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Herat Protest Sparks Concern

अफगानिस्तान में महिलाओं के प्रदर्शन पर बल प्रयोग के आरोप, UN ने तालिबान की कार्रवाई पर जताई चिंता

Deepshikha जून 12, 2026 0
Women protest in Herat as rights concerns grow amid disputed crackdown allegations.
Herat Women Protest Afghanistan

 

काबुल/हेरात: अफगानिस्तान के पश्चिमी शहर हेरात में महिलाओं के विरोध प्रदर्शन के दौरान बल प्रयोग और गोलीबारी के आरोपों को लेकर विवाद गहरा गया है। संयुक्त राष्ट्र से जुड़े स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञों ने इस घटना पर चिंता व्यक्त करते हुए तालिबान प्रशासन की आलोचना की है। विशेषज्ञों के अनुसार, प्रदर्शन के दौरान कम से कम दो लोगों की मौत हुई और 20 से अधिक लोग घायल हुए। हालांकि, इन आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि सीमित है।

रिपोर्टों के मुताबिक, हेरात में तालिबान की नैतिकता पुलिस (Morality Police) द्वारा कथित तौर पर उन महिलाओं के खिलाफ कार्रवाई की गई, जिन पर निर्धारित ड्रेस कोड का पालन नहीं करने का आरोप था। इसके बाद महिलाओं ने विरोध प्रदर्शन किया, जिसके दौरान सुरक्षा बलों द्वारा बल प्रयोग किए जाने के आरोप सामने आए।

UN विशेषज्ञों ने जताई चिंता

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) द्वारा नियुक्त स्वतंत्र विशेषज्ञों के एक समूह ने जारी बयान में कहा कि महिलाओं को ड्रेस कोड के कथित उल्लंघन के आधार पर हिरासत में लिए जाने की खबरें गंभीर चिंता का विषय हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि महिलाओं को अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता या भेदभाव से मुक्त रहने के अधिकार का उपयोग करने के कारण दंडित किया गया है, तो यह अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के अनुरूप नहीं माना जा सकता।

गोलीबारी को लेकर अलग-अलग दावे

प्रत्यक्षदर्शियों और स्थानीय स्रोतों ने दावा किया है कि प्रदर्शन को तितर-बितर करने के दौरान सुरक्षा बलों ने गोलीबारी की। कुछ रिपोर्टों में एक बच्चे की मौत का भी दावा किया गया है।

तालिबान प्रशासन और स्थानीय पुलिस अधिकारियों ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि प्रदर्शन के दौरान किसी प्रकार के हथियार का इस्तेमाल नहीं किया गया। इस कारण घटना को लेकर दोनों पक्षों के दावों में स्पष्ट अंतर बना हुआ है।

ड्रेस कोड को लेकर जारी है विवाद

अफगानिस्तान में महिलाओं के पहनावे से जुड़े नियम सदाचार के प्रसार और बुराई की रोकथाम मंत्रालय (PVPV) के तहत लागू किए जाते हैं। वर्तमान नियमों के अनुसार महिलाओं को सार्वजनिक स्थानों पर शरीर को पूरी तरह ढकने वाले वस्त्र पहनने की सलाह दी जाती है।

कई महिलाएं पारंपरिक बुर्के की बजाय अबाया, हिजाब या अन्य ढीले-ढाले परिधानों का उपयोग करती हैं। हाल के महीनों में ड्रेस कोड के पालन को लेकर निगरानी और कार्रवाई बढ़ने की खबरों के बाद महिलाओं के अधिकारों को लेकर बहस तेज हुई है।

अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर

हेरात की घटना ने एक बार फिर अफगानिस्तान में महिलाओं के अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रताओं को लेकर अंतरराष्ट्रीय चिंता बढ़ा दी है। मानवाधिकार संगठनों और संयुक्त राष्ट्र से जुड़े विशेषज्ञों ने घटना की निष्पक्ष जांच और नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की है।

फिलहाल घटना से जुड़े मौतों और घायलों के आंकड़ों तथा सुरक्षा बलों की भूमिका को लेकर अलग-अलग दावे सामने आ रहे हैं। स्वतंत्र जांच या आधिकारिक सत्यापन के बाद ही स्थिति की पूरी तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।

 

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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

Surbhi

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माली में अगवा भारतीय मूल के हीरा कारोबारी धीरू रमानी की रिहाई और फिरौती भुगतान की खबर
माली में अगवा भारतीय मूल के हीरा कारोबारी धीरू रमानी रिहा, परिवार ने कथित तौर पर ₹44 करोड़ की फिरौती देकर छुड़ाया

