गोपालगंज: बिहार के गोपालगंज जिले में पुलिस महकमे से जुड़ा गंभीर मामला सामने आया है। जादोपुर थाने के तत्कालीन थानेदार अनिल राम पर रिश्वतखोरी, जबरन वसूली और लोगों को कथित तौर पर गैर-कानूनी तरीके से हिरासत में रखने के आरोप लगे हैं। शिकायत मिलने के बाद गोपालगंज एसपी विनय तिवारी ने मामले की जांच के निर्देश दिए। जांच में कई गंभीर आरोपों के समर्थन में साक्ष्य मिलने के बाद पुलिस ने थानेदार समेत चार लोगों को गिरफ्तार किया है।
शुरुआती जांच में सामने आया कि जादोपुर थाने में कुछ लोगों को कथित तौर पर बिना FIR, आधिकारिक रिकॉर्ड या पर्याप्त कानूनी आधार के घंटों तक हिरासत में रखा गया। एक मामले में एक व्यक्ति को करीब 36 घंटे तक थाने में रखे जाने का आरोप है।
जांच के दौरान यह भी आरोप सामने आया कि हिरासत में लिए गए लोगों या उनके परिवारों को कथित तौर पर झूठे मामलों में फंसाने की धमकी दी जाती थी। इसके बदले रिहाई या केस से नाम हटाने के लिए पैसे मांगने की बात जांच में सामने आई।
गोपालगंज एसपी विनय तिवारी को 16 अगस्त को जादोपुर थाने में कथित वसूली के मामले की जानकारी मिली। इसके बाद उन्होंने DSP मुख्यालय को पूरे मामले की जांच करने का निर्देश दिया।
जांच के दौरान अधिकारियों ने कथित तौर पर कई मामलों में पैसों की मांग और लेनदेन से जुड़े सबूत जुटाए। थानेदार और एक कथित बिचौलिये के बीच हुई बार-बार की फोन बातचीत को भी जांच का हिस्सा बनाया गया।
जांच में एक व्यक्ति से कथित बिचौलिये के माध्यम से 50 हजार रुपये मांगने का आरोप सामने आया। एक अन्य मामले में एक महिला और उसकी नाबालिग बेटी को छोड़ने के बदले 75 हजार रुपये लिए जाने की बात सामने आई।
इसके अलावा एक युवक का नाम केस से हटाने के लिए कथित तौर पर 55 हजार रुपये की मांग किए जाने का भी आरोप है।
जांच टीम को तत्कालीन SHO अनिल राम और कथित बिचौलिये के बीच कई बार हुई फोन बातचीत के साक्ष्य भी मिले।
DSP की जांच के आधार पर 18 अगस्त को जादोपुर थाने के तत्कालीन SHO समेत चार लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की गई। इसके बाद पुलिस ने तत्कालीन थानेदार अनिल राम, कथित बिचौलिये राजू यादव और गांव के चौकीदार राकेश कुमार व महंथ कुमार यादव को गिरफ्तार कर लिया।
पुलिस के मुताबिक, थानेदार और दोनों चौकीदारों को तत्काल प्रभाव से निलंबित भी किया गया। गिरफ्तार आरोपियों को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है।
मामले के बाद गोपालगंज पुलिस प्रशासन ने भ्रष्टाचार, अधिकारों के कथित दुरुपयोग और गैर-कानूनी हिरासत के मामलों में सख्त रुख अपनाने की बात कही है।
एसपी विनय तिवारी ने पुलिसकर्मियों और बिचौलियों को चेतावनी दी है कि किसी मामले की जांच में अनुचित हस्तक्षेप करने या गवाहों को डराने-धमकाने की कोशिश करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
इस कार्रवाई के बाद पुलिस महकमे में भी यह संदेश देने की कोशिश की गई है कि शिकायत मिलने पर अपने ही विभाग के अधिकारियों के खिलाफ भी जांच और कानूनी कार्रवाई से पीछे नहीं हटेगी।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
पटना: बिहार की राजनीति में प्रशांत किशोर और चिराग पासवान को लेकर एक नया सियासी समीकरण चर्चा में है। बांकीपुर उपचुनाव में प्रशांत किशोर की ओर से बीजेपी को चुनौती मिलने के बाद चिराग पासवान ने उनकी तारीफ की। खास बात यह है कि प्रशांत किशोर भी NDA के दूसरे नेताओं की तुलना में चिराग पासवान के प्रति अपेक्षाकृत नरम रुख रखते हैं। इस वजह से दोनों नेताओं के बीच राजनीतिक नजदीकी को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं। हालांकि, चिराग की पार्टी ने साफ किया है कि वह फिलहाल NDA की मजबूत सहयोगी है और गठबंधन