टेक्नोलॉजी

Hydrogel Turns Moisture Into Power

हवा की नमी और पसीने से बनेगी बिजली! वैज्ञानिकों ने बनाया अनोखा हाइड्रोजेल जनरेटर, बिना चार्जर चल सकेंगे स्मार्ट डिवाइस

surbhi जून 25, 2026 0
Flexible hydrogel generator producing electricity from air moisture and human sweat for wearable devices
Hydrogel Generator Powered by Moisture

नई दिल्ली: कल्पना कीजिए कि आपकी स्मार्टवॉच, फिटनेस बैंड या हेल्थ मॉनिटर को कभी चार्ज करने की जरूरत ही न पड़े। वे सिर्फ हवा की नमी या आपके शरीर के पसीने से खुद ही ऊर्जा बनाकर काम करते रहें। यह सुनने में भले भविष्य की तकनीक लगे, लेकिन वैज्ञानिकों ने इस दिशा में एक बड़ी सफलता हासिल कर ली है।

शोधकर्ताओं ने एक नया फ्लेक्सिबल हाइड्रोजेल मॉइस्चर-इलेक्ट्रिक जनरेटर विकसित किया है, जो वातावरण में मौजूद नमी और मानव शरीर से निकलने वाले पसीने को सोखकर सीधे बिजली उत्पन्न कर सकता है। यह तकनीक भविष्य में वियरेबल डिवाइस और मेडिकल सेंसर की दुनिया बदल सकती है।

क्यों खास है यह नई तकनीक?

आज स्मार्टवॉच, फिटनेस ट्रैकर, वायरलेस ईयरबड्स और मेडिकल सेंसर जैसे उपकरणों की सबसे बड़ी चुनौती उनकी बैटरी है। इन्हें बार-बार चार्ज करना पड़ता है और समय के साथ बैटरी खराब होने पर इलेक्ट्रॉनिक कचरा भी बढ़ता है।

वैश्विक स्तर पर ई-वेस्ट लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में वैज्ञानिक ऐसी तकनीकों पर काम कर रहे हैं जो छोटे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को खुद ऊर्जा पैदा करने में सक्षम बना सकें।

नया हाइड्रोजेल जनरेटर इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

हवा की नमी से कैसे बनती है बिजली?

यह मॉइस्चर-इलेक्ट्रिक जनरेटर हवा में मौजूद जलवाष्प (Water Vapor) को अवशोषित करता है और उसे विद्युत ऊर्जा में बदल देता है।

इसका मतलब है कि:

  • त्वचा पर लगाए गए हेल्थ सेंसर
  • फिटनेस बैंड
  • स्मार्ट पैच
  • फेस मास्क आधारित सेंसर
  • मेडिकल मॉनिटर

भविष्य में बाहरी चार्जर या बड़ी बैटरी के बिना भी काम कर सकते हैं।

नई तकनीक कैसे काम करती है?

इस तकनीक का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा विशेष प्रकार का हाइड्रोजेल है।

शोधकर्ताओं ने:

  • पानी और ग्लिसरॉल आधारित चिपकने वाला हाइड्रोजेल तैयार किया।
  • इसे लिक्विड मेटल और स्ट्रेचेबल सिल्वर इलेक्ट्रोड से जोड़ा।
  • ग्लिसरॉल की मदद से हाइड्रोजेल और इलेक्ट्रोड के बीच मजबूत संपर्क बनाया।

इससे डिवाइस के अंदर विद्युत प्रवाह लगातार बना रहता है, चाहे उसे मोड़ा जाए, खींचा जाए या पहनकर इस्तेमाल किया जाए।

हजारों बार मोड़ने पर भी नहीं हुआ खराब

इस तकनीक की सबसे बड़ी उपलब्धियों में इसकी मजबूती शामिल है।

परीक्षण के दौरान:

  • डिवाइस को 8,000 बार मोड़ा गया।
  • 80% तक खींचकर 1,000 बार टेस्ट किया गया।
  • 180 डिग्री तक मोड़ने और खींचने के बाद भी इसकी कार्यक्षमता बरकरार रही।

यानी यह रोजमर्रा के उपयोग के लिए काफी लचीला और टिकाऊ साबित हुआ।

85% नमी में लगातार 9 दिन तक बिजली

टेस्टिंग के दौरान शोधकर्ताओं ने पाया कि:

  • 85% आर्द्रता (Humidity) में यह लगभग 0.94 वोल्ट बिजली उत्पन्न करने में सक्षम रहा।
  • डिवाइस ने लगातार 220 घंटे यानी 9 दिन से अधिक समय तक स्थिर बिजली उत्पादन किया।

हालांकि यह किसी स्मार्टफोन चार्जर जितनी ऊर्जा नहीं बनाता, लेकिन छोटे सेंसर और वियरेबल डिवाइस चलाने के लिए पर्याप्त माना जा रहा है।

किन क्षेत्रों में हो सकता है उपयोग?

विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक कई क्षेत्रों में क्रांतिकारी बदलाव ला सकती है।

संभावित उपयोग:

स्वास्थ्य सेवाएं

  • ECG मॉनिटर
  • हार्ट रेट सेंसर
  • सांसों की निगरानी करने वाले उपकरण

फिटनेस और स्पोर्ट्स

  • फिटनेस ट्रैकर्स
  • एथलीट परफॉर्मेंस मॉनिटरिंग

बुजुर्गों की देखभाल

  • निरंतर स्वास्थ्य निगरानी
  • आपातकालीन स्वास्थ्य सेंसर

दूरस्थ चिकित्सा (Telemedicine)

  • ऐसे क्षेत्रों में मेडिकल मॉनिटरिंग जहां बिजली की उपलब्धता सीमित है

क्या स्मार्टवॉच और ईयरबड्स बिना चार्जर चलेंगे?

