चेन्नई: तमिलनाडु की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कड़गम (TVK) को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का समर्थन मिलने के संकेत हैं, जिससे राज्य में सरकार गठन का रास्ता लगभग साफ होता नजर आ रहा है। सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस बुधवार को TVK के समर्थन में औपचारिक चिट्ठी जारी कर सकती है। इसके बाद कांग्रेस के विधायक पनैयूर में विजय से मुलाकात करेंगे, जहां फिलहाल TVK की राजनीतिक गतिविधियां चल रही हैं। इस मुलाकात को सरकार गठन की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है। 234 सीटों वाली तमिलनाडु विधानसभा में TVK ने 108 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरकर सभी को चौंका दिया है। इस चुनाव में TVK ने द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) को हराया और अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (AIADMK) को तीसरे स्थान पर धकेल दिया। करीब 60 वर्षों में पहली बार राज्य की पारंपरिक द्रविड़ राजनीति का दबदबा इस तरह कमजोर होता नजर आया है। कांग्रेस और TVK के बीच संभावित डील सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस ने 2026 विधानसभा चुनाव में 5 सीटें जीती हैं और अब वह समर्थन के बदले सरकार में हिस्सेदारी चाहती है। बताया जा रहा है कि कांग्रेस दो कैबिनेट मंत्री पद और कुछ सरकारी बोर्डों के चेयरमैन पद की मांग कर सकती है। इस मुद्दे पर दोनों दलों के बीच बातचीत जारी है। 7 मई को शपथ ले सकते हैं विजय खबरों के मुताबिक, विजय 7 मई को मुख्यमंत्री पद की शपथ ले सकते हैं। उनके साथ करीब 9 मंत्री भी शपथ ले सकते हैं। हालांकि TVK साधारण बहुमत से करीब 10 सीट पीछे है, ऐसे में सहयोगी दलों का समर्थन जरूरी है। अन्य दलों से भी बातचीत जारी कांग्रेस के अलावा TVK अब वाम दलों और छोटे क्षेत्रीय दलों से भी संपर्क में है। सूत्रों के अनुसार, पार्टी विदुथलाई चिरुथिगल काची (VCK), कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी), कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग जैसे दलों से बातचीत की तैयारी कर रही है। जल्द ही इन दलों को औपचारिक प्रस्ताव भेजा जा सकता है। राज्य में तेजी से बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच अब सबकी नजर इस बात पर है कि क्या विजय बहुमत का आंकड़ा हासिल कर सरकार बना पाते हैं।
तमिलनाडु की राजनीति में बड़ा बदलाव दिख रहा है। 2026 विधानसभा चुनाव के रुझानों में Tamilaga Vettri Kazhagam (टीवीके) ने पहली बार चुनाव लड़कर ही पारंपरिक दिग्गजों Dravida Munnetra Kazhagam (डीएमके) और All India Anna Dravida Munnetra Kazhagam (एआईएडीएमके) को कड़ी टक्कर दी है। क्या हुआ चुनाव में? Vijay की पार्टी टीवीके करीब 110 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है डीएमके गठबंधन लगभग 57 सीटों पर एआईएडीएमके गठबंधन करीब 66 सीटों पर आगे सरकार बनाने के लिए 117 सीटों का आंकड़ा जरूरी है, यानी टीवीके बहुमत के काफी करीब है। क्यों खास है यह परिणाम? टीवीके का यह पहला चुनाव है पहली बार में ही उसने 20+ साल से चली आ रही डीएमके–एआईएडीएमके की राजनीति को चुनौती दी तमिलनाडु में लंबे समय से सत्ता इन्हीं दो पार्टियों के बीच घूमती रही है क्या सरकार बना पाएगी टीवीके? पार्टी का दावा है कि वह अपने दम पर सरकार बनाएगी लेकिन जरूरत पड़ने पर छोटी पार्टियों का समर्थन मिल सकता है राजनीति में क्या बदल रहा है? यह नतीजे संकेत देते हैं कि: जनता नई राजनीति और नए चेहरे चाहती है परिवारवाद और पारंपरिक दलों के खिलाफ नाराजगी है स्टार पावर + एंटी-इंकम्बेंसी का असर दिखा
