नई व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य पोषाहार वितरण में पारदर्शिता बढ़ाना, फर्जी छात्र संख्या दिखाकर अतिरिक्त राशन लेने की संभावना कम करना और सरकारी संसाधनों की निगरानी को मजबूत करना है। अब सिर्फ रजिस्टर में बच्चों की संख्या दर्ज कर देने से काम नहीं चलेगा। स्कूल में वास्तव में कितने बच्चे मौजूद हैं और कितने बच्चों ने भोजन किया, इसका डिजिटल रिकॉर्ड तैयार किया जाएगा।
बिहार के सरकारी स्कूलों में करीब 1.09 करोड़ बच्चों को पोषाहार उपलब्ध कराया जाता है। अब इन बच्चों की उपस्थिति और मिड डे-मील से जुड़ी जानकारी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर दर्ज होगी।
स्कूल खुलने के बाद प्रधानाध्यापक को निर्धारित जानकारी सुबह 11 बजे तक ई-शिक्षाकोष एप पर अपलोड करनी होगी। इसमें छात्रों की उपस्थिति, भोजन करने वाले बच्चों की संख्या और भोजन की गुणवत्ता से संबंधित जानकारी शामिल होगी।
इस व्यवस्था के जरिए विभाग को रोजाना यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि किस स्कूल में कितने बच्चे मौजूद थे और उनके लिए कितना भोजन तैयार किया गया।
नई व्यवस्था का सबसे अहम हिस्सा बच्चों की वास्तविक संख्या का डिजिटल सत्यापन है। इसके लिए ई-शिक्षाकोष के नए संस्करण में फेस स्कैनिंग और वीडियो रिकॉर्डिंग जैसी सुविधाएं जोड़ी गई हैं।
इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि स्कूल में मौजूद बच्चों की संख्या और रिकॉर्ड में दर्ज संख्या के बीच बड़ा अंतर न हो। यानी केवल कागजी रिकॉर्ड के आधार पर पोषाहार की मात्रा तय करने के बजाय वास्तविक उपस्थिति को डिजिटल सिस्टम में दर्ज किया जाएगा।
नई डिजिटल व्यवस्था का सीधा असर पोषाहार के लिए मिलने वाले राशन के हिसाब पर पड़ेगा। वास्तविक छात्र संख्या के आधार पर भोजन की जरूरत का आकलन किया जाएगा।
इससे अधिक बच्चों की संख्या दिखाकर अतिरिक्त राशन या राशि लेने की संभावना कम हो सकती है। साथ ही सरकारी स्तर पर राशन की खपत का बेहतर हिसाब रखा जा सकेगा।
मिड डे-मील व्यवस्था में सबसे बड़ी चुनौती उन मामलों की होती है, जहां वास्तविक उपस्थिति से ज्यादा बच्चों की संख्या रिकॉर्ड में दर्ज कर दी जाती है। उदाहरण के तौर पर अगर किसी स्कूल में 50 बच्चे मौजूद हैं, लेकिन रिकॉर्ड में 100 बच्चों की संख्या दिखाई जाती है, तो उसी अनुपात में भोजन और राशन की जरूरत दिखाई जा सकती है।
नई व्यवस्था में डिजिटल उपस्थिति और वीडियो रिकॉर्डिंग के जरिए ऐसे अंतर को पकड़ना आसान हो सकता है। हालांकि, तकनीकी व्यवस्था कितनी प्रभावी साबित होगी, यह उसके जमीनी स्तर पर सही क्रियान्वयन और निगरानी पर निर्भर करेगा।
प्रधानाध्यापकों की जिम्मेदारी भी तय की गई है। हर दिन सुबह 11 बजे तक छात्रों की उपस्थिति और मिड डे-मील से संबंधित जरूरी जानकारी एप पर अपलोड करनी होगी।
तय समय तक डेटा अपलोड नहीं करने पर संबंधित प्रधानाध्यापक के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है। इससे स्कूलों को रोजाना रिकॉर्ड अपडेट करने के लिए जवाबदेह बनाया जाएगा।
