नई दिल्ली: पाकिस्तान में लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े एक कार्यक्रम का कथित वीडियो सामने आने के बाद कश्मीर में आतंकवाद को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। मौलवी नसीर मदनी ने कथित तौर पर दावा किया कि लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक हाफिज सईद ने कश्मीर में 10 हजार आतंकियों को भेजा था। हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है। मदनी के इस बयान पर भारतीय सेना के पूर्व अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल डीपी पांडेय ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने आतंकवादियों के खिलाफ जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बलों की कार्रवाई का जिक्र करते हुए मदनी पर तंज कसा और कहा कि आतंकवाद का रास्ता चुनने वालों का अंत सुरक्षा बलों की कार्रवाई में हुआ है। लश्कर से जुड़े कार्यक्रम में मदनी का दावा रिपोर्ट के मुताबिक, 14 अगस्त को पाकिस्तान के बहावलनगर में लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े एक कार्यक्रम में नसीर मदनी मंच पर नजर आया। कथित भाषण के दौरान उसने हाफिज सईद की तारीफ करते हुए दावा किया कि सईद ने कश्मीर में 10 हजार आतंकियों को भेजा था। यह दावा ऐसे समय सामने आया है जब पाकिस्तान से संचालित आतंकी संगठनों और जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के बीच संबंध लंबे समय से भारत की सुरक्षा चिंताओं का प्रमुख मुद्दा रहे हैं। हालांकि, मदनी द्वारा बताए गए 10 हजार के आंकड़े की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। पूर्व सैन्य अधिकारी ने दिया तीखा जवाब मदनी के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए पूर्व सैन्य अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल डीपी पांडेय ने भारतीय सेना, चिनार कोर और जम्मू-कश्मीर पुलिस द्वारा आतंकवाद विरोधी अभियानों का हवाला दिया। उन्होंने अपने बयान में संकेत दिया कि कश्मीर में आतंकवाद फैलाने वाले कई आतंकियों को सुरक्षा बलों की कार्रवाई में मार गिराया गया। इसी संदर्भ में उन्होंने मदनी के बयान पर कटाक्ष करते हुए उसके लिए भी ‘विदाई’ जैसी टिप्पणी की। हार्ट अटैक के बाद फिर चर्चा में मदनी नसीर मदनी इससे पहले जुलाई में पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के जहानियां में एक धार्मिक कार्यक्रम के दौरान अचानक गिरने के बाद चर्चा में आया था। रिपोर्टों के अनुसार, उसे अस्पताल ले जाया गया और बाद में उसकी हालत स्थिर बताई गई थी। अब अगस्त में लश्कर से जुड़े कार्यक्रम में उसकी कथित मौजूदगी और कश्मीर को लेकर दिए गए बयान ने उसे फिर सुर्खियों में ला दिया है। हाफिज सईद का नाम फिर चर्चा में हाफिज सईद लश्कर-ए-तैयबा से जुड़ा प्रमुख चेहरा रहा है और भारत लंबे समय से उसके संगठनात्मक नेटवर्क तथा आतंकवादी गतिविधियों को लेकर पाकिस्तान पर सवाल उठाता रहा है। ऐसे में नसीर मदनी के कथित बयान ने कश्मीर में सीमा पार आतंकवाद के मुद्दे को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
पहलगाम आतंकी हमले की जांच में सुरक्षा एजेंसियों के हाथ एक महत्वपूर्ण सुराग लगा है, जिसने हमले के संभावित अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क की ओर संकेत किया है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) और जम्मू-कश्मीर पुलिस की जांच में पता चला है कि आतंकियों के पास से बरामद दो मोबाइल फोन पाकिस्तान में आयात की गई खेप का हिस्सा थे। हैरानी की बात यह है कि दोनों उपकरण वर्षों तक निष्क्रिय रहे और हमले से ठीक पहले सक्रिय किए गए। 