चेन्नई, 4 मई: तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों के साथ यह बड़ा सवाल सामने है कि क्या राज्य में एक बार फिर द्रविड़ पहचान वाली पार्टियों का वर्चस्व कायम रहेगा या इस बार ‘राष्ट्रीय पहचान’ की राजनीति अपनी जगह बना पाएगी। दशकों से DMK और AIADMK के इर्द-गिर्द घूमने वाली तमिलनाडु की राजनीति इस बार नए मोड़ पर खड़ी दिख रही है। 1967 से द्रविड़ दलों का दबदबा तमिलनाडु में 1967 के बाद से द्रविड़ विचारधारा से निकली पार्टियों का ही शासन रहा है। DMK और AIADMK के बीच सत्ता का परिवर्तन होता रहा है, जिसे राज्य की “बायपोलर पॉलिटिक्स” कहा जाता है। 234 सीटों वाले विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 118 है। फिलहाल M. K. Stalin के नेतृत्व में DMK की सरकार है, जिसके पास मजबूत ओबीसी वोट बैंक और द्रविड़ पहचान का समर्थन है। AIADMK की चुनौती और कमजोर नेतृत्व AIADMK, जो कभी J. Jayalalithaa के नेतृत्व में मजबूत थी, अब नेतृत्व संकट से जूझती नजर आती है। भाजपा के साथ गठबंधन में होने के बावजूद पार्टी का संगठन पहले जैसा प्रभावशाली नहीं रहा। BJP का ‘नेशनल नैरेटिव’ इस बार Bharatiya Janata Party (BJP) ने तमिलनाडु में अपनी जमीन मजबूत करने के लिए “द्रविड़ बनाम राष्ट्रीय पहचान” का नैरेटिव पेश किया है। पार्टी हिंदुत्व और विकास मॉडल को आगे रख रही है प्रधानमंत्री Narendra Modi और गृहमंत्री Amit Shah ने कई रैलियां कीं लक्ष्य: राज्य में वोट शेयर को 10% से बढ़ाकर 15% तक ले जाना हालांकि, तमिलनाडु में BJP की स्वीकार्यता अभी सीमित रही है, लेकिन इस बार पार्टी DMK के खिलाफ सीधी चुनौती देने की कोशिश में दिख रही है। ‘विजय फैक्टर’ से बदला समीकरण इस चुनाव का सबसे बड़ा ट्विस्ट है अभिनेता से नेता बने Vijay की एंट्री। उनकी पार्टी Tamilaga Vettri Kazhagam (TVK) ने पहली बार चुनाव लड़ते हुए ही राजनीतिक समीकरण बदल दिए हैं। विजय ने आम लोगों के मुद्दों को उठाया युवा और शहरी वोटर्स में मजबूत पकड़ बड़ा फैन बेस, जो वोट में तब्दील होता दिख रहा है राजनीतिक इतिहास में M. G. Ramachandran और J. Jayalalithaa जैसे उदाहरण रहे हैं, जिन्होंने फिल्मी दुनिया से राजनीति में आकर सफलता हासिल की। ऐसे में विजय को भी संभावित ‘गेमचेंजर’ माना जा रहा है। क्या टूटेगा द्रविड़ वर्चस्व? एग्जिट पोल और शुरुआती रुझान संकेत दे रहे हैं कि इस बार मुकाबला पारंपरिक नहीं रहा। DMK अपनी पकड़ बनाए रखने की कोशिश में AIADMK अस्तित्व की लड़ाई में BJP नैरेटिव बदलने की कोशिश में TVK नए विकल्प के रूप में उभर रही
गुवाहाटी/तिरुवनंतपुरम/पुडुचेरी, एजेंसियां। असम, तमिलनाडु, केरलम और पुडुचेरी विधानसभा चुनाव के नतीजे आज आ जाएंगे। वोटों की गिनती जारी है। ताजा रुझानों के मुताबिक केरलम में LDF को 53 सीटों पर बढ़त मिली हुई है। लेकिन UDF बाजी पलटते हुए दिखाई दे रहा है। कांग्रेस के समर्थन वाले UDF को 83 सीटों पर बढ़त मिल गई है। असम व पुडूचेरी का हाल असम में बीजेपी को 69 सीटों पर और पुडुचेरी में बीजेपी को 22 सीटों पर बढ़त मिली हुई है। तमिलनाडु में डीएमके 46 सीटों पर आगे चल रही है। एक्टर विजय का जलवा इधर, एक्टर विजय की पार्टी TVK ने कई सीटों पर DMK को पीछे छोड़ दिया है। चुनाव आयोग के मुताबिक TVK 2 सीट पर आगे चल रही है। AIDMK तीन और DMK एक सीट पर आगे है। असम में बीजेपी आगे नतीजों से पहले आए एग्जिट पोल्स में असम में फिर हिमंता सरकार बनने का अनुमान है। तमिलनाडु में DMK की वापसी के आसार हैं, तो केरलम में कांग्रेस की अगुआई वाले UDF को बढ़त है। पुडुचेरी में NDA गठबंधन की वापसी दिखाई दे रही है।
