अमेरिका में हुई एक नई रिसर्च के मुताबिक, Metabolic Dysfunction-Associated Steatotic Liver Disease से पीड़ित लोग अगर महीने में कम से कम एक बार भी ‘बिंज ड्रिंकिंग’ करते हैं, तो उनमें एडवांस्ड लीवर फाइब्रोसिस का खतरा तीन गुना तक बढ़ सकता है।
यह अध्ययन National Health and Nutrition Examination Survey (NHANES) के 2017–2023 के डेटा पर आधारित है। इसमें 8,000 से अधिक लोगों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया, जिनमें विभिन्न प्रकार की लीवर बीमारियों से पीड़ित मरीज शामिल थे।
शोधकर्ताओं ने ‘बिंज ड्रिंकिंग’ को इस तरह परिभाषित किया:
स्टडी में पाया गया कि:
रिसर्च के अनुसार:
शोधकर्ताओं ने लीवर की कठोरता (liver stiffness) के आधार पर बीमारी की गंभीरता तय की:
अभी तक लीवर बीमारी की श्रेणियों में केवल औसत शराब सेवन को ध्यान में रखा जाता था, लेकिन यह स्टडी बताती है कि ‘कभी-कभार ज्यादा पीना’ भी उतना ही खतरनाक है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि अगर बिंज ड्रिंकिंग को ध्यान में रखकर मरीजों को दोबारा वर्गीकृत किया जाए, तो MetALD (MASLD + Alcohol) के मामलों की संख्या अमेरिका में दोगुनी से भी ज्यादा हो सकती है।
यह रिसर्च साफ संकेत देती है कि:
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। आधुनिक जीवनशैली में खुद को फिट रखने के लिए अधिकांश लोग अपने आहार में फलों के रस (फ्रूट जूस) को शामिल करते हैं। विशेषकर सुबह के नाश्ते या दोपहर के समय जूस पीना एक स्वस्थ विकल्प माना जाता है। हालांकि, स्वास्थ्य विशेषज्ञों के बीच इस बात को लेकर अक्सर चर्चा होती है कि क्या जूस का नियमित सेवन ब्लड प्रेशर (BP) और शुगर लेवल को अनियंत्रित कर सकता है। हालिया शोध और विशेषज्ञों के विश्लेषण से यह स्पष्ट हुआ है कि फलों का रस पोषक तत्वों से भरपूर होने के बावजूद, इसके सेवन का तरीका और मात्रा सेहत के लिए जोखिम पैदा कर सकती है। फ्रूट जूस और ब्लड शुगर के बीच गहरा संबंध स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, फलों के रस का ग्लाइसेमिक इंडेक्स (GI) मध्यम से थोड़ा अधिक होता है। इसका सीधा अर्थ यह है कि जूस पीने के बाद यह शरीर में बहुत तेजी से पचता है और रक्त में शुगर की मात्रा को अस्थाई रूप से बढ़ा देता है। शोध बताते हैं कि भले ही जूस प्राकृतिक फलों से तैयार किया गया हो, लेकिन इसमें मौजूद शुगर की सांद्रता शरीर के इंसुलिन रिस्पॉन्स को प्रभावित कर सकती है। यदि कोई व्यक्ति पहले से ही हाई ब्लड प्रेशर या डायबिटीज से जूझ रहा है, तो अनियंत्रित मात्रा में जूस का सेवन उसके लिए चिंता का विषय बन सकता है। साबुत फल बनाम जूस: फाइबर की अहम भूमिका अक्सर यह सवाल उठता है कि फल खाना बेहतर है या उनका रस पीना। जानकारों का कहना है कि साबुत फलों में फाइबर की प्रचुर मात्रा होती है, जो जूस निकालने की प्रक्रिया में पूरी तरह नष्ट हो जाती है। फाइबर शरीर में शुगर के अवशोषण (Absorption) की गति को धीमा करने का महत्वपूर्ण कार्य करता है। जब हम केवल जूस का सेवन करते हैं, तो फाइबर की अनुपस्थिति के कारण