New York Democratic Primary: न्यूयॉर्क की डेमोक्रेटिक प्राइमरी में भले ही जोहरान ममदानी खुद चुनाव मैदान में नहीं थे, लेकिन चुनाव नतीजों के बाद वह सबसे प्रभावशाली नेता बनकर उभरे हैं। उनके समर्थन वाले तीनों उम्मीदवारों ने अपने-अपने मुकाबले में जीत दर्ज की है। इन नतीजों के बाद डेमोक्रेटिक पार्टी के भीतर ममदानी की राजनीतिक पकड़ और मजबूत मानी जा रही है। राजनीतिक विश्लेषक अब उन्हें पार्टी का नया 'किंगमेकर' बता रहे हैं।
ममदानी समर्थित उम्मीदवारों में ब्रैड लैंडर ने मौजूदा सांसद डैन गोल्डमैन को हराया। वहीं क्लेयर वाल्डेज ने ब्रुकलिन बरो प्रेसिडेंट एंटोनियो रेनोसो को मात दी। तीसरे मुकाबले में डारियालिजा एविला शेवेलियर ने अनुभवी नेता एड्रियानो एस्पाइलाट को हराकर सबसे बड़ा राजनीतिक उलटफेर कर दिया। चूंकि इन सीटों पर डेमोक्रेटिक पार्टी का मजबूत आधार है, इसलिए नवंबर में होने वाले आम चुनाव में इन उम्मीदवारों की जीत की संभावना भी काफी अधिक मानी जा रही है.
तीनों उम्मीदवारों की जीत के बाद जोहरान ममदानी ने कहा कि उनकी राजनीतिक सफलता कोई संयोग नहीं है। उन्होंने कहा कि पिछले साल की जीत केवल एक शुरुआत थी और अब उनकी राजनीतिक विचारधारा व्यापक स्तर पर स्वीकार की जा रही है।
ममदानी ने कहा कि उनका संगठन केवल चुनाव लड़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि ऐसे उम्मीदवारों को भी आगे बढ़ा रहा है जो आम लोगों के मुद्दों को प्राथमिकता देते हैं।
सबसे चर्चित मुकाबला लोअर मैनहट्टन और ब्रुकलिन सीट पर हुआ, जहां ब्रैड लैंडर ने मौजूदा सांसद डैन गोल्डमैन को हराया। चुनाव प्रचार के दौरान लैंडर ने खुद को अधिक प्रगतिशील उम्मीदवार के रूप में पेश किया। ममदानी ने खुलकर उनके समर्थन में प्रचार किया, जिसका चुनाव परिणाम पर असर देखने को मिला।
ब्रुकलिन और क्वींस की सीट पर क्लेयर वाल्डेज ने एंटोनियो रेनोसो को हराकर सभी को चौंका दिया। यह सीट सांसद निडिया वेलाजक्वेज के हटने के बाद खाली हुई थी। ममदानी के समर्थन से वाल्डेज को युवा और प्रगतिशील मतदाताओं का बड़ा समर्थन मिला।
सबसे बड़ा उलटफेर डारियालिजा एविला शेवेलियर ने किया। उन्होंने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एड्रियानो एस्पाइलाट को हराया, जो करीब एक दशक से कांग्रेस में थे। इस जीत को न्यूयॉर्क की राजनीति के सबसे बड़े उलटफेरों में गिना जा रहा है।
राजनीति में किसी नेता का उम्मीदवारों का समर्थन करना सामान्य बात है, लेकिन जोहरान ममदानी के समर्थन वाले तीनों उम्मीदवारों की जीत ने उनकी राजनीतिक ताकत को नई पहचान दी है। खास बात यह रही कि दो उम्मीदवारों ने मौजूदा सांसदों को हराया, जबकि तीसरे ने एक मजबूत राजनीतिक दावेदार को चुनावी मैदान में मात दी।
ममदानी की कम्युनिकेशन डायरेक्टर अन्ना बह्र ने कहा कि यह नतीजे दिखाते हैं कि आम लोगों के मुद्दों पर आधारित राजनीति अब पारंपरिक चुनावी रणनीतियों पर भारी पड़ रही है।
इन प्राइमरी चुनावों में गाजा युद्ध और अमेरिका की इजरायल नीति भी प्रमुख मुद्दा रही। ममदानी और उनके समर्थित उम्मीदवारों ने महंगाई, आवास संकट और आम लोगों की आर्थिक परेशानियों को अमेरिकी विदेश नीति से जोड़कर चुनाव प्रचार किया।
इस रुख को लेकर उन्हें न्यूयॉर्क के कुछ यहूदी संगठनों और नेताओं की आलोचना का भी सामना करना पड़ा। डैन गोल्डमैन ने आरोप लगाया कि ममदानी का अभियान मध्य-पूर्व के मुद्दों को जरूरत से ज्यादा महत्व दे रहा है, जिससे राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ रहा है।
ताजा चुनाव परिणामों के बाद डेमोक्रेटिक पार्टी के भीतर जोहरान ममदानी का प्रभाव पहले से कहीं अधिक मजबूत माना जा रहा है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि उनके समर्थित उम्मीदवार नवंबर के आम चुनाव में भी जीत हासिल करते हैं, तो ममदानी आने वाले वर्षों में पार्टी की राष्ट्रीय राजनीति में भी अहम भूमिका निभा सकते हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
