पाकिस्तान के सबसे बड़े और प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध प्रांत बलूचिस्तान को लेकर एक बार फिर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में जारी विरोध प्रदर्शनों के बीच अब बलूचिस्तान से जुड़े एक संगठन ने 11 अगस्त को अपना 'स्वतंत्रता दिवस' मनाने का ऐलान किया है। संगठन ने दुनिया भर में रहने वाले बलूच समुदाय से इस दिन बड़े पैमाने पर कार्यक्रम आयोजित करने और कथित स्वतंत्र बलूचिस्तान का झंडा फहराने की अपील की है। साथ ही, संगठन ने संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से बलूचिस्तान को एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र के रूप में मान्यता देने की मांग भी दोहराई है। 11 अगस्त को क्यों चुना गया? रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान से जुड़े नेताओं का दावा है कि 11 अगस्त 1947 को, ब्रिटिश शासन समाप्त होने से ठीक पहले, तत्कालीन कलात रियासत ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित किया था। संगठन का कहना है कि बाद में बलूचिस्तान को पाकिस्तान में शामिल होने के लिए मजबूर किया गया। हालांकि, पाकिस्तान इस दावे को स्वीकार नहीं करता और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बलूचिस्तान को पाकिस्तान का ही हिस्सा माना जाता है। इसलिए संगठन का यह दावा उसकी अपनी राजनीतिक स्थिति को दर्शाता है, न कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त तथ्य को। मीर यार बलोच की अपील बलूच आंदोलन से जुड़े नेता मीर यार बलोच ने विभिन्न देशों में रहने वाले बलूच समुदाय से 11 अगस्त को अपने घरों, बाजारों, शैक्षणिक संस्थानों और सार्वजनिक स्थानों पर कथित स्वतंत्र बलूचिस्तान का झंडा फहराने की अपील की है। उन्होंने कहा कि अब हर वर्ष 11 अगस्त को बलूचिस्तान का स्वतंत्रता दिवस मनाया जाएगा। उनका दावा है कि यह दिन बलूच पहचान और आत्मनिर्णय के अधिकार का प्रतीक है। पहले भी कर चुके हैं स्वतंत्रता का दावा यह घोषणा ऐसे समय में आई है, जब कुछ सप्ताह पहले भी रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान से जुड़े नेताओं ने खुद को पाकिस्तान से स्वतंत्र घोषित करने का दावा किया था। हालांकि: पाकिस्तान सरकार ने इस दावे को पूरी तरह खारिज किया है। किसी भी देश या संयुक्त राष्ट्र ने बलूचिस्तान को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता नहीं दी है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय बलूचिस्तान को पाकिस्तान का हिस्सा ही मानता है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय से की अपील संगठन का कहना है कि जब तक बलूचिस्तान को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता नहीं मिलती, तब तक क्षेत्र में स्थायी शांति और विकास संभव नहीं होगा। उसने संयुक्त राष्ट्र और अन्य देशों से बलूचिस्तान के आत्मनिर्णय के अधिकार का समर्थन करने की अपील की है। संगठन का यह भी दावा है कि दुनिया भर में रहने वाले करोड़ों बलूच स्वयं को एक अलग राष्ट्र का नागरिक मानते हैं। हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है। अंतरिम संविधान का भी किया था ऐलान रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान ने 8 फरवरी 2026 को एक अंतरिम संविधान जारी करने का भी दावा किया था। संगठन के अनुसार, इस दस्तावेज का उद्देश्य एक धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और समान अधिकारों वाले गणराज्य की रूपरेखा प्रस्तुत करना है। मीर यार बलोच ने उस समय कहा था कि यह संविधान वर्षों से संघर्ष कर रहे बलूच लोगों की आकांक्षाओं का प्रतीक है और दुनिया के सामने यह संदेश देता है कि बलूचिस्तान लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार पर आगे बढ़ना चाहता है। क्या है मौजूदा स्थिति? बलूचिस्तान में लंबे समय से अलगाववादी गतिविधियां और सुरक्षा बलों के साथ संघर्ष जारी है। वहीं पाकिस्तान सरकार का कहना है कि वह प्रांत में कानून-व्यवस्था बनाए रखने और विकास कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है। दूसरी ओर, अलगाववादी संगठन लगातार राजनीतिक अधिकारों और स्वतंत्रता की मांग उठाते रहे हैं। ऐसे में 11 अगस्त को प्रस्तावित 'स्वतंत्रता दिवस' कार्यक्रम को लेकर एक बार फिर बलूचिस्तान का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय चर्चा में आ सकता है।
