social media debate

Bhumi Pednekar faces social media backlash after objecting to abusive language against PM Modi
भूमि पेडनेकर के बयान पर विवाद: पीएम मोदी के खिलाफ अभद्र भाषा पर जताई आपत्ति, सोशल मीडिया पर यूजर्स ने पूछे तीखे सवाल

नई दिल्ली: बॉलीवुड अभिनेत्री भूमि पेडनेकर इन दिनों अपने एक सोशल मीडिया वीडियो को लेकर चर्चा में हैं। जंतर-मंतर पर NEET-UG 2026 से जुड़े विरोध प्रदर्शनों के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कथित तौर पर इस्तेमाल की गई अभद्र भाषा पर भूमि ने आपत्ति जताई। उन्होंने युवाओं से अपील की कि असहमति और विरोध दर्ज कराते समय भाषा की मर्यादा बनाए रखनी चाहिए। हालांकि, उनके इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर ही उन्हें आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। पीएम मोदी के खिलाफ भाषा पर भूमि ने जताई आपत्ति भूमि पेडनेकर ने इंस्टाग्राम पर एक वीडियो साझा करते हुए विरोध-प्रदर्शनों से सामने आए कुछ वीडियो में इस्तेमाल की गई भाषा पर चिंता जताई। उनका कहना था कि देश के युवाओं को अपनी नाराजगी और असहमति व्यक्त करते समय अपमानजनक या गाली-गलौज वाली भाषा से बचना चाहिए। भूमि ने देश की संस्कृति और सार्वजनिक संवाद में सम्मानजनक भाषा के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि जिस तरह हम अपने परिवार के बड़ों से बात करते हैं, क्या सार्वजनिक जीवन में भी संवाद की एक मर्यादा नहीं होनी चाहिए। अभिनेत्री ने युवाओं से शिक्षा और लैंगिक हिंसा जैसे गंभीर मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने तथा एकता के साथ आगे बढ़ने की अपील की। बयान के बाद सोशल मीडिया पर घिरीं अभिनेत्री भूमि के इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई। कुछ यूजर्स ने उनके इस विचार का समर्थन किया कि राजनीतिक असहमति के बावजूद अपशब्दों से बचना चाहिए, लेकिन कई अन्य लोगों ने सवाल उठाया कि क्या विरोध-प्रदर्शन के दौरान कथित पुलिस कार्रवाई और छात्रों के साथ हुई घटनाओं पर भी समान रूप से आवाज उठाई गई थी। आलोचकों ने आरोप लगाया कि भूमि ने प्रदर्शनकारियों की भाषा पर तो टिप्पणी की, लेकिन प्रदर्शन से जुड़े दूसरे विवादित पहलुओं पर उनकी प्रतिक्रिया दिखाई नहीं दी। कुछ यूजर्स ने उनके बयान को 'चुनिंदा' बताया और कहा कि किसी भी मुद्दे को केवल एक पक्ष से देखने के बजाय पूरे घटनाक्रम पर बात होनी चाहिए। सोशल मीडिया पर कुछ टिप्पणियां बेहद तीखी भी रहीं। कुछ लोगों ने अभिनेत्री पर 'जमीनी हकीकत से दूर' होने का आरोप लगाया, जबकि कुछ यूजर्स ने यह सवाल किया कि क्या सम्मान की अपील करने से पहले सत्ता और प्रशासन की जवाबदेही पर भी सवाल नहीं उठाया जाना चाहिए। विवाद के बीच असली सवाल क्या है? इस पूरे विवाद में दो अलग-अलग मुद्दे सामने आते हैं। पहला, किसी भी लोकतांत्रिक विरोध में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ भाषा की मर्यादा का सवाल। दूसरा, प्रदर्शनकारियों के साथ प्रशासन और पुलिस के व्यवहार को लेकर उठाए जा रहे सवाल। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार की आलोचना और विरोध प्रदर्शन नागरिकों का महत्वपूर्ण अधिकार है। वहीं, किसी व्यक्ति या संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ हिंसक या अपमानजनक भाषा को लेकर सवाल उठाना भी अलग मुद्दा है। दोनों विषयों पर एक साथ चर्चा की जा सकती है। यही वजह है कि भूमि पेडनेकर के बयान ने सोशल मीडिया पर राजनीतिक और सामाजिक बहस को और तेज कर दिया है। जंतर-मंतर प्रदर्शन से जुड़ा विवाद यह विवाद उस समय सामने आया है जब NEET-UG 2026 से जुड़े मुद्दों को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन और राजनीतिक बहस जारी है। प्रदर्शनकारियों की ओर से शिक्षा व्यवस्था में सुधार और परीक्षा प्रक्रिया से जुड़े मुद्दों पर सवाल उठाए गए हैं। प्रदर्शन के दौरान कथित तौर पर प्रधानमंत्री के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा के इस्तेमाल ने भी अलग बहस को जन्म दिया। भूमि पेडनेकर ने इसी पहलू पर प्रतिक्रिया देते हुए युवाओं से संयमित और सम्मानजनक भाषा अपनाने की अपील की। हालांकि, सोशल मीडिया पर उनकी प्रतिक्रिया के बाद सवाल यह भी उठ रहा है कि सार्वजनिक हस्तियों को ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर टिप्पणी करते समय पूरे घटनाक्रम के सभी पक्षों पर बात करनी चाहिए या नहीं। सोशल मीडिया की बहस ने बढ़ाई चर्चा भूमि पेडनेकर के बयान के बाद सामने आई प्रतिक्रियाएं बताती हैं कि NEET-UG 2026 से जुड़ा विवाद केवल शिक्षा व्यवस्था तक सीमित नहीं रह गया है। अब इसमें विरोध प्रदर्शन, राजनीतिक भाषा, पुलिस कार्रवाई, सार्वजनिक संवाद और सेलिब्रिटी की भूमिका जैसे मुद्दे भी शामिल हो गए हैं। फिलहाल इस विवाद का सबसे बड़ा संदेश यही है कि लोकतांत्रिक असहमति में सवाल पूछना जरूरी है, लेकिन भाषा और संवाद की मर्यादा को लेकर बहस भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। साथ ही, किसी भी विवाद को समझने के लिए आरोपों, प्रतिक्रियाओं और उपलब्ध तथ्यों के बीच अंतर करना जरूरी है।  