50 साल पुरानी राजनीति में बड़ा बदलाव तमिलनाडु की राजनीति में इस बार ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिल रहा है। दशकों से चली आ रही दो दलों की सीधी टक्कर अब त्रिकोणीय मुकाबले में बदल गई है। M. K. Stalin की Dravida Munnetra Kazhagam और Edappadi K. Palaniswami की All India Anna Dravida Munnetra Kazhagam के बीच अब अभिनेता से नेता बने Vijay की एंट्री ने समीकरण पूरी तरह बदल दिए हैं। विजय की पार्टी TVK बनी ‘गेम चेंजर’ Vijay की पार्टी Tamilaga Vettri Kazhagam ने पहली बार चुनावी मैदान में उतरते ही बड़ा प्रभाव डाला है। युवाओं और शहरी वोटर्स के बीच पार्टी को तेजी से समर्थन मिल रहा है। अनुमान है कि TVK 15-20% तक वोट शेयर हासिल कर सकती है, जो किसी नई पार्टी के लिए बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। युवा और महिला वोटर्स पर खास फोकस TVK ने अपने चुनावी अभियान में युवाओं और महिलाओं को केंद्र में रखा है। पार्टी ने रोजगार, इंटर्नशिप और वित्तीय सहायता जैसे वादे किए हैं। साथ ही महिलाओं के लिए हर महीने ₹2500 की सहायता, मुफ्त गैस सिलेंडर और शादी से जुड़े लाभ देने का ऐलान किया है। DMK और AIADMK के सामने नई चुनौती Dravida Munnetra Kazhagam अपनी सरकार के काम और कल्याण योजनाओं के दम पर मैदान में है, जबकि All India Anna Dravida Munnetra Kazhagam भ्रष्टाचार और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों को उठा रही है। लेकिन TVK की एंट्री ने दोनों दलों के वोट बैंक में सेंध लगा दी है, जिससे मुकाबला और ज्यादा रोमांचक हो गया है। कई सीटों पर ‘किंगमेकर’ बन सकती है TVK विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही Tamilaga Vettri Kazhagam सीधे तौर पर सरकार न बना पाए, लेकिन कई सीटों पर उसका प्रदर्शन नतीजों को प्रभावित कर सकता है। दक्षिणी जिलों और चेन्नई जैसे शहरी इलाकों में इसका असर साफ दिखाई दे रहा है। क्या खत्म होगी द्विदलीय राजनीति? कुछ सर्वे बताते हैं कि अभी भी बड़ी संख्या में मतदाता इसे DMK बनाम AIADMK की लड़ाई मानते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत में यह चुनाव पूरी तरह बदल चुका है। तमिलनाडु की राजनीति अब एक नए दौर में प्रवेश करती दिख रही है, जहां तीसरी ताकत निर्णायक भूमिका निभा सकती है।
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव से पहले राज्य में बड़ी चुनावी कार्रवाई सामने आई है। चुनाव आयोग की निगरानी में अब तक ₹1,200 करोड़ से अधिक की नकदी, सोना-चांदी, फ्रीबीज, शराब और ड्रग्स जब्त किए गए हैं। जब्ती का बड़ा आंकड़ा आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार: ₹169.85 करोड़ कैश ₹650.87 करोड़ के सोना-चांदी इसके अलावा भारी मात्रा में फ्रीबीज, शराब और नशीले पदार्थ यह कार्रवाई चुनाव में पैसे और प्रलोभनों के इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए की जा रही है। पीएम मोदी पर आचार संहिता उल्लंघन का आरोप इसी बीच नरेंद्र मोदी के 18 अप्रैल के संबोधन को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। 