कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद ने बाबरी मस्जिद विध्वंस को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि 1992 की यह घटना देश के इतिहास का एक ऐसा अध्याय है, जिसे भुलाया नहीं जा सकता। नई दिल्ली में आयोजित एक पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में उन्होंने बाबरी विध्वंस को देश के शरीर पर एक "दर्दनाक और बदसूरत फोड़े" की संज्ञा दी और कहा कि सरकारें कई बार परिस्थितियों को देखते हुए रणनीतिक संयम का रास्ता अपनाती हैं, लेकिन समय बीतने के बाद वही फैसले गलत भी लग सकते हैं। सलमान खुर्शीद लेखक और वकील जावेद गाया की पुस्तक "हार्टलैंड राइजिंग: द मेकिंग ऑफ मेजॉरिटेरियन इंडिया" के विमोचन कार्यक्रम में शामिल हुए थे। इस दौरान उन्होंने बाबरी मस्जिद विध्वंस, 2002 के गुजरात दंगे, देश के विभाजन और उत्तर प्रदेश की राजनीति जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर विस्तार से अपनी बात रखी। बाबरी मस्जिद विध्वंस पर क्या बोले सलमान खुर्शीद? कार्यक्रम की संचालक मालविका राजकोटिया ने सलमान खुर्शीद से पूछा कि 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद विध्वंस के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव की सरकार ने रणनीतिक संयम क्यों अपनाया था। इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि किसी एक घटना को अलग करके देखने पर वह बहुत बड़ी, दर्दनाक और भयावह दिखाई देती है, लेकिन समय के साथ परिस्थितियों को व्यापक संदर्भ में समझना भी जरूरी होता है। उन्होंने कहा कि पीछे मुड़कर देखने पर यह कहना आसान होता है कि कौन-सा फैसला सही था और कौन-सा गलत। लेकिन जब कोई सरकार सत्ता में होती है, तब उसे उसी समय उपलब्ध परिस्थितियों और सीमित विकल्पों के आधार पर निर्णय लेना पड़ता है। 'संयम नहीं रखते तो हालात और ज्यादा बिगड़ सकते थे' सलमान खुर्शीद ने कहा कि उस समय कई लोगों की राय थी कि रणनीतिक संयम ही सबसे बेहतर विकल्प था। उनका मानना था कि अगर सरकार ने तत्काल सख्त कार्रवाई की होती, तो देश में हालात और अधिक बिगड़ सकते थे और बड़े स्तर पर हिंसा फैल सकती थी। हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि संभव है, जिस रणनीतिक संयम को उस समय सही समझा गया, वही बाद में हालात को और गंभीर बनाने का कारण भी बना हो। उन्होंने कहा कि इतिहास का मूल्यांकन हमेशा बाद में होता है और समय बीतने के बाद फैसलों पर अलग नजरिया बन सकता है। देश के विभाजन का भी दिया उदाहरण अपने जवाब के दौरान सलमान खुर्शीद ने भारत के विभाजन का उदाहरण भी दिया। उन्होंने कहा कि आज भी कई लोग देश के विभाजन के लिए जवाहरलाल नेहरू को जिम्मेदार ठहराते हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या उस समय यह फैसला लिया जा सकता था कि विभाजन नहीं होगा, भले ही देश गृहयुद्ध की स्थिति में पहुंच जाए। उन्होंने कहा कि सत्ता में बैठी सरकारों के सामने कई कठिन परिस्थितियां होती हैं और उन्हें उपलब्ध विकल्पों में से सबसे उपयुक्त फैसला लेना पड़ता है। बाद में उन फैसलों की आलोचना करना अपेक्षाकृत आसान होता है। उत्तर प्रदेश की राजनीति को बताया सबसे अहम उत्तर प्रदेश की राजनीति पर बोलते हुए सलमान खुर्शीद ने कहा कि देश के लोकतांत्रिक भविष्य की दिशा काफी हद तक उत्तर प्रदेश तय करेगा। उनके मुताबिक यदि भारत को संविधान की मूल भावना और लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करना है, तो इसकी शुरुआत उत्तर प्रदेश से हो सकती है। उन्होंने कहा कि कुछ लोगों का मानना है कि देश में राजनीतिक बदलाव संभव नहीं है, जबकि कुछ लोग इसे पूरी तरह संभव मानते हैं। वहीं, कुछ विश्लेषकों का मानना है कि बदलाव भारतीय जनता पार्टी के भीतर से आएगा, जबकि अन्य का कहना है कि उत्तर प्रदेश में गठबंधन की राजनीति भविष्य की दिशा तय कर सकती है। कई अहम मुद्दों पर रखी राय कार्यक्रम के दौरान सलमान खुर्शीद ने बाबरी मस्जिद विध्वंस के अलावा 2002 के गुजरात दंगों, भारत के विभाजन और मौजूदा राजनीतिक माहौल पर भी अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि इतिहास की घटनाओं को केवल एक नजरिए से नहीं देखा जा सकता। किसी भी बड़े फैसले का आकलन उस समय की परिस्थितियों, चुनौतियों और उपलब्ध विकल्पों को ध्यान में रखकर ही किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में संवाद, संवैधानिक मूल्यों और संस्थाओं की मजबूती सबसे महत्वपूर्ण है। सरकारों के फैसलों का मूल्यांकन समय के साथ बदल सकता है, लेकिन इतिहास से सीख लेकर भविष्य की दिशा तय करना अधिक जरूरी है।
राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामले पर CM योगी का बड़ा बयान, बोले- साधु-संतों की संलिप्तता नहीं मिली लखनऊ, एजेंसियां। अयोध्या स्थित राम मंदिर के चढ़ावे में कथित गड़बड़ी और चोरी के मामले को लेकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बड़ा बयान दिया है। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि मामले की जांच कर रही विशेष जांच टीम (SIT) की प्रारंभिक जांच में किसी साधु या संत की संलिप्तता नहीं पाई गई है। SIT जांच को लेकर योगी ने स्थिति साफ की मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि राम मंदिर के चढ़ावे से जुड़े मामले की जांच गंभीरता से की जा रही है। उन्होंने कहा कि अब तक सामने आए तथ्यों के आधार पर साधु-संतों को इस मामले से जोड़ना उचित नहीं है। योगी का यह बयान ऐसे समय आया है जब राम मंदिर के चढ़ावे में कथित चोरी को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तेज हैं और यह मुद्दा उत्तर प्रदेश विधानसभा में भी उठा है। विपक्ष पर भी साधा निशाना मुख्यमंत्री ने मामले को लेकर विपक्ष पर भी निशाना साधा। विधानसभा में इस मुद्दे पर हंगामे के बीच योगी ने आरोप लगाया कि विपक्ष अयोध्या और राम मंदिर से जुड़े मुद्दे को राजनीतिक रंग देने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने कहा कि जांच एजेंसियां तथ्यों के आधार पर कार्रवाई करेंगी और दोषी पाए जाने वाले किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा। दोषियों पर होगी कार्रवाई योगी आदित्यनाथ पहले भी इस मामले में कह चुके हैं कि जन आस्था के साथ खिलवाड़ करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी। जून में उन्होंने जांच के नतीजे सामने आने का इंतजार करने की बात कही थी और कहा था कि दोषी कोई भी हो, उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। राम मंदिर चढ़ावा मामले की जांच अभी जारी है। ऐसे में अंतिम निष्कर्ष और दोषियों की पहचान जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी।