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम स्थित बैसरन घाटी में हुए आतंकी हमले में 26 लोगों की जान गई थी। इसके बाद शुरू हुई जांच के दौरान सुरक्षा बलों ने जुलाई 2025 में दाचीगाम के मुलनार महादेव क्षेत्र में मुठभेड़ में तीन आतंकियों को मार गिराया। मारे गए आतंकियों के पास से दो शाओमी रेडमी सीरीज के मोबाइल फोन बरामद हुए थे। पाकिस्तान से आयातित खेप का हिस्सा था मोबाइल जांच में सामने आया कि बरामद रेडमी 9टी मोबाइल वर्ष 2021 में पाकिस्तान पहुंची एक आयातित खेप का हिस्सा था। तकनीकी विश्लेषण से पता चला कि फोन पाकिस्तान पहुंचने के बाद कभी इस्तेमाल नहीं किया गया और पहली बार हमले की तैयारी के दौरान सक्रिय हुआ। दूसरा फोन, रेडमी नोट 12, भी पाकिस्तान से आयातित था और उसके उपयोग का पैटर्न भी लगभग समान पाया गया। जांच अधिकारियों का मानना है कि दोनों मोबाइल फोन विशेष उद्देश्य के लिए सुरक्षित रखे गए थे और बाद में आतंकियों तक पहुंचाए गए। मोबाइल में मिले नक्शे और तस्वीरें फोन से कोई कॉल रिकॉर्ड, चैट या संदेश बरामद नहीं हुए हैं, लेकिन जांचकर्ताओं को इनमें पहलगाम और उसके आसपास के क्षेत्रों के नक्शे तथा कई तस्वीरें मिली हैं। एक तस्वीर 30 मार्च 2025 की बताई जा रही है, जिससे संकेत मिलता है कि हमलावर घटना से कई सप्ताह पहले इलाके में डेरा डाले हुए थे। तस्वीरों में एक अस्थायी टेंट और अन्य सामान भी दिखाई दे रहे हैं, जिससे सुरक्षा एजेंसियों को हमले की पूर्व तैयारी के संबंध में अहम संकेत मिले हैं। आतंकियों ने अपनाई थी वैकल्पिक संचार प्रणाली प्रारंभिक जांच के अनुसार, आतंकी मोबाइल नेटवर्क या इंटरनेट आधारित संचार पर निर्भर नहीं थे। अधिकारियों का मानना है कि वे लंबी दूरी की रेडियो संचार प्रणाली का इस्तेमाल कर रहे थे, जिससे उनकी गतिविधियां डिजिटल निगरानी से काफी हद तक बची रहीं। जांच को मिली नई दिशा मोबाइल फोन की उत्पत्ति, उनका वर्षों तक निष्क्रिय रहना और फिर हमले से ठीक पहले सक्रिय होना जांच एजेंसियों के लिए महत्वपूर्ण कड़ी बन गया है। एनआईए और जम्मू-कश्मीर पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि ये उपकरण पाकिस्तान से आतंकियों तक कैसे पहुंचे और हमले की साजिश में उनकी क्या भूमिका रही। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि इन डिजिटल सबूतों से हमले के पूरे नेटवर्क, उसके संचालकों और सीमा पार मौजूद संभावित समर्थन तंत्र तक पहुंचने में मदद मिल सकती है। जांच अधिकारियों का मानना है कि दोनों मोबाइल फोन विशेष उद्देश्य के लिए सुरक्षित रखे गए थे और बाद में आतंकियों तक पहुंचाए गए। मोबाइल में मिले नक्शे और तस्वीरें फोन से कोई कॉल रिकॉर्ड, चैट या संदेश बरामद नहीं हुए हैं, लेकिन जांचकर्ताओं को इनमें पहलगाम और उसके आसपास के क्षेत्रों के नक्शे तथा कई तस्वीरें मिली हैं। एक तस्वीर 30 मार्च 2025 की बताई जा रही है, जिससे संकेत मिलता है कि हमलावर घटना से कई सप्ताह पहले इलाके में डेरा डाले हुए थे। तस्वीरों में एक अस्थायी टेंट और अन्य सामान भी दिखाई दे रहे हैं, जिससे सुरक्षा एजेंसियों को हमले की पूर्व तैयारी के संबंध में अहम संकेत मिले हैं। आतंकियों ने अपनाई थी वैकल्पिक संचार प्रणाली प्रारंभिक जांच के अनुसार, आतंकी मोबाइल नेटवर्क या इंटरनेट आधारित संचार पर निर्भर नहीं थे। अधिकारियों का मानना है कि वे लंबी दूरी की रेडियो संचार प्रणाली का इस्तेमाल कर रहे थे, जिससे उनकी गतिविधियां डिजिटल निगरानी से काफी हद तक बची रहीं। जांच को मिली नई दिशा मोबाइल फोन की उत्पत्ति, उनका वर्षों तक निष्क्रिय रहना और फिर हमले से ठीक पहले सक्रिय होना जांच एजेंसियों के लिए महत्वपूर्ण कड़ी बन गया है। एनआईए और जम्मू-कश्मीर पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि ये उपकरण पाकिस्तान से आतंकियों तक कैसे पहुंचे और हमले की साजिश में उनकी क्या भूमिका रही। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि इन डिजिटल सबूतों से हमले के पूरे नेटवर्क, उसके संचालकों और सीमा पार मौजूद संभावित समर्थन तंत्र तक पहुंचने में मदद मिल सकती है।
