MGM Medical College Jamshedpur: अगर आप झारखंड के किसी सरकारी मेडिकल कॉलेज से MBBS की पढ़ाई करने का सपना देख रहे हैं, तो जमशेदपुर स्थित महात्मा गांधी मेमोरियल मेडिकल कॉलेज (MGM Medical College) आपके लिए एक महत्वपूर्ण विकल्प हो सकता है। मेडिकल की पढ़ाई के लिए कॉलेज चुनते समय छात्रों और अभिभावकों के मन में फीस, सीटों की संख्या, कट-ऑफ, कोर्स और एडमिशन प्रक्रिया को लेकर कई सवाल होते हैं। ऐसे में आइए जानते हैं MGM मेडिकल कॉलेज जमशेदपुर में MBBS और PG कोर्स से जुड़ी जरूरी जानकारी। MGM मेडिकल कॉलेज में कौन-कौन से कोर्स उपलब्ध हैं? महात्मा गांधी मेमोरियल मेडिकल कॉलेज, जमशेदपुर में UG स्तर पर MBBS और PG स्तर पर मेडिकल पाठ्यक्रम संचालित किए जाते हैं। MBBS में दाखिले के लिए छात्रों को नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट (NEET-UG) में शामिल होना होता है। NEET में प्राप्त स्कोर और रैंक के आधार पर निर्धारित काउंसलिंग प्रक्रिया के जरिए सीट आवंटित की जाती है। इसलिए मेडिकल कॉलेज में दाखिले की तैयारी कर रहे छात्रों के लिए NEET में बेहतर प्रदर्शन करना बेहद महत्वपूर्ण है। MBBS और PG के लिए कितनी सीटें हैं? कॉलेज की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार MGM मेडिकल कॉलेज में UG और PG स्तर पर सीटों की संख्या इस प्रकार बताई गई है: MBBS (UG): 150 सीटें PG: 51 सीटें MBBS की 150 सीटों के कारण यह कॉलेज झारखंड में मेडिकल शिक्षा की तैयारी करने वाले छात्रों के लिए एक प्रमुख विकल्प माना जाता है। किस यूनिवर्सिटी से संबद्ध है MGM मेडिकल कॉलेज? MGM मेडिकल कॉलेज, जमशेदपुर कोल्हान यूनिवर्सिटी, चाईबासा से संबद्ध है। कॉलेज की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक यह जमशेदपुर का पहला सरकारी मेडिकल कॉलेज है। मेडिकल कॉलेज में दाखिले से पहले छात्रों को कॉलेज की मान्यता, संबद्धता और उस वर्ष की सीटों की स्थिति की आधिकारिक जानकारी जरूर जांच लेनी चाहिए। MGM मेडिकल कॉलेज की फीस कितनी है? MGM मेडिकल कॉलेज की सबसे बड़ी खासियतों में से एक इसकी अपेक्षाकृत कम फीस है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार MBBS छात्रों के लिए ट्यूशन फीस करीब 9,130 रुपये प्रति वर्ष बताई गई है। सरकारी मेडिकल कॉलेज होने के कारण इसकी ट्यूशन फीस कई निजी मेडिकल कॉलेजों की तुलना में काफी कम है। हालांकि, छात्रों को हॉस्टल, परीक्षा, सिक्योरिटी, यूनिवर्सिटी और अन्य शुल्क के बारे में दाखिले के समय जारी आधिकारिक शुल्क विवरण जरूर देखना चाहिए। MGM मेडिकल कॉलेज का कट-ऑफ कितना रहा? MGM मेडिकल कॉलेज में MBBS में दाखिले के लिए कट-ऑफ हर साल NEET के परिणाम, कैटेगरी, सीटों की उपलब्धता और काउंसलिंग प्रक्रिया के आधार पर बदल सकता है। उपलब्ध 2025 के आंकड़ों के अनुसार कट-ऑफ स्कोर इस प्रकार बताया गया है: SC कैटेगरी: 488 OBC कैटेगरी: 559 General कैटेगरी: 564 ध्यान रखें कि ये पिछले वर्ष के आंकड़े हैं। 