नई दिल्ली: संसद भवन परिसर में मंगलवार को असामान्य राजनीतिक हलचल देखने को मिली। आम तौर पर विपक्षी दल किसी बड़े मुद्दे पर एकजुट होकर प्रदर्शन करते हैं, लेकिन इस बार अलग-अलग मुद्दों को लेकर तीन अलग-अलग विरोध प्रदर्शन हुए, जिन्होंने पूरे संसद परिसर का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।
इन प्रदर्शनों में निलंबित सांसदों का धरना, किसानों के मुद्दे पर समाजवादी पार्टी का प्रदर्शन और महंगाई के खिलाफ वाम दलों व RJD का विरोध शामिल रहा।
सबसे पहले प्रदर्शन कांग्रेस के निलंबित सांसदों का था, जो बजट सत्र के पहले चरण से ही जारी है। लोकसभा से निलंबित किए गए सांसद संसद भवन के मकर द्वार के पास धरना दे रहे हैं।
सांसदों का कहना है कि निलंबन के कारण उन्हें लोकसभा की कार्यवाही में हिस्सा लेने की अनुमति नहीं है, इसलिए वे रोजाना संसद की सीढ़ियों पर बैठकर अपना विरोध दर्ज करा रहे हैं। उनके हाथों में तख्तियां और पोस्टर भी दिखाई दिए, जिनके माध्यम से वे अपने मुद्दे उठाते रहे।
दूसरा प्रदर्शन समाजवादी पार्टी के सांसदों का था। इस प्रदर्शन में पार्टी की सांसद Dimple Yadav, Dharmendra Yadav, Priya Saroj और Iqra Hasan समेत कई अन्य सांसद शामिल हुए।
सपा सांसदों ने किसानों की समस्याओं को उठाते हुए हाथों में आलू और तख्तियां लेकर प्रदर्शन किया। इस दौरान वे “सस्ता आलू, महंगा बालू” जैसे नारे लगा रहे थे।
सांसदों की तख्तियों पर लिखे संदेशों के जरिए सरकार से किसानों को आलू का उचित मूल्य दिलाने की मांग की गई। एक पोस्टर पर लिखा था, “आलू किसान की सुध ले सरकार, उनका जीवन हो रहा बर्बाद।” वहीं दूसरे पोस्टर में लिखा था, “आलू किसान कर रहे पुकार, उनकी पीड़ा नहीं सुनती सरकार।”
सपा का आरोप है कि सरकार किसानों को उनकी उपज का उचित दाम दिलाने में विफल रही है, जिससे आलू उत्पादक किसानों को आर्थिक नुकसान झेलना पड़ रहा है।
तीसरा प्रदर्शन वामपंथी दलों और राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के सांसदों का था। इन नेताओं ने महंगाई और ईंधन की बढ़ती कीमतों को लेकर सरकार के खिलाफ नारेबाजी की।
प्रदर्शन के दौरान सांसदों ने तख्तियों के जरिए सरकार को घेरने की कोशिश की। एक पोस्टर पर लिखा था, “तेल हुआ महंगा, गैस हुई भारी, कहां छुपी है मोदी सरकार?”
