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Verdict Expected in Bhojshala Dispute

भोजशाला विवाद पर आज आ सकता है हाई कोर्ट का फैसला, डिप्टी सीएम बोले- ‘शांति से स्वीकार करें निर्णय’

surbhi मई 15, 2026 0
Security tightened near Bhojshala complex in Dhar ahead of Madhya Pradesh High Court verdict
Bhojshala Dispute High Court Verdict

Madhya Pradesh के धार स्थित भोजशाला-कमाल मौला परिसर विवाद पर आज बड़ा फैसला आ सकता है। Madhya Pradesh High Court की इंदौर खंडपीठ ने मामले में फैसला सुनाने के लिए 15 मई की तारीख तय की है। फैसले से पहले प्रशासन और पुलिस पूरी तरह अलर्ट मोड पर हैं।

सुरक्षा व्यवस्था कड़ी, प्रशासन ने की शांति की अपील

धार जिले में सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए हैं। जिला प्रशासन ने लोगों से अफवाहों पर ध्यान न देने और शांति बनाए रखने की अपील की है।

धार कलेक्टर राजीव रंजन मीना ने कहा कि भोजशाला परिसर Archaeological Survey of India यानी ASI द्वारा संरक्षित स्मारक है। प्रशासन सोशल मीडिया और अन्य प्लेटफॉर्म पर लगातार नजर बनाए हुए है। किसी भी तरह की भ्रामक जानकारी फैलाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की चेतावनी दी गई है।

डिप्टी सीएम जगदीश देवड़ा का बयान

मध्य प्रदेश के डिप्टी सीएम Jagdish Devda ने कहा कि सरकार कोर्ट के फैसले का सम्मान करेगी। उन्होंने लोगों से अपील की कि जो भी निर्णय आए, उसे शांति और संयम के साथ स्वीकार करें। उन्होंने कहा कि धार में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पर्याप्त सुरक्षा बल तैनात किए गए हैं।

क्या है भोजशाला-कमाल मौला विवाद?

धार स्थित भोजशाला को हिंदू समुदाय माता वाग्देवी यानी देवी सरस्वती का मंदिर मानता है। वहीं मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद बताता है।

इसके अलावा जैन समुदाय के एक याचिकाकर्ता ने दावा किया है कि यह परिसर मध्यकालीन जैन मंदिर और गुरुकुल का हिस्सा रहा है।

ASI सर्वे में क्या सामने आया?

ASI ने वैज्ञानिक सर्वेक्षण के बाद 2,000 से ज्यादा पन्नों की रिपोर्ट हाई कोर्ट में पेश की थी। रिपोर्ट में संकेत दिए गए कि परिसर में मौजूद संरचना से पहले यहां परमार राजाओं के शासनकाल की एक विशाल इमारत मौजूद थी।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि वर्तमान विवादित ढांचे के निर्माण में पुराने मंदिरों के हिस्सों का दोबारा इस्तेमाल किया गया था। हिंदू पक्ष का दावा है कि सर्वेक्षण में मिले सिक्के, मूर्तियां और शिलालेख इस बात के प्रमाण हैं कि परिसर मूल रूप से मंदिर था।

98 दिनों तक चला था सर्वे

हाई कोर्ट ने 11 मार्च 2024 को ASI को वैज्ञानिक सर्वेक्षण का आदेश दिया था। इसके बाद 22 मार्च 2024 से सर्वे शुरू हुआ, जो करीब 98 दिनों तक चला। ASI ने 15 जुलाई 2024 को अपनी विस्तृत रिपोर्ट कोर्ट में जमा की थी। अब सभी की नजर हाई कोर्ट के फैसले पर टिकी हुई है।

 

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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

Surbhi

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Bombay High Court building in Mumbai, where the court ruled that peaceful protests against government policies cannot be a valid ground for externment under the law.
केंद्र सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करना जुर्म नहीं, हाईकोर्ट ने मुंबई पुलिस को लगाई फटकार

