मध्य-पूर्व में चल रही कूटनीतिक हलचल के बीच Pakistan की रणनीति अब उसके पारंपरिक सहयोगी China के साथ रिश्तों पर असर डालती नजर आ रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान द्वारा United States के साथ बढ़ती नजदीकियों और ईरान मसले पर सक्रिय मध्यस्थता ने बीजिंग को असहज कर दिया है।
सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान ने ईरान-अमेरिका तनाव के बीच कुछ अहम कूटनीतिक पहल चीन से बिना सलाह लिए कीं। इससे बीजिंग नाराज बताया जा रहा है। इसी के बाद पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री Ishaq Dar को बीजिंग बुलाया गया, जहां उनसे पांच-सूत्रीय घोषणा पर हस्ताक्षर करवाए गए, जिसमें संयुक्त राष्ट्र चार्टर को प्राथमिकता देने की बात कही गई।
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump और पाकिस्तान के सेना प्रमुख Asim Munir के बीच बढ़ती समझ को लेकर भी चर्चा तेज है। माना जा रहा है कि पाकिस्तान ने अमेरिका को यह भरोसा दिलाने की कोशिश की थी कि वह ईरान को बातचीत के लिए राजी कर सकता है।
हालांकि, Abbas Araghchi ने अमेरिकी प्रतिनिधियों से मिलने से इनकार कर दिया, जिससे पाकिस्तान की मध्यस्थता की कोशिशों को झटका लगा। इसके बाद अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का इस्लामाबाद दौरा भी रद्द करना पड़ा।
Iran ने स्पष्ट कर दिया है कि वह बिना ठोस परिणाम के किसी भी वार्ता में शामिल नहीं होगा। ईरान के नेताओं का मानना है कि पिछली बातचीत में उन्हें पर्याप्त सम्मान नहीं मिला, जिससे उनका रुख और सख्त हो गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान द्वारा बार-बार चीन को नजरअंदाज करना बीजिंग के लिए चिंता का विषय है। Russia और चीन पहले ही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में होर्मुज से जुड़े प्रस्तावों पर अलग रुख दिखा चुके हैं। ऐसे में पाकिस्तान की ‘दोहरी रणनीति’ क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकती है।
मौजूदा हालात बताते हैं कि पाकिस्तान, अमेरिका और ईरान के बीच संतुलन साधने की कोशिश कर रहा है, लेकिन इससे उसके चीन के साथ संबंधों में खटास आ सकती है। यदि यह स्थिति बनी रहती है, तो भविष्य में इस रणनीति की कीमत पाकिस्तान को कूटनीतिक स्तर पर चुकानी पड़ सकती है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
तेहरान। ईरान के डिप्टी विदेश मंत्री काजम गरीबाबादी ने इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट (ICC) के चीफ प्रॉसिक्यूटर करीम खान को पद से हटाए जाने के बाद अमेरिका और इजराइल की आलोचना की है। उन्होंने इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के उस बयान पर आपत्ति जताई, जिसमें उन्होंने ICC के खिलाफ अमेरिकी कार्रवाई का समर्थन किया था। नेतन्याहू के बयान के बाद ईरान ने उठाए सवाल गरीबाबादी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा कि ICC के खिलाफ अमेरिका की कार्रवाई की कोशिश न्याय व्यवस्था को प्रभावित करने वाली है। उन्होंने नेतन्याहू के उस बयान का जिक्र किया, जिसमें इजराइली प्रधानमंत्री ने अमेरिका द्वारा ICC के खिलाफ सख्त कदम उठाने के वादे का स्वागत किया था। नेतन्याहू ने करीम खान को हटाने के फैसले का किया स्वागत इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ICC