वहीं एक अन्य तख्ती पर लिखा था, “जंग ट्रंप की, महंगाई जनता की-मोदी सरकार चुप क्यों?” इस नारे के जरिए वैश्विक घटनाओं और महंगाई के प्रभाव को जोड़ते हुए सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए गए।
मंगलवार को संसद परिसर में हुए इन तीनों प्रदर्शनों ने यह दिखाया कि अलग-अलग राजनीतिक दल अपने-अपने मुद्दों को लेकर सरकार के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं।
किसानों की समस्या, महंगाई और सांसदों के निलंबन जैसे मुद्दों को लेकर हुए इन प्रदर्शनों ने संसद परिसर का माहौल राजनीतिक रूप से काफी गरमा दिया और पूरे दिन यह घटनाक्रम चर्चा का विषय बना रहा।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। घर की नियमित सफाई के दौरान अक्सर छत पर रखी पानी की टंकी को नजरअंदाज कर दिया जाता है। लेकिन जब पानी गंदा आने लगे या उसमें से बदबू आने लगे, तब इसकी सफाई की जरूरत महसूस होती है। हालांकि टंकी साफ करने का काम काफी मेहनत भरा माना जाता है, इसलिए लोग इसे टालते रहते हैं। लेकिन कुछ आसान घरेलू उपायों की मदद से यह काम बिना ज्यादा मेहनत के किया जा सकता है। सफाई शुरू करने से पहले करें ये तैयारी टंकी की सफाई करने से पहले सबसे जरूरी है कि घर की मुख्य जल आपूर्ति और मोटर को बंद कर दिया जाए। इसके बाद टंकी में मौजूद पानी को पूरी तरह बाहर निकाल दें। जब टंकी में केवल थोड़ी गाद या मिट्टी बच जाए, तब सफाई की प्रक्रिया शुरू करें। ब्लीचिंग पाउडर से हटाएं बैक्टीरिया और काई टंकी में जमा काई और बैक्टीरिया को खत्म करने के लिए ब्लीचिंग पाउडर बेहद प्रभावी माना जाता है। इसके लिए थोड़े पानी में 4 से 5 चम्मच ब्लीचिंग पाउडर मिलाकर घोल तैयार करें और ब्रश की सहायता से टंकी की दीवारों और तली पर लगा दें। करीब 30 मिनट बाद टंकी को साफ पानी से धो लें। इससे गंदगी और काई आसानी से निकल जाएगी। बेकिंग सोडा और नींबू से हटेंगे जिद्दी दाग अगर टंकी में खारे पानी के कारण पीले या सफेद दाग जम गए हैं, तो बेकिंग सोडा और नींबू का मिश्रण कारगर साबित हो सकता है। दोनों को मिलाकर पेस्ट बनाएं और दाग वाली जगह पर लगाकर 20 मिनट तक छोड़ दें। बाद में हल्के स्क्रबर से साफ कर लें। विनेगर और फिटकरी भी हैं असरदार उपाय टंकी से आने वाली दुर्गंध को दूर करने के लिए वाइट विनेगर का इस्तेमाल किया जा सकता है। वहीं, टंकी में जमा मिट्टी और गाद को नीचे बैठाने के लिए फिटकरी सबसे आसान उपाय है। फिटकरी डालने के कुछ घंटों बाद सारी गंदगी नीचे जमा हो जाती है, जिसे आसानी से बाहर निकाला जा सकता है। इन आसान घरेलू उपायों को अपनाकर आप पानी की टंकी को साफ, सुरक्षित और स्वच्छ बनाए रख सकते हैं, वह भी बिना ज्यादा समय और मेहनत खर्च किए।
नई दिल्ली: दलित ईसाइयों को अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा दिए जाने की मांग एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में आ गई है। इस मुद्दे पर तेलंगाना की भारत राष्ट्र समिति (BRS) और आंध्र प्रदेश की वाईएसआर कांग्रेस पार्टी (YSRCP) ने न्यायमूर्ति के.जी. बालाकृष्णन आयोग के समक्ष अपने-अपने पक्ष रखे हैं। दोनों दलों ने आयोग को ज्ञापन सौंपकर दलित ईसाइयों को भी अनुसूचित जाति सूची में शामिल करने की सिफारिश करने का आग्रह किया। BRS प्रतिनिधिमंडल ने आयोग को सौंपा ज्ञापन मंगलवार को नई दिल्ली में बीआरएस के वरिष्ठ नेताओं के एक प्रतिनिधिमंडल ने आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति के.जी. बालाकृष्णन से मुलाकात की। प्रतिनिधिमंडल ने दलित ईसाइयों को एससी दर्जा देने की मांग करते हुए विस्तृत ज्ञापन सौंपा और कहा कि सामाजिक न्याय तथा समान अवसर के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए इस मुद्दे पर सकारात्मक निर्णय लिया जाना चाहिए। बीआरएस प्रतिनिधिमंडल में राज्यसभा सांसद वद्दिराजू रविचंद्र, पूर्व मंत्री कोप्पुला ईश्वर, पार्टी महासचिव आर.