अयोध्या, एजेंसियां। श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में एक बार फिर सोने-चांदी के चढ़ावे में तेजी देखने को मिल रही है। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट से जुड़े सूत्रों के अनुसार, पिछले 10 दिनों में श्रद्धालुओं ने करीब एक किलोग्राम सोना और लगभग तीन किलोग्राम चांदी दान स्वरूप अर्पित की है। सावन माह में दर्शनार्थियों की संख्या बढ़ने के साथ नकद दान के अलावा आभूषण, सिक्के और अन्य बहुमूल्य वस्तुओं का चढ़ावा भी लगातार बढ़ रहा है। मंदिर प्रशासन के अनुसार, प्राप्त सभी दान का रिकॉर्ड ऑनलाइन दर्ज किया जा रहा है और सुरक्षा मानकों के तहत उन्हें स्ट्रॉन्ग रूम में सुरक्षित रखा जा रहा है। इसके बाद ट्रस्ट की निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार धातुओं की शुद्धता की जांच और अन्य औपचारिकताएं पूरी की जाती हैं। चोरी की घटना के बाद लौटा श्रद्धालुओं का भरोसा, झूलनोत्सव की तैयारियां तेज राम मंदिर में कुछ समय पहले हुई चढ़ावा चोरी की घटना के बाद सोने-चांदी के दान में कमी आई थी, लेकिन अब सावन के दौरान श्रद्धालुओं का भरोसा फिर बढ़ता नजर आ रहा है। हाल के दिनों में मंदिर में प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं। बुधवार को करीब 75 हजार, गुरुवार को सवा लाख और शुक्रवार को लगभग 80 हजार श्रद्धालुओं ने रामलला के दर्शन किए। इसी दौरान कर्नाटक के एक श्रद्धालु ने 600 ग्राम चांदी का हार भेंट किया, जबकि अन्य श्रद्धालुओं ने सोने-चांदी के आभूषण और सिक्के दान किए। 17 अगस्त को स्वर्ण झूले पर विराजेंगे रामलला राम मंदिर ट्रस्ट ने सावन उत्सव और झूलनोत्सव की तैयारियां भी तेज कर दी हैं। सावन शुक्ल पंचमी यानी 17 अगस्त को रामलला को स्वर्ण झूले पर विराजमान कराया जाएगा। इसके लिए धर्म समिति विस्तृत कार्यक्रम तैयार कर रही है, जिसमें प्रतिदिन झूला दर्शन, भजन, कजरी और अन्य धार्मिक आयोजन शामिल होंगे। 15 अगस्त से मणि पर्वत पर पारंपरिक झूलनोत्सव की शुरुआत होगी, जबकि मंदिर परिसर में विशेष धार्मिक कार्यक्रमों के आयोजन की भी तैयारी की जा रही है। ट्रस्ट के पदाधिकारी और संत आयोजन को भव्य और सुव्यवस्थित बनाने के लिए लगातार समीक्षा बैठकें कर रहे हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावा चोरी मामले की जांच तेज हो गई है और अब इस हाई-प्रोफाइल प्रकरण में राम मंदिर ट्रस्ट के पूर्व सदस्य डॉ. अनिल मिश्रा की भूमिका भी जांच के दायरे में आ गई है। पुलिस ने मामले में गिरफ्तार सभी आठ आरोपियों से पूछताछ पूरी कर ली है। उनके बयानों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि चोरी की घटनाओं में प्रशासनिक लापरवाही या अन्य स्तर पर किसी की जिम्मेदारी बनती है या नहीं। सूत्रों के अनुसार, विवेचना पूरी होने के बाद डॉ. अनिल मिश्रा के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज किए जाने की संभावना जताई जा रही है। जांच के दौरान जांच के दौरान सामने आया कि डॉ. अनिल मिश्रा के पास मंदिर के गणना कक्ष की जिम्मेदारी थी। आरोप है कि शिकायतें मिलने के बावजूद समय पर आवश्यक कार्रवाई नहीं की गई, जिससे चोरी की घटनाओं को रोकने में विफलता रही। जांच एजेंसियां इस पहलू की भी पड़ताल कर रही हैं कि सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था में कहीं कोई गंभीर चूक तो नहीं हुई। इस मामले में पहले ट्रस्ट के पूर्व महासचिव चंपत राय का एक पत्र भी चर्चा में आया था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि चढ़ावे की गणना के लिए तैयार स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) में बिना अनुमति बदलाव किया गया और आवश्यक हस्ताक्षर प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। हालांकि, इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही हो सकेगी। पुलिस पूछताछ में क्या निकला ? पुलिस पूछताछ में छह आरोपियों ने कथित तौर पर चढ़ावा चोरी में अपनी संलिप्तता स्वीकार की है, जबकि दो आरोपी स्वयं को निर्दोष बता रहे हैं। जांच के दौरान कुछ सोना-चांदी और नकदी भी बरामद किए जाने की जानकारी सामने आई है। साथ ही, मुख्य आरोपी बताए जा रहे राम शंकर यादव उर्फ टिन्नू की संपत्तियों और उसके प्रभाव क्षेत्र की भी जांच की जा रही है। जांच एजेंसियों का मानना है कि यदि सुरक्षा व्यवस्था और निगरानी प्रणाली अधिक प्रभावी होती, तो इस तरह की घटनाओं को रोका जा सकता था। मामले में एसआईटी अपनी रिपोर्ट संबंधित न्यायिक प्रक्रिया के तहत प्रस्तुत कर चुकी है और आगे की कार्रवाई जांच के निष्कर्षों तथा अदालत की प्रक्रिया पर निर्भर करेगी।