से अलग होने जैसी कोई बात नहीं है। क्या भविष्य के विकल्प खुले रख रहे हैं चिराग? चिराग पासवान की ओर से प्रशांत किशोर की तारीफ के बाद LJP (रामविलास) के प्रवक्ता प्रोफेसर विनीत कुमार सिंह ने पार्टी का रुख स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि दोनों नेताओं के बीच व्यक्तिगत संबंध अच्छे हैं, लेकिन पार्टी NDA के साथ मजबूती से खड़ी है। पार्टी के मुताबिक उसका मौजूदा राजनीतिक लक्ष्य विकसित भारत के विजन को आगे बढ़ाना है। साथ ही, भविष्य में समान विचार और विजन वाली राजनीतिक ताकतों के साथ काम करने के विकल्पों को पूरी तरह बंद नहीं किया गया है। यही बात बिहार की राजनीति में चर्चा का विषय बनी हुई है कि क्या चिराग अभी से 2030 की राजनीति को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग विकल्पों को खुला रखना चाहते हैं। पिता रामविलास पासवान की रणनीति की झलक? राजनीतिक जानकार चिराग पासवान की मौजूदा रणनीति की तुलना उनके पिता रामविलास पासवान की राजनीति से करते हैं। रामविलास पासवान को लंबे समय तक बदलते राजनीतिक समीकरणों को पहचानने वाले नेता के तौर पर देखा जाता था। बांकीपुर के चुनावी नतीजे और बिहार की बदलती राजनीति को देखते हुए चिराग भी भविष्य की संभावनाओं पर नजर रख रहे हैं। हालांकि, फिलहाल उनके NDA से अलग होने का कोई संकेत नहीं है। प्रशांत किशोर और चिराग में क्या समानता? दोनों नेताओं की राजनीति में कुछ समानताएं भी दिखाई देती हैं। युवा नेतृत्व: दोनों बिहार की राजनीति में नई पीढ़ी के नेताओं के तौर पर अपनी पहचान बना रहे हैं। बिहार केंद्रित राजनीति: चिराग पासवान का ‘बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट’ का एजेंडा और प्रशांत किशोर का बिहार के विकास पर जोर दोनों को एक समान राजनीतिक स्पेस में खड़ा करता है। एक-दूसरे के प्रति नरम रुख: प्रशांत किशोर ने NDA के कई नेताओं पर तीखे हमले किए हैं, लेकिन चिराग पासवान को लेकर उनका रुख अपेक्षाकृत सकारात्मक रहा है। दूसरी तरफ चिराग भी प्रशांत किशोर की राजनीतिक सक्रियता की तारीफ करते नजर आए हैं। क्या 2030 में साथ आ सकते हैं दोनों? फिलहाल प्रशांत किशोर और चिराग पासवान के साथ आने की कोई तत्काल घोषणा या औपचारिक संकेत नहीं है। चिराग की पार्टी NDA में बनी हुई है, जबकि प्रशांत किशोर अपनी अलग राजनीतिक पहचान और संगठन के साथ आगे बढ़ रहे हैं। लेकिन बिहार की राजनीति में 2030 को एक महत्वपूर्ण भविष्य के पड़ाव के तौर पर देखा जा रहा है। ऐसे में दोनों नेताओं के बीच मौजूदा संवाद और एक-दूसरे के प्रति सकारात्मक रुख को भविष्य के संभावित राजनीतिक समीकरणों के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि, अभी इसे किसी संभावित गठबंधन की पुष्टि मानना जल्दबाजी होगी। बिहार की राजनीति में समीकरण तेजी से बदलते हैं और आने वाले वर्षों में ही स्पष्ट होगा कि चिराग पासवान और प्रशांत किशोर एक-दूसरे के साथ खड़े होते हैं या अलग-अलग राजनीतिक रास्तों पर आगे बढ़ते हैं।
सीतामढ़ी, एजेंसियां। बिहार के सीतामढ़ी में छात्रों के लिए 100 बेड वाले नए अल्पसंख्यक छात्रावास का निर्माण किया जाएगा। इसके लिए करीब ₹8.85 करोड़ की लागत निर्धारित की गई है। वर्षों से लंबित इस परियोजना को अब मंजूरी मिलने के बाद निर्माण कार्य शुरू होने का रास्ता साफ हो गया है। 