नई दिल्ली: संसद के मानसून सत्र के आखिरी दिन गुरुवार को लोकसभा की कार्यवाही बेहद संक्षिप्त रही। सदन की कार्यवाही शुरू होते ही राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ का सामूहिक गान हुआ और इसके तुरंत बाद लोकसभा को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया। सत्र के अंतिम दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह समेत कई प्रमुख नेता सदन में मौजूद थे। विपक्ष की ओर से कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी सदन में उपस्थित रहे। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सदन में पहुंचते ही ‘वंदे मातरम’ के गान की घोषणा की। राष्ट्रगीत के बाद सदन की कार्यवाही को आगे बढ़ाने के बजाय अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया। सत्र के आखिरी दिन नहीं हुआ लंबा कामकाज मानसून सत्र के अंतिम दिन सदन में सामान्य विधायी कार्यवाही आगे नहीं बढ़ सकी। कार्यवाही की शुरुआत ‘वंदे मातरम’ से हुई और इसके बाद सदन स्थगित कर दिया गया। इससे पहले पूरे मानसून सत्र के दौरान भी संसद में कई मुद्दों पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी राजनीतिक बहस देखने को मिली थी। कई मौकों पर हंगामे और विरोध के कारण कार्यवाही प्रभावित हुई। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, मानसून सत्र में लोकसभा का वास्तविक कामकाज करीब 15 घंटे ही हो सका। सदन में मौजूद रहे प्रधानमंत्री और प्रमुख नेता सत्र के अंतिम दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ गृह मंत्री अमित शाह और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भी सदन में मौजूद रहे। विपक्ष की ओर से राहुल गांधी समेत कई सांसद सदन में पहुंचे। ऐसे में अंतिम दिन ‘वंदे मातरम’ के सामूहिक गान के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के प्रमुख नेताओं की मौजूदगी ने इसे खास बना दिया। ‘वंदे मातरम’ को लेकर राजनीतिक और ऐतिहासिक महत्व ‘वंदे मातरम’ भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय गीत है। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की रचना ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान लोगों में राष्ट्रीय चेतना जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। भारत में ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान और ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगीत का दर्जा प्राप्त है। संसद में ‘वंदे मातरम’ का सामूहिक गान राष्ट्रीय महत्व की परंपरा से जुड़ा हुआ है। मानसून सत्र के अंतिम दिन सदन की शुरुआत इसी राष्ट्रगीत से होना राजनीतिक और संसदीय दृष्टि से भी चर्चा का विषय बना। हंगामे की आशंका के बीच सीधे स्थगित हुई कार्यवाही सत्र के दौरान विभिन्न मुद्दों को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच टकराव की स्थिति बनी रही थी। ऐसे में अंतिम दिन भी हंगामे की संभावना के बीच लोकसभा अध्यक्ष ने कार्यवाही को लंबा खींचने के बजाय शुरुआत में ही स्थगित करने का निर्णय लिया। इस तरह मानसून सत्र का समापन ‘वंदे मातरम’ के गान के साथ हुआ। अब संसद का अगला सत्र कब बुलाया जाएगा, इस पर सरकार की ओर से आगे कार्यक्रम तय किया जाएगा। लेकिन मानसून सत्र का कम कामकाज, लगातार राजनीतिक गतिरोध और अंतिम दिन की संक्षिप्त कार्यवाही आने वाले दिनों में राजनीतिक बहस का मुद्दा बनी रह सकती है।
नई दिल्ली: किसानों, छोटे कारोबारियों और सहकारी संस्थाओं के लिए वित्तीय सहायता का दायरा बढ़ाने की दिशा में सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (संशोधन) विधेयक, 2026 को लोकसभा ने मंगलवार को हंगामे के बीच ध्वनिमत से पारित कर दिया। इस विधेयक का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम यानी NCDC के अधिकार क्षेत्र और वित्तीय सहायता देने की क्षमता का विस्तार करना है। सरकार का कहना है कि संशोधित व्यवस्था से सहकारी क्षेत्र से जुड़े किसानों, छोटे कारोबारियों और अन्य लाभार्थियों के लिए ऋण तथा वित्तीय सहायता हासिल करने के रास्ते आसान हो सकते हैं। हंगामे के बीच लोकसभा में पास हुआ बिल लोकसभा में जब राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (संशोधन) विधेयक, 2026 को चर्चा और पारित करने के लिए पेश किया गया, उस समय विपक्षी सांसद विभिन्न मुद्दों को लेकर सदन में नारेबाजी कर रहे थे। सहकारिता राज्य मंत्री मुरलीधर मोहोल ने विधेयक पेश किया। हालांकि, विधेयक की सूची में इसे सहकारिता मंत्री अमित शाह के नाम से रखा गया था। विपक्षी सदस्यों के लगातार विरोध के बीच विधेयक पर विस्तृत चर्चा नहीं हो सकी और इसे ध्वनिमत से पारित कर दिया गया। विपक्षी सांसदों ने संशोधन भी नहीं रखे सदन में हंगामे के कारण कई विपक्षी सांसद अपने प्रस्तावित संशोधन पेश नहीं कर सके। इनमें एन. के. प्रेमचंद्रन, सौगत राय, मनोज कुमार, अभय कुमार सिनप, लालजी वर्मा और नीरज मौर्य समेत कई सांसद शामिल थे। विपक्षी सांसद राम मंदिर से चढ़ावे की कथित चोरी के मुद्दे पर चर्चा और प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई को लेकर गृह मंत्री अमित शाह से जवाब की मांग कर रहे थे। इन राजनीतिक मुद्दों के बीच सहकारी क्षेत्र से जुड़े इस महत्वपूर्ण विधेयक पर सदन में विस्तृत बहस नहीं हो सकी। किसानों को कैसे मिल सकता है फायदा? NCDC से जुड़े कानून में संशोधन का व्यापक उद्देश्य सहकारी क्षेत्र को वित्तीय रूप से मजबूत करना और इसके माध्यम से कृषि तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़े लोगों तक वित्तीय सहायता पहुंचाना है। सहकारी संस्थाओं के माध्यम से किसानों और छोटे कारोबारियों को ऋण तथा अन्य वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने की व्यवस्था को विस्तार मिलने से ग्रामीण क्षेत्रों में कारोबार, कृषि गतिविधियों और सहकारी परियोजनाओं को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। हालांकि, किसान को सीधे कितना और किस प्रक्रिया के तहत कर्ज मिलेगा, यह संबंधित नियमों और योजना के कार्यान्वयन के बाद अधिक स्पष्ट होगा। सहकारी क्षेत्र के लिए भी अहम बदलाव भारत में सहकारी संस्थाएं कृषि, डेयरी, ग्रामीण