श्रीनगर, एजेंसियां। भारतीय खुफिया एजेंसियों ने जम्मू-कश्मीर में आतंकी गतिविधियों को लेकर बड़ा अलर्ट जारी किया है। एजेंसियों के अनुसार लंबे समय से कमजोर पड़े आतंकी संगठन अल-बद्र अब एक बार फिर घाटी में सक्रिय होने की कोशिश कर रहा है। इसके लिए वह हिजबुल मुजाहिदीन के साथ मिलकर संयुक्त रणनीति पर काम कर रहा है। सूत्रों के मुताबिक पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI घाटी में “होमग्रोन टेरर मॉडल” के जरिए आतंकवाद को फिर से मजबूत करने की कोशिश कर रही है। एजेंसियों का मानना है कि स्थानीय चेहरों और पुराने नेटवर्क के सहारे आतंकी गतिविधियों को दोबारा सक्रिय करने की योजना बनाई जा रही है। ISI की रणनीति और नए भर्ती अभियान की आशंका खुफिया अधिकारियों के अनुसार, अल-बद्र और हिजबुल मुजाहिदीन को घरेलू आतंकी संगठनों के रूप में पेश करना ISI की रणनीति का हिस्सा हो सकता है। इन संगठनों में कई ऐसे लोग शामिल बताए जा रहे हैं, जो पहले पढ़ाई के बहाने पाकिस्तान गए थे और बाद में वहां प्रशिक्षण लेकर घाटी में आतंकी गतिविधियों से जुड़े। सूत्रों ने बताया कि अल-बद्र के शीर्ष कमांडर हमजा बुरहान की हालिया मौत संगठन के लिए बड़ा झटका थी, लेकिन इसके बावजूद संगठन फिर से नेटवर्क खड़ा करने की कोशिश कर रहा है। एजेंसियों के मुताबिक दोनों संगठन जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा के असंतुष्ट आतंकियों को भी अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। युवाओं को निशाना बनाने की साजिश खुफिया एजेंसियों के अनुसार, हमजा बुरहान युवाओं की भर्ती और प्रचार अभियान का जिम्मा संभाल रहा था। पोस्टर और सोशल मीडिया के जरिए युवाओं को कट्टरपंथ की ओर आकर्षित करने की योजना बनाई जा रही थी। हाल ही में हमजा बुरहान के अंतिम संस्कार में अल-बद्र और हिजबुल के कई नेताओं की मौजूदगी ने दोनों संगठनों की बढ़ती नजदीकियों को उजागर किया। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि घाटी में आतंकवाद को दोबारा सक्रिय करने की यह कोशिश आने वाले समय में बड़ी चुनौती बन सकती है।
भारत के खिलाफ बड़े आतंकी हमलों में शामिल एक और आतंकवादी के मारे जाने की खबर सामने आई है। पुलवामा आतंकी हमले की साजिश रचने वाले आतंकवादी Burhan Hamza की पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में गोली मारकर हत्या कर दी गई। सूत्रों के मुताबिक, बुरहान हमजा को मुजफ्फराबाद में अज्ञात हमलावरों ने निशाना बनाया। वह पाकिस्तान आधारित आतंकी नेटवर्क से जुड़ा हुआ था और लंबे समय से भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर था। पुलवामा हमले की साजिश में थी अहम भूमिका बुरहान हमजा का नाम 14 फरवरी 2019 को हुए Pulwama attack की साजिश से जुड़ा था। इस आतंकी हमले में सीआरपीएफ (CRPF) के 40 जवान शहीद हो गए थे। यह हमला जम्मू-कश्मीर में भारतीय सुरक्षा बलों पर हुए सबसे घातक हमलों में से एक माना जाता है। जांच एजेंसियों के अनुसार, बुरहान पाकिस्तान में बैठकर आतंकियों की भर्ती, प्रशिक्षण और हमले की योजना तैयार करने में सक्रिय भूमिका निभा रहा था। 