बमाको, एजेंसियां। पश्चिम अफ्रीकी देश माली में लगभग तीन महीने पहले अगवा किए गए भारतीय मूल के 75 वर्षीय हीरा कारोबारी धीरू रमानी को रिहा कर दिया गया है। सूत्रों के अनुसार, अमेरिका में रहने वाले उनके परिवार ने अपहरणकर्ताओं से लंबी बातचीत के बाद 4 मिलियन यूरो (करीब ₹44 करोड़) की फिरौती देकर उनकी रिहाई सुनिश्चित कराई।   पहले मांगे थे करीब ₹100 करोड़   रिपोर्टों के मुताबिक, अपहरणकर्ताओं ने शुरुआत में धीरू रमानी की रिहाई के बदले करीब ₹100 करोड़ (10 मिलियन यूरो) की मांग की थी। बाद में परिवार ने सीधे अपहरणकर्ताओं से बातचीत की और रकम घटाकर 4 मिलियन यूरो पर समझौता किया। बताया जा रहा है कि इस पूरी प्रक्रिया में किसी भारतीय सरकारी एजेंसी की प्रत्यक्ष भूमिका नहीं रही।   सोने की खान में निवेश के बाद रह रहे थे माली   गुजरात के अमरेली जिले के मूल निवासी धीरू रमानी का लंबे समय से सूरत के हीरा कारोबार से जुड़ाव रहा है। बाद में उनका परिवार अमेरिका में बस गया। हाल के वर्षों में उन्होंने माली में एक सोने की खान खरीदी थी और उसी सिलसिले में वहां रह रहे थे। अप्रैल में उनका अपहरण कर लिया गया था।   रिहाई के बाद भी माली में ही हैं रमानी   रिहा होने के बाद भी धीरू रमानी फिलहाल माली में ही हैं। स्थानीय अधिकारी उनसे अपहरण और रिहाई की परिस्थितियों के बारे में पूछताछ कर रहे हैं। अभी तक माली सरकार या भारतीय विदेश मंत्रालय ने कथित फिरौती भुगतान की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। यह घटना माली में बिगड़ती सुरक्षा स्थिति और वहां कारोबार कर रहे विदेशी नागरिकों के सामने मौजूद जोखिमों को एक बार फिर उजागर करती है।  

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कनाडा में 139 मिलियन डॉलर की ड्रग्स जब्त, भारतीय मूल के कई ट्रक ड्राइवर समेत 19 गिरफ्तार

कनाडा के ओंटारियो प्रांत में सीमा पार संचालित एक बड़े अंतरराष्ट्रीय ड्रग्स तस्करी नेटवर्क का भंडाफोड़ हुआ है। कनाडा बॉर्डर सर्विसेज एजेंसी (CBSA) और अन्य जांच एजेंसियों की संयुक्त कार्रवाई में करीब 1.7 टन अवैध मादक पदार्थ जब्त किए गए हैं, जिनकी अंतरराष्ट्रीय बाजार में अनुमानित कीमत 139 मिलियन अमेरिकी डॉलर बताई गई है। इस मामले में 19 लोगों को गिरफ्तार किया गया है, जिनमें भारतीय मूल के कई ट्रक चालक भी शामिल हैं। 22 जगहों पर छापेमारी, 19 आरोपी गिरफ्तार 'प्रोजेक्ट बे (Project Bay)' नामक विशेष अभियान के तहत अधिकारियों ने ओंटारियो के विंडसर, लासेल, कोरन्ना, ब्रैम्पटन, मार्कहम और कैलेडन समेत 22 स्थानों पर छापेमारी की। जांच एजेंसियों ने इस दौरान 19 आरोपियों को गिरफ्तार किया। गिरफ्तार भारतीय मूल के आरोपियों की पहचान गगनदीप थिंडल, सिमरनजीत सिंह, कंवरपाल कुलार, जतिंदरपाल सिंह, जसविंदर सोही, तेजविंदर संधू, हरजविंदर संधू, तरमिंदर सिंह, गुनदीप तारिवाल, महकप्रीत सिंह और करणदीप सिंह के रूप में हुई है। क्या-क्या हुआ बरामद? जांच एजेंसियों ने कार्रवाई के दौरान बड़ी मात्रा में ड्रग्स और हथियार बरामद किए। जब्त सामग्री में शामिल हैं: 973 किलोग्राम कोकीन 660 किलोग्राम मेथम्फेटामाइन 49 किलोग्राम अफीम 230 ऑक्सीकोडोन की गोलियां 17 हथियार, जिनमें एक टैंक-रोधी राइफल भी शामिल नकदी, कीमती आभूषण, मनी काउंटर गिरोह द्वारा इस्तेमाल किया गया एक वाहन 43 मोबाइल फोन और 6 लैपटॉप अधिकारियों के अनुसार, यह ओंटारियो में एक ही जांच के दौरान हुई सबसे बड़ी ड्रग्स जब्तियों में से एक है। 2025 में शुरू हुआ था 'प्रोजेक्ट बे' सीबीएसए के मुताबिक, जनवरी 2025 में शुरू किया गया 'प्रोजेक्ट बे' अभियान कनाडा-अमेरिका सीमा के जरिए हो रही मादक पदार्थों की तस्करी को रोकने के उद्देश्य से शुरू किया गया था। जांच में सामने आया कि तस्करी का नेटवर्क वाणिज्यिक ट्रकों का इस्तेमाल कर कनाडा और अमेरिका के बीच बड़ी मात्रा में कोकीन, मेथम्फेटामाइन और अफीम की खेप पहुंचाता था। ट्रांसपोर्ट नेटवर्क का किया जा रहा था दुरुपयोग अधिकारियों के अनुसार, गिरोह ने दलाली (Brokerage) मॉडल अपनाया था, जिसके तहत वैध सप्लाई चेन और कमर्शियल ट्रांसपोर्ट नेटवर्क का इस्तेमाल कर अवैध ड्रग्स की सीमा पार तस्करी कराई जाती थी। जांच में यह भी सामने आया कि कुछ ट्रक चालकों को जानबूझकर अवैध खेप ढोने के लिए तैयार किया जाता था। एजेंसियों का कहना है कि मामले की जांच जारी है और इस नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों की पहचान की जा रही है।  