के प्रॉसिक्यूटर करीम खान को हटाए जाने के फैसले को "सकारात्मक विकास" बताया। उन्होंने कहा कि ICC ने ऐसे फैसले लिए, जिनसे न्याय व्यवस्था कमजोर हुई और संप्रभु देशों की सुरक्षा पर असर पड़ा। करीम खान पर लगे थे गंभीर आरोप करीम खान पर अपने कार्यालय में काम करने वाली महिलाओं के साथ कथित यौन उत्पीड़न और गंभीर कदाचार के आरोप लगे थे। इन आरोपों के बाद ICC सदस्य देशों ने उनके खिलाफ कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू की थी। ICC ने 82 देशों के समर्थन से लिया फैसला 24 जुलाई को न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में ICC असेंबली ऑफ स्टेट्स पार्टीज की आपात बैठक हुई। इसमें 125 सदस्य देशों में से 82 देशों के समर्थन के बाद करीम खान को चीफ प्रॉसिक्यूटर पद से हटाने का फैसला किया गया। नेतन्याहू और गैलेंट के खिलाफ वारंट को लेकर भी विवाद नेतन्याहू ने दावा किया कि करीम खान ने अपने खिलाफ लगे आरोपों से ध्यान हटाने के लिए उनके और पूर्व रक्षा मंत्री योआव गैलेंट के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किए थे। उन्होंने इसे राजनीतिक कदम बताया। ईरान ने ICC की स्वतंत्रता को लेकर उठाया मुद्दा ईरानी अधिकारी ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं पर दबाव डालना वैश्विक न्याय व्यवस्था के लिए चिंता का विषय है। उन्होंने अमेरिका और इजराइल के रुख को लेकर सवाल उठाते हुए ICC की भूमिका का समर्थन किया।
चीन ने अपने Long March 10B रीयूजेबल रॉकेट का सफल परीक्षण कर अंतरिक्ष दौड़ में बड़ी छलांग लगाई है। इसके साथ ही वह एक महत्वाकांक्षी इलेक्ट्रोमैग्नेटिक लॉन्च सिस्टम (Electromagnetic Launch System) पर भी काम कर रहा है, जिसका उद्देश्य रॉकेट की शुरुआती उड़ान में ईंधन की खपत कम करना है। अगर यह तकनीक सफल होती है, तो भविष्य में अंतरिक्ष लॉन्च की लागत में बड़ी कमी आ सकती है और स्पेसएक्स जैसी कंपनियों को नई चुनौती मिल सकती है। Long March 10B से चीन ने क्या हासिल किया? चीन ने हाल ही में अपने Long March 10B रॉकेट के पहले चरण (बूस्टर) को सफलतापूर्वक समुद्र में बने प्लेटफॉर्म पर उतारा। यह चीन का पहला सफल रीयूजेबल (Reusable) रॉकेट परीक्षण माना जा रहा है। इससे पहले अमेरिका की स्पेसएक्स ही इस तकनीक में सबसे आगे थी। रीयूजेबल रॉकेट का सबसे बड़ा फायदा यह है कि एक ही बूस्टर का कई बार इस्तेमाल किया जा सकता है, जिससे लॉन्च की लागत काफी कम हो जाती है। अंतरिक्ष तक पहुंचना इतना मुश्किल क्यों है? पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण किसी भी रॉकेट के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। पृथ्वी की कक्षा (Orbit) तक पहुंचने के लिए लगभग 7.8 किमी प्रति सेकंड की गति चाहिए। पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से पूरी तरह बाहर निकलने के लिए करीब 11.2 किमी प्रति सेकंड की रफ्तार आवश्यक होती है। इसी वजह से रॉकेट को भारी मात्रा में ईंधन साथ लेकर उड़ना पड़ता है। लेकिन जितना अधिक ईंधन होगा, रॉकेट उतना भारी होगा और उसे उठाने के लिए और अधिक ईंधन की जरूरत पड़ेगी। स्पेसएक्स ने कैसे बदली तस्वीर? एलन मस्क की कंपनी SpaceX ने Falcon 9 के जरिए साबित किया कि रॉकेट का पहला चरण दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके