालांकि, ये सभी आरोप जांच में सामने आए बयानों पर आधारित हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि या दोष सिद्धि अभी नहीं हुई है।
अभय तिवारी ने अपने बयान में JPSC के तत्कालीन सदस्य अजीता भट्टाचार्य, जमाल अहमद और अनीमा हांसदा के साथ तत्कालीन चेयरमैन एल खियांग्ते की कथित भूमिका का जिक्र किया है।
बयान के अनुसार, अभ्यर्थियों की पैरवी के लिए टीडीपीएल के निदेशक रामवीर सिंह के माध्यम से आयोग के सदस्यों तक संपर्क कराया जाता था। दावा है कि आदित्य पांडेय नामक व्यक्ति के जरिए अभ्यर्थियों को संबंधित लोगों तक पहुंचाया गया।
जांच में सामने आए कथित बयान के मुताबिक, इस पूरी व्यवस्था से सात अभ्यर्थियों को फायदा पहुंचाने का दावा किया गया है। इसके बदले प्रति अभ्यर्थी करीब 15 लाख रुपये लिए जाने की बात कही गई है।
आरोप है कि इंटरव्यू से जुड़ी रकम अजीता भट्टाचार्य के कथित पीए ब्रजराम तक पहुंचाई जाती थी। वहीं, चेयरमैन एल खियांग्ते तक रकम धर्मेंद्र नाम के व्यक्ति के जरिए पहुंचाए जाने का दावा किया गया है।
अभय तिवारी के कथित बयान में इंटरव्यू प्रक्रिया को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए गए हैं। दावा किया गया है कि JPSC के कुछ सदस्य टीडीपीएल के निदेशक रामवीर सिंह पर अभ्यर्थियों के कोड की पहचान कराने का दबाव बनाते थे।
आरोप के अनुसार, चेयरमैन इंटरव्यू से एक दिन पहले ही अभ्यर्थियों के कोड की जानकारी हासिल कर लेते थे। इसके बाद संबंधित अभ्यर्थियों को कथित तौर पर विशेष बोर्ड में भेजने की व्यवस्था की जाती थी।
यदि जांच में ये आरोप सही पाए जाते हैं, तो इससे भर्ती परीक्षा की निष्पक्षता और इंटरव्यू प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े हो सकते हैं।
अभय तिवारी ने CID के सामने दिए कथित बयान में CDPO परीक्षा का भी जिक्र किया है। उनके अनुसार, इस परीक्षा में अभ्यर्थी उपलब्ध कराने के लिए प्रति अभ्यर्थी करीब 10 लाख रुपये का कथित रेट तय था।
बयान में एक अभ्यर्थी के इंटरव्यू को लेकर 15 लाख रुपये चेयरमैन तक पहुंचाने का आरोप लगाया गया है। वहीं, काजल भारती नाम की अभ्यर्थी के इंटरव्यू बोर्ड से जुड़े मामले में अजीता भट्टाचार्य के कथित पीए को 10 लाख रुपये दिए जाने का दावा किया गया है।
JPSC परीक्षा से जुड़े कथित भ्रष्टाचार के मामले में CID की जांच आगे बढ़ने के साथ कई नए नाम और आरोप सामने आ रहे हैं। अभय तिवारी के बयान के अलावा टीडीपीएल निदेशक रामवीर सिंह के कथित कबूलनामे का भी जांच में उल्लेख किया गया है।
फिलहाल इन आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष जांच और अदालत की प्रक्रिया के बाद ही सामने आएगा। यदि आरोप प्रमाणित होते हैं, तो यह मामला झारखंड की भर्ती परीक्षाओं की पारदर्शिता को लेकर बड़ा सवाल बन सकता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