2026 में कट-ऑफ अलग हो सकता है। इसलिए एडमिशन लेने वाले छात्रों को केवल पिछले साल के कट-ऑफ पर निर्भर नहीं रहना चाहिए और अपनी NEET रैंक, कैटेगरी तथा संबंधित काउंसलिंग के आधिकारिक डेटा के आधार पर कॉलेज की संभावना का आकलन करना चाहिए। एडमिशन के लिए क्या करना होगा? MGM मेडिकल कॉलेज में MBBS में दाखिले के लिए छात्रों को सबसे पहले NEET-UG परीक्षा में शामिल होना होगा। परीक्षा में क्वालिफाई करने के बाद निर्धारित मेडिकल काउंसलिंग प्रक्रिया में रजिस्ट्रेशन करना होता है। काउंसलिंग के दौरान NEET रैंक, कैटेगरी, उपलब्ध सीट और उम्मीदवार की पसंद के आधार पर कॉलेज का आवंटन किया जाता है। सीट मिलने के बाद छात्रों को निर्धारित समयसीमा के भीतर डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन और फीस जमा करने की प्रक्रिया पूरी करनी होती है। एडमिशन से पहले इन बातों का रखें ध्यान MGM मेडिकल कॉलेज में दाखिले की तैयारी कर रहे छात्रों को कॉलेज की सीट, फीस और कट-ऑफ के साथ-साथ 2026-27 सत्र के लिए जारी आधिकारिक नोटिफिकेशन भी जरूर देखना चाहिए। सीटों, फीस, काउंसलिंग नियमों या कट-ऑफ में बदलाव संभव है। मेडिकल कॉलेज में दाखिले का फैसला केवल फीस या पिछले वर्ष के कट-ऑफ के आधार पर न लें। कॉलेज की मान्यता, पाठ्यक्रम, अस्पताल की सुविधाएं, क्लीनिकल एक्सपोजर, हॉस्टल और काउंसलिंग नियमों की भी जानकारी हासिल करना जरूरी है।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल की भाजपा सरकार ने अपने पहले बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र को बड़ी प्राथमिकता देते हुए आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (AB-PMJAY) के लिए 3,100 करोड़ रुपये के आवंटन की घोषणा की है। वित्त मंत्री स्वपन दासगुप्ता ने विधानसभा में बजट पेश करते हुए कहा कि इस योजना के तहत राज्य के करीब 7 करोड़ लोगों को मुफ्त स्वास्थ्य बीमा का लाभ मिलेगा। वित्त मंत्री ने बताया कि आयुष्मान भारत योजना के तहत प्रत्येक पात्र परिवार को प्रति वर्ष 5 लाख रुपये तक का मुफ्त स्वास्थ्य बीमा कवर प्रदान किया जाएगा। उन्होंने कहा कि आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को बेहतर और सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना सरकार की प्राथमिकता है। योजना से बाहर रहने वाले गरीबों को भी मिलेगी सहायता सरकार ने उन गरीब परिवारों के लिए भी विशेष व्यवस्था की है, जो किसी कारणवश आयुष्मान भारत योजना के दायरे में नहीं आ पाएंगे। वित्त मंत्री ने घोषणा की कि ऐसे जरूरतमंद लोगों को मुख्यमंत्री राहत कोष के माध्यम से वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जाएगी, ताकि किसी भी व्यक्ति को इलाज के लिए आर्थिक कठिनाइयों का सामना न करना पड़े। उत्तर बंगाल में बनेगा AIIMS, कैंसर अस्पताल की भी घोषणा बजट में स्वास्थ्य अवसंरचना के विस्तार पर विशेष जोर दिया गया है। वित्त मंत्री ने घोषणा की कि उत्तर बंगाल में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) की स्थापना की जाएगी। इसके अलावा क्षेत्र में एक विशेष कैंसर अस्पताल का भी निर्माण होगा। सरकार ने सुंदरबन, पुरुलिया, दार्जिलिंग और बीरभूम जैसे क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत करने का भी ऐलान किया है। सुंदरबन और पुरुलिया में सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल बनाए जाएंगे, जबकि सिउरी सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल को उन्नत कर मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में परिवर्तित किया जाएगा। अलीपुरदुआर और पश्चिम बर्धमान में खुलेंगे नए मेडिकल कॉलेज राज्य सरकार ने अलीपुरदुआर और पश्चिम बर्धमान में नए मेडिकल कॉलेज स्थापित करने की भी घोषणा की है। वहीं, दीघा में ट्रॉमा केयर सेंटर खोला जाएगा, जिससे दुर्घटनाओं और आपात स्थितियों में लोगों को बेहतर चिकित्सा सुविधाएं मिल सकें। राज्य के बाहर इलाज कराने वालों को भी मिलेगी मदद वित्त मंत्री ने कहा कि हर वर्ष बड़ी संख्या में पश्चिम बंगाल के लोग गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए चेन्नई के वेल्लोर और मुंबई जैसे शहरों का रुख करते हैं। इसे देखते हुए सरकार इन शहरों में इलाज कराने वाले मरीजों और उनके परिजनों के लिए कम लागत पर आवासीय सुविधा उपलब्ध कराएगी। सरकार का कहना है कि इन घोषणाओं का उद्देश्य राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना, गरीबों को बेहतर इलाज उपलब्ध कराना और दूरदराज के इलाकों में चिकित्सा सुविधाओं की पहुंच बढ़ाना है।
CCTV में कैद हुई दिल दहला देने वाली घटना महाराष्ट्र के नासिक में एक सरकारी मेडिकल कॉलेज में बेहद दर्दनाक हादसा सामने आया है। यहां सर्जरी विभाग में कार्यरत 50 वर्षीय संविदाकर्मी ज्योति शिवाजी आहिरे की लिफ्ट में सिर फंसने से मौत हो गई। यह पूरी घटना अस्पताल में लगे सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गई। घटना के बाद अस्पताल परिसर में हड़कंप मच गया। सर्जिकल उपकरण ले जाने वाली लिफ्ट बनी मौत का कारण जानकारी के अनुसार, ज्योति आहिरे सर्जरी विभाग में काम कर रही थीं। इसी दौरान उन्होंने सर्जिकल उपकरण ढोने के लिए इस्तेमाल होने वाली फ्रेट लिफ्ट में झांकने की कोशिश की। तभी लिफ्ट अचानक चल पड़ी और उनका सिर उसमें फंस गया। हादसे के तुरंत बाद वहां मौजूद अन्य कर्मचारियों ने उन्हें बचाने का प्रयास किया। कई मिनट तक फंसी रहीं सीसीटीवी फुटेज में देखा जा सकता है कि घटना के बाद कर्मचारी तुरंत मौके पर पहुंचे, लेकिन महिला का सिर तुरंत नहीं निकाला जा सका। वह कई मिनट तक लिफ्ट में फंसी रहीं। कड़ी मशक्कत के बाद उन्हें बाहर निकाला गया और तत्काल आईसीयू में भर्ती कराया गया, जहां इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। अस्पताल प्रशासन पर लापरवाही का केस मृतका के बेटे की शिकायत पर पुलिस ने डॉ. वसंतराव पवार मेडिकल कॉलेज, हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर के खिलाफ लापरवाही का मामला दर्ज किया है। पुलिस अब हादसे के सभी पहलुओं की जांच कर रही है। अस्पताल ने दी सफाई अस्पताल प्रशासन ने बयान जारी कर कहा कि यह सामान्य यात्री लिफ्ट नहीं थी, बल्कि सर्जिकल उपकरणों के परिवहन के लिए इस्तेमाल होने वाली होइस्ट ट्रॉली थी। प्रशासन के मुताबिक, सरकारी विद्युत अभियंता ने जांच में किसी तकनीकी खराबी या यांत्रिक दोष की पुष्टि नहीं की है। सुरक्षा नियमों के उल्लंघन का दावा अस्पताल का कहना है कि महिला ने निर्धारित सुरक्षा रेखा पार कर ट्रॉली के मार्ग में झांका, जिससे यह दुखद हादसा हुआ। हालांकि, पुलिस और संबंधित एजेंसियां पूरे मामले की गहन जांच कर रही हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।