फायदे: लॉन्च की लागत में भारी कमी। मिशन अधिक किफायती बने। कम समय में बार-बार लॉन्च संभव हुए। हालांकि Falcon 9 और Starship दोनों अब भी केमिकल रॉकेट इंजन पर निर्भर हैं। चीन का इलेक्ट्रोमैग्नेटिक लॉन्च सिस्टम क्या है? चीन जिस तकनीक पर काम कर रहा है, उसका विचार काफी अलग है। इस सिस्टम में: जमीन पर एक लंबा इलेक्ट्रोमैग्नेटिक ट्रैक बनाया जाएगा। शक्तिशाली इलेक्ट्रिक मोटर रॉकेट को शुरुआती गति देंगी। तय रफ्तार मिलने के बाद ही रॉकेट का केमिकल इंजन चालू होगा। यानी उड़ान की शुरुआत में ईंधन कम खर्च होगा। इससे क्या फायदे हो सकते हैं? यदि यह तकनीक सफल होती है तो: शुरुआती ईंधन की जरूरत घट सकती है। अधिक पेलोड अंतरिक्ष में भेजा जा सकता है। लॉन्च की लागत और कम हो सकती है। भविष्य के भारी मिशनों को फायदा मिलेगा। बताया जा रहा है कि चीन ने तिब्बत के पास हाई-टेम्परेचर सुपरकंडक्टिंग नेविगेशन सिस्टम का शुरुआती परीक्षण भी किया है। सबसे बड़ी चुनौतियां क्या हैं? विशेषज्ञों के अनुसार इस तकनीक के सामने कई बड़ी बाधाएं हैं। 1. केमिकल इंजन की जरूरत खत्म नहीं होगी इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सिस्टम केवल शुरुआती गति देगा। कक्षा तक पहुंचने के लिए रॉकेट को बाद में अपने इंजन चलाने ही पड़ेंगे। 2. विशाल इंफ्रास्ट्रक्चर कई किलोमीटर लंबा ट्रैक अत्यधिक बिजली विशाल ऊर्जा भंडारण अत्यंत सटीक नियंत्रण प्रणाली इन सबकी जरूरत होगी। 3. भौगोलिक कठिनाइयां तिब्बत जैसे ऊंचे इलाकों में इतना बड़ा ढांचा तैयार करना और उसका रखरखाव आसान नहीं होगा। 4. अत्यधिक दबाव कम दूरी में भारी रॉकेट को तेज गति देने से उस पर बहुत अधिक बल पड़ेगा। यदि भविष्य में मानव मिशन किए जाते हैं, तो यात्रियों पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है। क्या यह स्पेसएक्स को पीछे छोड़ देगा? फिलहाल इसका जवाब नहीं माना जा रहा है। निकट भविष्य में स्पेसएक्स के लिए सबसे बड़ी चुनौती चीन का रीयूजेबल Long March 10B है, न कि इलेक्ट्रोमैग्नेटिक लॉन्च सिस्टम। हालांकि लंबी अवधि में यदि चीन इस तकनीक को सफलतापूर्वक विकसित कर लेता है, तो अंतरिक्ष लॉन्च की पूरी अर्थव्यवस्था बदल सकती है। कम ईंधन, अधिक पेलोड और कम लागत के साथ यह भविष्य की स्पेस टेक्नोलॉजी में बड़ा बदलाव ला सकता है।
PoK Elections 2026: पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में सोमवार (27 जुलाई) को विधानसभा चुनाव के पहले चरण के तहत 13 सीटों पर मतदान हो रहा है। सुरक्षा हालात और लंबे समय से जारी विरोध प्रदर्शनों को देखते हुए पाकिस्तान चुनाव आयोग ने चुनाव तीन चरणों में कराने का फैसला लिया है। चुनाव के नतीजों के साथ-साथ क्षेत्र में राजनीतिक असंतोष और सुरक्षा स्थिति पर भी नजर बनी हुई है। तीन चरणों में होगा चुनाव पाकिस्तानी चुनाव आयोग के अनुसार, 45 सदस्यीय विधानसभा के लिए मतदान इस तरह होगा: 27 जुलाई: मीरपुर डिवीजन की 13 सीटें 2 अगस्त: मुजफ्फराबाद डिवीजन की 9 सीटें और पाकिस्तान में रहने वाले शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 सीटें 10 अगस्त: पूंछ डिवीजन की 11 सीटें मतदान के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सेना और सुरक्षा बलों की अतिरिक्त तैनाती की गई है। विरोध प्रदर्शनों के बीच चुनाव PoK में