एस. प्रवीण कुमार और पूर्व निगम अध्यक्ष राजीव सागर समेत कई नेता शामिल थे। वाईएसआरसीपी ने भी उठाई समानता और सामाजिक न्याय की मांग बीआरएस से पहले वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के सांसद मद्दिला गुरुमूर्ति ने भी आयोग से मुलाकात कर दलित ईसाइयों को संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के दायरे में शामिल करने की मांग की थी। आयोग को सौंपे गए ज्ञापन में गुरुमूर्ति ने कहा कि दलित ईसाइयों को एससी सूची से बाहर रखना समानता, धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय जैसे संवैधानिक मूल्यों की भावना के विपरीत है। उन्होंने आयोग से इस विषय पर सकारात्मक सिफारिश करने का अनुरोध किया। आंध्र प्रदेश विधानसभा के प्रस्ताव का दिया हवाला वाईएसआरसीपी सांसद ने अपने ज्ञापन में 24 मार्च 2023 को आंध्र प्रदेश विधानसभा द्वारा पारित सर्वसम्मत प्रस्ताव का भी उल्लेख किया। उस प्रस्ताव में कहा गया था कि दलित ईसाई भी सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक रूप से उसी प्रकार वंचित हैं जैसे हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म से जुड़े अनुसूचित जाति समुदाय। पार्टी का तर्क है कि सामाजिक पिछड़ापन और भेदभाव धर्म परिवर्तन के बाद भी पूरी तरह समाप्त नहीं होता, इसलिए दलित ईसाइयों को भी समान संवैधानिक लाभ मिलना चाहिए। धर्म परिवर्तन से खत्म नहीं होती सामाजिक विषमता: तर्क आयोग के समक्ष प्रस्तुत पक्ष में कहा गया कि केवल धर्म परिवर्तन के आधार पर किसी समुदाय को अनुसूचित जाति के अधिकारों से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। दलित ईसाई आज भी कई क्षेत्रों में सामाजिक भेदभाव, आर्थिक पिछड़ेपन और शैक्षणिक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। वाईएसआरसीपी ने यह भी कहा कि एससी दर्जा न होने के कारण दलित ईसाई अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत मिलने वाले कई कानूनी संरक्षणों से भी वंचित रह जाते हैं। अनुच्छेद 341 के तहत संसद के पास है अधिकार ज्ञापन में संविधान के अनुच्छेद 341(2) का उल्लेख करते हुए कहा गया कि संसद को किसी समुदाय को अनुसूचित जाति सूची में शामिल करने अथवा उससे बाहर करने का अधिकार प्राप्त है। इसी आधार पर आयोग से आग्रह किया गया है कि वर्तमान सामाजिक वास्तविकताओं और संवैधानिक मूल्यों को ध्यान में रखते हुए दलित ईसाइयों को एससी दर्जा देने के पक्ष में अपनी सिफारिश प्रस्तुत करे। राष्ट्रीय स्तर पर फिर तेज हुई बहस बीआरएस और वाईएसआरसीपी की ओर से आयोग के समक्ष रखे गए पक्ष के बाद दलित ईसाइयों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने का मुद्दा एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गया है। अब नजर न्यायमूर्ति के.जी. बालाकृष्णन आयोग की सिफारिशों पर टिकी है, जो इस लंबे समय से लंबित सामाजिक और संवैधानिक प्रश्न पर आगे की दिशा तय कर सकती हैं।
नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय राजनीति में एक नया इतिहास रच दिया है। लगातार तीसरी बार देश की सत्ता संभाल रहे मोदी अब भारत के सबसे लंबे समय तक लगातार निर्वाचित प्रधानमंत्री बनने वाले नेता बन गए हैं। उन्होंने देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का रिकॉर्ड पीछे छोड़ते हुए 4,399 दिनों का लगातार निर्वाचित कार्यकाल पूरा कर लिया है। लगातार तीसरे कार्यकाल में बना नया इतिहास प्रधानमंत्री मोदी ने पहली बार 26 मई 2014 को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। इसके बाद उन्होंने 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों में भी जीत दर्ज कर लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की। इसी के साथ उनका निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में कार्यकाल 4,399 दिनों तक पहुंच