उद्योग, भंडारण और अन्य क्षेत्रों में बड़ी भूमिका निभाती हैं। ऐसे में NCDC के अधिकार क्षेत्र का विस्तार इन संस्थाओं के लिए वित्तीय संसाधनों की उपलब्धता बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यदि संशोधित व्यवस्था प्रभावी ढंग से लागू होती है, तो सहकारी संस्थाओं को नई परियोजनाओं के लिए वित्तीय सहायता जुटाने में मदद मिल सकती है। इसका असर ग्रामीण स्तर पर रोजगार और आर्थिक गतिविधियों पर भी पड़ने की उम्मीद है। FCRA संशोधन विधेयक पर भी चर्चा इसी बीच संसद में FCRA संशोधन विधेयक, 2026 को लेकर भी राजनीतिक गतिविधियां तेज हैं। सूत्रों के मुताबिक, इस विधेयक को संसद के दोनों सदनों की संयुक्त समिति के पास भेजने के विकल्प पर विचार किया जा रहा है। कांग्रेस और कुछ अन्य विपक्षी दल इस विधेयक को वापस लेने की मांग कर रहे हैं। राज्यसभा की कार्य मंत्रणा समिति की बैठक में कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस समेत कुछ दलों ने इस मुद्दे को उठाया। अब निगाहें लागू होने वाली व्यवस्था पर NCDC संशोधन विधेयक के लोकसभा से पारित होने के बाद अब इसकी आगे की संसदीय प्रक्रिया और कार्यान्वयन पर नजर रहेगी। किसानों और छोटे कारोबारियों के लिए इसका वास्तविक लाभ इस बात पर निर्भर करेगा कि वित्तीय सहायता की प्रक्रिया कितनी सरल होती है और सहकारी संस्थाओं तक संसाधन कितनी तेजी से पहुंचते हैं। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सहकारी क्षेत्र की महत्वपूर्ण भूमिका को देखते हुए यह विधेयक किसानों की वित्तीय पहुंच और सहकारी संस्थाओं की क्षमता बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: संसद के मानसून सत्र के दौरान शुक्रवार को सरकार और विपक्ष के बीच टकराव और तेज हो गया। विपक्षी सांसदों ने संसद भवन के मकर द्वार के सामने प्रदर्शन करते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से छात्र प्रदर्शनकारियों पर कथित पुलिस कार्रवाई और अयोध्या के राम मंदिर में दान से जुड़ी कथित वित्तीय गड़बड़ियों पर जवाब देने की मांग की। बारिश के बीच विपक्षी सांसद हाथों में तख्तियां और छाते लेकर संसद परिसर में जुटे। प्रदर्शन के दौरान ‘अमित शाह जवाब दो’ के नारे लगाए गए और सरकार से इन दोनों मुद्दों पर संसद में विस्तृत बयान देने की मांग की गई। छात्र प्रदर्शन पर सरकार को घेरा विपक्ष ने 20 जुलाई को हुए छात्र प्रदर्शन के दौरान कथित पुलिस कार्रवाई का मुद्दा प्रमुखता से उठाया। विपक्षी दलों का आरोप है कि प्रदर्शन कर रहे छात्रों के साथ सख्ती बरती गई और इस मामले में सरकार को जवाब देना चाहिए। कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल ने कहा कि यदि सरकार युवाओं के हितों को लेकर गंभीर है तो गृह मंत्री अमित शाह को संसद में आकर इस मुद्दे पर बयान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि छात्रों के खिलाफ हुई कथित कार्रवाई के लिए जवाबदेही तय होनी चाहिए और सरकार को इस पर स्पष्ट रुख रखना चाहिए। राम मंदिर दान मामले पर चर्चा की मांग विपक्ष ने अयोध्या के राम मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा दिए गए दान से जुड़ी कथित वित्तीय अनियमितताओं का मुद्दा भी उठाया। कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल ने लोकसभा में स्थगन प्रस्ताव का नोटिस देकर इस विषय पर तत्काल चर्चा कराने की मांग की। उन्होंने आरोप लगाया कि मंदिर में नकद दान और कीमती सामान के कथित गबन से जुड़े गंभीर आरोप सामने आए हैं। विपक्ष का कहना है कि इन आरोपों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और यदि किसी स्तर पर गड़बड़ी हुई है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए। लगातार बाधित हो रही संसद की कार्यवाही मानसून सत्र के पिछले दो सप्ताह से विभिन्न मुद्दों पर सरकार और विपक्ष के बीच लगातार गतिरोध बना हुआ है। छात्र आंदोलन, पुलिस कार्रवाई और अन्य राजनीतिक मुद्दों को लेकर विपक्ष लगातार सरकार को घेर रहा है। विपक्षी सांसदों का कहना है कि जब तक सरकार इन मुद्दों पर संसद में जवाब नहीं देती, तब तक उनका विरोध जारी रहेगा।
नई दिल्ली: संसद का मानसून सत्र सिर्फ तीखी राजनीतिक बहसों और आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रहा। सदन के भीतर और गलियारों में कई ऐसे हल्के-फुल्के पल भी देखने को मिले, जिन्होंने राजनीतिक माहौल को अलग रंग दे दिया। कभी नेताओं के बीच तंज और हाजिरजवाबी चर्चा का विषय बनी तो कभी सत्ता और विपक्ष के नेताओं की मुस्कुराहट भरी मुलाकात ने सबका ध्यान खींचा। संसदीय परिसर में घटी ऐसी कई घटनाएं पूरे दिन राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बनी रहीं। महाराष्ट्र पर केंद्रीय मंत्री का तंज संसद परिसर में एक केंद्रीय मंत्री की मुलाकात महाराष्ट्र से आने वाले एनडीए के एक सहयोगी दल के सांसद से हुई। बातचीत के दौरान मंत्री ने हल्के अंदाज में कहा कि महाराष्ट्र की राजनीतिक संस्कृति बाकी राज्यों से अलग है। उन्होंने कहा कि अन्य राज्यों में जब कोई केंद्रीय मंत्री दौरे पर जाता है तो वहां के सभी सांसद एक साथ मिलते हैं, बैठते हैं और रात्रिभोज भी करते हैं, लेकिन महाराष्ट्र में ऐसा कम देखने को मिलता है। इतना सुनते ही सांसद ने मुस्कुराते हुए मंत्री का हाथ पकड़ लिया और कहा कि उन्हें ऐसी किसी बैठक की जानकारी ही नहीं थी। मौके पर मौजूद पत्रकारों के सामने हुई यह बातचीत राजनीतिक तंज के रूप में पूरे दिन चर्चा में रही। 