रांची: झारखंड के संविदा पर कार्यरत 211 विशेष शिक्षकों के लिए सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत की खबर सामने आई है। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि इन शिक्षकों के दावों पर केवल J-TET पास नहीं होने के आधार पर फैसला न किया जाए। सरकार को संबंधित शिक्षकों की पात्रता पर सुप्रीम कोर्ट के पहले के आदेश के आधार पर विचार कर दो महीने के भीतर उचित निर्णय लेने को कहा गया है। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए 7 मार्च 2025 को दिए गए अपने पूर्व आदेश का हवाला दिया। अदालत ने कहा कि संविदा पर नियुक्त विशेष शिक्षकों के मामले में Rehabilitation Council of India (RCI) की निर्धारित योग्यता महत्वपूर्ण है। 211 में सिर्फ 33 शिक्षक J-TET के आधार पर पात्र सुप्रीम कोर्ट के समक्ष झारखंड सरकार की ओर से 1 अगस्त 2026 को दाखिल हलफनामे का भी उल्लेख किया गया। इसमें बताया गया कि राज्य में कार्यरत 211 संविदा विशेष शिक्षकों में केवल 33 को J-TET की योग्यता के आधार पर पात्र माना गया है। सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता और एमिकस क्यूरी ऋषि मल्होत्रा ने अदालत का ध्यान 7 मार्च 2025 के आदेश की ओर दिलाया। इस आदेश में विशेष शिक्षकों के लिए RCI की योग्यता को अहम माना गया था। इसके बाद पीठ ने स्पष्ट किया कि सभी 211 शिक्षकों के दावों पर उसी आदेश में तय मानकों के अनुसार विचार किया जाना चाहिए। केवल J-TET पास नहीं करने के आधार पर किसी शिक्षक को दावे के विचार से बाहर नहीं किया जा सकता। JSSC परीक्षा देने वाले शिक्षकों को लेकर भी स्थिति स्पष्ट सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि 211 विशेष शिक्षकों में से किसी ने JSSC की परीक्षा दी है, तो हर मामले में उनका भविष्य केवल उस परीक्षा के परिणाम के आधार पर तय नहीं होगा। ऐसे मामलों पर 7 मार्च 2025 के आदेश के तहत निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार विचार किया जाएगा। हालांकि, राहुल कौशिक की ओर से पेश आवेदकों के मामले में अदालत ने अलग व्यवस्था रखी है। इन आवेदकों का भविष्य JSSC परीक्षा के परिणाम के आधार पर तय किया जाएगा। सरकार को दो महीने में लेना होगा फैसला सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद अब झारखंड सरकार को 211 संविदा विशेष शिक्षकों के दावों पर निर्धारित प्रक्रिया के तहत विचार करना होगा। अदालत ने सरकार को दो महीने के भीतर उचित निर्णय लेने का निर्देश दिया है। इस आदेश से उन शिक्षकों को राहत मिलने की उम्मीद है, जिन्हें केवल J-TET की योग्यता पूरी नहीं करने के आधार पर पात्रता से बाहर किए जाने का खतरा था। बाकी रिक्त पद कानून के अनुसार भरे जा सकेंगे अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि बाकी रिक्त पदों को लागू कानून और नियमों के अनुसार भरा जा सकता है। मामले से जुड़े दो अंतरिम आवेदन भी अदालत ने निपटा दिए। झारखंड के अलावा उत्तराखंड, मध्य प्रदेश और दिल्ली के संविदा विशेष शिक्षकों से जुड़े मामले भी सुप्रीम कोर्ट के समक्ष विचाराधीन थे। झारखंड के 211 शिक्षकों के मामले में अब राज्य सरकार को अदालत के निर्देश के अनुसार आगे की कार्रवाई करनी होगी।
रांची: JPSC-JSSC परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के खिलाफ रांची में छात्रों और अभ्यर्थियों का आंदोलन लगातार जारी है। आमरण अनशन पर बैठे JLKM नेता देवेंद्र नाथ महतो के अनशन का बुधवार को 11वां दिन है। स्वास्थ्य बिगड़ने के बाद सदर अस्पताल में भर्ती महतो ने अस्पताल से ही एक खुला पत्र जारी कर आंदोलन जारी रखने का ऐलान किया है। पत्र में देवेंद्र नाथ महतो ने कहा कि अस्पताल में इलाज चलने के बावजूद उनका अनिश्चितकालीन अनशन जारी है। उन्होंने बताया कि स्वास्थ्य ठीक नहीं होने के