धनबाद: धनबाद में वायु प्रदूषण कम करने के लिए केंद्र सरकार की ओर से राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) के तहत करोड़ों रुपये की राशि उपलब्ध करायी गयी, लेकिन इसका बड़ा हिस्सा अब तक खर्च नहीं हो सका है। वित्तीय वर्ष 2023-24 से 2025-26 के बीच धनबाद को 147.06 करोड़ रुपये मिले, जिसमें से केवल 19.94 करोड़ रुपये ही खर्च किये गये। यानी करीब 127.12 करोड़ रुपये की राशि खर्च होने से बच गयी। उपलब्ध राशि का महज करीब 13.6 प्रतिशत ही इस्तेमाल किया जा सका। केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 10 अगस्त को लोकसभा में यह जानकारी दी। खास बात यह है कि जहां प्रदूषण नियंत्रण के लिए बड़ी राशि उपलब्ध है, वहीं धनबाद की हवा अब भी राष्ट्रीय मानक से काफी खराब बनी हुई है। शहर में पीएम10 का स्तर लगातार निर्धारित सीमा से ऊपर दर्ज किया जा रहा है। पीएम10 का स्तर राष्ट्रीय मानक से काफी ज्यादा धनबाद में वायु गुणवत्ता में पिछले कुछ वर्षों के दौरान सुधार जरूर हुआ है, लेकिन प्रदूषण अभी भी गंभीर स्तर पर है। वर्ष 2017-18 में धनबाद में पीएम10 की वार्षिक औसत सांद्रता 315 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर थी। यह वर्ष 2024-25 में घटकर 138 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर हो गयी। इस तरह करीब सात वर्षों में पीएम10 के स्तर में लगभग 56 प्रतिशत की कमी आयी है। इसके बावजूद यह आंकड़ा राष्ट्रीय वार्षिक मानक 60 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर से करीब 78 माइक्रोग्राम अधिक है। यानी सुधार के बावजूद धनबाद अभी भी स्वच्छ हवा के तय मानक से काफी दूर है। सड़क की धूल से लेकर कोयला परिवहन तक बड़ी चुनौती एनसीएपी के तहत मिलने वाली राशि का इस्तेमाल वायु प्रदूषण कम करने के लिए कई योजनाओं में किया जाता है। इसमें सड़कों की धूल कम करना, सड़कों का पक्कीकरण, हरित क्षेत्र विकसित करना, यातायात व्यवस्था में सुधार, माइक्रो फॉरेस्ट तैयार करना और अन्य प्रदूषण नियंत्रण उपाय शामिल हैं। धनबाद में कोयला खनन, कोयले का परिवहन, औद्योगिक गतिविधियां और सड़क की धूल प्रदूषण के प्रमुख कारण माने जाते हैं। ऐसे में उपलब्ध राशि का समय पर और प्रभावी इस्तेमाल प्रदूषण नियंत्रण के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। लेकिन करोड़ों रुपये खर्च नहीं होने से योजनाओं की गति पर सवाल उठ रहे हैं। रांची में भी पूरी राशि खर्च नहीं हुई झारखंड के दूसरे बड़े शहरों में भी वायु प्रदूषण की स्थिति चिंता का विषय बनी हुई है। रांची के लिए 2023-24 से 2025-26 के दौरान 68.62 करोड़ रुपये जारी किये गये, जिसमें से 39.95 करोड़ रुपये खर्च हुए। वहीं, जमशेदपुर अर्बन एरिया के लिए इस अवधि में नयी राशि जारी नहीं की गयी, लेकिन 23.03 करोड़ रुपये खर्च किये गये। इसमें पिछले वर्षों में जारी राशि का उपयोग भी शामिल है। धनबाद, रांची और जमशेदपुर तीनों ही क्षेत्रों में इस अवधि के दौरान पीएम10 का स्तर राष्ट्रीय मानक से अधिक रहा। देश के 108 शहरों में प्रदूषण में कमी एनसीएपी के तहत देश के 130 शहरों में वायु प्रदूषण कम करने के लिए योजनाएं चलायी जा रही हैं। वर्ष 2025-26 में इनमें से 108 शहरों में पीएम10 की सांद्रता में वर्ष 2017-18 की तुलना में कमी दर्ज की गयी। इनमें 72 शहरों में 20 प्रतिशत से अधिक और 26 शहरों में 40 प्रतिशत से अधिक कमी आयी। हालांकि राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानक हासिल करने वाले शहरों की संख्या अभी भी कम है। वर्ष 2025-26 में केवल 14 शहर ही इस मानक को पूरा कर सके। 119 शहरों में प्रदूषण के स्रोतों की पहचान एनसीएपी के तहत देश के 119 शहरों में प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों का अध्ययन कराया गया है। इसमें वाहनों, उद्योगों, सड़क की धूल, निर्माण कार्य और घरेलू ईंधन से होने वाले प्रदूषण का आकलन किया जा रहा है। धनबाद जैसे कोयला आधारित शहर में इस तरह के अध्ययन की खास अहमियत है। प्रदूषण के स्रोतों की स्पष्ट पहचान होने के बाद संबंधित क्षेत्रों में प्रभावी कदम उठाये जा सकते हैं। अब सबसे बड़ी चुनौती उपलब्ध 127 करोड़ रुपये से अधिक की राशि का समय पर और सही तरीके से इस्तेमाल कर धनबाद की हवा को राष्ट्रीय मानक के करीब लाना है।