'QR कोड दे दीजिए' वाला जवाब बना चर्चा संसद परिसर में समाजवादी पार्टी के सांसद इन दिनों चंदा चोरी मामले को लेकर अनोखे अंदाज में विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं। वे दानपात्र रखकर सांसदों से सहयोग राशि जुटा रहे हैं। सोमवार को दानपात्र खोलने पर 47,100 रुपये और मंगलवार को 33,050 रुपये के साथ दो चांदी के सिक्के मिले। इसी दौरान सपा सांसद अक्षय यादव ने दावा किया कि किसी भी भाजपा सांसद ने इसमें सहयोग नहीं किया। तभी वहां से गुजर रहे एक भाजपा सांसद और केंद्रीय राज्य मंत्री से उन्होंने श्रीराम के नाम पर चंदा देने का आग्रह किया। इस पर मंत्री ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "QR कोड दे दीजिए", और आगे बढ़ गए। उनका यह जवाब संसद परिसर में मौजूद लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गया। मेटा अधिकारियों से फेक वीडियो पर तीखे सवाल संसद की सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) संबंधी स्थायी समिति की बैठक में मेटा के अधिकारियों को भी सांसदों के तीखे सवालों का सामना करना पड़ा। अधिकारियों ने बताया कि तकनीकी त्रुटि के कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक वीडियो गलती से हट गया था, क्योंकि फेक वीडियो हटाने वाली ऑटोमेटेड प्रणाली सक्रिय थी। इस पर समिति की एक महिला सांसद ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर मौजूद एक कथित फर्जी वीडियो दिखाते हुए सवाल किया कि जब उनका फेक वीडियो अब तक नहीं हटाया गया, तो फिर प्रधानमंत्री का वास्तविक वीडियो कैसे हट गया। इस सवाल के बाद बैठक में मेटा अधिकारियों को अपनी तकनीकी प्रक्रिया पर विस्तार से सफाई देनी पड़ी। सत्ता और विपक्ष के नेताओं की सौहार्दपूर्ण मुलाकात संसद भवन के मकर द्वार पर सत्ता और विपक्ष के नेताओं के बीच एक दिलचस्प मुलाकात भी देखने को मिली। कांग्रेस के एक राज्यसभा सांसद और भाजपा के एक लोकसभा सांसद, जो अक्सर टीवी डिबेट में एक-दूसरे के राजनीतिक विरोधी नजर आते हैं, संसद परिसर में मुस्कुराते हुए मिले। दोनों ने हाथ मिलाया, हालचाल पूछा और कुछ मिनट तक बातचीत की। इसी दौरान मौजूद एक पत्रकार ने दोनों नेताओं के सफेद परिधान पर टिप्पणी की। इस पर भाजपा सांसद ने मजाकिया अंदाज में कांग्रेस सांसद की ओर इशारा करते हुए कहा, "इनका जीवन भी बिल्कुल वाइट ही है।" इस टिप्पणी पर आसपास मौजूद लोग मुस्कुरा उठे। बातचीत के दौरान पंजाब कांग्रेस में चल रही अंदरूनी खींचतान का भी जिक्र हुआ। इस पर भाजपा सांसद ने हल्का राजनीतिक तंज किया, जबकि कांग्रेस सांसद ने शांत अंदाज में जवाब देते हुए कहा कि उनकी पार्टी में हालात जल्द सामान्य हो जाएंगे। संसद की राजनीति का दूसरा चेहरा संसद की कार्यवाही के दौरान जहां एक ओर गंभीर मुद्दों पर तीखी बहस होती है, वहीं दूसरी ओर ऐसे हल्के-फुल्के पल यह भी दिखाते हैं कि राजनीतिक मतभेदों के बावजूद व्यक्तिगत स्तर पर नेताओं के बीच संवाद, हास्य और सौहार्द भी बना रहता है। यही संसदीय लोकतंत्र की एक अलग और कम दिखाई देने वाली तस्वीर भी पेश करता है।
नई दिल्ली: संसद के मानसून सत्र में लगातार जारी गतिरोध के बीच सरकार और विपक्ष के बीच संवाद की नई पहल ने समाधान की उम्मीद जगाई है। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी से मुलाकात कर संसद की बाधित कार्यवाही को सामान्य करने पर चर्चा की। राजनीतिक मतभेदों के बीच यह पहल लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। कई मुद्दों पर टकराव, ठप रही संसद मानसून सत्र की शुरुआत NEET पेपर लीक और छात्र आंदोलन के माहौल में हुई थी। हालांकि आंदोलन समाप्त हो चुका है, लेकिन उससे जुड़े राजनीतिक मुद्दे अब भी संसद में गतिरोध का कारण बने हुए हैं। CJP के 'संसद चलो मार्च' के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई, राम मंदिर चंदा चोरी के आरोप और अन्य विवादों को लेकर विपक्ष लगातार सरकार को घेर रहा है। इसके चलते लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही बार-बार बाधित हो रही है। बिना चर्चा पारित हुए कई विधेयक सत्र के दौरान अब तक लोकसभा में एक भी प्रश्नकाल पूरी तरह संचालित नहीं हो सका है। सरकार ने पांच विधेयक पारित कराए हैं, लेकिन अधिकांश पर विस्तृत चर्चा नहीं हो सकी। लोक परीक्षा संशोधन विधेयक जैसे महत्वपूर्ण बिल पर भी पर्याप्त बहस नहीं हुई। संसदीय विशेषज्ञों का मानना है कि कानून बनाने की प्रक्रिया में व्यापक चर्चा लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता है। प्रश्नकाल क्यों है लोकतंत्र की ताकत? प्रश्नकाल संसद की जवाबदेही व्यवस्था का सबसे अहम हिस्सा माना जाता है। इसी दौरान विपक्ष सरकार से सीधे सवाल पूछता है और जनता से जुड़े मुद्दों को सदन में उठाता है। इससे सरकार की नीतियों की समीक्षा होती है और आवश्यक सुधार का अवसर मिलता है। लगातार बाधित हो रहा प्रश्नकाल लोकतांत्रिक जवाबदेही को भी प्रभावित कर रहा है। बजट सत्र जैसा प्रदर्शन दोहराने की चुनौती पिछले बजट सत्र में सरकार और विपक्ष के बीच मतभेद होने के बावजूद लोकसभा की उत्पादकता 93 प्रतिशत और राज्यसभा की 110 प्रतिशत रही थी। इस बार भी उम्मीद जताई जा रही है कि संवाद के जरिए गतिरोध खत्म होगा और लंबित महत्वपूर्ण विधेयकों, जिनमें प्रस्तावित FCRA विधेयक और अन्य अहम बिल शामिल हैं, पर सार्थक चर्चा हो सकेगी। संवाद ही लोकतंत्र का सबसे मजबूत रास्ता लोकतंत्र में सरकार और विपक्ष दोनों की भूमिका समान रूप से महत्वपूर्ण होती है। सरकार की जिम्मेदारी है कि वह विपक्ष से लगातार संवाद बनाए रखे, जबकि विपक्ष की भी जिम्मेदारी है कि विरोध के साथ-साथ बहस और चर्चा में सक्रिय भागीदारी करे। यदि दोनों पक्ष टकराव की बजाय संवाद को प्राथमिकता दें, तो संसद की कार्यवाही अधिक प्रभावी होगी और जनता से जुड़े मुद्दों पर बेहतर फैसले लिए जा सकेंगे।
संसद के मानसून सत्र का मंगलवार (21 जुलाई) को दूसरा दिन है। पहले दिन विपक्ष के जोरदार हंगामे के बाद आज भी लोकसभा और राज्यसभा में तीखी बहस और टकराव के आसार हैं। विपक्ष NEET 2026 पेपर लीक, राम मंदिर चंदा विवाद और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर सरकार को घेरने की तैयारी में है, जबकि केंद्र सरकार महत्वपूर्ण विधेयकों को सदन में पेश कर अपने विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाने की कोशिश करेगी। अब तक के बड़े अपडेट NDA संसदीय दल की 'मंगल मिलन' बैठक शुरू संसद की कार्यवाही शुरू होने से पहले एनडीए संसदीय दल की बैठक शुरू हो गई है। बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत एनडीए के वरिष्ठ मंत्री और सांसद शामिल हैं। माना जा रहा है कि बैठक में संसद की रणनीति, विपक्ष के हमलों का जवाब और आगामी विधायी एजेंडे पर चर्चा हो रही है। आज राज्यसभा में पेश हो सकता है वंदे मातरम बिल सरकार आज राज्यसभा में राष्ट्रीय सम्मान संरक्षण (संशोधन) विधेयक, 2026 पेश कर सकती है। प्रस्तावित विधेयक में 'वंदे मातरम' का