मुंबई, एजेंसियां। सप्ताह के पहले कारोबारी दिन भारतीय शेयर बाजार में गिरावट दर्ज की गई। सोमवार को बीएसई सेंसेक्स 443 अंक फिसलकर 77,709 के स्तर पर बंद हुआ, जबकि एनएसई निफ्टी 96 अंक टूटकर 24,239 पर आ गया। पूरे दिन के कारोबार में निवेशकों ने खासकर प्राइवेट बैंक, ऑटोमोबाइल और आईटी शेयरों में बिकवाली की, जबकि सरकारी बैंक और फार्मा सेक्टर के शेयरों में सीमित खरीदारी देखने को मिली। बाजार पर सबसे अधिक दबाव निजी बैंकिंग शेयरों से आया। पहली तिमाही (Q1) के वित्तीय नतीजों के बाद HDFC बैंक, एक्सिस बैंक और कोटक महिंद्रा बैंक जैसे प्रमुख शेयरों में कमजोरी रही। इसके साथ ही ऑटो और आईटी सेक्टर में भी मुनाफावसूली देखने को मिली, जिससे प्रमुख सूचकांक लाल निशान में बंद हुए। वैश्विक बाजारों के कमजोर संकेतों का भी घरेलू बाजार पर असर पड़ा। एशियाई बाजारों में जापान का निक्केई और दक्षिण कोरिया का कोस्पी भारी गिरावट के साथ बंद हुए, जबकि हांगकांग के हैंगसेंग में तेजी दर्ज की गई। वहीं, पिछले कारोबारी सत्र में अमेरिकी बाजारों में भी गिरावट रही, जिससे निवेशकों का भरोसा प्रभावित हुआ। विशेषज्ञों के अनुसार विशेषज्ञों के अनुसार, बाजार में गिरावट के पीछे कई प्रमुख कारण रहे। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव, ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत 90 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंचना, विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) की लगातार बिकवाली और अमेरिकी 10-वर्षीय बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी ने निवेशकों की चिंता बढ़ाई। इन परिस्थितियों में निवेशकों ने जोखिम वाले निवेश से दूरी बनानी शुरू कर दी। गौरतलब है कि इससे पहले शुक्रवार को बाजार में जोरदार तेजी देखने को मिली थी। उस दिन सेंसेक्स 964 अंक चढ़कर 78,151 पर और निफ्टी 261 अंक की बढ़त के साथ 24,334 पर बंद हुआ था। हालांकि, सोमवार को वैश्विक और घरेलू कारकों के दबाव ने बाजार की दिशा बदल दी। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में वैश्विक आर्थिक घटनाक्रम, कच्चे तेल की कीमतों और विदेशी निवेशकों की गतिविधियों पर निवेशकों की नजर बनी रहेगी।
अयोध्या राम मंदिर में चढ़ावे और दान से जुड़ी कथित अनियमितताओं का मामला अब संसद तक पहुंचने की तैयारी में है। कांग्रेस ने साफ संकेत दिए हैं कि वह मानसून सत्र के दौरान इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाएगी। पार्टी का कहना है कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े इस मामले में पूरी पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए। संसद में चर्चा की मांग करेगी कांग्रेस कांग्रेस नेताओं के अनुसार, राम मंदिर में मिले दान और चढ़ावे के प्रबंधन को लेकर उठ रहे सवालों पर संसद में विस्तृत चर्चा होनी चाहिए। पार्टी का कहना है कि यदि किसी प्रकार की वित्तीय अनियमितता हुई है, तो उसकी निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए। प्रमोद तिवारी ने लगाए गंभीर आरोप कांग्रेस सांसद प्रमोद तिवारी ने आरोप लगाया कि मामले की जांच वास्तविक जिम्मेदार लोगों तक पहुंचनी चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि किसी स्तर पर गड़बड़ी हुई है तो उसे सामने लाया जाना चाहिए और किसी भी प्रभावशाली व्यक्ति को बचाने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। हालांकि, इन आरोपों की अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और मामले की जांच जारी है। दान और चढ़ावे को लेकर बढ़ी राजनीतिक बयानबाजी राम मंदिर चढ़ावा विवाद को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। विपक्ष जहां मामले में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग कर रहा है, वहीं भाजपा और उसके सहयोगी दल विपक्ष के आरोपों को राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित बता रहे हैं। जांच पूरी होने का इंतजार मामले की जांच फिलहाल संबंधित एजेंसियों के स्तर पर जारी है। ऐसे में किसी भी तरह की अनियमितता या जिम्मेदारी को लेकर अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने के बाद ही सामने आएगा। मानसून सत्र में गरमा सकता है मुद्दा संसद के मानसून सत्र में यह मामला प्रमुख राजनीतिक मुद्दों में शामिल हो सकता है। कांग्रेस समेत विपक्षी दल सरकार से इस विषय पर जवाब मांगने की तैयारी में हैं, जबकि सत्ता पक्ष के भी इस मुद्दे पर अपना पक्ष रखने की संभावना है। ऐसे में आने वाले दिनों में संसद के भीतर इस मुद्दे पर तीखी बहस देखने को मिल सकती है।
अयोध्या, एजेंसियां। अयोध्या के राम मंदिर चढ़ावा चोरी एवं गबन मामले में मुख्य आरोपी रमाशंकर यादव उर्फ टिन्नू यादव और उसके भतीजे मनीष यादव को 39 घंटे की पुलिस कस्टडी रिमांड पर लिया गया है। शनिवार सुबह 8:40 बजे से शुरू हुई रिमांड के तहत दोनों आरोपियों को जिला कारागार से पुलिस लाइन स्थित अस्पताल ले जाया गया, जहां मेडिकल परीक्षण के बाद उन्हें विशेष जांच दल (एसआईटी) और पुलिस की संयुक्त पूछताछ के लिए एसओजी कार्यालय पहुंचाया गया। इस दौरान टिन्नू यादव मीडिया और लोगों की नजरों से बचने के लिए पूरे समय गमछे से अपना चेहरा ढके रहा। जांच एजेंसियों के अनुसार जांच एजेंसियों के अनुसार, इस रिमांड के दौरान दोनों आरोपियों से मंदिर के चढ़ावे की कथित रकम के गबन, उसके बंटवारे और धन के इस्तेमाल से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर गहन पूछताछ की जाएगी। पुलिस उन्हें उन स्थानों पर भी ले जा सकती है, जहां कथित रूप से चढ़ावे की राशि का वितरण किया जाता था। इसके अलावा रियल एस्टेट, निर्माण कार्य, मकानों, हॉस्टलों और अन्य संपत्तियों में किए गए संभावित निवेश की भी जांच होगी। नकदी, आभूषण और दस्तावेजों की बरामदगी पर फोकस पुलिस का मुख्य उद्देश्य मामले से जुड़ी नकदी, आभूषण और महत्वपूर्ण दस्तावेजों की बरामदगी करना है। इससे पहले तीन चरणों की पुलिस कस्टडी के दौरान छह अन्य आरोपियों से पूछताछ में जांच एजेंसियों को कई अहम साक्ष्य मिले थे। इस दौरान दस्तावेज, आभूषण और दो चारपहिया वाहन भी बरामद किए गए थे। सूत्रों के मुताबिक सूत्रों के मुताबिक, एसआईटी की रिपोर्ट में यह उल्लेख है कि टिन्नू यादव के पास मंदिर की दानपेटिका (हुंडी) की चाबी रहती थी। इसी आधार पर जांच एजेंसियां मान रही हैं कि मुख्य आरोपियों से पूछताछ इस मामले का सबसे अहम चरण साबित हो सकती है। अधिकारियों को उम्मीद है कि रिमांड के दौरान चढ़ावे की रकम के गबन, उसके निवेश, पूरे नेटवर्क और मामले में शामिल अन्य संभावित लोगों की भूमिका से जुड़े महत्वपूर्ण खुलासे सामने आ सकते हैं। फिलहाल पुलिस और एसआईटी सभी पहलुओं की गहन जांच में जुटी हुई हैं।
