कोलकाता, एजेंसियां। पश्चिम बंगाल सरकार ने कानून-व्यवस्था को और मजबूत बनाने के उद्देश्य से पुलिस महकमे में बड़ा प्रशासनिक फेरबदल किया है। राज्य पुलिस मुख्यालय की ओर से जारी आदेश के अनुसार 16 डिप्टी सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस (DSP) और 108 थाना प्रभारियों का तबादला किया गया है। इस फैसले को आगामी प्रशासनिक चुनौतियों और कानून-व्यवस्था को बेहतर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
तबादला सूची में कोलकाता, हावड़ा, उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना, हुगली, पूर्व और पश्चिम मेदिनीपुर सहित कई जिलों के अधिकारियों को नई जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं। राज्य सरकार का कहना है कि यह बदलाव पुलिस व्यवस्था को अधिक प्रभावी और जवाबदेह बनाने के उद्देश्य से किया गया है।
सूत्रों के मुताबिक, संवेदनशील क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए यह फेरबदल किया गया है। नए अधिकारियों को जल्द कार्यभार संभालने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि कानून-व्यवस्था बनाए रखने और अपराध नियंत्रण की रणनीति को और प्रभावी बनाया जा सके।
राज्य पुलिस मुख्यालय की ओर से जारी अधिसूचना के अनुसार सभी संबंधित अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से नई तैनाती पर योगदान देने के निर्देश दिए गए हैं। अधिकारियों का मानना है कि इस व्यापक फेरबदल से पुलिस प्रशासन की कार्यक्षमता और समन्वय में सुधार होगा।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। PM CARES Fund की वित्त वर्ष 2024-25 की ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक हो गई है। रिपोर्ट के मुताबिक 31 मार्च 2025 तक फंड का कुल कोष बढ़कर करीब ₹8,452 करोड़ हो गया। इनमें से लगभग ₹7,846.65 करोड़ यानी करीब 93 प्रतिशत राशि फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) में रखी गई थी। एक साल में सिर्फ ₹87.85 लाख खर्च रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2024-25 में PM CARES Fund से कुल ₹87.85 लाख खर्च किए गए। इसके मुकाबले 31 मार्च 2025 तक फंड की कुल राशि ₹8,452 करोड़ से अधिक थी। इससे पहले कोरोना महामारी के दौरान फंड से वेंटिलेटर, ऑक्सीजन प्लांट, वैक्सीन और अन्य स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए बड़ी रकम खर्च की गई थी। हालिया वर्ष में खर्च काफी कम रहा। घरेलू चंदे में 30% की गिरावट ऑडिट रिपोर्ट के मुताबिक 2024-25 में घरेलू स्रोतों से मिलने वाला चंदा करीब ₹479 करोड़ रहा, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 30 प्रतिशत कम है। विदेशी योगदान भी घटकर करीब ₹92.8 लाख रहा। वहीं, फंड को अपनी जमा राशि पर मिलने वाले ब्याज से बड़ी आय हुई। रिपोर्ट के अनुसार FD में रखी रकम पर मिलने वाला ब्याज घरेलू चंदे के लगभग बराबर रहा। ₹324 करोड़ की वापसी पर भी सवाल रिपोर्ट में विभिन्न कार्यान्वयन एजेंसियों से करीब ₹324 करोड़ की राशि वापस मिलने का उल्लेख भी सामने आया है। इस रकम और फंड के कम खर्च को लेकर राजनीतिक और सार्वजनिक बहस तेज हो गई है। आलोचकों ने फंड में बड़ी राशि के निष्क्रिय रहने और खर्च से जुड़ी जानकारी पर सवाल उठाए हैं, जबकि PM CARES की आधिकारिक जानकारी के अनुसार यह स्वैच्छिक योगदान से बना सार्वजनिक धर्मार्थ ट्रस्ट है और इसे बजटीय सहायता नहीं मिलती। रिपोर्ट सामने आने के बाद सियासी बहस तेज PM CARES की वित्तीय जानकारी लंबे अंतराल के बाद सार्वजनिक होने से अब फंड के इस्तेमाल, पारदर्शिता और बड़ी रकम FD में रखने को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। आधिकारिक वेबसाइट पर भी फंड की जानकारी और नवीनतम FAQ उपलब्ध हैं।
नई दिल्ली, एजेंसियां। दिल्ली जल बोर्ड के सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) से जुड़े कथित टेंडर घोटाले में दिल्ली की एंटी करप्शन ब्रांच (ACB) ने पूर्व मंत्री और आम आदमी पार्टी नेता सत्येंद्र जैन समेत छह लोगों को गिरफ्तार किया है। यह कार्रवाई 18 अगस्त 2026 को हुई। गिरफ्तार किए गए लोगों में दिल्ली जल बोर्ड के पूर्व CEO और IAS अधिकारी उदित प्रकाश राय भी शामिल हैं। 