फिलहाल यह तकनीक शुरुआती शोध चरण में है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इसे बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करने से पहले:

  • लंबे समय तक परीक्षण
  • सुरक्षित पैकेजिंग
  • बड़े आकार के प्रोटोटाइप
  • व्यावसायिक उत्पादन

जैसे चरण पूरे करने होंगे।

हालांकि यदि यह तकनीक सफलतापूर्वक बाजार में आती है, तो भविष्य में स्मार्टवॉच, हेल्थ बैंड और अन्य छोटे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की बैटरी पर निर्भरता काफी कम हो सकती है।

तकनीक की सबसे बड़ी उपलब्धि

यह शोध सिर्फ एक नई ऊर्जा तकनीक नहीं बल्कि ई-वेस्ट कम करने की दिशा में भी बड़ा कदम माना जा रहा है। यदि छोटे उपकरण वातावरण की नमी से स्वयं ऊर्जा पैदा कर सकें, तो बैटरी बदलने और चार्जिंग की जरूरत काफी हद तक घट सकती है।

 

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यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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Google Pixel 11, Pixel Watch 5
Google Pixel 11 के साथ Pixel Watch 5 भी होगा लॉन्च, नए स्मार्ट फीचर्स की उम्मीद

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Cloudflare के AI एजेंट्स के लिए लॉन्च Kitesurf ब्राउजर
AI एजेंट्स के लिए Cloudflare ने लॉन्च किया Kitesurf ब्राउजर, Chromium से 7 गुना तक कम मेमोरी खपत का दावा

हैदराबाद, एजेंसियां। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते इस्तेमाल के बीच इंटरनेट इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी Cloudflare ने AI एजेंट्स के लिए खास तौर पर डिजाइन किया गया नया क्लाउड-होस्टेड ब्राउजर Kitesurf लॉन्च किया है। कंपनी के मुताबिक, यह पारंपरिक ब्राउजर से अलग तरीके से काम करता है और AI एजेंट्स को कम संसाधनों में वेब पर काम करने में मदद करता है।   इंसानों के लिए नहीं, AI एजेंट्स के लिए बनाया गया ब्राउजर     Chrome और Firefox जैसे पारंपरिक ब्राउजर मुख्य रूप से इंसानी यूजर्स को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं। इनमें टैब, थीम और एक्सटेंशन जैसी सुविधाएं होती हैं। इसके विपरीत Kitesurf को ऐसे AI एजेंट्स के लिए तैयार किया गया है, जो यूजर की ओर से वेबसाइट खोलने, जानकारी जुटाने और ऑनलाइन टास्क पूरा करने जैसे काम खुद कर सकते हैं।   Cloudflare के अनुसार, AI एजेंट्स के लिए ब्राउजर में कॉन्टेक्स्ट विंडो मैनेजमेंट, कम टोकन कॉस्ट, बेहतर स्केलिंग और सुरक्षा जैसी क्षमताएं ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। ऐसे सिस्टम को प्रॉम्प्ट इंजेक्शन जैसे AI-केंद्रित सुरक्षा खतरों से भी निपटना पड़ता है।   Chromium के मुकाबले कम CPU और मेमोरी का दावा     Cloudflare के अपने टेस्ट के मुताबिक, Kitesurf ने Chromium की तुलना में 3.1 से 3.8 गुना कम CPU और 4.7 से 7 गुना कम मेमोरी का इस्तेमाल किया। कंपनी का दावा है कि इससे बड़े स्तर पर AI एजेंट्स को चलाने की लागत कम हो सकती है।   हालांकि, कम संसाधन इस्तेमाल करने के बदले इसकी स्पीड थोड़ी कम है। कंपनी के परीक्षण में Kitesurf को टास्क पूरा करने में Chromium की तुलना में करीब 1.7 से 1.8 गुना अधिक समय लगा।   12 हफ्तों में तैयार किया गया Kitesurf     Cloudflare के मुताबिक, Kitesurf को महज 12 हफ्तों में विकसित किया गया है। यह कंपनी के Serverless प्लेटफॉर्म Workers पर चलता है और V8 Isolates के भीतर काम करता है।   फिलहाल यह Browser Run के जरिए बीटा वर्जन में उपलब्ध है। डेवलपर्स इसके जरिए हेडलेस ब्राउजर इंस्टेंस को नियंत्रित कर सकते हैं।   कई ओपन-सोर्स टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल     Kitesurf को तैयार करने में कई अलग-अलग टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया गया है। इसमें Blitz का रेंडरिंग इंजन, Firefox का Stylo CSS पार्सर और Rust में लिखा Boa JavaScript इंजन शामिल हैं।   Cloudflare ने ओपन-सोर्स हेडलेस इंजन Obscura को भी इसके शुरुआती प्रोटोटाइप के लिए प्रेरणा का स्रोत बताया है।   2.15 लाख से ज्यादा वेब टेस्ट पास     कंपनी के अनुसार, Kitesurf अब तक 2,15,000 से ज्यादा वेब प्लेटफॉर्म टेस्ट पास कर चुका है। यह Wikipedia, Hacker News और Cloudflare के अपने डैशबोर्ड जैसे वेब पेजों को सही तरीके से लोड करने में सक्षम है।   Kitesurf को Cloudflare के AI एजेंट इकोसिस्टम का हिस्सा माना जा रहा है, जिसमें Agents SDK और AI Search जैसे टूल भी शामिल हैं।

ranjan kumar tiwari अगस्त 10, 2026 0
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