अपमान करने या इसके गायन में जानबूझकर बाधा डालने को दंडनीय अपराध बनाने का प्रावधान है। यह बिल सोमवार को पेश होना था, लेकिन विपक्ष के हंगामे के कारण इसे सूचीबद्ध नहीं किया जा सका। परीक्षा व्यवस्था पर चर्चा की मांग कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल ने लोकसभा में स्थगन प्रस्ताव का नोटिस दिया है। उन्होंने NEET पेपर लीक समेत देश की परीक्षा व्यवस्था में कथित अनियमितताओं पर तत्काल चर्चा कराने की मांग की है। विपक्ष का कहना है कि लगातार सामने आ रहे पेपर लीक के मामलों ने लाखों छात्रों का भविष्य प्रभावित किया है। आज इन मुद्दों पर घमासान संभव NEET 2026 पेपर लीक राम मंदिर चंदा विवाद छात्रों के प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई शिक्षा व्यवस्था में सुधार सरकार के विधायी एजेंडे पर विपक्ष का विरोध सरकार की क्या है तैयारी? सरकार आज संसद में अपने लंबित विधेयकों को आगे बढ़ाने की कोशिश करेगी। इसके साथ ही विपक्ष द्वारा उठाए जाने वाले मुद्दों का जवाब देने और सदन की कार्यवाही सुचारु रूप से चलाने पर भी सरकार का फोकस रहेगा। सरकार की कोशिश रहेगी कि हंगामे के बीच भी महत्वपूर्ण विधायी कार्य पूरे किए जा सकें। पहले दिन जमकर हुआ था हंगामा मानसून सत्र के पहले दिन विपक्ष ने कई मुद्दों को लेकर सरकार को घेरा था, जिसके चलते दोनों सदनों की कार्यवाही कई बार बाधित हुई। ऐसे में दूसरे दिन भी सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक होने की संभावना जताई जा रही है। राजनीतिक गलियारों की नजर आज खासतौर पर वंदे मातरम बिल, NEET विवाद और विपक्ष की रणनीति पर रहेगी।
नई दिल्ली, एजेंसियां। संसद का मानसून सत्र आज (20 जुलाई) से शुरू हो गया है। यह सत्र 13 अगस्त तक चलेगा और इस दौरान 19 बैठकें प्रस्तावित हैं। सरकार ने अपने विधायी एजेंडे में 8 नए विधेयकों को सूचीबद्ध किया है, जबकि विपक्ष ने नीट परीक्षा विवाद, राम मंदिर दान मामले, सोनम वांगचुक आंदोलन, परिसीमन समेत कई मुद्दों पर सरकार को घेरने की रणनीति बनाई है। सरकार के एजेंडे में 8 नए विधेयक सरकार इस सत्र में कई महत्वपूर्ण विधेयक पेश करने की तैयारी में है। इनमें 'वंदे मातरम्' के अपमान को दंडनीय अपराध बनाने वाला विधेयक भी शामिल है। इसके अलावा विभिन्न प्रशासनिक और कानूनी सुधारों से जुड़े अन्य विधेयकों पर भी चर्चा और पारित कराने की योजना है। विपक्ष ने बनाई आक्रामक रणनीति सत्र शुरू होने से पहले विपक्षी दलों ने बैठक कर कई मुद्दों को प्रमुखता से उठाने का फैसला लिया। विपक्ष नीट परीक्षा विवाद, राम मंदिर दान प्रकरण, सोनम वांगचुक आंदोलन, परिसीमन और अन्य जनहित के मुद्दों पर सरकार से जवाब मांगने की तैयारी में है। स्पीकर ने सहयोग की अपील की लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सभी राजनीतिक दलों से सदन की कार्यवाही सुचारु रूप से चलाने और महत्वपूर्ण विषयों पर सार्थक चर्चा में सहयोग करने की अपील की है। सरकार और विपक्ष दोनों ने सत्र के दौरान जनहित के मुद्दों पर चर्चा की आवश्यकता जताई है। हंगामेदार रहने के आसार राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मानसून सत्र के पहले दिन से ही सदन में तीखी बहस और विरोध देखने को मिल सकता है। सरकार जहां अपने विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाने पर जोर देगी, वहीं विपक्ष विभिन्न राष्ट्रीय मुद्दों पर सरकार को घेरने की कोशिश करेगा।
संसद के मानसून सत्र के पहले ही दिन केंद्र सरकार राष्ट्रीय सम्मान से जुड़े कानून में बड़ा बदलाव करने जा रही है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह सोमवार को 'राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक, 2026' संसद में पेश करेंगे। प्रस्तावित संशोधन का उद्देश्य राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम्' के सम्मान को कानूनी संरक्षण देना और इसके अपमान या गायन में बाधा डालने को दंडनीय अपराध की श्रेणी में लाना है। 'वंदे मातरम्' के सम्मान को मिलेगा कानूनी संरक्षण प्रस्तावित विधेयक के अनुसार यदि कोई व्यक्ति राष्ट्रीय गीत का अपमान करता है या इसके गायन में जानबूझकर बाधा डालता है, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकेगी। सरकार का कहना है कि यह संशोधन राष्ट्रीय प्रतीकों और राष्ट्रीय गीत के सम्मान को और मजबूत करने के उद्देश्य से लाया जा रहा है। 20 जुलाई से शुरू हुआ मानसून सत्र 20 जुलाई से शुरू होकर 13 अगस्त तक चलने वाले मानसून सत्र से पहले रविवार को सर्वदलीय बैठक आयोजित की गई। बैठक के दौरान कई राष्ट्रीय और राजनीतिक मुद्दों पर सरकार और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली। इन मुद्दों पर विपक्ष ने सरकार को घेरा सर्वदलीय बैठक में विपक्ष ने कई अहम विषय उठाए, जिनमें शामिल हैं– अयोध्या राम मंदिर के चढ़ावे में कथित अनियमितता सोनम वांगचुक का अनशन विदेश नीति NEET पेपर लीक मामला अन्य समसामयिक राष्ट्रीय मुद्दे समाजवादी पार्टी ने संकेत दिया है कि वह राम मंदिर चढ़ावा मामले को संसद में प्रमुखता से उठाएगी। टीएमसी और शिवसेना के बागी सांसदों पर विवाद बैठक के दौरान विपक्ष ने तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना (UBT) के बागी सांसदों को बैठक में बुलाने का विरोध किया। विपक्षी दलों ने कुछ समय के लिए वॉकआउट भी किया। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने इसे सरकार का "तानाशाही फैसला" बताया, जबकि शिवसेना (UBT) के नेता अरविंद सावंत ने लोकसभा अध्यक्ष के अंतिम निर्णय से पहले नए गुट को मान्यता दिए जाने पर सवाल उठाए। सरकार इन प्रमुख विधेयकों को भी करेगी पेश 1. राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक, 2026 'वंदे मातरम्' के अपमान या गायन में बाधा डालने पर कानूनी कार्रवाई का प्रावधान। राष्ट्रीय सम्मान से जुड़े कानून को और सख्त बनाने की पहल। 2. जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक, 2026 जन्म और मृत्यु के पंजीकरण की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और समयबद्ध बनाना। विलंब से पंजीकरण कराने पर नियमों को और सख्त किया जाएगा। 3. आयकर (संशोधन) विधेयक, 2026 सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश करने वाले विदेशी निवेशकों को दी गई कर छूट को स्थायी कानूनी स्वरूप देना। विदेशी निवेश को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम। बैठक में कई वरिष्ठ नेता रहे मौजूद सर्वदलीय बैठक में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा, संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू, कांग्रेस नेता जयराम रमेश, प्रमोद तिवारी, कोडिकुनिल सुरेश, समाजवादी पार्टी के धर्मेंद्र यादव समेत विभिन्न दलों के वरिष्ठ नेता शामिल हुए। मानसून सत्र के पहले ही दिन सरकार और विपक्ष के बीच कई अहम मुद्दों पर टकराव के संकेत मिल रहे हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में संसद में तीखी बहस और राजनीतिक गर्मी बढ़ने की संभावना है।