surbhi अगस्त 3, 2026 0
Singer Abhijeet Bhattacharya's Instagram post sparks online debate over claims about India's education history
अभिजीत भट्टाचार्य के इंस्टा पोस्ट पर छिड़ी बहस, लिखा- '1947 से शुरू हुआ जिहाद', शिक्षा मंत्रियों की सूची की शेयर

Abhijeet Bhattacharya Instagram Post: बॉलीवुड गायक अभिजीत भट्टाचार्य के एक इंस्टाग्राम पोस्ट ने सोशल मीडिया पर नई बहस छेड़ दी है। अभिजीत ने अपने आधिकारिक इंस्टाग्राम अकाउंट पर 1947 से 1977 तक भारत के शिक्षा मंत्रियों की तस्वीरों और उनके कथित कार्यकाल की एक सूची साझा की। इस पोस्ट के साथ उन्होंने कैप्शन में लिखा, "Jih#d began from 1947..." और इसके साथ #VandeMataram, #JaiShreeRam तथा #HarHarMahadev जैसे हैशटैग भी जोड़े। पोस्ट सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर इसे लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। पोस्ट में क्या लिखा गया? अभिजीत भट्टाचार्य द्वारा साझा की गई पोस्ट में दावा किया गया है कि आजादी के बाद भारत की शिक्षा व्यवस्था को एक विशेष सोच के तहत संचालित किया गया। पोस्ट में सवाल उठाया गया कि बाबर, हुमायूं और अकबर को इतिहास में "महान" क्यों बताया गया, जबकि भारतीय सभ्यता, संस्कृति और कई ऐतिहासिक तथ्यों को कथित तौर पर नजरअंदाज किया गया। पोस्ट में लोगों से "जागो, सोचो और सच्चाई को पहचानो" जैसी अपील भी की गई है। पोस्ट में किन शिक्षा मंत्रियों का किया गया जिक्र? पोस्ट में 1947 से 1977 तक के शिक्षा मंत्रियों की एक सूची भी साझा की गई है। इसमें मौलाना अबुल कलाम आजाद, हुमायूं कबीर, एम.सी. छागला (मो. करीम छागला के रूप में उल्लेख), फखरुद्दीन अली अहमद, प्रो. सैयद नूरुल हसन समेत कई नाम शामिल किए गए हैं। पोस्ट में इन नेताओं के कार्यकाल भी दर्शाए गए हैं। हालांकि, पोस्ट में दी गई सूची और कार्यकाल को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं। विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों और सरकारी रिकॉर्ड में शिक्षा मंत्रियों के कार्यकाल इससे अलग बताए गए हैं। कई नाम और तिथियां आधिकारिक दस्तावेजों से मेल नहीं खातीं। इसलिए पोस्ट में किए गए दावों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है। इतिहास और शिक्षा व्यवस्था पर लगाए गए आरोप पोस्ट में यह भी आरोप लगाया गया है कि स्वतंत्रता के बाद इतिहास की पुस्तकों में कुछ शासकों को महिमामंडित किया गया, जबकि भारतीय परंपरा, संस्कृति और कई ऐतिहासिक घटनाओं को पर्याप्त महत्व नहीं मिला। इसमें शिक्षा के राजनीतिकरण, इतिहास को एक विशेष दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने और नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से दूर करने जैसे दावे भी किए गए हैं। हालांकि, ये सभी दावे सोशल मीडिया पोस्ट में व्यक्त विचार हैं। इनकी पुष्टि किसी आधिकारिक सरकारी दस्तावेज या स्वतंत्र ऐतिहासिक अध्ययन से नहीं हुई है। इतिहासकारों और विशेषज्ञों के बीच इन विषयों पर लंबे समय से अलग-अलग मत रहे हैं। सोशल मीडिया पर तेज हुई बहस अभिजीत भट्टाचार्य का यह पोस्ट वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर समर्थन और विरोध दोनों तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ यूजर्स ने उनके विचारों का समर्थन किया, जबकि कई लोगों ने पोस्ट में किए गए दावों की तथ्यात्मकता पर सवाल उठाए। फिलहाल अभिजीत भट्टाचार्य ने इस पोस्ट को लेकर कोई अतिरिक्त स्पष्टीकरण या बयान जारी नहीं किया है।  