मुंबई: बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना किसी भी नागरिक को तड़ीपार (Externment) करने का आधार नहीं हो सकता। अदालत ने मुंबई पुलिस द्वारा एसडीपीआई नेता सईद अहमद अब्दुल वाहिद चौधरी के खिलाफ जारी तड़ीपार आदेश को रद्द करते हुए कहा कि ऐसी कार्रवाई नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। न्यायमूर्ति माधव जमदार की एकल पीठ ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार की नीतियों के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करना और नारे लगाना प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। केवल इस आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम के तहत तड़ीपार जैसी कठोर कार्रवाई नहीं की जा सकती। क्या था मामला? 49 वर्षीय सईद अहमद अब्दुल वाहिद चौधरी, जो सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के महासचिव हैं और लोकसभा चुनाव भी लड़ चुके हैं, ने मुंबई पुलिस के तड़ीपार आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। मुंबई पुलिस ने वर्ष 2019 से 2024 के बीच उनके खिलाफ दर्ज कई एफआईआर का हवाला देते हुए उन्हें एक वर्ष के लिए मुंबई शहर, मुंबई उपनगर और आसपास के क्षेत्रों से तड़ीपार कर दिया था। किन मामलों में दर्ज हुई थीं एफआईआर? सईद अहमद के खिलाफ दर्ज अधिकांश मामले विभिन्न विरोध प्रदर्शनों से जुड़े थे। इनमें नागरिकता संशोधन कानून (CAA), एनआरसी, ज्ञानवापी मस्जिद विवाद, बाबरी मस्जिद विध्वंस, वक्फ बोर्ड में कथित भ्रष्टाचार और बढ़ती ईंधन कीमतों के विरोध में आयोजित प्रदर्शन शामिल थे। याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता पयोशी रॉय ने अदालत को बताया कि उनके मुवक्किल के खिलाफ कुल पांच एफआईआर दर्ज की गई थीं। इनमें अधिकांश मामले भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 188 के तहत दर्ज किए गए थे, जो सरकारी आदेश की अवहेलना से संबंधित है। कोर्ट ने क्या कहा? सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी लोकतांत्रिक देश में सरकार की नीतियों के खिलाफ शांतिपूर्ण तरीके से विरोध दर्ज कराना नागरिकों का मूल अधिकार है। अदालत ने कहा कि प्रशासन केवल सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करने के आधार पर किसी व्यक्ति को समाज के लिए खतरा मानकर तड़ीपार नहीं कर सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसी कार्रवाई संविधान द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार के विपरीत है। फैसले का महत्व बॉम्बे हाईकोर्ट के इस फैसले को नागरिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी के संदर्भ में अहम माना जा रहा है। अदालत ने अपने आदेश के जरिए स्पष्ट संदेश दिया है कि लोकतंत्र में सरकार की आलोचना या उसके फैसलों का शांतिपूर्ण विरोध करना अपराध नहीं है और ऐसे मामलों में प्रशासनिक शक्तियों का इस्तेमाल कानून की सीमाओं के भीतर ही किया जाना चाहिए।  

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पश्चिम बंगाल में ‘दुर्गा सुरक्षा स्क्वाड’ की शुरुआत, महालया से शुरू होगी डायल-112 सेवा; 5 मिनट में पुलिस पहुंचाने का लक्ष्य