शरीर को सीधे 'लिक्विड शुगर' मिलती है, जो तेजी से अवशोषित होकर ब्लड शुगर लेवल को ऊपर ले जाती है। यही कारण है कि पोषण विशेषज्ञ जूस के बजाय सीधे फल खाने की सलाह देते हैं। कब और कैसे करें जूस का सेवन? रिपोर्ट के अनुसार, फ्रूट जूस पूरी तरह हानिकारक नहीं है, बल्कि इसके सेवन का समय और मात्रा सबसे अधिक मायने रखती है। विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि जूस में विटामिन और मिनरल्स जैसे जरूरी पोषक तत्व मौजूद होते हैं, जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं। हालांकि, मधुमेह के रोगियों को जूस पीने से पहले अपने चिकित्सक से परामर्श अवश्य लेना चाहिए। जूस के बजाय यदि स्मूदी या बिना छाने हुए रस का उपयोग किया जाए, तो कुछ हद तक फाइबर को बरकरार रखा जा सकता है, जो सेहत के लिए तुलनात्मक रूप से बेहतर विकल्प साबित हो सकता है। निष्कर्ष और विशेषज्ञों की राय कुल मिलाकर, फ्रूट जूस सीधे तौर पर ब्लड प्रेशर बढ़ाता है या नहीं, इस पर शोध के अलग-अलग पहलू हैं, लेकिन यह रक्त शर्करा को प्रभावित कर अप्रत्यक्ष रूप से मेटाबॉलिज्म पर असर डालता है। हृदय रोगों और हाइपरटेंशन से बचाव के लिए एक संतुलित दिनचर्या का होना आवश्यक है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का सुझाव है कि प्राकृतिक रूप से मीठे फलों का सीमित मात्रा में सेवन करना ही स्वास्थ्य के लिए सबसे सुरक्षित मार्ग है। किसी भी स्वास्थ्य संबंधी समस्या के होने पर आहार में बदलाव करने से पहले विशेषज्ञ की सलाह लेना अनिवार्य है।
स्वास्थ्य क्षेत्र में एक बड़ी प्रगति सामने आई है, जहां वैज्ञानिकों ने एक ऐसा लो-कॉस्ट ब्लड टेस्ट विकसित किया है, जो एक साथ कई प्रकार के कैंसर का पता लगाने में सक्षम हो सकता है। यह नई तकनीक cell-free DNA (cfDNA) पर आधारित है, जिसे भविष्य में कैंसर स्क्रीनिंग के तरीके को पूरी तरह बदलने वाला माना जा रहा है। क्या है यह नई तकनीक? मल्टीकैंसर डिटेक्शन के लिए विकसित इस नई टेस्ट तकनीक का नाम MethylScan है। यह खून में मौजूद cfDNA के मिथाइलेशन पैटर्न का विश्लेषण करके शरीर के अलग-अलग अंगों से जुड़े कैंसर के संकेतों को पहचानता है। यह टेस्ट न केवल कम खर्चीला है, बल्कि एक ही सैंपल से कई बीमारियों की पहचान करने की क्षमता रखता है, जो इसे मौजूदा टेस्ट्स से अलग बनाता है। स्टडी में क्या पाया गया? इस रिसर्च में 1061 लोगों पर परीक्षण किया गया और इसके नतीजे बेहद प्रभावशाली रहे: लिवर, लंग, ओवेरियन और स्टमक कैंसर की पहचान में AUROC स्कोर 0.938 रहा सेंसिटिविटी 63.3% और स्पेसिफिसिटी 98% दर्ज की गई शुरुआती स्टेज के कैंसर में भी टेस्ट ने 0.916 का AUROC हासिल किया लिवर कैंसर मॉनिटरिंग में सेंसिटिविटी 79.6% तक पहुंची ये आंकड़े बताते हैं कि यह तकनीक शुरुआती चरण में भी कैंसर पहचानने की दिशा में कारगर हो सकती है। क्यों है यह खोज अहम? अब तक ज्यादातर कैंसर टेस्ट महंगे होते हैं और एक समय में एक ही बीमारी का पता लगा पाते हैं। लेकिन यह नया ब्लड टेस्ट: एक साथ कई कैंसर की पहचान कर सकता है शुरुआती स्टेज में बीमारी पकड़ने