पिछले कई महीनों से महंगाई, बढ़े हुए बिजली बिल, सरकारी नीतियों और राजनीतिक हस्तक्षेप के खिलाफ व्यापक प्रदर्शन हो रहे हैं। इन आंदोलनों की अगुआई जम्मू-कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JKJAAC) कर रही है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि सुरक्षा बलों ने कई जगह बल प्रयोग किया, संचार सेवाएं बाधित कीं और रास्ते बंद कर दिए, जिससे आम लोगों को खाद्य सामग्री और दवाइयों की कमी का सामना करना पड़ा। कई जगह प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच झड़पों में लोगों की मौत और घायल होने की घटनाएं भी सामने आई हैं। 12 शरणार्थी सीटों पर विवाद इस चुनाव का सबसे बड़ा विवाद पाकिस्तान में रहने वाले कश्मीरी शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 सीटों को लेकर है। स्थानीय संगठनों और JKJAAC का आरोप है कि इन सीटों के जरिए इस्लामाबाद की सरकार चुनावी नतीजों को प्रभावित करती है, जिससे स्थानीय मतदाताओं की राजनीतिक आवाज कमजोर पड़ जाती है और केंद्र समर्थित दलों को फायदा मिलता है। क्या चुनाव से बदलेगी स्थिति? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव कराने से संवैधानिक प्रक्रिया पूरी हो जाएगी, लेकिन महंगाई, बिजली संकट, राजनीतिक अधिकारों और सुरक्षा बलों की कार्रवाई जैसे मूल मुद्दों का समाधान फिलहाल होता नहीं दिख रहा। ऐसे में चुनाव के बाद भी क्षेत्र में राजनीतिक तनाव जारी रहने की आशंका जताई जा रही है। भारत ने फिर जताया विरोध भारत लगातार स्पष्ट करता रहा है कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख का पूरा केंद्र शासित प्रदेश, जिसमें PoK और गिलगित-बाल्टिस्तान शामिल हैं, भारत का अभिन्न हिस्सा हैं। भारत ने इन क्षेत्रों में पाकिस्तान द्वारा कराए जाने वाले चुनावों पर पहले भी कड़ा विरोध दर्ज कराया है और ऐसी चुनावी प्रक्रिया या तथाकथित विधानसभा को मान्यता नहीं दी है। वहीं, मानवाधिकार संगठनों ने PoK में हालात को लेकर चिंता जताई है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने भी हिंसा की घटनाओं की निष्पक्ष जांच की मांग की है। नवाज शरीफ का बड़ा बयान चुनाव प्रचार के दौरान पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (PML-N) प्रमुख नवाज शरीफ ने कहा कि यदि उनकी पार्टी चुनाव जीतती है तो वह प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से उन्हें PoK का प्रधानमंत्री बनाने का आग्रह करेंगे ताकि वे स्वयं क्षेत्र के विकास की निगरानी कर सकें। उन्होंने कहा कि "PoK मेरे लिए पंजाब जितना ही प्रिय है। मेरे पूर्वज कश्मीर से आए थे, इसलिए यह मेरा दूसरा घर है।" 2021 के चुनाव में क्या हुआ था? 2021 के विधानसभा चुनाव में इमरान खान की PTI ने 45 में से 25 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी। सरदार अब्दुल कय्यूम नियाजी प्रधानमंत्री बने, लेकिन 2022 में उन्होंने इस्तीफा दे दिया। इसके बाद सरदार तनवीर इलियास प्रधानमंत्री बने, जिन्हें 2023 में अदालत ने अयोग्य घोषित कर दिया। बाद में चौधरी अनवरुल हक प्रधानमंत्री बने, लेकिन नवंबर 2025 में अविश्वास प्रस्ताव के जरिए उन्हें भी हटा दिया गया। वर्तमान में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) के फैसल मुमताज राठौर PoK के प्रधानमंत्री हैं।