100 छात्रों के रहने की होगी व्यवस्था नए छात्रावास में एक साथ 100 छात्रों के रहने की सुविधा उपलब्ध होगी। इसका उद्देश्य विशेष रूप से अल्पसंख्यक समुदाय के जरूरतमंद विद्यार्थियों को बेहतर आवासीय सुविधा उपलब्ध कराना है, ताकि आर्थिक या आवास की समस्या के कारण उनकी पढ़ाई प्रभावित न हो। ₹8.85 करोड़ से होगा निर्माण परियोजना के लिए ₹8.85 करोड़ की राशि निर्धारित की गई है। छात्रावास के निर्माण से विद्यार्थियों को रहने के साथ पढ़ाई के लिए बेहतर वातावरण मिलने की उम्मीद है। परियोजना के पूरा होने के बाद सीतामढ़ी में उच्च शिक्षा हासिल करने वाले छात्रों को इसका सीधा लाभ मिलेगा। वर्षों का इंतजार हुआ खत्म रिपोर्ट के अनुसार, सीतामढ़ी में इस छात्रावास की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी। परियोजना में देरी के कारण विद्यार्थियों को आवास की समस्या का सामना करना पड़ रहा था। अब निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ने से इस समस्या के समाधान की उम्मीद जगी है। शिक्षा को मिलेगा बढ़ावा नए छात्रावास से दूर-दराज के इलाकों से सीतामढ़ी आकर पढ़ाई करने वाले विद्यार्थियों को विशेष फायदा हो सकता है। सरकार की ऐसी आवासीय योजनाओं का उद्देश्य विद्यार्थियों को सुरक्षित आवास और पढ़ाई के अनुकूल माहौल उपलब्ध कराकर उच्च शिक्षा तक उनकी पहुंच बढ़ाना है।
भागलपुर। भागलपुर से रांची और बोकारो जाने वाले यात्रियों के लिए राहत की खबर है। सावन समाप्त होने के बाद पथ परिवहन निगम इन दोनों शहरों के लिए सरकारी बस सेवा शुरू करने की तैयारी में है। इसके लिए चार नई बसें भागलपुर डिपो पहुंच चुकी हैं और दोनों रूटों को भी तय कर लिया गया है। फिलहाल परमिट की प्रक्रिया पूरी होने का इंतजार है। आठ साल से लंबित थी बस सेवा की योजना रांची के लिए सरकारी बस सेवा शुरू करने की कवायद पिछले करीब आठ वर्षों से चल रही थी। अलग-अलग कारणों से योजना अब तक धरातल पर नहीं उतर सकी। इस बार परिवहन विभाग ने तैयारियां तेज कर दी हैं। अधिकारियों के अनुसार सावन खत्म होने के बाद दोनों रूटों पर बसों का परिचालन शुरू किया जा सकता है। पटना से भागलपुर पहुंचीं चार नई बसें पथ परिवहन निगम को पटना से चार नई बसें मिली हैं, जिन्हें भागलपुर डिपो भेज दिया गया है। इन्हीं बसों का इस्तेमाल रांची और बोकारो रूट पर किया जाएगा। विभाग ने रूट तय कर लिया है और परमिट लेने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। क्षेत्रीय प्रबंधक अमित कुमार के अनुसार, परमिट मिलते ही बसों के परिचालन की तारीख और समय तय किया जाएगा। यात्रियों को प्राइवेट बसों के भरोसे नहीं रहना पड़ेगा भागलपुर से रांची और बोकारो जाने वाले यात्रियों की संख्या काफी अधिक है। प्राइवेट बसों में सीटों की उपलब्धता सीमित रहने के कारण यात्रियों को कई बार पहले से टिकट की व्यवस्था करनी पड़ती है। त्योहारों और छुट्टियों के दौरान परेशानी और बढ़ जाती है। ऐसे में सरकारी बस सेवा शुरू होने से यात्रियों को एक अतिरिक्त और सुविधाजनक विकल्प मिलेगा। खासकर रोजगार, कारोबार, शिक्षा और अन्य जरूरी कामों से झारखंड जाने वाले लोगों को इसका लाभ मिलने की उम्मीद है। रेल के साथ मिलेगा एक और विकल्प भागलपुर से रांची जाने के लिए रेल सेवा भी यात्रियों का प्रमुख साधन है। भागलपुर से वनांचल एक्सप्रेस का परिचालन होता है, लेकिन ट्रेनों में सीट की उपलब्धता को लेकर अक्सर यात्रियों को परेशानी होती है। सरकारी बस सेवा शुरू होने के बाद यात्रियों के पास सड़क मार्ग से सफर करने का भी विकल्प होगा। परमिट के बाद तय होगा टाइमिंग और किराया फिलहाल बस सेवा की शुरुआत की तैयारी पूरी हो चुकी है, लेकिन परिचालन का अंतिम समय, किराया और विस्तृत स्टॉपेज की जानकारी परमिट प्रक्रिया पूरी होने के बाद तय की जाएगी। चार बसों के डिपो पहुंचने के बाद अब यात्रियों की नजर सेवा शुरू होने की तारीख पर है। अगर निर्धारित समय के अनुसार बस सेवा शुरू होती है, तो भागलपुर से रांची और बोकारो के बीच सड़क संपर्क और बेहतर होगा। लंबे समय से प्रतीक्षित इस सरकारी बस सेवा से यात्रियों को प्राइवेट बसों के अलावा एक नया परिवहन विकल्प मिल सकेगा।