ई-शिक्षाकोष के नए वर्जन में वीडियो रिकॉर्डिंग की सुविधा का इस्तेमाल छात्रों की वास्तविक संख्या दर्ज करने के लिए किया जाएगा। इससे विभाग के पास स्कूल स्तर पर पोषाहार वितरण का डिजिटल रिकॉर्ड उपलब्ध रहेगा।
भविष्य में किसी स्कूल में राशन की खपत, छात्रों की संख्या या भोजन वितरण को लेकर सवाल उठने पर डिजिटल रिकॉर्ड की जांच की जा सकेगी। इससे निरीक्षण और जवाबदेही की प्रक्रिया भी मजबूत होने की उम्मीद है।
नई व्यवस्था सिर्फ छात्रों की संख्या तक सीमित नहीं है। एप के माध्यम से भोजन करने वाले बच्चों की संख्या और भोजन की गुणवत्ता से संबंधित जानकारी भी दर्ज की जाएगी।
इससे पोषाहार व्यवस्था के दो अहम पहलुओं पर एक साथ निगरानी रखने की कोशिश होगी—पहला, कितने बच्चों को भोजन दिया गया और दूसरा, उन्हें किस गुणवत्ता का भोजन उपलब्ध कराया गया।
मिड डे-मील योजना सीधे बच्चों के पोषण और स्कूलों में उनकी उपस्थिति से जुड़ी है। ऐसे में इस योजना में राशन की बर्बादी या रिकॉर्ड में गड़बड़ी का सीधा असर सरकारी संसाधनों और बच्चों को मिलने वाली सुविधा पर पड़ सकता है।
डिजिटल सिस्टम का उद्देश्य यही है कि रजिस्टर आधारित व्यवस्था को तकनीक से जोड़ा जाए और वास्तविक आंकड़ों के आधार पर राशन की जरूरत तय हो।
हालांकि, फेस स्कैन और वीडियो आधारित निगरानी के साथ डेटा सुरक्षा, इंटरनेट कनेक्टिविटी, तकनीकी गड़बड़ी और स्कूलों में इसके व्यावहारिक इस्तेमाल जैसे पहलुओं पर भी ध्यान देना जरूरी होगा। खासकर ग्रामीण और दूरदराज के स्कूलों में सिस्टम सुचारू रूप से चले, यह इसकी सफलता के लिए महत्वपूर्ण होगा।
बिहार शिक्षा विभाग का यह कदम मिड डे-मील व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण बदलाव माना जा सकता है। अगर डिजिटल रिकॉर्डिंग, फेस स्कैनिंग और समयबद्ध डेटा अपलोड की व्यवस्था सही तरीके से लागू होती है, तो फर्जी छात्र संख्या और राशन संबंधी गड़बड़ियों पर नियंत्रण मजबूत हो सकता है।
लेकिन असली परीक्षा जमीनी स्तर पर होगी। तकनीक के साथ-साथ स्कूलों की जवाबदेही, नियमित निरीक्षण और डेटा की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण होगी। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि नई व्यवस्था से सरकारी पोषाहार योजना में कितनी वास्तविक पारदर्शिता आती है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
पटना: बिहार में शिक्षक भर्ती के चौथे चरण यानी TRE-4 का इंतजार कर रहे अभ्यर्थियों के लिए बड़ी राहत की खबर है। भर्ती प्रक्रिया को लेकर पिछले कुछ समय से चल रही चर्चाओं के बीच बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC) ने स्थिति स्पष्ट कर दी है। आयोग ने उन खबरों को खारिज किया है, जिनमें दावा किया जा रहा था कि TRE-4 की अधियाचना शिक्षा विभाग को वापस भेज दी गई है। BPSC के मुताबिक, अधियाचना वापस नहीं की गई है। जांच के दौरान उसमें कुछ त्रुटियां पाई गई थीं, जिन्हें दूर करने के लिए शिक्षा विभाग को पत्र भेजा गया है। अब संशोधित अधियाचना मिलने के बाद TRE-4 के विज्ञापन जारी करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी। अधियाचना में मिली थीं कुछ त्रुटियां TRE-4 भर्ती को लेकर अभ्यर्थियों के बीच विज्ञापन जारी होने का इंतजार लगातार