ढाका, एजेंसियां। बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने भारत से पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के प्रत्यर्पण की प्रक्रिया तेज करने की उम्मीद जताई है। प्रधानमंत्री ने 10 अगस्त को बांग्लादेश में भारत के नए उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी से मुलाकात के दौरान यह मुद्दा उठाया। बैठक में दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों को बेहतर बनाने और लंबित मुद्दों को बातचीत के जरिए सुलझाने पर भी चर्चा हुई। शेख हसीना के प्रत्यर्पण पर बांग्लादेश का दबाव तारिक रहमान ने भारतीय उच्चायुक्त के सामने शेख हसीना के प्रत्यर्पण का मुद्दा प्रमुखता से रखा। बांग्लादेश सरकार लंबे समय से भारत से शेख हसीना को वापस भेजने की मांग कर रही है। ढाका का कहना है कि भारत से प्रत्यर्पण अनुरोध पर जल्द सकारात्मक कार्रवाई की उम्मीद है। बांग्लादेश में शेख हसीना के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले चल रहे हैं और उन्हें एक मामले में दोषी ठहराया जा चुका है। हसीना अगस्त 2024 में बांग्लादेश से निकलने के बाद भारत में रह रही हैं। भारत-बांग्लादेश संबंधों को सुधारने की कोशिश बैठक के दौरान तारिक रहमान ने भारत के साथ संबंधों को फिर से बेहतर बनाने के लिए अनुकूल माहौल तैयार करने की आवश्यकता पर जोर दिया। दोनों देशों के बीच व्यापार, सीमा, ऊर्जा, सुरक्षा और क्षेत्रीय सहयोग जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। बांग्लादेशी प्रधानमंत्री ने यह भी संकेत दिया कि दोनों देशों के बीच किसी भी ऐसे कदम से बचना चाहिए जिससे द्विपक्षीय संबंधों को नुकसान पहुंचे। भारत की ओर से भी बातचीत और रचनात्मक तरीके से संबंधों को आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया है। हसीना के बयानों से भी बढ़ा तनाव शेख हसीना के भारत में रहते हुए हाल में दिए गए सार्वजनिक बयानों को लेकर बांग्लादेश सरकार ने नाराजगी जताई है। ढाका का कहना है कि भारत की जमीन से हसीना की राजनीतिक गतिविधियां दोनों देशों के संबंधों को प्रभावित कर सकती हैं। भारत ने दूसरी ओर कहा है कि शेख हसीना के प्रत्यर्पण अनुरोध की समीक्षा कानूनी प्रक्रियाओं के तहत की जा रही है। नई दिल्ली ने साथ ही बांग्लादेश के साथ रचनात्मक और सकारात्मक संबंध बनाए रखने की प्रतिबद्धता भी दोहराई है। आगे की बातचीत पर टिकी नजर तारिक रहमान और भारतीय उच्चायुक्त की बैठक ऐसे समय हुई है जब दोनों देश रिश्तों में आई खटास को कम करने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि शेख हसीना का प्रत्यर्पण दोनों देशों के बीच सबसे संवेदनशील मुद्दों में बना हुआ है। अब नजर इस बात पर है कि भारत बांग्लादेश की नई मांग पर क्या रुख अपनाता है और क्या दोनों देश प्रत्यर्पण समेत अन्य लंबित मुद्दों पर कूटनीतिक बातचीत के जरिए कोई रास्ता निकाल पाते हैं।
मॉस्को, एजेंसियां। रूस के भीतर यूक्रेन के एक बड़े ड्रोन हमले में कम से कम 13 लोगों की मौत हो गई है। हमला रूस के तातारस्तान गणराज्य के निज़नेकाम्स्क शहर में हुआ, जहां यूक्रेनी ड्रोन ने तेल और पेट्रोकेमिकल प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया। हमले में एक बच्चे समेत कई लोगों की मौत हुई है, जबकि दर्जनों लोग घायल बताए जा रहे हैं। रूस के अधिकारियों ने घटना की जांच शुरू कर दी है। तानेको तेल रिफाइनरी को बनाया निशाना यूक्रेनी सेना ने निज़नेकाम्स्क क्षेत्र में स्थित तानेको तेल रिफाइनरी को निशाना बनाए जाने की पुष्टि की है। यह रूस के प्रमुख तेल शोधन और पेट्रोकेमिकल केंद्रों में शामिल है। रिपोर्टों के अनुसार यह प्रतिष्ठान मॉस्को से करीब 800 किलोमीटर पूर्व में स्थित है। हमले के बाद रिफाइनरी परिसर और आसपास के औद्योगिक क्षेत्रों में धुआं उठता दिखाई दिया। रूसी अधिकारियों के अनुसार ड्रोन हमले का असर शहर के कुछ रिहायशी इलाकों पर भी पड़ा। 