संसद का मानसून सत्र सोमवार से शुरू हो रहा है और पहले ही दिन सरकार तथा विपक्ष के बीच तीखे टकराव के संकेत मिल रहे हैं। विपक्ष कई प्रमुख मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने की रणनीति बना चुका है, जबकि सरकार अपने विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाने की तैयारी में है। सत्र शुरू होने से पहले कांग्रेस ने अपने लोकसभा सांसदों की महत्वपूर्ण बैठक बुलाई है। कांग्रेस ने सांसदों की बुलाई अहम बैठक मानसून सत्र की शुरुआत से पहले कांग्रेस ने सुबह 10:30 बजे संसद परिसर स्थित कांग्रेस संसदीय दल (CPP) कार्यालय में अपने लोकसभा सांसदों की बैठक बुलाई है। बैठक में विपक्षी दलों की रणनीति, फ्लोर मैनेजमेंट और सदन में उठाए जाने वाले मुद्दों पर चर्चा होगी। इन मुद्दों पर सरकार को घेरने की तैयारी विपक्ष ने पहले ही साफ कर दिया है कि वह कई अहम मुद्दों को सदन में उठाएगा। इनमें शामिल हैं– NEET-UG परीक्षा में कथित पेपर लीक सोनम वांगचुक का अनशन और संसद मार्च महंगाई मणिपुर की स्थिति किसानों से जुड़े मुद्दे चुनाव आयोग के कामकाज अयोध्या राम मंदिर में कथित चढ़ावे से जुड़ा मामला एथनॉल नीति कांग्रेस सांसद माणिकम टैगोर ने लोकसभा में NEET-UG पेपर लीक मामले पर तत्काल चर्चा की मांग करते हुए कार्यस्थगन प्रस्ताव का नोटिस भी दिया है। सरकार का फोकस आठ विधेयकों पर संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने बताया कि मानसून सत्र के लिए फिलहाल आठ विधेयकों को सूचीबद्ध किया गया है। उन्होंने कहा कि यदि कोई नया विधेयक लाया जाएगा तो उसकी जानकारी पहले कार्य मंत्रणा समिति और सभी राजनीतिक दलों को दी जाएगी। सरकार ने विपक्ष से सदन की कार्यवाही सुचारू रूप से चलाने में सहयोग की अपील भी की है। टीएमसी के बागी सांसदों की सीटें बदलीं लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी सांसदों के लिए अलग बैठने की व्यवस्था की गई है। इस बदलाव के तहत कुल 39 सांसदों की सीटों का पुनः आवंटन किया गया है। संसद परिसर में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी मानसून सत्र से पहले संसद भवन की सुरक्षा व्यवस्था का व्यापक परीक्षण किया गया। सीआईएसएफ, दिल्ली पुलिस, सीआरपीएफ, एनएसजी, एनडीआरएफ और संसद सुरक्षा कर्मियों ने संयुक्त रूप से मॉक ड्रिल कर आपात स्थिति से निपटने की तैयारियों की समीक्षा की। पहले दिन हंगामे के आसार संसद का यह सत्र राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विपक्ष जहां विभिन्न राष्ट्रीय मुद्दों पर सरकार को घेरने की तैयारी में है, वहीं सरकार अपने विधायी कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के लिए पूरी तरह तैयार है। ऐसे में पहले ही दिन सदन में जोरदार बहस और हंगामे की संभावना जताई जा रही है।
मुंबई, एजेंसियां। 20 से 26 जुलाई के बीच OTT प्लेटफॉर्म्स पर दर्शकों के लिए मनोरंजन का भरपूर डोज़ तैयार है। इस सप्ताह कई नई फिल्में और वेब सीरीज़ रिलीज़ होने जा रही हैं, जिनमें 'Musafir Cafe', 'Adarsh Baal Vidyalaya' जैसे कई अन्य चर्चित टाइटल शामिल हैं। अलग-अलग जॉनर की इन रिलीज़ का दर्शकों को बेसब्री से इंतजार है। 'Musafir Cafe' पर टिकी दर्शकों की नजर इस हफ्ते की सबसे चर्चित रिलीज़ 'Musafir Cafe' मानी जा रही है। फिल्म दोस्ती, रिश्तों और जीवन के नए अनुभवों की कहानी को हल्के-फुल्के अंदाज़ में पेश करती है। ट्रेलर को सोशल मीडिया पर शानदार प्रतिक्रिया मिली है और दर्शकों के बीच इसे लेकर अच्छा उत्साह देखने को मिल रहा है। 'Adarsh Baal Vidyalaya' भी बटोर रही सुर्खियां स्कूल जीवन और सामाजिक मुद्दों पर आधारित 'Adarsh Baal Vidyalaya' भी इस सप्ताह की प्रमुख रिलीज़ में शामिल है। फिल्म की कहानी और विषय को लेकर दर्शकों में खासा उत्साह है। रिलीज़ से पहले ही इसका ट्रेलर और पोस्टर चर्चा का विषय बने हुए हैं। हर जॉनर के दर्शकों के लिए विकल्प इस सप्ताह कॉमेडी, ड्रामा, फैमिली और थ्रिलर जैसे अलग-अलग जॉनर की कई नई फिल्में और सीरीज़ विभिन्न OTT प्लेटफॉर्म्स पर रिलीज़ होंगी। ऐसे में दर्शकों को अपनी पसंद के अनुसार कई नए विकल्प मिलने वाले हैं। वीकेंड पर OTT दर्शकों की होगी मौज लगातार नई रिलीज़ के साथ यह सप्ताह OTT प्रेमियों के लिए बेहद खास रहने वाला है। दर्शक घर बैठे अलग-अलग प्लेटफॉर्म्स पर नई फिल्मों और वेब सीरीज़ का आनंद ले सकेंगे, जिससे वीकेंड का मनोरंजन और भी शानदार होने की उम्मीद है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई से शुरू होकर 13 अगस्त 2026 तक चलेगा। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने केंद्र सरकार की सिफारिश पर लोकसभा और राज्यसभा की बैठकें बुलाने को मंजूरी दे दी है। केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर इसकी जानकारी साझा करते हुए कहा कि राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद संसद के दोनों सदनों का मानसून सत्र निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार आयोजित किया जाएगा। संसदीय परंपरा के अनुसार संसदीय परंपरा के अनुसार मानसून सत्र की शुरुआत राष्ट्रपति के अभिभाषण से होगी। इसके बाद लोकसभा और राज्यसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा कराई जाएगी। करीब तीन सप्ताह तक चलने वाले इस सत्र में सरकार कई महत्वपूर्ण विधेयकों को पेश करने और उन्हें पारित कराने का प्रयास करेगी। इसके साथ ही विभिन्न राष्ट्रीय और जनहित से जुड़े मुद्दों पर भी दोनों सदनों में विस्तृत चर्चा होने की संभावना है। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने अपने बयान में कहा कि मानसून सत्र लोकतांत्रिक विमर्श का महत्वपूर्ण मंच होगा, जहां राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर सार्थक बहस, चर्चा और निर्णय लिए जाएंगे। उन्होंने उम्मीद जताई कि सभी राजनीतिक दल सकारात्मक सहयोग के साथ संसद की कार्यवाही को सफल बनाने में योगदान देंगे। इस बार के मानसून सत्र पर राजनीतिक दृष्टि इस बार के मानसून सत्र पर राजनीतिक दृष्टि से भी खास नजर रहेगी। विपक्ष महंगाई, बेरोजगारी, कृषि, आर्थिक स्थिति, कानून-व्यवस्था और अन्य समसामयिक मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने की तैयारी में है। वहीं सरकार अपने विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाने के साथ विभिन्न नीतिगत फैसलों पर सदन की सहमति हासिल करने की कोशिश करेगी। संसद का यह सत्र कई महत्वपूर्ण विधेयकों, नीति संबंधी चर्चाओं और सरकार-विपक्ष के बीच होने वाली बहस के कारण बेहद अहम माना जा रहा है। ऐसे में आगामी तीन सप्ताह तक देश की राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र संसद भवन रहेगा।
रांची। झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों के लिए 18 जून को चुनाव होगा। इसको लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। भाजपा ने अपना प्रत्याशी उतारने की घोषणा कर दी है। पार्टी की चुनाव समिति की बैठक में प्रत्याशी उतारने का फैसला हुआ। इसी बीच सत्तारूढ़ झामुमो ने भारत निर्वाचन आयोग को पत्र लिखकर चुनाव में हॉर्स ट्रेडिंग की आशंका जताई है। भाजपा की चुनाव समिति की बैठक में कहा गया कि पार्टी को चुनाव लड़ना चाहिए। एक सीट पर सशक्त उम्मीदवार देना चाहिए। पार्टी और उसके सहयोगी दलों को मिलाकर 24 वोट हैं। जीत के लिए सिर्फ चार वोट की जरूरत है। सभी विधायकों से राष्ट्रहित में आग्रह किया जाए कि वे पीएम नरेंद्र मोदी को और मजबूत करें, जिससे झारखंड सहित पूरे देश का विकास हो। बैठक में पार्टी की रणनीति को लेकर भी चर्चा हुई। साथ ही जेएलकेएम विधायक जयराम महतो, आजसू, जदयू व लोजपा (आर) के विधायकों व प्रदेश अध्यक्षों के साथ भी बैठक करने पर सहमति बनी। दावा-पार्टी का कार्यकर्ता ही चुनाव लड़ेगा बैठक के बाद प्रदेश महामंत्री अमर बाउरी ने कहा कि कोई बाहरी नहीं, पार्टी का कार्यकर्ता ही राज्यसभा चुनाव लडेगा। झामुमो के हॉर्स ट्रेडिंग को बढ़ावा देने की आशंका पर उन्होंने कहा कि चुनाव से पहले ही महागठबंधन का अपने विधायकों पर से भरोसा खत्म हो गया है। झारखंड में राज्यसभा चुनाव में खरीद-फरोख्त की शुरुआत महागठबंधन की पार्टियों ने ही की थी। झामुमो ने आयोग को लिखा पत्र इधर, झामुमो के महासचिव विनोद पांडेय ने चुनाव आयोग को पत्र लिखा है। इसमें उन्होंने हॉर्स ट्रेडिंग की आशंका जताई है। कहा है कि गठबंधन के पास दोनों सीटें जीतने के लिए पर्याप्त विधायक हैं। लेकिन, एनडीए के पास सिर्फ 24 विधायक हैं, जो एक सीट जीतने के लिए काफी नहीं है। ऐसे में भाजपा के प्रत्याशी उतारने पर विधायकों को प्रभावित करने के लिए आर्थिक प्रलोभन, बाहरी दबाव या अन्य अनैतिक तरीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है। झामुमो ने आयोग से निष्पक्ष, पारदर्शी और भयमुक्त माहौल में राज्यसभा चुनाव कराने के लिए विशेष निगरानी व्यवस्था सुनिश्चित करने की मांग की है। पार्टी ने सीबीआई, ईडी, राज्य खुफिया निदेशालय, केंद्रीय सतर्कता आयोग और राज्य के भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो को भी सतर्क रखने का आग्रह किया है। मतलब साफ है, झारखंड में राज्यसभा की एक सीट को लेकर सियासी घमासान स्क्रिप्ट तैयार दिख रही है। आनेवाले दिनों रोमांचक संघर्ष की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
नई दिल्ली में राजनीतिक हलचल तेज, विपक्ष ने सरकार पर लगाए गंभीर आरोप भारत में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने के लिए लाया गया महत्वपूर्ण बिल संसद में पास नहीं हो सका। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के लिए यह बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि 12 साल के शासन में पहली बार कोई संवैधानिक संशोधन प्रस्ताव अटक गया है। इस पूरे मामले के पीछे “परिसीमन (Delimitation)” को लेकर चला विवाद मुख्य कारण बताया जा रहा है। सरकार ने लोकसभा में महिलाओं को एक-तिहाई आरक्षण देने वाले बिल को परिसीमन प्रक्रिया से जोड़ दिया था, जिसके बाद विपक्ष ने इसे लोकतंत्र पर हमला करार दिया। महिला आरक्षण और परिसीमन विवाद ने बढ़ाई टकराव की स्थिति यह विधेयक महिलाओं को संसद और विधानसभा में 33 प्रतिशत आरक्षण देने के उद्देश्य से लाया गया था। लेकिन इसे 2011 की जनगणना के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण (परिसीमन) से जोड़ दिया गया। विपक्ष का कहना है कि यह कदम महिलाओं के अधिकारों के बजाय राजनीतिक सीमाओं को बदलने की कोशिश है। संसद में नहीं मिला दो-तिहाई बहुमत यह एक संवैधानिक संशोधन विधेयक था, जिसके लिए दो-तिहाई बहुमत जरूरी था। मतदान में सरकार को 298 वोट मिले, जबकि 230 सांसदों ने इसका विरोध किया। पर्याप्त समर्थन न मिलने के कारण यह बिल पारित नहीं हो सका। विपक्ष का तीखा हमला: ‘लोकतंत्र पर हमला’ विपक्षी दलों ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने इसे लोकतंत्र पर खुला हमला बताया। वहीं गौरव गोगोई ने कहा कि सरकार परिसीमन को “पीछे के दरवाजे” से लागू करने की कोशिश कर रही है। राहुल गांधी ने कहा कि यह बिल महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए नहीं बल्कि राजनीतिक नक्शा बदलने का प्रयास है। उत्तर-दक्षिण भारत के बीच बढ़ा राजनीतिक तनाव परिसीमन मुद्दा लंबे समय से भारत में संवेदनशील माना जाता है। दक्षिण भारत के राज्य जैसे तमिलनाडु और केरल को डर है कि जनसंख्या के आधार पर सीटें बढ़ने से उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी घट जाएगी। वहीं उत्तर भारत के अधिक जनसंख्या वाले राज्यों को इसका फायदा मिल सकता है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने इसे “दंडात्मक कदम” बताते हुए विरोध जताया। सरकार का पक्ष: जनसंख्या के आधार पर न्याय जरूरी गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि बढ़ती जनसंख्या के अनुसार निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण जरूरी है ताकि हर वोट का समान मूल्य हो। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कहा कि यह अवसर महिलाओं के हित में है और इसे राजनीतिक नजरिए से नहीं देखना चाहिए। आगे क्या होगा? महिला आरक्षण बिल पहले ही 2023 में पारित हो चुका है, लेकिन इसके लागू होने में 2029 तक की देरी है। अब परिसीमन विवाद के चलते इसकी प्रक्रिया और भी जटिल हो गई है। राजनीतिक दलों के बीच टकराव आगे और बढ़ने की संभावना है।