नई दिल्ली: अरावली पर्वतमाला की नई परिभाषा तय करने की प्रक्रिया में सुप्रीम कोर्ट ने समयसीमा बढ़ाने की मांग को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने 11 अगस्त को सुझाव और आपत्तियां जमा करने की तय अंतिम तारीख को आगे बढ़ाने से इनकार करते हुए कहा कि अगर हर बार समयसीमा बढ़ाई जाती रही तो यह प्रक्रिया कभी खत्म नहीं होगी। अरावली को लेकर यह मामला केवल पहाड़ों की पहचान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध पर्यावरण संरक्षण और खनन गतिविधियों से भी है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में हाई पावर कमेटी यानी HPC को विस्तृत रिपोर्ट तैयार करने की जिम्मेदारी दी है। कमेटी को अब 31 अगस्त तक अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में पेश करनी है। गुजरात के आदिवासी समुदाय की दलील सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील देबाशीष भरुका ने सुझाव और आपत्तियां दाखिल करने की समयसीमा बढ़ाने की मांग की थी। उनका तर्क था कि गुजरात के अरावली क्षेत्रों में रहने वाले अनुसूचित जनजाति समुदाय के लोगों से हाई पावर कमेटी ने पर्याप्त बातचीत नहीं की। उनकी ओर से यह भी कहा गया कि कमेटी की सूचना मुख्य रूप से हिंदी और अंग्रेजी में जारी की गई, जबकि संबंधित क्षेत्रों में रहने वाले कई स्थानीय लोग दूसरी भाषाओं का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में बड़ी संख्या में लोगों को कमेटी की प्रक्रिया और अपनी आपत्तियां दर्ज कराने के अधिकार की जानकारी नहीं मिल सकी। हालांकि, कोर्ट ने इस आधार पर समयसीमा बढ़ाने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने क्यों नहीं बढ़ाई डेडलाइन? CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि अरावली और खनन से जुड़े विवाद पर दिसंबर 2025 से ही दोबारा विचार की प्रक्रिया चल रही है। कोर्ट के मुताबिक, इस अवधि में संबंधित आदेशों और मामले की जानकारी सार्वजनिक रही है। पीठ ने यह भी संकेत दिया कि प्रक्रिया को लगातार आगे बढ़ाने के बजाय अब निर्धारित समयसीमा के भीतर रिपोर्ट तैयार करना जरूरी है। कोर्ट का मानना है कि यदि बार-बार अतिरिक्त समय दिया गया तो पूरी प्रक्रिया अनिश्चितकाल तक खिंच सकती है। हालांकि, कोर्ट ने लोगों के लिए अपनी बात रखने का रास्ता बंद नहीं किया है। जिन लोगों ने अभी तक सुझाव या आपत्ति दर्ज नहीं कराई है, वे HPC के सामने अपनी बात रख सकते हैं। 100 मीटर की परिभाषा पर क्यों उठा विवाद? अरावली की पहचान और कानूनी सुरक्षा को लेकर विवाद की जड़ नवंबर 2025 के उस फैसले से जुड़ी है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने अरावली क्षेत्र की पहचान के लिए 100 मीटर ऊंचाई के मानदंड को मंजूरी दी थी। इस परिभाषा को लेकर पर्यावरणविदों और अन्य पक्षों ने चिंता जताई थी। आशंका थी कि ऊंचाई आधारित मानदंड के कारण अरावली के कई महत्वपूर्ण हिस्से संरक्षण के दायरे से बाहर हो सकते हैं। इसके बाद 29 दिसंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने पहले के फैसले पर रोक लगाते हुए मामले की दोबारा जांच के लिए हाई पावर कमेटी की प्रक्रिया आगे बढ़ाने का रास्ता साफ किया। अब HPC को अरावली की ऐसी परिभाषा पर अपनी रिपोर्ट देनी है, जिससे इसके पर्यावरणीय और भौगोलिक महत्व को बेहतर तरीके से संरक्षित किया जा सके। अरावली क्यों है इतनी महत्वपूर्ण? अरावली पर्वतमाला भारत की सबसे पुरानी पर्वत प्रणालियों में से एक मानी जाती है। यह राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात तक फैले विशाल क्षेत्र के पर्यावरणीय संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अरावली क्षेत्र को थार के रेगिस्तान के विस्तार को रोकने वाली प्राकृतिक ढाल के तौर पर भी देखा जाता है। इसके अलावा यह भूजल पुनर्भरण, वनस्पति संरक्षण, जैव विविधता और स्थानीय जलवायु को प्रभावित करने वाली महत्वपूर्ण प्राकृतिक प्रणाली है। लेकिन