बढ़ रहा था। इसी बीच अधियाचना वापस होने की खबरों से असमंजस की स्थिति बन गई थी। BPSC ने अब स्पष्ट किया है कि शिक्षा विभाग से TRE-4 के लिए अधियाचना आयोग को प्राप्त हुई थी। आयोग की जांच के दौरान उसमें कुछ कमियां और त्रुटियां सामने आईं। इसके बाद BPSC ने शिक्षा विभाग को पत्र भेजकर आवश्यक सुधार करने को कहा। आयोग ने यह स्पष्ट किया है कि अधियाचना को रद्द या वापस नहीं किया गया है, बल्कि उसमें सुधार की जरूरत बताई गई है। इसका मतलब है कि भर्ती प्रक्रिया बंद नहीं हुई है और आवश्यक संशोधन के बाद इसे आगे बढ़ाया जा सकता है। शिक्षा मंत्री ने बताया क्या है अगला कदम TRE-4 को लेकर बिहार के शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी ने भी महत्वपूर्ण जानकारी दी है। उनके अनुसार, BPSC की ओर से अधियाचना में त्रुटि के संबंध में प्राथमिक शिक्षा निदेशक को पत्र भेजा गया था। शिक्षा मंत्री ने बताया कि आयोग की ओर से बताई गई त्रुटियों को दूर कर दिया गया है और संशोधित अधियाचना भेजने की प्रक्रिया पूरी कर ली गई है। हालांकि, विभाग की ओर से कुछ ऐसे विषयों को भी शामिल किया जाना है, जो पहले भेजी गई अधियाचना में छूट गए थे। इन विषयों को शामिल करने के लिए सप्लीमेंट्री अधियाचना BPSC को भेजी जाएगी। छूटे हुए विषयों के लिए भेजी जाएगी सप्लीमेंट्री अधियाचना शिक्षा मंत्री के मुताबिक, कुछ विषय पहली अधियाचना में शामिल नहीं हो पाए थे। अब इन विषयों को भी भर्ती प्रक्रिया में शामिल करने की तैयारी है। विभाग अगले एक-दो दिनों में सप्लीमेंट्री अधियाचना BPSC को भेज सकता है। इसके बाद आयोग के स्तर पर भर्ती प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का रास्ता और स्पष्ट हो जाएगा। मंत्री ने यह भी संकेत दिया कि विभाग और आयोग के बीच इस मुद्दे पर लगातार समन्वय बना हुआ है। उन्होंने बताया कि TRE-4 को लेकर BPSC अध्यक्ष से उनकी व्यक्तिगत स्तर पर बातचीत भी हुई है। विज्ञापन और परीक्षा की तारीख पर क्या अपडेट? TRE-4 अभ्यर्थियों के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर विज्ञापन कब जारी होगा और परीक्षा की तारीख कब घोषित होगी। फिलहाल BPSC की ओर से विज्ञापन की कोई अंतिम तारीख आधिकारिक रूप से सामने नहीं आई है। लेकिन शिक्षा मंत्री के बयान से संकेत मिल रहा है कि अधियाचना से जुड़ी तकनीकी और प्रशासनिक अड़चनों को दूर करने का काम तेजी से किया जा रहा है। संशोधित और सप्लीमेंट्री अधियाचना BPSC को मिलने के बाद आयोग विज्ञापन जारी करने की दिशा में आगे बढ़ सकता है। इसके बाद परीक्षा कार्यक्रम को लेकर आधिकारिक जानकारी सामने आने की उम्मीद है। अभ्यर्थियों के लिए सबसे अहम बात TRE-4 की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों को फिलहाल एक बात स्पष्ट रूप से समझनी चाहिए कि भर्ती प्रक्रिया रद्द नहीं हुई है और अधियाचना वापस होने की बात BPSC ने खारिज कर दी है। विज्ञापन में देरी का कारण अधियाचना में पाई गई त्रुटियों का सुधार और कुछ छूटे हुए विषयों को शामिल करने की प्रक्रिया है। विभाग की ओर से संशोधित अधियाचना के साथ सप्लीमेंट्री अधियाचना भेजे जाने के बाद BPSC भर्ती