kalpana जुलाई 31, 2026 0
Vishal Dadlani, Kunika Sadanand, and Shekhar Suman react to the CJP protest, sparking debate across Bollywood.
CJP प्रदर्शन पर बॉलीवुड में बंटी राय, विशाल ददलानी ने चुप्पी पर उठाए सवाल, कुनिका सदानंद और शेखर सुमन ने भी दी प्रतिक्रिया

नई दिल्ली: जंतर-मंतर पर हुए CJP के प्रदर्शन और प्रदर्शनकारियों पर पुलिस कार्रवाई के बाद बॉलीवुड में भी प्रतिक्रियाओं का दौर तेज हो गया है। गायक विशाल ददलानी, अभिनेत्री कुनिका सदानंद और अभिनेता शेखर सुमन ने इस मुद्दे पर अपनी राय सार्वजनिक की है। वहीं, कई बड़े फिल्मी सितारों की चुप्पी को लेकर भी सोशल मीडिया पर बहस छिड़ी हुई है। विशाल ददलानी ने बॉलीवुड की चुप्पी पर जताई नाराजगी विशाल ददलानी ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर एक वीडियो साझा करते हुए प्रदर्शन के दौरान छात्रों पर हुई कथित पुलिस कार्रवाई पर दुख जताया। उन्होंने कहा कि जो छात्र अपने भविष्य और अधिकारों की बात कर रहे थे, उनके साथ बल प्रयोग किया गया। इसके साथ ही उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री के उन लोगों पर भी सवाल उठाए, जिन्होंने अब तक इस मुद्दे पर सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं दी। विशाल ने कहा कि सामाजिक मुद्दों पर कलाकारों को अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए और केवल चुप रहना समाधान नहीं है। पहले भी उठा चुके हैं आवाज विशाल ददलानी इससे पहले भी छात्रों से जुड़े मुद्दों और विभिन्न सामाजिक विषयों पर अपनी राय खुलकर रखते रहे हैं। उन्होंने एक अन्य पोस्ट में भी शिक्षा व्यवस्था और युवाओं से जुड़े मुद्दों पर चिंता व्यक्त की थी। कुनिका सदानंद ने सरकार से उठाए सवाल अभिनेत्री कुनिका सदानंद, जो हाल के दिनों में छात्रों के समर्थन में जंतर-मंतर भी पहुंची थीं, ने सरकार से इस पूरे मामले पर स्पष्ट रुख अपनाने की मांग की। मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा कि छात्रों की मांगों पर सरकार को गंभीरता से विचार करना चाहिए। उनका कहना था कि यदि इतने लंबे समय से उठ रहे मुद्दों पर चर्चा नहीं होगी, तो लोगों का भरोसा कमजोर होगा। उन्होंने लोकतांत्रिक व्यवस्था में संवाद की आवश्यकता पर भी जोर दिया और कहा कि सरकार को छात्रों की बात सुननी चाहिए। शेखर सुमन ने भी जताई चिंता अभिनेता शेखर सुमन ने भी छात्रों के प्रदर्शन और उस दौरान हुई घटनाओं पर प्रतिक्रिया दी। अपने कार्यक्रम के दौरान उन्होंने युवाओं की आवाज सुने जाने की आवश्यकता पर जोर दिया और कहा कि समाज में संवाद और जवाबदेही लोकतंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है। सोशल मीडिया पर भी छिड़ी बहस इस पूरे घटनाक्रम के बाद सोशल मीडिया पर दो तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। एक ओर कई लोग उन कलाकारों का समर्थन कर रहे हैं जिन्होंने इस मुद्दे पर खुलकर अपनी बात रखी, वहीं दूसरी ओर कुछ लोग मानते हैं कि सार्वजनिक हस्तियों पर किसी भी मुद्दे पर प्रतिक्रिया देने का दबाव नहीं होना चाहिए।  