पिछले कई वर्षों से अवैध और अनियंत्रित खनन, पेड़ों की कटाई तथा निर्माण गतिविधियों के कारण अरावली के कई हिस्सों पर दबाव बढ़ा है। यही वजह है कि इसकी कानूनी परिभाषा और संरक्षण का दायरा बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अरावली में फिलहाल खनन पर क्या स्थिति है? सुप्रीम कोर्ट ने अरावली से जुड़े मामले में नई खनन लीज देने पर रोक जारी रखी है। पुराने खनन पट्टों के नवीनीकरण के लिए भी कोर्ट की अनुमति आवश्यक है। यह स्थिति तब तक बनी रहेगी, जब तक सुप्रीम कोर्ट इस मामले में आगे कोई स्पष्ट और अंतिम आदेश नहीं देता। इसका अर्थ है कि फिलहाल अरावली क्षेत्र में खनन से जुड़ी गतिविधियों पर अदालत की निगरानी बनी हुई है। लोगों के लिए अभी भी मौका हालांकि कोर्ट ने 11 अगस्त की डेडलाइन बढ़ाने से इनकार कर दिया है, लेकिन जिन लोगों ने अभी तक अपनी बात HPC के सामने नहीं रखी है, उनके लिए रास्ता खुला है। वे अपनी आपत्तियां और सुझाव कमेटी को भेज सकते हैं। अगर HPC किसी व्यक्ति या समूह की आपत्ति को स्वीकार नहीं करती है, तो संबंधित पक्ष सुप्रीम कोर्ट का रुख कर सकता है। अब सभी की नजर HPC की रिपोर्ट पर है, जिसे 31 अगस्त तक सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किया जाना है। इस रिपोर्ट से यह तय करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठ सकता है कि भविष्य में अरावली क्षेत्र की पहचान और कानूनी सुरक्षा किस आधार पर की जाएगी। अरावली की नई परिभाषा आने वाले समय में पर्यावरण संरक्षण, खनन और क्षेत्रीय विकास के बीच संतुलन तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
पटना, एजेंसियां। बिहार सरकार ने राज्य में बालू घाटों के संचालन और खनन व्यवस्था को और पारदर्शी बनाने के लिए सख्त कदम उठाया है। नई व्यवस्था के तहत अब यदि किसी घाट से तय सीमा से अधिक बालू का खनन किया जाता है, तो संबंधित बंदोबस्तधारी को अतिरिक्त स्वामित्व राशि सरकार को जमा करनी होगी। इस कदम का उद्देश्य खनन गतिविधियों पर नियंत्रण बढ़ाना और राजस्व नुकसान को रोकना है। वार्षिक आधार पर होगी खनन की गणना नई नीति के अनुसार बालू घाटों से निकाले गए खनिज की वार्षिक आधार पर गणना की जाएगी। यदि किसी घाट से निकाले गए बालू की मात्रा, बंदोबस्ती के समय तय राशि से अधिक पाई जाती है, तो उस अंतर की राशि को अतिरिक्त रूप से वसूला जाएगा। इससे खनन की वास्तविक मात्रा का सटीक आकलन संभव होगा और सरकारी राजस्व में पारदर्शिता आएगी। 2026 संशोधित नियमावली लागू राज्य सरकार ने बिहार खनिज (समानुदान, अवैध खनन, परिवहन एवं भंडारण निवारण) (संशोधन) नियमावली, 2026 को लागू कर दिया है, जो 6 मई 2026 से प्रभावी है। इस नियमावली में बालू घाटों के संचालन, सुरक्षा जमा राशि और स्वामित्व दरों में कई महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं। सरकार का मानना है कि ये संशोधन खनन क्षेत्र में जवाबदेही और नियंत्रण को मजबूत करेंगे। अवैध खनन पर रोक लगाने की कोशिश खनन विभाग का कहना है कि इस नई व्यवस्था से अवैध खनन और कम स्वामित्व राशि जमा करने की प्रवृत्ति पर रोक लगेगी। इससे न केवल सरकारी राजस्व में वृद्धि होगी बल्कि खनन गतिविधियों की निगरानी भी अधिक प्रभावी हो सकेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम बालू कारोबार में अनुशासन और पारदर्शिता लाने में मदद करेगा। जिलाधिकारियों को दिए गए निर्देश खनन विभाग ने सभी जिलाधिकारियों को निर्देश जारी किया है कि वे अपने-अपने जिलों में अतिरिक्त स्वामित्व राशि की गणना शीघ्र पूरी करें। जहां भी अतिरिक्त राशि पाई जाएगी, वहां संबंधित बंदोबस्तधारियों से वसूली कर उसे सरकारी खनन मद में जमा कराया जाएगा। इसकी निगरानी मुख्यालय स्तर से भी की जाएगी। राजस्व बढ़ने की उम्मीद सरकार को उम्मीद है कि इस नई व्यवस्था से राज्य के राजस्व संग्रह में वृद्धि होगी और बालू घाटों के संचालन में पारदर्शिता आएगी। साथ ही, खनन गतिविधियों पर निगरानी और नियंत्रण पहले से अधिक मजबूत होगा, जिससे पूरे सिस्टम में सुधार देखने को मिलेगा।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।