राष्ट्रीय

जौनपुर हत्याकांड: पत्नी और प्रेमी ने मिलकर की पति की हत्या, साक्ष्य मिटाने के लिए रची साजिश

ranjan kumar tiwari जुलाई 27, 2026 0
जौनपुर हत्याकांड में पति की हत्या के आरोप में गिरफ्तार पत्नी वंदना और प्रेमी राजेश
Jaunpur Murder Case Sandeep Wife Vandana Arrested

जौनपुर। उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले में हुए संदीप हत्याकांड में पुलिस ने सनसनीखेज खुलासा किया है। जांच में सामने आया है कि 27 वर्षीय संदीप की हत्या उसकी पत्नी वंदना और उसके कथित प्रेमी राजेश ने मिलकर की थी। पुलिस ने दोनों आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है।

 

मुंह दबाया, गमछे से घोंट दिया गला

 

पुलिस के अनुसार, वारदात की रात वंदना ने पति का मुंह दबा दिया, जबकि राजेश उसके सीने पर बैठ गया और नीले रंग के गमछे से गला कसकर उसकी हत्या कर दी। प्रारंभिक जांच में हत्या के पीछे दोनों के बीच कथित प्रेम संबंध और उससे उपजा विवाद वजह माना जा रहा है।

 

चार साल से थे संपर्क में

 

जांच में पता चला कि राजेश रिश्ते में वंदना का ममेरा भाई लगता है। दोनों पिछले चार वर्षों से संपर्क में थे। वंदना की शादी के बाद भी दोनों एक-दूसरे से मिलते रहे। जब संदीप को इस संबंध की जानकारी हुई तो उसने इसका विरोध किया, जिसके बाद कथित तौर पर हत्या की साजिश रची गई।

 

सुबह साक्ष्य मिटाने की कोशिश

 

पुलिस के मुताबिक, हत्या के बाद राजेश अपने घर चला गया, जबकि वंदना ने घर के बाहर गोबर से लिपाई कर साक्ष्य मिटाने की कोशिश की। इसके बाद उसने अपने ससुर से संदीप को जगाने के लिए कहा, ताकि घटनास्थल पर उनके पैरों के निशान पड़ जाएं और मामला सामान्य मौत जैसा लगे।

 

पड़ोस की महिलाओं के शक से खुला राज

 

परिजन पहले संदीप की मौत को सामान्य मानकर अंतिम संस्कार की तैयारी कर रहे थे। इसी दौरान पड़ोस की कुछ महिलाओं की नजर संदीप के गले पर पड़े निशानों पर गई। शक होने पर पुलिस को सूचना दी गई। पूछताछ और जांच के दौरान पूरी साजिश का खुलासा हो गया।

 

दो मासूम बच्चों पर टूटा दुखों का पहाड़

 

इस घटना के बाद परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। पिता की हत्या और मां के जेल जाने से दंपती के दो छोटे बच्चों के सिर से माता-पिता दोनों का साया उठ गया है। वहीं, बुजुर्ग पिता को अपने बेटे की अर्थी उठानी पड़ी और अब बच्चों की जिम्मेदारी भी उन्हीं पर आ गई है।

 

दोनों आरोपी जेल भेजे गए

 

पुलिस ने बताया कि दोनों आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य मिलने के बाद उन्हें न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया। मामले की आगे की जांच जारी है।

 

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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

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हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

Ranjan Kumar Tiwari Ranjan123

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जंतर-मंतर ने दुनिया को दिखाया नया भारत, भारतीय Gen-Z ने विरोध की बदल दी परिभाषा