2022 में भारत सरकार ने घोषित किया था आतंकवादी केंद्र की Narendra Modi सरकार ने साल 2022 में बुरहान हमजा को आधिकारिक रूप से आतंकवादी घोषित किया था। गृह मंत्रालय की ओर से जारी अधिसूचना में उसका असली नाम अरजुमंद गुलजार डार बताया गया था। अधिसूचना के मुताबिक, वह पुलवामा जिले के खरबतपोरा, रत्नीपोरा का निवासी था और आतंकी संगठन Al-Badr से जुड़ा हुआ था। अल-बदर को UAPA के तहत प्रतिबंधित आतंकी संगठन घोषित किया गया है। पढ़ाई के बहाने गया पाकिस्तान, बना आतंकी कमांडर जानकारी के अनुसार, बुरहान हमजा साल 2017 में उच्च शिक्षा हासिल करने के बहाने पाकिस्तान गया था। वहां पहुंचने के बाद वह अल-बदर आतंकी संगठन में शामिल हो गया और धीरे-धीरे संगठन का सक्रिय कमांडर बन गया। सुरक्षा एजेंसियों का मानना था कि वह पाकिस्तान में रहकर भारत विरोधी आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने की रणनीति तैयार करता था। कैसे हुआ था पुलवामा हमला? 14 फरवरी 2019 को जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग (NH-44) पर सीआरपीएफ जवानों का बड़ा काफिला गुजर रहा था। इस काफिले में 78 बसें और कई अन्य वाहन शामिल थे। दोपहर के समय जब काफिला पुलवामा पहुंचा, तभी एक आत्मघाती हमलावर ने विस्फोटकों से भरी कार को सीआरपीएफ की बस से टकरा दिया। टक्कर के तुरंत बाद जोरदार विस्फोट हुआ, जिसमें बस के परखच्चे उड़ गए। इस भयावह हमले में 40 जवान मौके पर ही शहीद हो गए थे। हमले के बाद पूरे देश में आक्रोश फैल गया था। भारत ने बालाकोट एयरस्ट्राइक से दिया था जवाब पुलवामा हमले के जवाब में भारत ने पाकिस्तान के बालाकोट में एयरस्ट्राइक की थी। भारतीय वायुसेना ने आतंकवादी ठिकानों को निशाना बनाते हुए बड़ी कार्रवाई की थी, जिसे भारत की आतंकवाद के खिलाफ सख्त नीति के तौर पर देखा गया।
Pakistan के अशांत Balochistan प्रांत में सुरक्षा बलों ने बड़ा आतंकवाद विरोधी अभियान चलाते हुए 35 आतंकवादियों को मार गिराने का दावा किया है। इसके साथ ही तीन वरिष्ठ कमांडरों को भी गिरफ्तार किया गया है। बलूचिस्तान सरकार के प्रवक्ता Shahid Rind ने रविवार रात क्वेटा में मीडिया को जानकारी देते हुए बताया कि यह ऑपरेशन मंगला जरघून क्षेत्र में 13 मई से चलाया जा रहा था। उन्होंने कहा कि पिछले चार दिनों में सुरक्षा बलों ने कई ठिकानों पर कार्रवाई करते हुए आतंकियों के बेस कैंप भी नष्ट कर दिए। TTP और प्रॉक्सी समूहों के खिलाफ कार्रवाई प्रवक्ता के मुताबिक यह अभियान प्रतिबंधित संगठन Tehrik-i-Taliban Pakistan (TTP) और बलूचिस्तान में सक्रिय उसके प्रॉक्सी समूहों के खिलाफ चलाया गया। उन्होंने बताया कि गिरफ्तार किए गए तीनों कमांडर “हाई-प्रोफाइल” और संगठन के महत्वपूर्ण सदस्य हैं। रिंद ने कहा कि यह कार्रवाई पहले गिरफ्तार किए गए आतंकवादियों से मिली खुफिया जानकारी के आधार पर की गई। कई आतंकी ठिकाने तबाह सुरक्षा बलों ने मंगला जरघून इलाके में आतंकवादियों के कई ठिकानों और बेस कैंपों को भी नष्ट कर दिया। प्रवक्ता ने बताया कि प्रांत के अन्य हिस्सों में भी अतिरिक्त अभियान जारी हैं। इन अभियानों का मकसद आतंकवादी नेटवर्क के संचालकों, वित्तीय समर्थकों और उनके सहयोगियों तक पहुंचना है। पाकिस्तानी सेना की ओर से नहीं आया आधिकारिक बयान हालांकि, Pakistan Army ने अब तक इस ताजा अभियान पर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है। इससे पहले 12 मई को बलूचिस्तान के बरखान जिले में एक अन्य सैन्य अभियान के दौरान एक मेजर समेत पांच पाकिस्तानी सैनिक मारे गए थे। पाकिस्तानी सेना की मीडिया शाखा Inter-Services Public Relations (ISPR) के अनुसार, उस कार्रवाई में कम से कम सात आतंकवादी भी मारे गए थे। बलूचिस्तान में लगातार बढ़ रही हिंसा बलूचिस्तान लंबे समय से अलगाववादी गतिविधियों और आतंकवादी हमलों से प्रभावित रहा है। पाकिस्तान सरकार और सुरक्षा एजेंसियां लगातार इस क्षेत्र में आतंकवाद विरोधी अभियान चला रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि हाल के महीनों में बढ़ती हिंसा और सुरक्षा चुनौतियों के कारण पाकिस्तान ने बलूचिस्तान में सैन्य और खुफिया अभियानों को और तेज कर दिया है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।