मुंबई: महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के दोनों गुटों के वरिष्ठ नेताओं की मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से अलग-अलग मुलाकातों के बाद शरद पवार के अगले राजनीतिक कदम को लेकर नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं। हालांकि बैठकों में क्या चर्चा हुई, इस पर किसी भी पक्ष ने आधिकारिक जानकारी नहीं दी है।
मंगलवार देर रात एनसीपी (शरद पवार गुट) के प्रदेश अध्यक्ष जयंत पाटिल ने पहले दक्षिण मुंबई स्थित शरद पवार के आवास 'सिल्वर ओक' पर उनसे मुलाकात की। इसके बाद उन्होंने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से भी बैठक की।
वहीं, सत्तारूढ़ एनसीपी (अजित पवार गुट) के वरिष्ठ नेता सुनील तटकरे और प्रफुल्ल पटेल ने भी मुख्यमंत्री फडणवीस से अलग से मुलाकात की।
इन बैठकों के बाद राज्य की राजनीति में संभावित नए समीकरणों को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।
बैठकों के बाद न तो किसी नेता ने बातचीत का एजेंडा बताया और न ही मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से कोई आधिकारिक बयान जारी किया गया। दोनों गुटों के सूत्रों का भी कहना है कि बैठक में किन मुद्दों पर चर्चा हुई, इसकी जानकारी फिलहाल सार्वजनिक नहीं की गई है।
सूत्रों के मुताबिक, एनसीपी (शरद पवार गुट) के 10 विधायकों में से करीब आधे विधायक राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के साथ जाने के पक्ष में बताए जा रहे हैं। उनका मानना है कि विपक्ष में रहने के कारण अपने विधानसभा क्षेत्रों के विकास कार्यों के लिए आवश्यक मंजूरी और फंड हासिल करना लगातार मुश्किल होता जा रहा है।
हाल ही में जयंत पाटिल ने भी पार्टी विधायकों के साथ बैठक में संकेत दिया था कि कई विधायक एनडीए में शामिल होने की इच्छा जता रहे हैं।
इन तमाम राजनीतिक चर्चाओं के बावजूद शरद पवार ने अब तक इस मुद्दे पर कोई सार्वजनिक टिप्पणी नहीं की है। उन्होंने पार्टी की आगे की रणनीति को लेकर भी कोई संकेत नहीं दिया है, जिससे सस्पेंस और गहरा गया है।
महाराष्ट्र विधानसभा में एनसीपी (शरद पवार गुट) के पास फिलहाल 10 विधायक हैं, जबकि लोकसभा में पार्टी के 8 सांसद हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संसद में भविष्य के महत्वपूर्ण विधेयकों, विशेषकर परिसीमन (डिलिमिटेशन) जैसे मुद्दों पर संख्या मजबूत करने के लिए एनडीए छोटी पार्टियों के समर्थन को अहम मान सकता है। ऐसे में एनसीपी (एसपी) की राजनीतिक भूमिका आने वाले समय में और महत्वपूर्ण हो सकती है।
मुख्यमंत्री फडणवीस और एनसीपी नेताओं की बैठकों के बाद महाराष्ट्र की राजनीति में नए समीकरणों की चर्चाएं जरूर तेज हुई हैं, लेकिन अभी तक किसी गठबंधन, विलय या राजनीतिक बदलाव को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। ऐसे में शरद पवार का अगला कदम आने वाले दिनों में राज्य की राजनीति की दिशा तय कर सकता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने आज दिल्ली के जंतर-मंतर पहुंचकर सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक से मुलाकात की। वांगचुक लंबे समय से जारी अनशन के जरिए परीक्षा व्यवस्था में कथित गड़बड़ियों, पेपर लीक और छात्रों के भविष्य से जुड़े मुद्दों को उठा रहे हैं। पवन खेड़ा ने सरकार पर साधा निशाना सोनम वांगचुक से मुलाकात के बाद पवन खेड़ा ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि छात्रों की समस्याओं को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। उन्होंने वांगचुक की बिगड़ती सेहत को लेकर चिंता जताई और सरकार से बातचीत कर समाधान निकालने की अपील की। अनशन में उठाए जा रहे हैं छात्रों से जुड़े मुद्दे सोनम वांगचुक का यह आंदोलन परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, पेपर लीक की घटनाओं पर कार्रवाई और युवाओं के हितों से जुड़े मुद्दों को लेकर है। उनके अनशन को लेकर कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और राजनीतिक नेताओं ने समर्थन जताया है। स्वास्थ्य को लेकर बढ़ी चिंता लंबे समय से अनशन पर रहने के कारण सोनम वांगचुक की सेहत को लेकर चिंता जताई जा रही है। डॉक्टरों के अनुसार उनका वजन भी काफी कम हुआ है और लगातार निगरानी रखी जा रही है। लद्दाख के मुद्दों से भी जुड़े रहे हैं वांगचुक सोनम वांगचुक इससे पहले लद्दाख को राज्य का दर्जा देने, संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने और स्थानीय अधिकारों की मांग को लेकर भी आंदोलन कर चुके हैं। लेकिन वर्तमान अनशन का मुख्य मुद्दा परीक्षा व्यवस्था और छात्रों से जुड़ी मांगें हैं।