में मददगार हो सकता है कम लागत के कारण ज्यादा लोगों तक पहुंच सकता है क्या हैं सीमाएं? हालांकि यह शोध काफी उम्मीद जगाता है, लेकिन अभी इसे बड़े स्तर पर और अलग-अलग आबादी पर जांचने की जरूरत है। साथ ही शुरुआती स्टेज के कैंसर में सेंसिटिविटी को और बेहतर करने की आवश्यकता है। भविष्य की दिशा विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में ऐसे ब्लड टेस्ट: कैंसर स्क्रीनिंग को आसान और सुलभ बना सकते हैं समय रहते इलाज शुरू करने में मदद करेंगे हेल्थकेयर सिस्टम पर बोझ कम कर सकते हैं
एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अध्ययन में यह सामने आया है कि Natural Killer Cells (NK Cells) हार्ट अटैक के बाद दिल को होने वाले नुकसान को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाते हैं। यह खोज Myocardial Infarction के बाद शरीर की इम्यून प्रतिक्रिया को समझने में एक बड़ा कदम मानी जा रही है। हार्ट अटैक और इम्यून सिस्टम का कनेक्शन दुनियाभर में हार्ट अटैक हार्ट फेलियर का एक प्रमुख कारण है। अब तक माना जाता था कि दिल को नुकसान केवल ब्लड सप्लाई रुकने (इस्कीमिया) से होता है, लेकिन नई रिसर्च बताती है कि शरीर का इम्यून सिस्टम भी इस नुकसान को बढ़ा सकता है। खासतौर पर NK Cells जैसे साइटोटॉक्सिक इम्यून सेल्स की भूमिका अब तक स्पष्ट नहीं थी। कैसे बढ़ता है दिल को नुकसान? रिसर्च के अनुसार, हार्ट अटैक के तुरंत बाद NK Cells तेजी से एक्टिव हो जाते हैं और दिल के क्षतिग्रस्त हिस्से तक पहुंच जाते हैं। एक्टिव होने के बाद ये सेल्स Granzyme B नामक जहरीला प्रोटीन छोड़ते हैं, जो दिल की मांसपेशियों की कोशिकाओं को Apoptosis के जरिए नष्ट कर देता है। इससे होता है: दिल की कोशिकाओं का ज्यादा नुकसान दिल की संरचना में खराब बदलाव (वेंट्रिकुलर रिमॉडलिंग) दिल की कार्यक्षमता में गिरावट प्रयोगों से मिले ठोस सबूत रिसर्च में यह भी साबित हुआ कि NK Cells केवल मौजूद नहीं होते, बल्कि सक्रिय रूप से नुकसान पहुंचाते हैं। जब NK Cells को हटाया या कम किया गया, तो दिल की कोशिकाओं की मौत कम हुई और हार्ट फंक्शन बेहतर हुआ। वहीं, NK Cells को ज्यादा एक्टिव करने पर दिल को नुकसान और बढ़ गया और हार्ट फेलियर का खतरा तेजी से बढ़ा। दिल से बाहर भी असर यह अध्ययन यह भी बताता है कि NK Cells केवल दिल तक सीमित नहीं हैं। ये बोन मैरो को भी प्रभावित करते हैं और शरीर में अन्य इम्यून सेल्स के उत्पादन को बढ़ाते हैं, जिससे पूरे शरीर में सूजन बढ़ सकती है। मानव हृदय ऊतकों के विश्लेषण में भी ऐसे ही संकेत मिले, जिससे यह संभावना मजबूत होती है कि यह मैकेनिज्म इंसानों में भी लागू हो सकता है। भविष्य की इलाज की दिशा हालांकि यह अध्ययन अभी मुख्य रूप से जानवरों पर आधारित है, लेकिन यह एक नई उम्मीद जगाता है। अगर NK Cells को नियंत्रित किया जाए, तो: हार्ट अटैक के बाद नुकसान कम किया जा सकता है दिल की रिकवरी बेहतर हो सकती है हार्ट फेलियर का खतरा घटाया जा सकता है फिलहाल, इस दिशा में और रिसर्च की जरूरत है ताकि इसे सुरक्षित रूप से मरीजों पर लागू किया जा सके।