अयोध्या: राम मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी की जांच के बीच अब श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के सामने एक नई चुनौती खड़ी हो गई है। दान की गिनती करने वाले 20 कर्मचारियों के इस्तीफे के बाद चढ़ावे की गिनती की व्यवस्था प्रभावित होने लगी है। कर्मचारियों ने बढ़ते कार्यभार और मानसिक दबाव को इस्तीफे की वजह बताया है। जांच के बाद आधे से ज्यादा कर्मचारी हुए अलग पुलिस सूत्रों के अनुसार, पहले मंदिर में दान की राशि गिनने के लिए करीब 40 कर्मचारी तैनात थे। कथित चढ़ावा चोरी का मामला सामने आने के बाद कई कर्मचारियों ने नियमित रूप से ड्यूटी पर आना बंद कर दिया। शुरुआत में रोजाना केवल 15 से 20 कर्मचारी ही काम कर रहे थे। अब 20 कर्मचारियों के इस्तीफे के बाद यह संख्या घटकर लगभग एक दर्जन रह गई है। बढ़ते काम और सख्त प्रक्रिया से बढ़ा दबाव इस्तीफा देने वाले कर्मचारियों ने अपने पत्र में लिखा है कि जांच के बाद दान गिनने की पूरी प्रक्रिया पहले से कहीं अधिक सख्त हो गई है। हर चरण में अतिरिक्त जांच, सत्यापन और निगरानी के कारण काम का दबाव काफी बढ़ गया है। कर्मचारियों का कहना है कि लगातार बढ़ते कार्यभार और मानसिक तनाव के चलते जिम्मेदारी निभाना मुश्किल हो गया था। चढ़ावा चोरी मामले के बाद बदली व्यवस्था राम मंदिर में कथित चढ़ावा चोरी का मामला सामने आने के बाद जांच एजेंसियां सक्रिय हैं। इसके बाद ट्रस्ट ने दान की गिनती की प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी बनाने के लिए कई अतिरिक्त सुरक्षा उपाय लागू किए हैं। अब हर चरण की निगरानी की जा रही है, जिससे प्रक्रिया पहले की तुलना में अधिक समय लेने लगी है। ट्रस्ट के सामने नई चुनौती कर्मचारियों के लगातार इस्तीफों से ट्रस्ट के सामने दान गिनने की व्यवस्था को सुचारु बनाए रखना बड़ी चुनौती बन गया है। अब ट्रस्ट को नई टीम तैयार करने के साथ-साथ पारदर्शिता और सुरक्षा के बीच संतुलन बनाते हुए चढ़ावे की गिनती की प्रक्रिया को सामान्य करना होगा। जांच जारी कथित चढ़ावा चोरी मामले की जांच अभी जारी है। जांच एजेंसियां मामले से जुड़े सभी पहलुओं की पड़ताल कर रही हैं। वहीं, ट्रस्ट प्रशासन का फोकस अब दान गिनने की व्यवस्था को बिना किसी बाधा के जारी रखने और नई व्यवस्था को प्रभावी ढंग से लागू करने पर है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। अयोध्या स्थित श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में चढ़ावे और दान राशि से जुड़े कथित अनियमितताओं का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। मामले में दायर याचिकाओं में केंद्रीय जांच ब्यूरो से स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराने की मांग की गई है। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ करेगी। CBI जांच और FIR दर्ज करने की मांग याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की है कि राम मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा दिए गए चढ़ावे और दान से जुड़ी कथित गड़बड़ियों की जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी से कराई जाए। याचिका में CBI के नेतृत्व में जांच कराने और मामले में प्राथमिकी दर्ज करने की मांग भी की गई है। मंदिर दान की पारदर्शिता पर उठे सवाल याचिका में आरोप लगाया गया है कि मंदिर से जुड़े दान और चढ़ावे की व्यवस्था में कथित वित्तीय अनियमितताओं की निष्पक्ष जांच जरूरी है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि जांच ऐसी एजेंसी से कराई जानी चाहिए जिसके पास बड़े वित्तीय मामलों की जांच का अनुभव हो। सुप्रीम कोर्ट में जल्द होगी सुनवाई मामले की सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट ने इसे सूचीबद्ध किया है। रिपोर्टों के अनुसार, 13 जुलाई को CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ इस मामले पर सुनवाई कर सकती है। अयोध्या पुलिस भी कर रही जांच इस मामले में अयोध्या पुलिस की ओर से भी जांच जारी है। रिपोर्टों के मुताबिक, जांच के दौरान कुछ संदिग्धों से पूछताछ की गई है और कथित रूप से चढ़ावे में शामिल आभूषणों से जुड़े मामलों की भी पड़ताल की जा रही है। मामले पर देशभर की नजर राम मंदिर से जुड़ा यह मामला धार्मिक और सामाजिक रूप से संवेदनशील माना जा रहा है। अब सभी की नजर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर है कि अदालत इस मामले में CBI जांच या किसी अन्य जांच व्यवस्था को लेकर क्या दिशा-निर्देश देती है।
अयोध्या: राम मंदिर में कथित चंदा गड़बड़ी मामले में पूर्व महासचिव चंपत राय ने पहली बार अपनी चुप्पी तोड़ी है। विशेष जांच दल (SIT) को दिए गए लिखित बयान में उन्होंने भारतीय स्टेट बैंक (SBI) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि बैंक ने कैश रूम से जुड़े अपने ही सुरक्षा नियमों का पालन नहीं किया, जिससे लापरवाही की स्थिति बनी। SBI की सुरक्षा व्यवस्था पर उठाए सवाल मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, चंपत राय ने अपने बयान में कहा कि बैंक के कैश रूम (चेस्ट रूम) में प्रवेश और निकास के दौरान कर्मचारियों की तलाशी लेना अनिवार्य होता है। इसके अलावा बैंक कर्मचारियों की यूनिफॉर्म में जेब नहीं होनी चाहिए, ताकि नकदी की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। उन्होंने आरोप लगाया कि बैंक ने इन नियमों को प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया। शुरुआत में कर्मचारियों को जेब वाली यूनिफॉर्म दी गई और वरिष्ठ अधिकारियों ने इस पर ध्यान नहीं दिया। राय का कहना है कि यदि सुरक्षा मानकों का सही तरीके से पालन होता, तो ऐसी स्थिति पैदा ही नहीं होती। 