प्रक्रिया को आगे बढ़ा सकता है। अभ्यर्थियों को अब BPSC और शिक्षा विभाग की आधिकारिक सूचनाओं पर नजर रखनी चाहिए। सोशल मीडिया पर चल रही अपुष्ट तारीखों या दावों के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से बचना जरूरी है। TRE-4 को लेकर फिलहाल तस्वीर यही है कि प्रक्रिया जारी है, अटकी हुई अधियाचना में सुधार किया जा रहा है और विज्ञापन जारी होने की दिशा में अगला कदम संशोधित अधियाचना मिलने के बाद उठाया जाएगा।
पटना: राष्ट्रीय जनता दल (RJD) की बिहार प्रदेश की पूरी संगठनात्मक कमेटी भंग किए जाने के बाद पार्टी के भीतर सियासी हलचल तेज हो गई है। संगठन को नए सिरे से खड़ा करने की कवायद के बीच अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि नई कमेटी में किन नेताओं को जगह मिलेगी और नेतृत्व किस तरह संगठनात्मक ढांचे में बदलाव करेगा। इसी बीच RJD के वरिष्ठ नेता भाई वीरेंद्र के तीखे बयान ने पार्टी के भीतर चल रही चर्चाओं को और हवा दे दी है। भाई वीरेंद्र ने कहा कि पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने नेतृत्व पर भरोसा जताया था। उनके मुताबिक नेताओं की राय और सलाह के आधार पर बिहार की पूरी RJD कमेटी को भंग किया गया है। अब नई कमेटी कब बनेगी और उसमें किन नेताओं को जिम्मेदारी मिलेगी, इसका फैसला पार्टी नेतृत्व करेगा। कमेटी भंग होने के बाद नेताओं में बढ़ी बेचैनी पूरी प्रदेश कमेटी के भंग होने के बाद पार्टी के पुराने पदाधिकारियों के साथ-साथ संगठन में जिम्मेदारी की उम्मीद लगाए बैठे नेताओं की नजर अब नई टीम पर है। संगठन में बदलाव को पार्टी के भीतर एक बड़े पुनर्गठन के तौर पर देखा जा रहा है। नई कमेटी में पुराने चेहरों को बरकरार रखा जाएगा या नए नेताओं को अधिक जिम्मेदारी दी जाएगी, यह फिलहाल स्पष्ट नहीं है। हालांकि, यह जरूर माना जा रहा है कि आने वाला संगठनात्मक ढांचा RJD की जमीनी सक्रियता और आगामी राजनीतिक रणनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण होगा। भाई वीरेंद्र ने साधा निशाना कमेटी भंग होने के सवाल पर भाई वीरेंद्र ने राजनीति में सक्रिय कुछ लोगों की कार्यशैली पर भी तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि कुछ लोगों को राजनीति में पैसा कमाने की भूख है, जबकि कुछ लोग ‘छपास की बीमारी’ से परेशान हैं। उनके इस बयान को पार्टी के भीतर चल रही खींचतान से जोड़कर देखा जा रहा है। ‘छपास की बीमारी’ के जरिए उन्होंने उन नेताओं पर निशाना साधा, जो लगातार सार्वजनिक बयान देकर या मीडिया में बने रहकर अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराने की कोशिश करते हैं। भाई वीरेंद्र के बयान का एक संदेश यह भी माना जा रहा है कि संगठन में ऐसे नेताओं की भूमिका को लेकर पार्टी के भीतर बहस चल रही है, जिनकी प्राथमिकता संगठन मजबूत करने के बजाय व्यक्तिगत राजनीतिक पहचान बनाने पर अधिक केंद्रित मानी जा रही है। नई कमेटी ही तय करेगी संगठन की नई दिशा RJD की पूरी बिहार कमेटी भंग किए जाने के बाद अब पार्टी नेतृत्व के सामने कई चुनौतियां हैं। सिर्फ नए पदाधिकारियों की नियुक्ति करना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि बूथ और पंचायत स्तर तक संगठन को सक्रिय करना, कार्यकर्ताओं के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना और पुराने नेताओं की नाराजगी को दूर करना भी अहम होगा। ऐसे में नई कमेटी के गठन को केवल संगठनात्मक प्रक्रिया के तौर पर नहीं देखा जा रहा है। यह फैसला आने वाले समय में पार्टी के भीतर शक्ति संतुलन और नेतृत्व की प्राथमिकताओं का संकेत भी दे सकता है। पुराने नेताओं को मौका या नए चेहरों पर भरोसा? पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच सबसे ज्यादा चर्चा इसी बात की है कि नई टीम में किस तरह का संतुलन बनाया जाएगा। क्या लंबे समय से संगठन में सक्रिय नेताओं को फिर से महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिलेगी या नेतृत्व नई पीढ़ी के चेहरों को आगे लाएगा? भाई वीरेंद्र ने कमेटी गठन की समयसीमा को लेकर स्पष्ट किया कि इसका फैसला पार्टी नेतृत्व करेगा। यानी फिलहाल संगठन के नेताओं और कार्यकर्ताओं को नेतृत्व के अगले निर्णय का इंतजार करना होगा। RJD के लिए बड़ी संगठनात्मक परीक्षा राजनीतिक दृष्टि से देखें तो कमेटी भंग करना किसी भी पार्टी के लिए बड़ा संगठनात्मक फैसला होता है। इससे एक ओर नेतृत्व को नए सिरे से टीम चुनने का अवसर मिलता है, तो दूसरी ओर पुराने पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं की नाराजगी का जोखिम भी रहता है। RJD के सामने चुनौती यह होगी कि नई कमेटी में ऐसा संतुलन बनाया जाए जिससे अनुभवी नेताओं की भूमिका भी बनी रहे और नए चेहरों को आगे बढ़ने का अवसर भी मिले। इसके साथ ही पार्टी के भीतर सार्वजनिक बयानबाजी और गुटीय मतभेदों को नियंत्रित करना भी नेतृत्व के लिए महत्वपूर्ण होगा। भाई वीरेंद्र के बयान के बाद अब नई कमेटी का गठन और भी महत्वपूर्ण हो गया है। आखिर नेतृत्व किन नेताओं पर भरोसा जताता है, किसे संगठन में जगह मिलती है और किन चेहरों को बाहर रखा जाता है, इससे RJD की आगे की राजनीतिक दिशा का काफी हद तक संकेत मिल सकता है।
सहरसा: बिहार के सहरसा जिले में जिला कार्यक्रम पदाधिकारी (DPO) अजीत अमर के खिलाफ आर्थिक अपराध इकाई (EOU) की कार्रवाई में कथित तौर पर आय से अधिक संपत्ति का मामला सामने आया है। EOU ने शुक्रवार को DPO से जुड़े चार ठिकानों पर एक साथ छापेमारी की। जांच एजेंसी के अनुसार, अब तक की कार्रवाई में अजीत अमर की संपत्ति उनकी ज्ञात आय से 72.35 प्रतिशत अधिक होने की जानकारी सामने आई है। छापेमारी के दौरान अधिकारियों ने कई महत्वपूर्ण दस्तावेज, बैंक खातों और निवेश से जुड़े कागजात, जमीन की खरीद के दस्तावेज, मकान निर्माण से संबंधित बिल और बड़ी मात्रा में आभूषण बरामद किए हैं। वेतन से करीब 38 लाख रुपये की आय, संपत्ति पर उठे सवाल जानकारी के अनुसार, अजीत अमर 4 फरवरी 2022 को सरकारी सेवा में आए थे। करीब साढ़े चार साल के कार्यकाल में उन्हें वेतन के रूप में लगभग 38 लाख रुपये प्राप्त हुए। EOU की कार्रवाई में उनकी और उनके परिवार से जुड़ी कई संपत्तियों और निवेश के दस्तावेज सामने आने के बाद एजेंसी आय और संपत्ति के बीच अंतर की जांच कर रही है। जांच के मुताबिक, सीवान जिले के दरौंदा थाना क्षेत्र