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Poppy fields in Afghanistan amid a sharp decline in opium cultivation following the Taliban ban
अफगानिस्तान में 'अफीम संकट': 95% घटी खेती, फिर भी तस्करी क्यों नहीं थमी?

Afghanistan Opium Crisis: तालिबान सरकार ने 2022 में अफीम की खेती पर कड़ा प्रतिबंध लगाया, जिसके बाद खेती में करीब 95% की गिरावट दर्ज की गई। इसके बावजूद दुनिया में हेरोइन की सप्लाई पूरी तरह नहीं रुकी। इसकी सबसे बड़ी वजह पहले से जमा किया गया विशाल स्टॉक और सक्रिय तस्करी नेटवर्क हैं। 2022 के प्रतिबंध का बड़ा असर तालिबान प्रमुख मुल्ला हैबतुल्लाह अखुंदजादा ने 2022 में पूरे अफगानिस्तान में अफीम की खेती पर रोक लगाने का आदेश दिया। संयुक्त राष्ट्र (UN) की रिपोर्ट के अनुसार, 2022 में जहां लगभग 2.33 लाख हेक्टेयर में अफीम की खेती होती थी, वहीं 2023 में यह घटकर केवल 10,800 हेक्टेयर रह गई। एक समय अफगानिस्तान दुनिया की 80-90% अफीम और यूरोप की 95% हेरोइन की आपूर्ति करता था। फिर भी हेरोइन की सप्लाई क्यों जारी रही? विशेषज्ञों के अनुसार, प्रतिबंध का समय इसकी सबसे बड़ी वजह बना। तालिबान ने अफीम की फसल कटने से ठीक पहले खेती पर रोक लगाई, लेकिन किसानों को फसल काटने के लिए कुछ समय भी दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि 2022 में बड़ी मात्रा में उत्पादन हुआ और किसानों व तस्करों ने अफीम बेचने के बजाय उसे स्टोर कर लिया। प्रतिबंध के बाद अफीम की कीमत 70 डॉलर प्रति किलोग्राम से बढ़कर लगभग 1,000 डॉलर प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई। चूंकि अफीम लंबे समय तक खराब नहीं होती, इसलिए इसे गोदामों में सुरक्षित रख लिया गया। रिकॉर्ड स्तर पर जमा है स्टॉक सैटेलाइट आंकड़ों के मुताबिक, केवल अफगानिस्तान के रेगिस्तानी इलाकों में ही करीब 13,700 टन अफीम का स्टॉक मौजूद है, जबकि कुल भंडार लगभग 16,550 टन आंका गया है। इसे अब तक का सबसे बड़ा स्टॉक माना जा रहा है। हर इलाके में लागू नहीं हुआ प्रतिबंध अफगानिस्तान के कुछ क्षेत्रों, खासकर बदख्शां जैसे इलाकों में, जहां तालिबान का प्रभाव अपेक्षाकृत कम है, वहां खेती पूरी तरह बंद नहीं हुई। 2024 में जब सरकार ने सख्ती बढ़ाई तो कई जगह किसानों ने विरोध प्रदर्शन और हथियारबंद प्रतिरोध भी किया, जिसके बाद प्रशासन को कुछ मामलों में नरम रुख अपनाना पड़ा। तस्करों ने अपनाए नए तरीके विशेषज्ञों के अनुसार, तस्कर फिलहाल दो रणनीतियों पर काम कर रहे हैं— पहले से जमा पुराने अफीम स्टॉक को बाजार में बेच रहे हैं। हेरोइन में मिलावट कर सप्लाई बनाए रख रहे हैं। इसी वजह से पाकिस्तान और ईरान की सीमाओं से तस्करी पूरी तरह नहीं रुकी और यूरोप समेत कई देशों में हेरोइन की उपलब्धता बनी रही। 2000 और 2022 के प्रतिबंध में क्या अंतर? साल 2000 में तालिबान ने अफीम पर प्रतिबंध फसल कटने के बाद लगाया था, जिससे सप्लाई पर तुरंत असर पड़ा था। लेकिन 2022 में प्रतिबंध कटाई से पहले लगाया गया, जिससे बड़ी मात्रा में अफीम पहले ही स्टोर कर ली गई। यही कारण है कि खेती में भारी गिरावट के बावजूद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हेरोइन की सप्लाई तत्काल प्रभावित नहीं हुई।  

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