surbhi जुलाई 21, 2026 0
Main Wapas Aaunga
इम्तियाज अली की फिल्म 'मैं वापस आऊंगा' को लेकर सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस

मुंबई, एजेंसियां।  A. R. Rahman और Imtiaz Ali की नई फिल्म Main Vaapas Aaunga इन दिनों सिनेमाघरों में चर्चा का विषय बनी हुई है। 12 जून को रिलीज हुई इस फिल्म को दर्शकों से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिल रही है, लेकिन सोशल मीडिया पर इसे लेकर विवाद भी खड़ा हो गया है। कुछ यूजर्स ने फिल्म में पाकिस्तान के चित्रण को लेकर सवाल उठाते हुए इसे कथित तौर पर "राष्ट्र विरोधी" बताया है।   इसी विवाद के बीच ऑस्कर विजेता संगीतकार ए.आर. रहमान ने सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक व्यंग्यात्मक पोस्ट को अपनी इंस्टाग्राम स्टोरी पर साझा कर चुटीला अंदाज अपनाया। उन्होंने पोस्ट के साथ हंसने वाली इमोजी लगाकर उन दावों पर अप्रत्यक्ष प्रतिक्रिया दी, जिनमें फिल्म को "एंटी नेशनल" बताया जा रहा था।   वायरल पोस्ट पर रहमान का रिएक्शन जिस पोस्ट पर रहमान ने प्रतिक्रिया दी, उसमें लिखा था कि फिल्म को केवल इसलिए "राष्ट्र विरोधी" कहा जा रहा है क्योंकि इसमें आतंकवादियों या सीक्रेट एजेंटों के बिना पाकिस्तान को दिखाया गया है। रहमान का यह हल्का-फुल्का रिएक्शन सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया और इस पर लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं।   पांचवीं बार साथ आए रहमान और इम्तियाज यह फिल्म ए.आर. रहमान और इम्तियाज अली की सफल साझेदारी का पांचवां प्रोजेक्ट है। इससे पहले दोनों Highway, Rockstar, Tamasha और Amar Singh Chamkila जैसी फिल्मों में साथ काम कर चुके हैं। फिल्म के गीतों के लिए रहमान ने एक बार फिर Irshad Kamil के साथ काम किया है।   फिल्म में Diljit Dosanjh, Naseeruddin Shah, Vedang Raina और Sharvari Wagh मुख्य भूमिकाओं में हैं। 1947 के भारत विभाजन की पृष्ठभूमि पर आधारित इस पीरियड रोमांटिक ड्रामा ने रिलीज के पहले सप्ताह में 10.05 करोड़ रुपये का नेट बॉक्स ऑफिस कलेक्शन दर्ज किया है।

anjali kumari जून 18, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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