के रैनी स्थित पैतृक जमीन पर करीब 40 लाख रुपये से अधिक की लागत से आलीशान मकान बनवाया गया है। मकान की तलाशी के दौरान निर्माण से संबंधित करीब 30 बिल भी मिले। पैतृक आवास से 40 लाख रुपये से ज्यादा के जेवर EOU की टीम को अजीत अमर के पैतृक गांव स्थित निजी आवास से करीब 40.05 लाख रुपये मूल्य के आभूषण मिले। इसके अलावा छापेमारी के दौरान करीब 27 लाख रुपये के आभूषण की खरीद से संबंधित रसीदें भी मिलने की जानकारी सामने आई है। एजेंसी इन दस्तावेजों और संपत्तियों के स्रोत की जांच कर रही है। पत्नी के नाम 6 बीघा से ज्यादा जमीन छपरा स्थित सरकारी आवास की तलाशी के दौरान अजीत अमर की पत्नी पूजा कुमारी के नाम खरीदी गई जमीन के दस्तावेज भी मिले। दस्तावेजों के मुताबिक, सारण जिले के परसागढ़ में 23 मई 2025 को 6 बीघा 9 कट्ठा 8 धूर जमीन खरीदी गई थी। इस जमीन की खरीद से जुड़े दस्तावेज EOU के हाथ लगे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, इस जमीन की खरीद पर करीब 41.50 लाख रुपये खर्च किए गए थे। जमीन की खरीद और उसके भुगतान के स्रोत को लेकर भी जांच की जा रही है। स्कॉर्पियो और बाइक के दस्तावेज भी मिले छापेमारी के दौरान वाहन से जुड़े दस्तावेज भी सामने आए। इनमें 24 अप्रैल 2023 को खरीदी गई महिंद्रा स्कॉर्पियो क्लासिक, जिसकी कीमत करीब 15.35 लाख रुपये बताई गई है, शामिल है। इसके अलावा एक बाइक भी मिली है। EOU इन संपत्तियों और वाहनों की खरीद के लिए इस्तेमाल किए गए धन के स्रोत की भी जांच कर रही है। चार बैंक खाते और निवेश से जुड़े दस्तावेज जांच के दौरान अजीत अमर और उनकी पत्नी के नाम पर कुल चार बैंक खातों की जानकारी सामने आने की बात कही गई है। इसके साथ ही विभिन्न निवेशों से संबंधित कागजात भी मिले हैं। एजेंसी अब बैंक खातों, निवेश, जमीन, मकान, वाहनों और आभूषणों की कीमत को उनकी वैध आय से मिलाकर देख रही है। चार ठिकानों पर एक साथ हुई छापेमारी EOU ने शुक्रवार को अजीत अमर से जुड़े चार स्थानों पर कार्रवाई की। इनमें सीवान स्थित उनका पैतृक आवास और निजी मकान, सहरसा के नया बाजार स्थित किराए का आवास, सहरसा स्थित सरकारी कार्यालय कक्ष और छपरा के गंडक कॉलोनी स्थित सरकारी आवास शामिल बताए गए हैं। यह कार्रवाई उस जांच के बाद हुई, जिसमें अजीत अमर पर कथित तौर पर अवैध तरीके से धन अर्जित करने के आरोपों की जांच की जा रही थी। अजीत अमर जब छपरा में DPO प्लानिंग एंड अकाउंट के पद पर प्रतिनियुक्त थे, उस दौरान उन पर अवैध कमाई के आरोप लगे थे। इसके बाद जिला प्रशासन की ओर से मामले की जांच कराई गई। अब संपत्तियों के स्रोत की होगी जांच EOU की छापेमारी में सामने आए दस्तावेज और संपत्तियां जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। अब एजेंसी यह पता लगाने की कोशिश करेगी कि जमीन, मकान, आभूषण, वाहन और अन्य निवेश के लिए धन कहां से आया और क्या ये संपत्तियां अजीत अमर की घोषित एवं वैध आय के अनुरूप हैं। फिलहाल सामने आई संपत्तियों और आय के बीच अंतर को लेकर EOU की जांच जारी है। अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने और संबंधित दस्तावेजों के सत्यापन के बाद ही स्पष्ट होगा।