'बैंक ने अपने ही नियमों की अनदेखी की' चंपत राय ने सवाल उठाया कि जब सुरक्षा संबंधी दिशानिर्देश पहले से तय थे, तो उन्हें लागू क्यों नहीं किया गया। उनका कहना है कि बैंक अधिकारियों की सतर्कता से संभावित गड़बड़ियों को समय रहते रोका जा सकता था। ट्रस्ट में हुए बड़े बदलाव चंदा विवाद के बीच राम मंदिर ट्रस्ट ने पूर्व महासचिव चंपत राय का इस्तीफा स्वीकार कर लिया है। ट्रस्ट सदस्य अनिल मिश्रा का इस्तीफा भी मंजूर कर लिया गया है, जबकि प्रशासक गोपाल राव को उनके पद से हटा दिया गया है। साथ ही ट्रस्ट ने नए मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) की नियुक्ति के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया है। समिति जल्द ही नए सीईओ के चयन की प्रक्रिया शुरू करेगी। आठ गिरफ्तारियां, लाखों रुपये बरामद जांच एजेंसियों के अनुसार, इस मामले में अब तक आठ लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। पुलिस ने आरोपियों के कब्जे से करीब 79.85 लाख रुपये बरामद करने का दावा किया है। मामले की जांच अभी भी एसआईटी की निगरानी में जारी है। '45 साल का सार्वजनिक जीवन पूरी तरह पारदर्शी' चंपत राय ने कहा कि उन्होंने ट्रस्ट की इच्छा का सम्मान करते हुए अब तक इस मामले पर सार्वजनिक बयान नहीं दिया था। उन्होंने कहा कि एसआईटी की प्रारंभिक रिपोर्ट सामने आ चुकी है, लेकिन अंतिम रिपोर्ट आने के बाद ही पूरे मामले की सच्चाई स्पष्ट होगी। उन्होंने कहा, "मैं 1991 से अयोध्या में सेवा कर रहा हूं। मेरा 45 वर्षों का सार्वजनिक जीवन पूरी तरह पारदर्शी रहा है। मुझे विश्वास है कि जांच पूरी होने के बाद सभी तथ्य सामने आ जाएंगे।" जांच जारी राम मंदिर चंदा विवाद की जांच फिलहाल एसआईटी कर रही है। अंतिम जांच रिपोर्ट आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि कथित वित्तीय अनियमितताओं की जिम्मेदारी किस पर तय होती है। तब तक मामले में जांच और कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।
देवघर। झारखंड के देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम को विश्वस्तरीय धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। अयोध्या की तर्ज पर मंदिर परिसर के आसपास लगभग 30 एकड़ क्षेत्र में भव्य कॉरिडोर विकसित करने की योजना तैयार की जा रही है। इस परियोजना का उद्देश्य श्रद्धालुओं को आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराना, यातायात व्यवस्था को सुव्यवस्थित बनाना और मंदिर की ऐतिहासिक एवं धार्मिक विरासत का संरक्षण करना है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद एनआईटी पटना को बाबा बैद्यनाथ धाम के समग्र विकास की रूपरेखा तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। प्रस्तावित योजना के पहले चरण में 30 एकड़ क्षेत्र में कॉरिडोर विकसित किया जाएगा। इसके बाद दूसरे चरण में करीब 40.24 एकड़ क्षेत्र में रणनीतिक विकास कार्य होंगे, जबकि तीसरे चरण में 83.70 एकड़ क्षेत्र में फैले ऐतिहासिक जल स्रोतों के संरक्षण और पुनर्जीवन पर काम किया जाएगा। शिवगंगा, मानसरोवर, सतार पोखरिया और जलसार योजना के तहत शिवगंगा, मानसरोवर, सतार पोखरिया और जलसार जैसे धार्मिक महत्व वाले जल निकायों का संरक्षण किया जाएगा। साथ ही, बाबाधाम को देवघर के चार प्रमुख प्रवेश मार्गों से जोड़ने के लिए अलग-अलग तीर्थयात्री पहुंच मार्ग भी विकसित किए जाएंगे, जिससे श्रद्धालुओं की आवाजाही अधिक सुगम हो सके। मास्टर प्लान में मंदिर के चारों ओर 750 मीटर क्षेत्र को 'कोर हेरिटेज जोन' बनाने का प्रस्ताव है। इस क्षेत्र में पैदल यात्रियों को प्राथमिकता दी जाएगी और निजी वाहनों के प्रवेश पर प्रतिबंध रहेगा। केवल आपातकालीन सेवाओं, मंदिर प्रशासन और अधिकृत इलेक्ट्रिक वाहनों को ही अनुमति मिलेगी। इसके बाहर 750 से 1000 मीटर तक 'मैनेजमेंट जोन' विकसित किया जाएगा, जहां मल्टीलेवल पार्किंग, तीर्थयात्री सुविधा केंद्र, सार्वजनिक परिवहन इंटरचेंज और विश्राम स्थल बनाए जाएंगे। इमरजेंसी एक्सेस कॉरिडोर भी बनाया जाएगा इसके अलावा 20 मीटर चौड़ा इमरजेंसी एक्सेस कॉरिडोर भी बनाया जाएगा, ताकि किसी भी आपात स्थिति में राहत एवं बचाव कार्य तेजी से किया जा सके। हालांकि इस महत्वाकांक्षी परियोजना को लागू करने से पहले राज्य सरकार, देवघर जिला प्रशासन, नगर निगम, बाबा बैद्यनाथ मंदिर ट्रस्ट और अन्य संबंधित एजेंसियों की मंजूरी आवश्यक होगी। योजना पूरी होने के बाद बाबाधाम न केवल श्रद्धालुओं के लिए अधिक सुविधाजनक बनेगा, बल्कि देश के प्रमुख धार्मिक पर्यटन स्थलों में भी अपनी अलग पहचान स्थापित करेगा।
अयोध्या: अयोध्या स्थित श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की सोमवार (6 जुलाई) को होने वाली महत्वपूर्ण बैठक पर सभी की नजरें टिकी हैं। राम मंदिर में दान राशि के कथित गबन मामले की जांच के बीच आयोजित इस बैठक में ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी डॉ. अनिल मिश्रा के भविष्य को लेकर बड़ा फैसला लिया जा सकता है। सूत्रों के अनुसार, दोनों के इस्तीफों के साथ-साथ विशेष जांच दल (SIT) की अंतरिम रिपोर्ट पर भी विस्तार से चर्चा होने की संभावना है। बैठक ट्रस्ट अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास के मठ मणिराम छावनी में आयोजित होगी। ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष गोविंद देव गिरी ने सभी नियमित और पदेन सदस्यों को इसमें शामिल होने के लिए आमंत्रित किया है। वर्चुअली शामिल हो सकते हैं अध्यक्ष सूत्रों के मुताबिक, ट्रस्ट अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास फिलहाल अस्पताल में भर्ती हैं। ऐसे में उनके वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से बैठक में शामिल होने की संभावना है। वहीं वरिष्ठ ट्रस्टी के. परासरन भी स्वास्थ्य कारणों से वर्चुअल माध्यम से बैठक में भाग ले सकते हैं। बैठक में किन मुद्दों पर होगी चर्चा? बैठक में मुख्य रूप से निम्नलिखित विषयों पर विचार किया जा सकता है— महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी डॉ. अनिल मिश्रा के सौंपे गए इस्तीफे। दान राशि के कथित गबन मामले में SIT की अंतरिम जांच रिपोर्ट। ट्रस्ट के प्रशासनिक और भविष्य के निर्णयों से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण मुद्दे। ट्रस्ट के नियम क्या कहते हैं? श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के बायलॉज के अनुसार— कोई भी ट्रस्टी कम से कम एक महीने का लिखित नोटिस देकर इस्तीफा दे सकता है। ट्रस्ट अगली बैठक में उसे स्वीकार या अस्वीकार करने का निर्णय लेता है। यदि किसी ट्रस्टी पर ट्रस्ट के हितों के खिलाफ काम करने का आरोप हो, तो उसे हटाने के लिए दो-तिहाई बहुमत आवश्यक होता है। किसी भी ट्रस्टी को हटाने से पहले कारण बताओ नोटिस देना और अपना पक्ष रखने का अवसर देना अनिवार्य है। वर्तमान में ट्रस्ट के 12 सदस्य निर्णय प्रक्रिया में शामिल हैं। किसी प्रस्ताव को मंजूरी देने के लिए कम से कम 8 सदस्यों का समर्थन आवश्यक होगा। VHP ने क्या कहा? इस मामले पर विश्व हिंदू परिषद (VHP) के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने कहा कि कथित दान गबन विवाद से करोड़ों राम भक्तों की भावनाएं आहत हुई हैं। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट एक स्वतंत्र संस्था है और उसके प्रशासनिक फैसलों के लिए वीएचपी जिम्मेदार नहीं है। उन्होंने कहा कि ट्रस्ट अपने नियमों और प्रक्रिया के अनुसार निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है। सभी की नजर बैठक के फैसले पर राम मंदिर ट्रस्ट की यह बैठक ऐसे समय हो रही है जब दान राशि के कथित गबन मामले को लेकर जांच जारी है। ऐसे में चंपत राय और डॉ. अनिल मिश्रा के इस्तीफों पर ट्रस्ट क्या फैसला लेता है और SIT की अंतरिम रिपोर्ट पर क्या रुख अपनाता है, इस पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं। बैठक के बाद ट्रस्ट की ओर से आधिकारिक जानकारी सामने आने की उम्मीद है।
रांची। अलनीनो के प्रभाव से झारखंड में इस वर्ष मानसून कमजोर पड़ गया है, जिसका सीधा असर खेती और जल संसाधनों पर दिखाई देने लगा है। राज्य में अब तक केवल 129 मिमी बारिश दर्ज की गई है, जो सामान्य से करीब 50 प्रतिशत कम है। बारिश की कमी के कारण खरीफ फसलों, खासकर धान की रोपाई बुरी तरह प्रभावित हुई है। हालात को देखते हुए राज्य सरकार लगातार स्थिति की समीक्षा कर रही है और कृषि विभाग हर 15 दिन में खरीफ खेती की तैयारियों का आकलन कर रहा है। बारिश के आकड़े क्या कहते है? बारिश के आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले वर्ष जुलाई के पहले सप्ताह तक राज्य में 417 मिमी वर्षा हो चुकी थी, जबकि इस बार यह आंकड़ा महज 129 मिमी तक सिमट गया है। राजधानी रांची में अब तक 205 मिमी बारिश हुई है, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यहां 600 मिमी से अधिक वर्षा दर्ज की गई थी। पश्चिम सिंहभूम में इस बार केवल 136 मिमी और गढ़वा जिले में महज 18 मिमी बारिश हुई है। राज्य का कोई भी जिला सामान्य वर्षा के स्तर तक नहीं पहुंच पाया है। कम बारिश का सबसे अधिक असर धान की खेती पर पड़ा है। पिछले वर्ष जुलाई के पहले सप्ताह तक लगभग 95 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में धान की रोपाई हो चुकी थी, जबकि इस बार अब तक केवल तीन हजार हेक्टेयर में ही रोपाई हो सकी है। यह रोपाई भी मुख्य रूप से संताल परगना के कुछ जिलों तक सीमित है। दक्षिणी छोटानागपुर और कोल्हान जैसे प्रमुख कृषि क्षेत्रों में भी रोपाई की रफ्तार बेहद धीमी है। कृषि मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की ने कहा कृषि मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की ने कहा कि अलनीनो के कारण सामान्य से करीब 50 प्रतिशत कम वर्षा चिंता का विषय है। हालांकि सरकार ने संभावित सुखाड़ की आशंका को देखते हुए पहले ही सभी आवश्यक तैयारियां पूरी कर ली हैं। उन्होंने बताया कि झारखंड देश का पहला राज्य है, जिसने संभावित सूखे की स्थिति से निपटने के लिए अपना कंटिन्जेंसी प्लान समय रहते केंद्र सरकार को भेज दिया है। सरकार का दावा है कि हालात पर लगातार नजर रखी जा रही है और किसानों को हर संभव सहायता उपलब्ध कराने की तैयारी है।
अयोध्या: अयोध्या स्थित श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में चढ़ावे को लेकर सामने आए कथित अनियमितताओं के मामले ने नया राजनीतिक और सामाजिक मोड़ ले लिया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है, जबकि बजरंग दल के संस्थापक और पूर्व भाजपा सांसद विनय कटियार ने दावा किया है कि उन्होंने इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बातचीत की है। इस बीच, उत्तर प्रदेश सरकार ने मामले की जांच के लिए विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया है, जो कथित वित्तीय अनियमितताओं और दान प्रबंधन से जुड़े पहलुओं की जांच कर रही है। RSS ने संयम बरतने की अपील की RSS के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि मामले की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच होनी चाहिए। यदि जांच में कोई भी व्यक्ति दोषी पाया जाता है तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए। उन्होंने हिंदू समाज से अपील करते हुए कहा कि मामले को लेकर धैर्य बनाए रखें और किसी भी अफवाह या भड़काऊ प्रचार से बचें। उनके अनुसार, कुछ हिंदू विरोधी और राष्ट्र विरोधी ताकतें इस विवाद का फायदा उठाकर समाज में भ्रम फैलाने की कोशिश कर सकती हैं। 