बावजूद 10 अगस्त को वह छात्रों के विधानसभा घेराव मार्च में शामिल हुए थे। विधानसभा घेराव को बताया ऐतिहासिक देवेंद्र नाथ महतो ने विधानसभा घेराव कार्यक्रम को सफल बनाने वाले छात्रों, युवाओं और अन्य सहयोगियों के प्रति आभार जताया। उन्होंने शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए लाठीचार्ज करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। उन्होंने कहा कि आंदोलन का उद्देश्य अभ्यर्थियों को न्याय दिलाना है और जब तक उनकी मांगों पर पूरी तरह से न्याय नहीं होता, तब तक संघर्ष जारी रहेगा। JPSC-JSSC परीक्षाओं में कथित गड़बड़ी को लेकर आंदोलन रांची में चल रहा यह आंदोलन JPSC और JSSC की भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं, पेपर लीक और भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर है। प्रदर्शनकारी अभ्यर्थी संबंधित परीक्षाओं को रद्द करने, पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने और भर्ती प्रक्रिया में सुधार की मांग कर रहे हैं। आंदोलनकारियों का कहना है कि भर्ती परीक्षाओं में पारदर्शिता सुनिश्चित करना जरूरी है, ताकि मेहनत करने वाले अभ्यर्थियों के साथ अन्याय न हो। सदर अस्पताल में इलाज के बीच जारी है अनशन अनशन के दौरान तबीयत बिगड़ने के बाद देवेंद्र नाथ महतो को रांची के सदर अस्पताल में भर्ती कराया गया। अस्पताल से जारी तस्वीरों में उन्हें आईवी ड्रिप लगी हुई दिखाई दे रही है। खुले पत्र में उन्होंने संकेत दिया कि स्वास्थ्य कमजोर होने के बावजूद न्याय की मांग को लेकर उनका संकल्प कायम है। छात्रों का आंदोलन भी जारी JPSC-JSSC भर्ती परीक्षाओं को लेकर छात्र संगठनों और अभ्यर्थियों का आंदोलन लगातार आगे बढ़ रहा है। विधानसभा घेराव के दौरान पुलिस कार्रवाई के आरोपों के बाद मामला और गरमा गया है। देवेंद्र नाथ महतो ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि केवल आश्वासन से आंदोलन समाप्त नहीं होगा। उनका कहना है कि अभ्यर्थियों को जब तक संपूर्ण न्याय नहीं मिलता, तब तक संघर्ष जारी रहेगा।
रांची। JPSC-JSSC भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर आंदोलन कर रहे अभ्यर्थियों पर विधानसभा घेराव के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई के विरोध में भाजपा के आह्वान पर मंगलवार को झारखंड बंद बुलाया गया। राज्य के कई जिलों में बंद का मिलाजुला असर देखने को मिला। हजारीबाग, जमशेदपुर, रामगढ़, गढ़वा, देवघर, पाकुड़ और जामताड़ा समेत कई जगहों पर भाजपा कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन किया और दुकानों को बंद कराने की कोशिश की। कई स्थानों पर दुकानदारों ने खुद ही प्रतिष्ठान बंद रखे, जबकि कुछ जगहों पर कार्यकर्ताओं ने सड़क पर उतरकर विरोध प्रदर्शन किया। बंद के दौरान कुछ इलाकों में यातायात भी प्रभावित हुआ। हजारीबाग में दिखा बंद का व्यापक असर हजारीबाग में भाजपा के झारखंड बंद का अपेक्षाकृत व्यापक असर देखने को मिला। भाजपा कार्यकर्ता सुबह से ही शहर की सड़कों पर नजर आए। जिला अध्यक्ष विवेकानंद सिंह के नेतृत्व में कार्यकर्ताओं ने विभिन्न प्रतिष्ठानों को बंद कराने की अपील की। कार्यकर्ताओं ने JPSC-JSSC अभ्यर्थियों पर हुई पुलिस कार्रवाई का विरोध करते हुए सरकार के खिलाफ नारेबाजी की और बंद को सफल बनाने की अपील की। जमशेदपुर में