Gen-Z Protest: 36 दिनों तक चले जंतर-मंतर छात्र आंदोलन के समापन के साथ सिर्फ एक धरना खत्म नहीं हुआ, बल्कि भारतीय छात्र राजनीति में विरोध की एक नई शैली सामने आई। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद आंदोलन समाप्त हुआ, लेकिन इस दौरान देश की Gen-Z पीढ़ी ने जिस अनुशासन, अहिंसा और रचनात्मकता का परिचय दिया, उसने भारतीय लोकतंत्र में विरोध की राजनीति को एक नई पहचान दी। जिस पीढ़ी को अक्सर सोशल मीडिया, रील्स और डिजिटल दुनिया तक सीमित मान लिया जाता है, उसी पीढ़ी ने यह साबित किया कि वह लोकतांत्रिक मूल्यों, संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक जिम्मेदारियों को भी उतनी ही गंभीरता से समझती है। जंतर-मंतर पर बीते 36 दिनों में जो तस्वीरें सामने आईं, वे दुनिया के कई बड़े छात्र आंदोलनों से अलग नजर आईं। विरोध भी, जिम्मेदारी भी आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारियों ने न तो सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया और न ही हिंसा का रास्ता अपनाया। पुलिस की कार्रवाई, वॉटर कैनन, हिरासत और सुरक्षा बंदोबस्त के बावजूद आंदोलन का स्वरूप व्यापक रूप से शांतिपूर्ण बना रहा। प्रदर्शन के बीच कई ऐसे दृश्य सामने आए जिन्होंने लोगों का ध्यान खींचा। कहीं छात्र वॉटर कैनन के बीच नाचते दिखाई दिए, तो कहीं पुलिसकर्मियों से मजाकिया अंदाज में हेलमेट मांगते नजर आए। भीषण गर्मी में कुछ छात्र राहगीरों को हाथ से पंखा झलते दिखे, जबकि स्वयंसेवकों ने प्रदर्शन स्थल की सफाई की जिम्मेदारी भी अपने हाथों में ली। दस्ताने पहनकर कचरा उठाना, झाड़ू लगाना और सफाई अभियान चलाना इस आंदोलन की अलग पहचान बन गया। रचनात्मक विरोध की नई मिसाल यह आंदोलन केवल नारों तक सीमित नहीं रहा। कविता, संगीत, पोस्टर, व्यंग्य और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से छात्रों ने अपनी बात रखी। सोशल मीडिया का उपयोग केवल प्रचार के लिए नहीं, बल्कि संवाद और जनजागरूकता के माध्यम के रूप में किया गया। इसने यह संदेश दिया कि विरोध केवल आक्रोश नहीं, बल्कि विचार और जिम्मेदारी के साथ भी किया जा सकता है। मास्क के पीछे छिपी सामाजिक हकीकत आंदोलन के दौरान कई छात्र मास्क या हेलमेट पहनकर प्रदर्शन में शामिल हुए। इसके पीछे सुरक्षा से अधिक पारिवारिक और सामाजिक दबाव की वजह बताई गई। कुछ छात्रों का कहना था कि उनके परिवारों की राजनीतिक सोच अलग है और वे घर में अनावश्यक विवाद नहीं चाहते थे। यह पहलू भारतीय समाज में राजनीतिक मतभेदों के बदलते स्वरूप को भी दर्शाता है। देश के शीर्ष संस्थानों के छात्र रहे शामिल जंतर-मंतर आंदोलन में देश के कई प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों के छात्र शामिल हुए। इनमें IIT, AIIMS, IIM, NIT, दिल्ली विश्वविद्यालय, जेएनयू, बीएचयू, श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स, मिरांडा हाउस और अन्य केंद्रीय विश्वविद्यालयों के विद्यार्थी मौजूद थे। इनमें बड़ी संख्या उन छात्रों की थी जिन्होंने JEE Advanced, NEET, CAT, CLAT और CUET जैसी कठिन प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता हासिल की थी। यही कारण रहा कि आंदोलन की रणनीति, पोस्टर, नारे और सोशल मीडिया अभियान में भी वैचारिक परिपक्वता और व्यवस्थित योजना दिखाई दी। दुनिया के आंदोलनों से कैसे अलग रहा जंतर-मंतर? पिछले कुछ वर्षों में फ्रांस, चिली, हांगकांग, बांग्लादेश और श्रीलंका सहित कई देशों में छात्र आंदोलनों के दौरान हिंसा, आगजनी, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान और पुलिस के साथ गंभीर झड़पें देखने को मिलीं। इसके विपरीत जंतर-मंतर आंदोलन में प्रदर्शनकारियों ने शांतिपूर्ण विरोध, सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने और लोकतांत्रिक मूल्यों का पालन करने पर जोर दिया। आंदोलन के दौरान स्वयं सफाई करना, लोगों की मदद करना और रचनात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम से अपनी बात रखना इसकी सबसे बड़ी विशेषता बनकर उभरा। भारतीय छात्र आंदोलनों की नई दिशा जेपी आंदोलन, मंडल आंदोलन और नागरिकता कानून विरोध जैसे आंदोलनों के बाद जंतर-मंतर का यह आंदोलन एक अलग पहचान छोड़ता दिखाई देता है। यहां विरोध था, लेकिन हिंसा नहीं। नारों में आक्रोश था, लेकिन सार्वजनिक संपत्ति के प्रति सम्मान भी था। सोशल मीडिया की ताकत थी, लेकिन जमीनी संगठन और अनुशासन भी उतना ही मजबूत दिखाई दिया। इस आंदोलन ने यह संकेत दिया कि भारत की नई पीढ़ी केवल डिजिटल दुनिया तक सीमित नहीं है। वह लोकतंत्र में अपनी भागीदारी को समझती है, सवाल भी पूछती है और जिम्मेदारी भी निभाती है। यही वजह है कि जंतर-मंतर का यह आंदोलन भारतीय छात्र राजनीति के इतिहास में विरोध की एक नई और अलग शैली के रूप में याद किया जा सकता है।  

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बदायूं के प्राथमिक स्कूल में गैस सिलिंडर में लगी आग, 20 बच्चों को सुरक्षित निकाला; पुलिस की सूझबूझ से टला बड़ा हादसा