Harivansh Nomination: राज्यसभा के निवर्तमान उपसभापति हरिवंश को एक बार फिर उच्च सदन का सदस्य बनाया गया है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें मनोनीत किया है। क्यों हुआ मनोनयन? हरिवंश का कार्यकाल 9 अप्रैल को समाप्त हो गया था उन्हें उस सीट पर नामित किया गया है, जो पूर्व CJI रंजन गोगोई के रिटायर होने के बाद खाली हुई थी संवैधानिक प्रावधान यह मनोनयन संविधान के अनुच्छेद 80 के तहत किया गया राष्ट्रपति को राज्यसभा में नॉमिनेटेड सदस्य नियुक्त करने का अधिकार होता है हरिवंश का प्रोफाइल बिहार से दो बार राज्यसभा सांसद रह चुके राज्यसभा के उपसभापति के रूप में भी कार्य कर चुके संसदीय कार्यों में लंबा अनुभव
नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महिला आरक्षण बिल को लेकर एक खुला लेख लिखते हुए इसकी अहमियत पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि यह बिल सिर्फ एक कानून नहीं, बल्कि देश की करोड़ों महिलाओं की उम्मीदों और भविष्य से जुड़ा हुआ है। साथ ही, उन्होंने सभी राजनीतिक दलों से इस बिल का समर्थन करने की अपील की है। क्यों जरूरी है महिला आरक्षण बिल? प्रधानमंत्री ने अपने लेख में लिखा कि: भारत की आबादी में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग आधी है राष्ट्र निर्माण में महिलाओं का योगदान बेहद महत्वपूर्ण रहा है इसके बावजूद राजनीति और विधायी संस्थाओं में उनका प्रतिनिधित्व कम है उन्होंने कहा कि जब महिलाएं निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल होती हैं, तो: शासन की गुणवत्ता बेहतर होती है नई सोच और अनुभव से नीतियां मजबूत बनती हैं सभी दलों से समर्थन की अपील PM मोदी ने कहा: यह मुद्दा किसी एक पार्टी या सरकार का नहीं, पूरे देश का है महिला सशक्तिकरण के लिए सभी को मिलकर काम करना होगा यह कदम आने वाली पीढ़ियों के लिए महत्वपूर्ण है उन्होंने सभी सांसदों से आग्रह किया कि वे दलगत राजनीति से ऊपर उठकर इस बिल का समर्थन करें। 16 अप्रैल को संसद में चर्चा प्रधानमंत्री ने बताया कि: 16 अप्रैल को संसद सत्र बुलाया जाएगा इस दौरान महिला आरक्षण बिल पर चर्चा और पारित करने की प्रक्रिया होगी क्या है इसका महत्व? PM मोदी के अनुसार: यह बिल लोकतंत्र को और अधिक समावेशी बनाएगा महिलाओं को राजनीतिक भागीदारी का बड़ा अवसर मिलेगा समाज तभी आगे बढ़ता है जब महिलाएं आगे बढ़ती हैं
आम आदमी पार्टी (AAP) ने राघव चड्ढा को राज्यसभा में उपनेता पद से हटा दिया है, लेकिन इसके बावजूद पार्टी उन्हें न तो बाहर निकाल पा रही है और न ही उनकी सांसद सदस्यता खत्म करवा सकती है। इसके पीछे भारतीय संविधान और संसद के कुछ अहम नियम हैं। राज्यसभा सदस्य होने का फायदा राघव चड्ढा राज्यसभा सांसद हैं किसी सांसद की सदस्यता पार्टी सीधे खत्म नहीं कर सकती इसके लिए संविधान में तय प्रक्रिया का पालन जरूरी होता है दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) यह कानून संविधान की दसवीं अनुसूची में आता है इसके तहत सांसद तभी अयोग्य ठहराया जा सकता है जब: वह खुद पार्टी छोड़ दे, या व्हिप के खिलाफ वोट करे जब तक चड्ढा ऐसा नहीं करते, तब तक उनकी सदस्यता पर कोई असर नहीं पड़ेगा। सदस्यता खत्म करने की प्रक्रिया किसी सांसद को हटाने का अधिकार सीधे पार्टी के पास नहीं होता यह अधिकार राज्यसभा के सभापति के पास होता है प्रक्रिया: शिकायत या मामला उठाया जाता है जांच विशेषाधिकार समिति को भेजी जाती है रिपोर्ट के बाद सदन में प्रस्ताव आता है बहुमत से पास होने पर सदस्यता खत्म होती है AAP की राजनीतिक दुविधा AAP की स्थिति फिलहाल “न निगल पा रही, न उगल पा रही” जैसी है: अगर कार्रवाई नहीं करती: चड्ढा का कद पार्टी से बड़ा हो सकता है पार्टी की राजनीतिक लाइन कमजोर पड़ सकती है अगर बाहर निकालती है: चड्ढा स्वतंत्र सांसद बने रहेंगे खुलकर पार्टी के खिलाफ बोल सकते हैं इससे चुनावी नुकसान हो सकता है संकेत क्या मिला? उपनेता पद से हटाना एक राजनीतिक संदेश है पार्टी यह दिखाना चाहती है कि “लाइन से हटने वालों को साइडलाइन किया जाएगा”
केंद्र सरकार 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले महिलाओं के लिए 33% आरक्षण लागू करने की तैयारी में है। इसके लिए संसद के मौजूदा सत्र में दो अहम बिल लाए जा सकते हैं। प्रस्ताव के मुताबिक, लोकसभा की कुल सीटें 543 से बढ़ाकर 816 की जा सकती हैं। इनमें से 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। क्या होगा बड़ा बदलाव? सरकार महिला आरक्षण लागू करने की मौजूदा शर्तों में बदलाव करना चाहती है। अभी यह कानून नई जनगणना और परिसीमन के बाद लागू होना है सरकार अब 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन करने पर विचार कर रही है इससे प्रक्रिया तेज होगी और 2029 से पहले आरक्षण लागू किया जा सकेगा दो बिल लाने की तैयारी सरकार इस सत्र में दो अलग-अलग बिल ला सकती है: नारी शक्ति वंदन अधिनियम में संशोधन परिसीमन कानून में बदलाव इन बिलों को पास कराने के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत जरूरी होगा, इसलिए सरकार विपक्षी दलों से समर्थन जुटाने में लगी है। राजनीतिक सहमति बनाने की कोशिश गृहमंत्री अमित शाह ने इस मुद्दे पर कई दलों के नेताओं के साथ बैठक की है, जिनमें- वाईएसआर कांग्रेस, सपा, एनसीपी (एसपी), आरजेडी, AIMIM, बीजेडी और शिवसेना (UBT) शामिल हैं। हालांकि, कांग्रेस के साथ अभी चर्चा बाकी है। सहमति बनने पर बिल इसी हफ्ते पेश किए जा सकते हैं। आरक्षण का फॉर्मूला क्या होगा? कुल 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित SC/ST वर्ग की महिलाओं को उनके कोटे के भीतर हिस्सा OBC महिलाओं के लिए अलग प्रावधान फिलहाल शामिल नहीं है इसी मॉडल को राज्यों की विधानसभाओं में भी लागू करने की योजना है। 