टायर जलाकर प्रदर्शन जमशेदपुर में बंद का मिलाजुला असर रहा। भाजपा कार्यकर्ताओं ने छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई के विरोध में प्रदर्शन किया। कुछ स्थानों पर टायर जलाकर भी विरोध जताया गया। कार्यकर्ताओं ने कई दुकानों को बंद कराया और सरकार के खिलाफ नारेबाजी की। बंद को देखते हुए पुलिस बल की भी तैनाती की गई थी, ताकि किसी अप्रिय स्थिति से निपटा जा सके। रामगढ़ में सड़क जाम, यातायात प्रभावित रामगढ़ में भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं ने छात्रों के समर्थन में जोरदार प्रदर्शन किया। कार्यकर्ताओं ने सुभाष चौक समेत शहर के कई प्रमुख स्थानों पर सड़क जाम कर विरोध जताया। सड़क जाम के कारण कुछ समय के लिए यातायात व्यवस्था प्रभावित हुई और राहगीरों को परेशानी का सामना करना पड़ा। पुलिस ने मौके पर पहुंचकर यातायात को व्यवस्थित कराने की कोशिश की। गढ़वा में चौक पर जुटे भाजपा कार्यकर्ता गढ़वा में भी बंद का असर देखने को मिला। भाजपा नेता और कार्यकर्ता रंका मोड़ घंटाघर के पास एकत्र हुए और JPSC-JSSC भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं तथा छात्रों पर पुलिस कार्रवाई के खिलाफ प्रदर्शन किया। इस दौरान कार्यकर्ताओं ने सड़क पर नारेबाजी की। मौके पर पुलिस बल भी तैनात रहा। प्रदर्शन के दौरान भाजपा कार्यकर्ताओं और पुलिस के बीच नोकझोंक की स्थिति भी बनी। देवघर में सरकार के खिलाफ नारेबाजी देवघर में भाजपा कार्यकर्ता विभिन्न चौक-चौराहों पर एकजुट हुए। उन्होंने झारखंड सरकार के खिलाफ नारेबाजी करते हुए लोगों से बंद को समर्थन देने की अपील की। भाजपा का कहना है कि विधानसभा घेराव के दौरान छात्रों पर पुलिस कार्रवाई लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन करने के अधिकार के खिलाफ है। पार्टी ने इसी के विरोध में राज्यव्यापी बंद का आह्वान किया था। पाकुड़ में भाजपा कार्यकर्ता गिरफ्तार पाकुड़ में बंद के दौरान प्रदर्शन कर रहे भाजपा कार्यकर्ताओं को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तार कार्यकर्ताओं को नगर थाना में रखा गया। भाजपा जिला उपाध्यक्ष हिसाबी राय ने आरोप लगाया कि कार्यकर्ता शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन कर रहे थे। उन्होंने सरकार पर छात्रों की आवाज दबाने का आरोप लगाया और पुलिस कार्रवाई का विरोध किया। जामताड़ा में बाजार बंद कराने की कोशिश जामताड़ा में भी भाजपा कार्यकर्ता बंद के समर्थन में सड़कों पर उतरे। कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने बाजार में घूमकर दुकानदारों से प्रतिष्ठान बंद रखने की अपील की। इस दौरान सरकार के खिलाफ नारेबाजी भी की गई। जामताड़ा में बंद का असर मिलाजुला रहा और कई इलाकों में सामान्य गतिविधियां जारी रहीं। JPSC-JSSC विवाद को लेकर बढ़ा राजनीतिक टकराव झारखंड बंद के जरिए भाजपा ने JPSC-JSSC भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और छात्रों पर पुलिस कार्रवाई को लेकर सरकार पर दबाव बढ़ाने की कोशिश की है। वहीं, राज्य के अलग-अलग जिलों में बंद के दौरान प्रदर्शन, सड़क जाम और कुछ जगहों पर गिरफ्तारियों के कारण राजनीतिक टकराव और तेज हो गया है। अब नजर इस बात पर है कि बंद के बाद सरकार छात्र संगठनों की मांगों और भर्ती परीक्षाओं से जुड़े विवाद पर क्या कदम उठाती है।