बदायूं, उत्तर प्रदेश। जिले के बिसौली क्षेत्र स्थित प्राथमिक विद्यालय रामपुरिया में सोमवार सुबह मिड-डे मील तैयार करने के दौरान गैस सिलिंडर में आग लगने से अफरा-तफरी मच गई। घटना के समय स्कूल में मौजूद सभी 20 बच्चों को तत्काल सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया। पुलिसकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से आग पर समय रहते काबू पा लिया गया, जिससे बड़ा हादसा टल गया।   खाना बनाते समय गैस लीक होने से लगी आग   जानकारी के अनुसार, सुबह करीब 8:15 बजे रसोइया बच्चों के लिए भोजन बनाने की तैयारी कर रहा था। सिलिंडर का रेगुलेटर खोलने के दौरान गैस रिसाव हुआ और चूल्हा जलाते ही सिलिंडर में आग लग गई। आग की लपटें उठते ही स्कूल परिसर में अफरा-तफरी का माहौल बन गया।   पुलिस ने दिखाई तत्परता   घटना की सूचना मिलते ही डायल-112, एंबुलेंस और फायर ब्रिगेड मौके के लिए रवाना हुई। हालांकि, फायर ब्रिगेड के पहुंचने से पहले ही कांस्टेबल सत्येंद्र पाल और हेड कांस्टेबल महावीर ने अग्निशमन यंत्र की मदद से आग पर काबू पा लिया। उनकी सूझबूझ और तत्परता से सिलिंडर फटने जैसी संभावित बड़ी दुर्घटना टल गई।   सभी बच्चे सुरक्षित, कोई हताहत नहीं   आग लगने के दौरान कुछ देर तक सिलिंडर फटने की आशंका बनी रही, जिससे आसपास के लोगों में दहशत फैल गई। राहत की बात यह रही कि समय रहते सभी बच्चों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया और इस घटना में किसी के घायल होने या किसी प्रकार के जान-माल के नुकसान की सूचना नहीं है। पुलिस और प्रशासन पूरे मामले की जांच कर रहे हैं।

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जहरीले कफ सिरप मामले में केंद्र सरकार की बड़ी कार्रवाई और दवा इकाइयों का निरीक्षण
जहरीले कफ सिरप पर केंद्र की बड़ी कार्रवाई, 950 से ज्यादा दवा निर्माण इकाइयों पर हुई सख्ती

नई दिल्ली, एजेंसियां। जहरीले कफ सिरप से जुड़े मामलों में बच्चों की मौतों के बाद केंद्र सरकार ने दवा उद्योग पर निगरानी और सख्ती बढ़ा दी है। दिसंबर 2022 से शुरू किए गए विशेष अभियान के तहत अब तक 1,040 से अधिक दवा निर्माण इकाइयों का जोखिम-आधारित निरीक्षण किया गया है। जांच में अनियमितताएं मिलने पर 950 से ज्यादा इकाइयों के खिलाफ उत्पादन बंद कराने, लाइसेंस निलंबित या रद्द करने, कारण बताओ नोटिस जारी करने और चेतावनी देने जैसी कार्रवाई की गई है।   1,100 से अधिक कफ सिरप कंपनियों का हुआ विशेष ऑडिट   सरकारी आंकड़ों के अनुसार, राज्यों के सहयोग से 1,100 से अधिक कफ सिरप बनाने वाली कंपनियों का विशेष ऑडिट कराया गया। इसके अलावा बाजार में उपलब्ध कफ सिरप के नमूनों की व्यापक जांच की गई, ताकि घटिया गुणवत्ता या मिलावटी दवाओं की पहचान कर उन्हें बाजार से हटाया जा सके।   अब हर कफ सिरप में होगी जहरीले रसायनों की अनिवार्य जांच   दवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने इंडियन फार्माकोपिया (IP) 2022 में संशोधन किया है। नए नियमों के तहत अब बाजार में आने से पहले हर कफ सिरप की डाइएथिलीन ग्लाइकॉल (DEG) और एथिलीन ग्लाइकॉल (EG) जैसे जहरीले रसायनों के लिए अनिवार्य जांच होगी। यही रसायन कई देशों में बच्चों की मौतों से जुड़े कफ सिरप में पाए गए थे।   पांच वर्षों में साढ़े पांच लाख से अधिक दवा नमूनों की जांच   सरकार ने बताया कि देशभर में दवाओं की गुणवत्ता की निगरानी लगातार बढ़ाई जा रही है। पिछले पांच वर्षों में 5,49,352 दवा नमूनों की जांच की गई है। जांच के आधार पर गुणवत्ता मानकों का उल्लंघन करने वाली कंपनियों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की गई है।   दवा गुणवत्ता पर सरकार की सख्त नजर   सरकार का कहना है कि इस अभियान का उद्देश्य दवा निर्माण में गुणवत्ता मानकों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करना और उपभोक्ताओं, विशेषकर बच्चों की सुरक्षा को प्राथमिकता देना है। आने वाले समय में भी निरीक्षण, ऑडिट और गुणवत्ता जांच का अभियान जारी रहेगा।  

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