700 से अधिक नागरिकों–जिनमें पूर्व ब्यूरोक्रेट्स, एक्टिविस्ट और पत्रकार शामिल हैं–ने चुनाव आयोग को पत्र लिखकर इसे आचार संहिता (MCC) का उल्लंघन बताया है। शिकायत में कहा गया है कि यह संबोधन दूरदर्शन, संसद टीवी और ऑल इंडिया रेडियो जैसे सरकारी प्लेटफॉर्म पर प्रसारित हुआ, जो चुनाव के दौरान पक्षपातपूर्ण प्रचार जैसा प्रतीत होता है। विपक्ष के हमले तेज ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि पीएम मोदी चुनाव प्रचार में सरकारी संसाधनों–रेल और विमान–का दुरुपयोग कर रहे हैं। राहुल गांधी ने तमिलनाडु में कहा कि भाजपा “रिमोट कंट्रोल” वाली सरकार बनाना चाहती है, जैसा उन्होंने बिहार का उदाहरण देकर आरोप लगाया। मद्रास हाई कोर्ट का नोटिस इस बीच मद्रास हाई कोर्ट ने TVK प्रमुख विजय के खिलाफ याचिका पर चुनाव आयोग और आयकर विभाग को नोटिस जारी किया है। याचिका में आरोप है कि अलग-अलग हलफनामों में उनकी संपत्ति के आंकड़ों में करीब ₹100 करोड़ का अंतर है। चुनावी माहौल और सख्त तमिलनाडु में चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, चुनाव आयोग की सख्ती और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप दोनों तेज होते जा रहे हैं।
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 से पहले आए ताज़ा ओपिनियन पोल्स ने सियासी तस्वीर को बेहद दिलचस्प और अनिश्चित बना दिया है। राज्य में 23 अप्रैल को मतदान और 4 मई को मतगणना होनी है, लेकिन उससे पहले ही सर्वे रिपोर्ट्स ने राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है। मुकाबला मुख्य रूप से DMK और AIADMK के बीच है, जबकि अभिनेता Vijay की पार्टी TVK ने समीकरणों को और जटिल बना दिया है। ओपिनियन पोल्स: तस्वीर साफ नहीं, मुकाबला बेहद करीबी तीन प्रमुख सर्वे-VoteVibe, IANS-Matrize और Agni News अलग-अलग तस्वीर पेश कर रहे हैं: VoteVibe सर्वे के अनुसार DMK गठबंधन को 113–123 सीटें मिल सकती हैं, जबकि AIADMK गठबंधन 106–116 सीटों के बीच रह सकता है। IANS-Matrize सर्वे AIADMK को 114–127 सीटों के साथ बढ़त में दिखाता है, जबकि DMK 104–114 सीटों पर सिमट सकती है। Agni सर्वे सबसे अलग तस्वीर दिखाता है, जिसमें DMK को 180 सीटों की बड़ी जीत का अनुमान है, जबकि AIADMK 54 सीटों तक सीमित रह सकती है। इन विरोधाभासी आंकड़ों से साफ है कि चुनाव बेहद करीबी और अनिश्चित होने वाला है, जहां मामूली वोट शेयर का अंतर भी नतीजों को पूरी तरह बदल सकता है। वोटर मूड: बटी हुई जनता सर्वे बताते हैं कि मतदाता पूरी तरह विभाजित हैं: करीब 40% लोग सरकार के काम से संतुष्ट हैं लगभग 39% मतदाता असंतोष जाहिर कर रहे हैं यानी राज्य में न तो स्पष्ट सरकार विरोधी लहर है और न ही पूरी तरह समर्थन-यही वजह है कि मुकाबला इतना टाइट बना हुआ है। किस वर्ग का झुकाव किस ओर? महिलाएं और अल्पसंख्यक वोटर DMK के साथ दिख रहे हैं पुरुष, OBC और सवर्ण वोटर AIADMK की ओर झुकाव दिखा रहे हैं युवा मतदाता बदलाव की ओर देख रहे हैं यह सामाजिक विभाजन चुनाव को और जटिल बना रहा है। विजय की TVK: गेम चेंजर या वोट कटवा? Vijay की पार्टी TVK पहली बार चुनावी मैदान में है। सर्वे के मुताबिक TVK को 2–8 सीटें मिल सकती हैं युवाओं में इसकी पकड़ जरूर दिख रही है हालांकि, अभी तक TVK को निर्णायक “गेम चेंजर” के बजाय “वोट कटवा” के रूप में देखा जा रहा है, जो किसी एक बड़े दल का खेल बिगाड़ सकती है। CM फेस: स्टालिन को मामूली बढ़त मुख्यमंत्री M. K. Stalin को AIADMK नेता Edappadi K. Palaniswami पर हल्की बढ़त मिलती दिख रही है, लेकिन अंतर इतना कम है कि इसे निर्णायक नहीं कहा जा सकता। निष्कर्ष: हाई-वोल्टेज और अनप्रेडिक्टेबल चुनाव कुल मिलाकर, तमिलनाडु चुनाव 2026 एक बेहद रोमांचक और अनिश्चित मुकाबले की ओर बढ़ रहा है। DMK को हल्की बढ़त जरूर दिख रही है, लेकिन AIADMK पूरी ताकत से चुनौती दे रही है। अंतिम परिणाम इस बात पर निर्भर करेगा कि आखिरी समय में मतदाता किस ओर झुकते हैं और मतदान प्रतिशत कैसा रहता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।