देहरादून, एजेंसियां। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी आज उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में कांग्रेस के 'छात्रों की गूंज' अभियान के तहत छात्रों और युवाओं से संवाद करेंगे। कार्यक्रम में प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक, बेरोज़गारी, भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और शिक्षा व्यवस्था जैसे मुद्दों पर चर्चा होगी। कांग्रेस का कहना है कि इस अभियान का उद्देश्य देशभर के छात्रों की समस्याओं को सुनकर उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर उठाना है। पेपर लीक को लेकर सरकार पर हमला कार्यक्रम से पहले राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर केंद्र सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि "यह सिर्फ पेपर लीक नहीं, बल्कि युवाओं के भविष्य की चोरी है।" उन्होंने आरोप लगाया कि बार-बार होने वाली परीक्षा अनियमितताओं से लाखों छात्रों का भविष्य प्रभावित हो रहा है और सरकार इस समस्या पर प्रभावी कार्रवाई करने में विफल रही है। छात्रों से सीधे संवाद करेंगे राहुल कांग्रेस नेताओं के अनुसार, राहुल गांधी कार्यक्रम के दौरान छात्रों के सवालों का जवाब देंगे और भर्ती परीक्षाओं, रोजगार के अवसरों तथा शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर उनके सुझाव भी सुनेंगे। अभियान के तहत विभिन्न राज्यों में ऐसे संवाद कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं ताकि युवाओं की आवाज़ को राष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया जा सके। राजनीतिक रूप से भी अहम माना जा रहा कार्यक्रम विश्लेषकों के अनुसार, उत्तराखंड में आयोजित यह कार्यक्रम केवल छात्र संवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे कांग्रेस के युवा संपर्क अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। आगामी राजनीतिक गतिविधियों और संसद के मानसून सत्र से पहले यह कार्यक्रम युवाओं के मुद्दों को प्रमुखता से उठाने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
कोलकाता, एजेंसियां। पश्चिम बंगाल की राजनीति में गुरुवार को बड़ा घटनाक्रम सामने आया, जब तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मदन मित्रा ने पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा देने की घोषणा कर दी। इसके साथ ही उन्होंने ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी गुट में शामिल होने का ऐलान किया। इस फैसले को TMC के भीतर बढ़ती अंदरूनी खींचतान का बड़ा संकेत माना जा रहा है। नेतृत्व से नाराजगी बनी वजह मदन मित्रा ने अपने इस्तीफे के पीछे पार्टी नेतृत्व से मतभेद को प्रमुख कारण बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि संगठन के भीतर उनकी बातों को महत्व नहीं दिया जा रहा था और पार्टी में फैसले लेने की प्रक्रिया बदल गई है। रिपोर्टों के मुताबिक उन्होंने अभिषेक बनर्जी की कार्यशैली पर भी सवाल उठाए। बंगाल की राजनीति में बढ़ी हलचल मदन मित्रा के इस कदम के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विधानसभा चुनाव के बाद TMC के भीतर उभर रहे मतभेद अब खुलकर सामने आने लगे हैं। TMC के लिए बड़ा झटका मदन मित्रा लंबे समय से ममता बनर्जी के करीबी नेताओं में गिने जाते रहे हैं। ऐसे में उनका पार्टी छोड़ना TMC के लिए बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है। हाल ही में उन्हें संगठन में अहम जिम्मेदारी भी दी गई थी, लेकिन कुछ ही दिनों बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया। आगे की रणनीति पर नजर मदन मित्रा के बागी गुट में शामिल होने के बाद अब सभी की नजर पश्चिम बंगाल की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों और TMC नेतृत्व की अगली रणनीति पर टिकी है। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में पार्टी के भीतर और भी बड़े राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिल सकते हैं।