13 लोगों की मौत, दर्जनों घायल रूसी अधिकारियों के अनुसार हमले में कम से कम 13 लोगों की मौत हुई है, जिसमें एक बच्चा भी शामिल है। कई लोग घायल हुए हैं और उन्हें अस्पतालों में भर्ती कराया गया है। कुछ रिपोर्टों में घायलों की संख्या 39 से अधिक बताई गई है, जबकि बाद के स्थानीय अपडेट में इससे ज्यादा लोगों के प्रभावित होने की जानकारी सामने आई है। रिपोर्टों के अनुसार मृतकों में मध्य एशियाई देशों के नागरिक भी शामिल हैं। उज्बेकिस्तान ने बताया है कि उसके सात नागरिकों की इस हमले में मौत हुई। रूस ने शुरू की जांच, तातारस्तान में शोक हमले के बाद रूसी अधिकारियों ने इसे गंभीर सुरक्षा घटना माना है और जांच शुरू कर दी है। तातारस्तान के अधिकारियों ने मृतकों के सम्मान में शोक दिवस घोषित किया है। यह हमला रूस के अंदर यूक्रेन की बढ़ती ड्रोन क्षमता को भी दर्शाता है। यूक्रेन लंबे समय से रूस की तेल और ऊर्जा से जुड़ी सुविधाओं को निशाना बनाकर उसकी सैन्य और आर्थिक क्षमता पर दबाव बनाने की रणनीति पर काम कर रहा है। निज़नेकाम्स्क पर हुआ हमला इसी अभियान की महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक माना जा रहा है।
वॉशिंगटन, एजेंसियां। अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध समाप्त करने और रणनीतिक होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने को लेकर चल रही बातचीत में नया विवाद खड़ा हो गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका ईरान से युद्ध, हमलों और लंबे समय से चले आ रहे संघर्षों में हुई मौतों और नुकसान के लिए मुआवजे की मांग करेगा। ट्रंप की इस मांग से दोनों देशों के बीच समझौते की राह और मुश्किल होती दिखाई दे रही है। ईरान ने भी रखी मुआवजे की मांग ईरान की ओर से अमेरिका और इजरायल के हमलों से हुए नुकसान के लिए मुआवजे की मांग की गई है। इसके अलावा तेहरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने के लिए कुछ शर्तें रखी हैं। इनमें प्रतिबंधों में राहत और ईरान की कुछ जब्त संपत्तियों को जारी करने जैसी मांगें शामिल हैं। ट्रंप ने ईरान की इस मांग को स्वीकार करने के बजाय जवाबी तौर पर कहा है कि ईरान को भी अमेरिकी सैनिकों की मौत और ईरान समर्थित समूहों से जुड़े पुराने हमलों के लिए मुआवजा देना चाहिए। ट्रंप ने यह मांग कई दशकों में हुई घटनाओं को आधार बनाकर रखी है। होर्मुज जलडमरूमध्य पर समझौता अटका होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलना अमेरिका-ईरान वार्ता का सबसे अहम मुद्दा बना हुआ है। ईरान का कहना है कि जब तक अमेरिका उसकी शर्तों को पूरा नहीं करता, तब तक जलडमरूमध्य को पूरी तरह खोलने पर सहमति नहीं बन सकती। इसके जवाब में अमेरिका भी ईरान से कई मांगें कर रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। यहां लंबे समय से जारी तनाव के कारण तेल और गैस की आपूर्ति को लेकर अंतरराष्ट्रीय बाजारों में चिंता बढ़ी है। तेल की कीमतों पर भी पड़ा असर अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में गतिरोध का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार पर दिखाई दे रहा है। 11 अगस्त को कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखी गई और बाजार में यह चिंता बढ़ी कि यदि होर्मुज को लेकर जल्द समझौता नहीं हुआ तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। रॉयटर्स के मुताबिक ब्रेंट क्रूड 88 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया, जबकि अमेरिकी क्रूड 82 डॉलर से ऊपर रहा। फिलहाल अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत पूरी तरह खत्म नहीं हुई है, लेकिन दोनों पक्षों की मुआवजे संबंधी मांगों ने समझौते को जटिल बना दिया है। आने वाले दिनों में होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने को लेकर होने वाली बातचीत पर पूरी दुनिया की नजर रहेगी।