2023 में पास हुआ था कानून, लेकिन लागू नहीं हुआ महिला आरक्षण बिल 2023 में संविधान के 106वें संशोधन के रूप में पास हुआ था, जिसे “नारी शक्ति वंदन अधिनियम” नाम दिया गया। लोकसभा में लगभग सर्वसम्मति से पास राज्यसभा में सर्वसम्मति से पास राष्ट्रपति की मंजूरी भी मिल चुकी है फिर भी, यह अभी लागू नहीं हुआ है क्योंकि इसकी प्रक्रिया जनगणना और परिसीमन से जुड़ी है। इतिहास: कब शुरू हुई महिला आरक्षण की मांग 1931: पहली बार महिला आरक्षण पर चर्चा 1974: स्थानीय निकायों में आरक्षण की सिफारिश 1993: पंचायत और नगर निकायों में 33% आरक्षण लागू कई राज्यों में अब 50% तक आरक्षण लागू
राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने अपने विदाई भाषण में जहां 54 वर्षों के लंबे संसदीय अनुभव को साझा किया, वहीं माहौल को हल्का बनाने वाला एक बयान भी दे दिया, जिस पर सदन में मुस्कान छा गई-यहां तक कि नरेंद्र मोदी भी हंसी नहीं रोक सके। खड़गे ने अपने संबोधन की शुरुआत भावुक अंदाज़ में करते हुए कहा कि विदाई का पल हमेशा कठिन होता है, लेकिन सार्वजनिक जीवन में कोई भी व्यक्ति वास्तव में “रिटायर” नहीं होता। उन्होंने माना कि दशकों के अनुभव के बाद भी सीखने की प्रक्रिया कभी खत्म नहीं होती। हल्के अंदाज़ में सियासी टिप्पणी अपने भाषण के दौरान खड़गे ने पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवगौड़ा का जिक्र करते हुए चुटकी ली- “देवगौड़ा जी ने मोहब्बत हमसे की और शादी मोदी जी के साथ कर ली।” उनकी इस टिप्पणी पर सदन में ठहाके गूंज उठे और माहौल कुछ देर के लिए हल्का हो गया। साथियों के योगदान का जिक्र खड़गे ने कई वरिष्ठ सांसदों के योगदान को याद किया। उन्होंने रामदास अठावले की खास शैली और कविताओं का उल्लेख किया, वहीं शक्ति सिंह गोहिल और नीरज डांगी जैसे साथियों की तैयारी और सक्रियता की सराहना की। संसदीय मर्यादा पर जोर अपने भाषण के अंत में खड़गे ने सदन में सहयोग और शालीनता की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि संवाद और आपसी समझ ही संसदीय लोकतंत्र को मजबूत बनाते हैं, जबकि दूरी और टकराव से गलतफहमियां बढ़ती हैं। गौरतलब है कि राज्यसभा के 37 सदस्यों का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। इस मौके पर खड़गे ने उम्मीद जताई कि जाने वाले सदस्य आगे भी लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने में योगदान देते रहेंगे।
नई दिल्ली: संसद में सियासी टकराव लगातार तेज होता जा रहा है। लोकसभा अध्यक्ष Om Birla के खिलाफ प्रस्ताव की चर्चा के बाद अब विपक्ष ने देश के मुख्य चुनाव आयुक्त Gyanesh Kumar को भी निशाने पर ले लिया है। जानकारी के अनुसार विपक्षी दल उन्हें हटाने के प्रस्ताव की तैयारी में जुट गए हैं और इसके लिए सांसदों के हस्ताक्षर जुटाए जा रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक, इस सप्ताह ही लोकसभा और राज्यसभा के सचिवालयों में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने से संबंधित नोटिस जमा कराया जा सकता है। यदि ऐसा होता है तो यह भारतीय संसदीय इतिहास में पहली बार होगा जब किसी मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए औपचारिक नोटिस दिया जाएगा। TMC की अगुवाई में तैयार हो रहा प्रस्ताव मीडिया रिपोर्टों के अनुसार इस पहल की अगुवाई All India Trinamool Congress कर रही है। प्रस्ताव पर विपक्षी गठबंधन INDIA Alliance से जुड़े दलों के अलावा Aam Aadmi Party के सांसदों ने भी हस्ताक्षर किए हैं। सूत्रों के अनुसार नोटिस में मुख्य चुनाव आयुक्त पर करीब आधा दर्जन आरोप लगाए गए हैं। इनमें कथित पक्षपातपूर्ण रवैया और मतदाता सूची से नाम हटाने जैसे गंभीर आरोप शामिल बताए जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि गुरुवार तक यह नोटिस संसद सचिवालय में जमा किया जा सकता है। आवश्यक संख्या से अधिक सांसदों के हस्ताक्षर बुधवार रात तक लोकसभा के लिए करीब 120 सांसदों और राज्यसभा के लिए लगभग 60 सांसदों के हस्ताक्षर जुटाए जा चुके थे। नियमों के अनुसार लोकसभा में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के प्रस्ताव के लिए कम से कम 100 सांसदों के हस्ताक्षर आवश्यक होते हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त Gyanesh Kumar को लेकर विपक्षी दलों की नाराजगी पिछले कुछ महीनों से बढ़ती रही है। तृणमूल कांग्रेस पहले से ही उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रही थी। इसी बीच कांग्रेस नेता Rahul Gandhi ने भी ‘वोट चोरी’ अभियान के जरिए चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। स्पीकर के खिलाफ प्रस्ताव के बाद नया राजनीतिक मोर्चा हाल ही में विपक्ष ने लोकसभा अध्यक्ष Om Birla को हटाने के प्रस्ताव का भी समर्थन किया था। हालांकि बजट सत्र के दौरान यह प्रस्ताव वॉइस वोट से खारिज हो गया। इसके बाद विपक्ष ने दोनों सदनों के सांसदों के हस्ताक्षर जुटाकर अपनी राजनीतिक एकजुटता का प्रदर्शन किया है। मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया भारत में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया काफी जटिल और सख्त है। यह प्रक्रिया लगभग उसी तरह होती है जैसे Supreme Court of India के न्यायाधीश को हटाने के लिए अपनाई जाती है। कानून के अनुसार यह कार्रवाई केवल ‘कदाचार’ या ‘अक्षमता’ के आधार पर ही संभव है। 1968 के जजेस (इंक्वायरी) एक्ट के तहत यदि नोटिस स्वीकार हो जाता है, तो लोकसभा स्पीकर या राज्यसभा के सभापति तीन सदस्यीय जांच समिति गठित करते हैं। यह समिति आरोपों की जांच कर रिपोर्ट तैयार करती है। इसके बाद दोनों सदनों में इस पर चर्चा होती है। प्रस्ताव पारित करने के लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत आवश्यक होता है-जिसमें सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत शामिल होता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।