कोलकाता: पश्चिम बंगाल सरकार ने राज्य में कानून-व्यवस्था मजबूत करने और महिलाओं की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए कई नई पहल की घोषणा की है। मुख्यमंत्री Suvendu Adhikari ने नबान्न सभागार से ‘दुर्गा सुरक्षा स्क्वाड’, साइबर क्राइम हेल्प डेस्क और महिला हेल्प डेस्क का शुभारंभ किया। साथ ही उन्होंने घोषणा की कि महालया से राज्यभर में डायल-112 आपातकालीन सेवा शुरू होगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार का लक्ष्य है कि 112 पर सूचना मिलने के बाद पुलिस किसी भी थाना क्षेत्र में पांच मिनट के भीतर घटनास्थल पर पहुंचे। क्या है ‘दुर्गा सुरक्षा स्क्वाड’? ‘दुर्गा सुरक्षा स्क्वाड’ महिलाओं और छात्राओं की सुरक्षा के लिए गठित एक विशेष पुलिस इकाई है। यह टीम सार्वजनिक स्थानों, स्कूलों, कॉलेजों और संवेदनशील क्षेत्रों में नियमित गश्त करेगी तथा महिला सुरक्षा से जुड़ी शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई करेगी। सरकार के अनुसार, इस स्क्वाड का उद्देश्य महिलाओं के खिलाफ अपराधों की रोकथाम और सुरक्षित माहौल सुनिश्चित करना है। एक साल में 5 मिनट रिस्पॉन्स टाइम का लक्ष्य मुख्यमंत्री ने बताया कि वर्तमान में पश्चिम बंगाल में पुलिस की औसत प्रतिक्रिया समय लगभग तीन घंटे है, जबकि गुजरात, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में पुलिस औसतन छह मिनट के भीतर मौके पर पहुंच जाती है। उन्होंने कहा कि सरकार अगले एक वर्ष के भीतर पश्चिम बंगाल में भी पुलिस का रिस्पॉन्स टाइम घटाकर पांच मिनट करने का लक्ष्य लेकर काम कर रही है। इसके लिए इस वर्ष के बजट में प्रत्येक थाने को डायल-112 सेवा के लिए एक वाहन उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई है। अगले बजट में इन वाहनों की संख्या और बढ़ाई जाएगी। 500 थानों में महिला हेल्प डेस्क सरकार ने राज्य के 500 पुलिस थानों में महिला हेल्प डेस्क की शुरुआत भी की है। मुख्यमंत्री ने कहा कि महिलाओं और बेटियों की सुरक्षा सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल है। उन्होंने पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया कि महिलाओं से जुड़े मामलों में किसी भी शिकायत को नजरअंदाज न किया जाए और प्रत्येक शिकायत पर तत्काल एफआईआर दर्ज कर कानून के अनुसार कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। साइबर अपराध से निपटने के लिए विशेष हेल्प डेस्क राज्य के सभी थानों में साइबर क्राइम हेल्प डेस्क भी स्थापित किए गए हैं। इनका उद्देश्य ऑनलाइन धोखाधड़ी, साइबर अपराध और डिजिटल फ्रॉड से जुड़े मामलों की त्वरित शिकायत दर्ज करना और जांच प्रक्रिया को तेज करना है। पुलिस के आधुनिकीकरण का भरोसा मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार पश्चिम बंगाल पुलिस और कोलकाता पुलिस के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने और उन्हें आधुनिक तकनीक से लैस करने पर काम कर रही है। उन्होंने कहा कि पुलिस बल को राष्ट्रीय स्तर की आधुनिक एजेंसियों के अनुरूप विकसित किया जाएगा और पुलिस के कामकाज में किसी भी प्रकार का राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं होने दिया जाएगा। सरकार का कहना है कि इन पहलों का उद्देश्य कानून-व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाना, महिलाओं की सुरक्षा बढ़ाना और आम नागरिकों को तेज एवं भरोसेमंद पुलिस सहायता उपलब्ध कराना है।  

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Election Commission
बिहार, एमपी और गुजरात में उपचुनाव का बिगुल, चुनाव आयोग ने जारी किया शेड्यूल

नई दिल्ली ,एजेंसियां। चुनाव आयोग ने बिहार, मध्य प्रदेश और गुजरात की तीन रिक्त विधानसभा सीटों पर उपचुनाव कराने की घोषणा कर दी है। आयोग के अनुसार, 30 जुलाई 2026 को मतदान होगा, जबकि 3 अगस्त 2026 को मतगणना कर परिणाम घोषित किए जाएंगे। इन सीटों पर आचार संहिता तत्काल प्रभाव से लागू हो गई है।   इन तीन सीटों पर होगा उपचुनाव   उपचुनाव बिहार की बांकीपुर, मध्य प्रदेश की दतिया और गुजरात की मंजलपुर विधानसभा सीट पर कराया जाएगा। तीनों सीटें अलग-अलग कारणों से रिक्त हुई थीं।   क्यों खाली हुईं ये सीटें?   बिहार की बांकीपुर सीट भाजपा नेता नितिन नवीन के विधायक पद से इस्तीफा देने के बाद खाली हुई। मध्य प्रदेश की दतिया सीट कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती की धोखाधड़ी मामले में दोषसिद्धि के बाद सदस्यता समाप्त होने से रिक्त हुई, जबकि गुजरात की मंजलपुर सीट भाजपा विधायक योगेशभाई नारनदास पटेल के निधन के कारण खाली हुई।   जानिए पूरा चुनाव कार्यक्रम   चुनाव आयोग के कार्यक्रम के अनुसार, 6 जुलाई को अधिसूचना जारी होगी। 13 जुलाई नामांकन दाखिल करने की अंतिम तिथि होगी, 14 जुलाई को नामांकन पत्रों की जांच होगी और 16 जुलाई तक उम्मीदवार अपना नाम वापस ले सकेंगे। मतदान 30 जुलाई को होगा और 3 अगस्त को मतगणना के बाद नतीजे घोषित किए जाएंगे।   राजनीतिक दलों ने शुरू की तैयारियां   उपचुनाव की घोषणा के साथ ही तीनों राज्यों में राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। प्रमुख दल उम्मीदवारों के चयन और चुनावी रणनीति को अंतिम रूप देने में जुट गए हैं। इन उपचुनावों को आगामी राजनीतिक समीकरणों के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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