'मंदिर प्रबंधन की कमियां दूर हों' होसबाले ने कहा कि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को इस पूरे मामले को गंभीरता से लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि मंदिर के प्रबंधन और व्यवस्था में यदि कहीं कोई कमी है तो उसे जल्द दूर किया जाना चाहिए, ताकि करोड़ों श्रद्धालुओं का विश्वास कायम रहे। विनय कटियार ने ट्रस्ट के पुनर्गठन की मांग की पूर्व भाजपा सांसद और बजरंग दल के संस्थापक विनय कटियार ने श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के पुनर्गठन की मांग की है। उन्होंने दावा किया कि उन्होंने इस पूरे मामले पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से चर्चा की है। कटियार ने यह भी कहा कि जांच पूरी होने के बाद दोषी पाए जाने वाले लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकती है। उनके इस बयान पर अब तक सरकार या जांच एजेंसियों की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। अब तक आठ गिरफ्तार, दो पदाधिकारियों ने दिया इस्तीफा पुलिस के अनुसार, इस मामले में अब तक आठ लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। वहीं, श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के पदाधिकारी चंपत रायऔर अनिल मिश्रा ने अपने-अपने पदों से इस्तीफा दे दिया है। SIT कर रही है पूरे मामले की जांच उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल (SIT) दान प्रबंधन, वित्तीय लेन-देन और कथित अनियमितताओं से जुड़े सभी पहलुओं की जांच कर रहा है। जांच रिपोर्ट आने के बाद आगे की कार्रवाई तय की जाएगी। राजनीतिक हलकों में भी चर्चा तेज अयोध्या राम मंदिर आंदोलन से जुड़े संगठनों और नेताओं के बयान सामने आने के बाद यह मामला राजनीतिक रूप से भी चर्चा का विषय बन गया है। फिलहाल सभी की नजर SIT की जांच और उसकी रिपोर्ट पर टिकी हुई है, जिससे पूरे मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट होने की उम्मीद है।
अयोध्या: श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की महत्वपूर्ण बैठक 6 जुलाई को आयोजित होने की संभावना है। बैठक ऐसे समय प्रस्तावित है, जब राम मंदिर के चढ़ावे में कथित अनियमितताओं के आरोपों और ट्रस्ट के दो वरिष्ठ सदस्यों के इस्तीफों को लेकर चर्चाएं तेज हैं। बैठक में ट्रस्ट के संगठनात्मक ढांचे और भविष्य की कार्ययोजना पर भी विचार किया जा सकता है। इससे पहले विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के अध्यक्ष आलोक कुमार ने बताया था कि बैठक 7 जुलाई को होगी, लेकिन अब इसके एक दिन पहले 6 जुलाई को आयोजित होने की संभावना जताई जा रही है। चंपत राय और अनिल मिश्रा के इस्तीफों पर हो सकती है चर्चा सूत्रों के अनुसार, ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और सदस्य अनिल मिश्रा ने अपने पदों से इस्तीफा दिया है। यह घटनाक्रम राम मंदिर के चढ़ावे में कथित गबन के आरोपों के बाद सामने आया है। बैठक में दोनों नेताओं के इस्तीफों पर चर्चा होने की संभावना है। यदि ट्रस्ट इन्हें स्वीकार करता है तो ट्रस्ट में तीन पद रिक्त हो जाएंगे। इनमें एक पद पहले से ही खाली है, क्योंकि ट्रस्ट सदस्य बिमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्रा के निधन के बाद से उस स्थान पर नियुक्ति नहीं की गई है। ट्रस्ट के पुनर्गठन पर भी हो सकता है विचार सूत्रों का कहना है कि ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपालदास, वरिष्ठ अधिवक्ता के. परासरन सहित कुछ अन्य वरिष्ठ न्यासी उम्र और स्वास्थ्य संबंधी कारणों से पहले जैसी सक्रिय भूमिका नहीं निभा पा रहे हैं। ऐसे में बैठक में ट्रस्ट के पुनर्गठन और रिक्त पदों पर नए सदस्यों की नियुक्ति को लेकर भी चर्चा हो सकती है। सीईओ नियुक्ति के लिए नियमों में बदलाव जरूरी बैठक में ट्रस्ट के प्रशासनिक ढांचे को लेकर भी विचार-विमर्श संभव है। यदि केंद्र सरकार ट्रस्ट में मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) का पद सृजित करना चाहती है, तो इसके लिए पहले ट्रस्ट की नियमावली में संशोधन करना होगा। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि वर्तमान नियमों के तहत सीईओ की नियुक्ति संभव नहीं है और इसके लिए औपचारिक संशोधन आवश्यक होगा। इन नामों की चर्चा सूत्रों के अनुसार, संभावित सीईओ के लिए राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा का नाम पहले से चर्चा में है। इसके अलावा सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी योगेश्वर राम मिश्र का नाम भी संभावित दावेदारों में शामिल बताया जा रहा है। ट्रस्ट या सरकार की ओर से इन नामों पर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। बैठक पर रहेगी सभी की नजर राम मंदिर ट्रस्ट की यह बैठक संगठनात्मक बदलाव, रिक्त पदों पर नियुक्ति और प्रशासनिक सुधारों के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। बैठक के एजेंडे और संभावित फैसलों को लेकर अभी तक ट्रस्ट की ओर से कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है।
नई दिल्ली: अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए प्राप्त चंदे में कथित अनियमितताओं की जांच के लिए गठित विशेष जांच दल (SIT) को लेकर आम आदमी पार्टी (AAP) के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री Arvind Kejriwal ने गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि SIT के पास कोई वास्तविक कानूनी अधिकार नहीं है और इसका गठन कथित रूप से मामले में शामिल लोगों को बचाने के उद्देश्य से किया गया है। केजरीवाल की यह प्रतिक्रिया उस समय आई है जब SIT ने अपनी प्रारंभिक जांच रिपोर्ट उत्तर प्रदेश सरकार को सौंप दी है। ‘SIT के पास न समन का अधिकार, न गिरफ्तारी का’ मीडिया से बातचीत के दौरान केजरीवाल ने कहा कि यदि मामले में अब तक कोई प्राथमिकी (FIR) दर्ज नहीं हुई है, तो यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि SIT का गठन किस कानूनी प्रावधान के तहत किया गया है। उन्होंने कहा, “SIT किसी को समन नहीं भेज सकती, किसी की गिरफ्तारी नहीं कर सकती और न ही छापेमारी कर सकती है। ऐसे में यह जांच समिति आखिर किस अधिकार के तहत काम कर रही है?” AAP प्रमुख ने आरोप लगाया कि जांच का इस्तेमाल वास्तविक मुद्दे से ध्यान हटाने और कथित दोषियों के खिलाफ कार्रवाई को टालने के लिए किया जा रहा है। 