गया, जो अब तक का सबसे लंबा लगातार निर्वाचित कार्यकाल है। नेहरू का रिकॉर्ड टूटा पंडित Jawaharlal Nehru ने 13 मई 1952 को पहले आम चुनाव के बाद निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में कार्यभार संभाला था और 27 मई 1964 तक इस पद पर रहे। निर्वाचित प्रधानमंत्री के तौर पर उनका कार्यकाल 4,398 दिनों का था। यदि 15 अगस्त 1947 से उनके पूरे प्रधानमंत्री कार्यकाल को शामिल किया जाए तो वे कुल 6,130 दिनों तक देश के प्रधानमंत्री रहे थे। लेकिन निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में लगातार कार्यकाल के मामले में मोदी अब उनसे आगे निकल गए हैं। गुजरात से दिल्ली तक का लंबा राजनीतिक सफर राष्ट्रीय राजनीति में आने से पहले नरेंद्र मोदी ने 7 अक्टूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में कार्यभार संभाला था। लगभग 13 वर्षों तक राज्य का नेतृत्व करने के बाद वे 2014 में देश के प्रधानमंत्री बने। मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के रूप में उनका कुल नेतृत्वकाल अब 8,931 दिनों तक पहुंच चुका है, जो भारत के किसी भी निर्वाचित सरकार प्रमुख के लिए एक नया रिकॉर्ड माना जा रहा है। मोदी के नाम पहले से कई बड़े रिकॉर्ड प्रधानमंत्री मोदी पहले भी कई राजनीतिक उपलब्धियां अपने नाम कर चुके हैं। वे: स्वतंत्र भारत के बाद जन्म लेने वाले पहले प्रधानमंत्री हैं। पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने लगातार दो पूर्ण कार्यकाल पूरे किए। लगातार तीन लोकसभा चुनाव जीतकर सत्ता में लौटने वाले चुनिंदा नेताओं में शामिल हैं। सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री दोनों पदों पर रहने वाले निर्वाचित नेताओं में से एक हैं। सोशल मीडिया पर भी मजबूत मौजूदगी राजनीतिक उपलब्धियों के साथ-साथ प्रधानमंत्री मोदी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी लगातार नए रिकॉर्ड बना रहे हैं। यूट्यूब पर 3 करोड़ से अधिक सब्सक्राइबर। इंस्टाग्राम पर 10 करोड़ से ज्यादा फॉलोअर्स वाले दुनिया के पहले कार्यरत राष्ट्र प्रमुख। एक्स (पूर्व ट्विटर) पर 10 करोड़ से अधिक फॉलोअर्स। 12 वर्षों के कार्यकाल की प्रमुख उपलब्धियां आर्थिक क्षेत्र भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना। डिजिटल भुगतान प्रणाली UPI को वैश्विक पहचान मिली। निवेश और कारोबार को बढ़ावा देने के लिए कई सुधार लागू किए गए। जनकल्याण योजनाएं प्रधानमंत्री जनधन योजना के तहत करोड़ों बैंक खाते खुले। उज्ज्वला योजना के माध्यम से करोड़ों परिवारों को गैस कनेक्शन मिला। आयुष्मान भारत और प्रधानमंत्री आवास योजना का विस्तार हुआ। जल जीवन मिशन और स्वच्छ भारत अभियान को व्यापक स्तर पर लागू किया गया। बड़े राजनीतिक फैसले जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाया गया। तीन तलाक कानून लागू किया गया। नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) पारित हुआ। नए संसद भवन का उद्घाटन किया गया। बुनियादी ढांचा और रक्षा वंदे भारत ट्रेनों की शुरुआत। एक्सप्रेसवे, हाईवे और एयरपोर्ट नेटवर्क का विस्तार। रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता पर जोर। राफेल लड़ाकू विमानों को भारतीय वायुसेना में शामिल किया गया। वैश्विक मंच पर भारत G20 New Delhi Summit की सफल मेजबानी। International Solar Alliance को वैश्विक पहचान। ग्लोबल साउथ की आवाज के रूप में भारत की भूमिका मजबूत हुई। क्यों महत्वपूर्ण है यह उपलब्धि? प्रधानमंत्री मोदी का 4,399 दिनों का लगातार निर्वाचित कार्यकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जा रहा है। यह उपलब्धि न केवल उनके लंबे राजनीतिक सफर को दर्शाती है, बल्कि लगातार तीन आम चुनावों में मिले जनादेश को भी रेखांकित करती है। भारत के राजनीतिक इतिहास में यह रिकॉर्ड अब एक नए मानक के रूप में दर्ज हो गया है।