1,900 करोड़ रुपये से ज्यादा के टेंडर की जांच मामला दिल्ली जल बोर्ड की करीब ₹1,943 करोड़ की बहु-टेंडर STP परियोजनाओं से जुड़ा बताया जा रहा है। जांच एजेंसी के अनुसार, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के विस्तार और उन्नयन से जुड़े टेंडर की प्रक्रिया में कथित तौर पर अनियमितताएं की गईं। आरोप है कि टेंडर की तकनीकी शर्तों में इस तरह बदलाव किया गया जिससे एक खास तकनीक उपलब्ध कराने वाली कंपनी को फायदा मिल सके। सत्येंद्र जैन समेत छह आरोपी गिरफ्तार ACB के अनुसार गिरफ्तार किए गए छह लोगों में सत्येंद्र जैन, पूर्व DJB CEO उदित प्रकाश राय, पूर्व संविदा सलाहकार अंकित श्रीवास्तव तथा निजी क्षेत्र से जुड़े नागेंद्र यादव, राजा कुमार कुर्रा और पंकज वर्मा शामिल हैं। एजेंसी मामले में कथित रिश्वत और पैसों के लेन-देन की कड़ियों की जांच कर रही है। रिपोर्टों में कथित रिश्वत की रकम को लेकर अलग-अलग आंकड़े सामने आए हैं, इसलिए अंतिम रकम के बारे में जांच एजेंसी की आधिकारिक जानकारी का इंतजार महत्वपूर्ण है। AAP ने गिरफ्तारी को बताया राजनीतिक कार्रवाई सत्येंद्र जैन की गिरफ्तारी के बाद दिल्ली की राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं। आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल ने कार्रवाई को राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया है, जबकि बीजेपी ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि जांच में कथित पैसों के लेन-देन के सबूत सामने आए हैं। बीजेपी की ओर से इस गिरफ्तारी को भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई बताया जा रहा है, जबकि AAP इसे विपक्षी नेताओं को निशाना बनाने की कार्रवाई बता रही है। आगे की जांच में क्या सामने आएगा? ACB अब टेंडर प्रक्रिया, संबंधित कंपनियों के बीच हुए वित्तीय लेन-देन और कथित रिश्वत के पैसों की कड़ी की जांच कर रही है। जांच एजेंसी यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि क्या टेंडर की शर्तों में जानबूझकर बदलाव किया गया और सरकारी परियोजना से जुड़े धन का गलत इस्तेमाल हुआ। फिलहाल आरोप जांच के दायरे में हैं और अदालत में दोष सिद्ध होना बाकी है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। सुप्रीम कोर्ट ने फांसी को मृत्युदंड देने की मौजूदा कानूनी प्रक्रिया से हटाकर किसी दूसरे तरीके, जैसे घातक इंजेक्शन, से बदलने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने 18 अगस्त 2026 को फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि मौजूदा सामग्री के आधार पर यह साबित नहीं होता कि घातक इंजेक्शन फांसी की तुलना में कम पीड़ादायक है। फांसी की संवैधानिक वैधता बरकरार याचिका में फांसी को असंवैधानिक घोषित करने और इसकी जगह कम पीड़ादायक तरीकों को अपनाने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता ने घातक इंजेक्शन, गोली मारने और अन्य वैकल्पिक तरीकों का सुझाव दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि मौजूदा व्यवस्था को हटाने से इनकार कर दिया। अदालत ने अपने फैसले में पिछली न्यायिक व्यवस्था का भी उल्लेख किया और कहा कि केवल इस आधार पर मौजूदा प्रक्रिया को असंवैधानिक नहीं ठहराया जा सकता कि कोई वैकल्पिक तरीका मौजूद हो सकता है। वैज्ञानिक प्रमाण मिलने पर हो सकता है दोबारा विचार सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर भविष्य का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं किया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि भविष्य में ठोस वैज्ञानिक, चिकित्सकीय या अनुभवजन्य प्रमाण सामने आते हैं, जिनसे यह साबित हो कि कोई दूसरा तरीका कम पीड़ादायक और अधिक मानवीय है, तो इस विषय पर फिर विचार किया जा सकता है। साथ ही केंद्र सरकार अपने स्तर पर विशेषज्ञों की समिति बनाकर मौजूदा फांसी की प्रक्रिया और संभावित वैकल्पिक तरीकों की व्यापक समीक्षा कर सकती है। मृत्युदंड के दौरान गरिमा बनाए रखना जरूरी अदालत ने यह भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि राज्य को मृत्युदंड लागू करने का कानूनी अधिकार होने के बावजूद उसे मनमाने, अत्यधिक या मानवीय गरिमा के विरुद्ध तरीके से लागू नहीं किया जा सकता। मृत्युदंड की अंतिम और अपरिवर्तनीय प्रकृति को देखते हुए अदालत ने प्रक्रिया में अनावश्यक पीड़ा को कम करने और दोषी की गरिमा बनाए रखने पर जोर दिया। इस फैसले के बाद फिलहाल भारत में मृत्युदंड देने के लिए फांसी की मौजूदा व्यवस्था जारी रहेगी, हालांकि भविष्य में नए वैज्ञानिक प्रमाण मिलने पर वैकल्पिक तरीकों पर बहस और न्यायिक समीक्षा की संभावना बनी रहेगी।