2021 की जांच का दिया हवाला केजरीवाल ने वर्ष 2021 में अयोध्या भूमि खरीद मामले को याद करते हुए कहा कि उस समय भी इसी तरह की जांच समिति बनाई गई थी, लेकिन उसका कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया। उन्होंने कहा, “तब भी SIT बनाई गई थी, लेकिन न कोई FIR दर्ज हुई और न ही किसी जिम्मेदार व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई हुई। आज उस जांच का कोई उल्लेख तक नहीं करता। मुझे आशंका है कि वर्तमान SIT का भी वही हश्र होगा।” ‘छोटे अधिकारियों पर फोकस, बड़े नामों को बचाया जा रहा’ AAP नेता ने दावा किया कि मौजूदा जांच का फोकस निचले स्तर के अधिकारियों तक सीमित दिखाई देता है, जबकि निर्णय लेने वाले प्रभावशाली लोगों तक जांच पहुंचती नजर नहीं आ रही। उन्होंने कहा कि यदि सरकार वास्तव में सच सामने लाना चाहती है, तो जांच को उन लोगों तक पहुंचना चाहिए जिन्होंने कथित तौर पर बड़े फैसले लिए और पूरे मामले को प्रभावित किया। CBI और ED जांच की मांग केजरीवाल ने यह भी सवाल उठाया कि यदि सरकार निष्पक्ष जांच चाहती है, तो मामला केंद्रीय एजेंसियों को क्यों नहीं सौंपा गया। उन्होंने कहा, “अगर सच्चाई सामने लाने की मंशा है, तो जांच Central Bureau of Investigation (CBI) या Enforcement Directorate (ED) जैसी एजेंसियों को सौंपी जानी चाहिए। अब तक FIR दर्ज न होना भी कई सवाल खड़े करता है।” श्रद्धालुओं के सवालों का जवाब जरूरी केजरीवाल ने कहा कि राम मंदिर से करोड़ों लोगों की आस्था जुड़ी हुई है और ऐसे में चंदे से जुड़े आरोपों की पारदर्शी जांच होना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि सनातन धर्म के अनुयायी और मंदिर निर्माण में योगदान देने वाले श्रद्धालु यह जानना चाहते हैं कि उनके द्वारा दिए गए धन का उपयोग किस प्रकार किया गया और आरोपों की सच्चाई क्या है। क्या है मामला? राम मंदिर निर्माण के लिए जुटाए गए चंदे और उससे जुड़े वित्तीय लेन-देन को लेकर हाल के दिनों में कई सवाल उठे हैं। इन्हीं आरोपों की जांच के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने SIT का गठन किया है। हालांकि, जांच अभी शुरुआती चरण में है और सरकार की ओर से इस संबंध में विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आना बाकी है। फिलहाल, SIT की वैधता और जांच की दिशा को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है, जबकि विपक्ष पारदर्शी और स्वतंत्र जांच की मांग कर रहा है।
प्रयागराज/अयोध्या: अयोध्या के राम मंदिर में दान पेटी से कथित चोरी और वित्तीय अनियमितताओं को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट में दायर जनहित याचिका (PIL) के जरिए पूरे प्रकरण की केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) से जांच और राम मंदिर ट्रस्ट के वित्तीय लेन-देन का नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) से ऑडिट कराने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता और अधिवक्ता मोहित अशोक ने सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल (SIT) की निष्पक्षता और कानूनी वैधता पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि इतने संवेदनशील और गंभीर मामले में SIT जांच के नाम पर केवल "लीपापोती" की जा रही है। विजिलेंस विभाग को सौंपा गया था ज्ञापन एएनआई के अनुसार, अधिवक्ता मोहित अशोक ने बताया कि उन्होंने 8 जून को उत्तर प्रदेश विजिलेंस विभाग के प्रधान सचिव को ज्ञापन सौंपकर राम मंदिर ट्रस्ट और दान पेटी में कथित चोरी की CBI जांच कराने की मांग की थी। उन्होंने कहा कि इसके बाद 9 जून को राम मंदिर ट्रस्ट के वरिष्ठ सदस्य नृपेंद्र मिश्र की अध्यक्षता में बैठक हुई। इस दौरान यह जानकारी सामने आई कि मामले की जांच के लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट के दो सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की अध्यक्षता में एक जांच समिति गठित की जा सकती है। इसी बीच उन्होंने 12 जून को इलाहाबाद हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर दी। SIT जांच की वैधता पर सवाल मोहित अशोक ने आरोप लगाया कि याचिका दाखिल होने के बाद राम मंदिर ट्रस्ट ने जल्दबाजी में राज्य सरकार से संपर्क कर SIT जांच की मांग की। उन्होंने कहा कि SIT के गठन का कोई स्पष्ट कानूनी आधार नहीं है। उनके अनुसार, आम नागरिकों के लिए यह भी स्पष्ट नहीं है कि यदि उनके पास कोई दस्तावेजी साक्ष्य हैं, तो उन्हें SIT के समक्ष कैसे प्रस्तुत किया जाए। उन्होंने कहा, "SIT के गठन, उसकी कार्यप्रणाली और जवाबदेही को लेकर कई गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं।" जांच रिपोर्ट में देरी पर उठे सवाल याचिकाकर्ता ने दावा किया कि SIT की रिपोर्ट सात दिनों के भीतर आने की बात कही गई थी, लेकिन तय समय बीत जाने के बावजूद अब तक कोई अंतिम रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई है। इससे जांच की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। CBI जांच और CAG ऑडिट की मांग इलाहाबाद हाई कोर्ट में दायर याचिका में मांग की गई है कि: राम मंदिर ट्रस्ट के गठन से अब तक हुए सभी वित्तीय लेन-देन का CAG द्वारा विशेष ऑडिट कराया जाए। दान पेटी में कथित चोरी और वित्तीय अनियमितताओं की CBI जांच कराई जाए। जांच रिपोर्ट सार्वजनिक कर पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए। बढ़ सकता है राजनीतिक और कानूनी विवाद राम मंदिर देश की आस्था और करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं से जुड़ा मुद्दा है। ऐसे में दान राशि और वित्तीय प्रबंधन को लेकर उठे सवालों ने मामले को राजनीतिक और कानूनी रूप से और संवेदनशील बना दिया है। अब सभी की नजर इलाहाबाद हाई कोर्ट की आगामी सुनवाई और राज्य सरकार के अगले कदम पर टिकी हुई है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।