पाकिस्तान की राजनीति में एक बार फिर तख्तापलट की चर्चाओं ने जोर पकड़ लिया है। इसकी वजह बने हैं शहबाज शरीफ सरकार के गृह मंत्री मोहसिन नकवी, जिन्हें सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर का करीबी माना जाता है। नकवी ने सार्वजनिक रूप से देश की प्रशासनिक और न्यायिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाते हुए दावा किया कि पाकिस्तान की संस्थाओं में वर्षों से गहरे स्तर पर भ्रष्टाचार व्याप्त है। उनके बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में नई बहस शुरू हो गई है। 21 साल पुराने कथित घोटाले का किया दावा मीडिया से बातचीत में मोहसिन नकवी ने कहा कि पाकिस्तान के इतिहास में शायद ही कभी इतना बड़ा घोटाला सामने आया हो। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले 21 वर्षों से अवैध वित्तीय लेन-देन का सिलसिला चलता रहा और इसमें कई प्रभावशाली लोग शामिल रहे। नकवी ने कहा कि इस कथित घोटाले में न्यायपालिका, नौकरशाही, राजनेता और बैंकिंग क्षेत्र से जुड़े लोग भी शामिल रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकार इस मामले में जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करेगी। उन्होंने कहा, "मुझे नहीं लगता कि पाकिस्तान के इतिहास में कभी इतना बड़ा घोटाला हुआ है, जिसमें जज, नौकरशाह, राजनेता और बैंकर सभी शामिल रहे हों। 21 सालों तक अवैध लेन-देन चलता रहा और लोग इसका लाभ उठाते रहे। अब हर जिम्मेदार व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।" हालांकि, उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि यह कथित घोटाला किस मामले से जुड़ा है और इसमें किन लोगों की भूमिका की जांच की जा रही है। बयान के बाद क्यों बढ़ीं तख्तापलट की चर्चाएं? मोहसिन नकवी का बयान ऐसे समय आया है, जब पाकिस्तान पहले से ही आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता और संस्थागत टकराव का सामना कर रहा है। चूंकि नकवी को सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर का करीबी माना जाता है, इसलिए उनके इस बयान को लेकर कई तरह की राजनीतिक अटकलें लगाई जा रही हैं। हालांकि, अब तक पाकिस्तान में सेना की ओर से किसी तख्तापलट या सत्ता परिवर्तन को लेकर कोई आधिकारिक संकेत नहीं दिया गया है। इसलिए तख्तापलट की चर्चाओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। पाकिस्तान में तख्तापलट का इतिहास पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास में सेना कई बार सत्ता अपने हाथ में ले चुकी है। 1958: पहला सैन्य तख्तापलट राष्ट्रपति इस्कंदर मिर्जा ने संविधान निलंबित कर मार्शल लॉ लागू किया। कुछ ही दिनों बाद जनरल अय्यूब खान ने इस्कंदर मिर्जा को सत्ता से हटाकर खुद देश की कमान संभाल ली। अय्यूब खान 1969 तक सत्ता में रहे। 1977: दूसरा तख्तापलट जनरल जिया-उल-हक ने प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो की सरकार को हटाकर सत्ता पर कब्जा कर लिया। बाद में भुट्टो को गिरफ्तार किया गया और 1979 में उन्हें फांसी दे दी गई। जिया-उल-हक 1988 तक शासन करते रहे। 1999: तीसरा तख्तापलट कारगिल युद्ध के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और सेना प्रमुख परवेज मुशर्रफ के बीच टकराव बढ़ गया। सेना ने नवाज शरीफ की सरकार को हटाकर सत्ता अपने हाथ में ले ली। जनरल परवेज मुशर्रफ 2008 तक पाकिस्तान के राष्ट्रपति रहे। क्या फिर बदल सकती है पाकिस्तान की सियासत? मोहसिन नकवी के बयान ने पाकिस्तान की राजनीतिक व्यवस्था और सरकारी संस्थाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि, फिलहाल ऐसा कोई आधिकारिक संकेत नहीं है कि देश में सैन्य तख्तापलट की तैयारी चल रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में सरकार की कार्रवाई, जांच की दिशा और सेना का रुख यह तय करेगा कि पाकिस्तान की राजनीति किस ओर बढ़ती है।
Pakistan-US Relations: पाकिस्तान के सूचना एवं प्रसारण मंत्री अताउल्लाह तरार ने अमेरिका पर गंभीर आरोप लगाते हुए दावा किया है कि पाकिस्तान के खिलाफ संगठित दुष्प्रचार अभियान चलाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि सुरक्षा एजेंसियों ने एक ऐसे व्यक्ति को गिरफ्तार किया है, जिसका संबंध अमेरिका से था और जिसे कथित तौर पर पाकिस्तान विरोधी डिजिटल प्रचार के लिए विदेश से भुगतान किया जा रहा था। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर जारी एक वीडियो संदेश में तरार ने कहा कि कुछ दिन पहले गिरफ्तार किया गया व्यक्ति डिजिटल मार्केटिंग सेवाएं प्रदान करता था और प्रारंभिक जांच में उसके अमेरिका से जुड़े होने के संकेत मिले हैं। 'अमेरिका से हो रही थी पेमेंट' अताउल्लाह तरार ने दावा किया कि जांच के दौरान सामने आया कि आरोपी को अमेरिका से भुगतान किया जा रहा था। उनके मुताबिक पूछताछ में यह भी पता चला कि वह कथित 'बॉट फार्म' के जरिए सोशल मीडिया पर पाकिस्तान के खिलाफ दुष्प्रचार अभियान चला रहा था। उन्होंने आरोप लगाया कि इस नेटवर्क के माध्यम से पाकिस्तान सरकार, सेना, सेना प्रमुख, सरकारी संस्थानों और विभिन्न सरकारी विभागों के खिलाफ भ्रामक और नकारात्मक सामग्री सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही थी। सरकार और सेना को निशाना बनाने का आरोप पाकिस्तानी मंत्री ने कहा कि कथित अभियान का उद्देश्य केवल सरकार की आलोचना करना नहीं था, बल्कि देश की संस्थाओं पर लोगों का भरोसा कमजोर करना भी था। उन्होंने दावा किया कि इस सामग्री को अमेरिका से संचालित नेटवर्क के जरिए बड़े स्तर पर वायरल किया जा रहा था। हालांकि, तरार ने अपने आरोपों के समर्थन में कोई सार्वजनिक दस्तावेज, जांच रिपोर्ट या अन्य ठोस सबूत पेश नहीं किए। वहीं अमेरिका की ओर से भी इन आरोपों पर तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। पाकिस्तान-अमेरिका रिश्तों के बीच नया विवाद यह बयान ऐसे समय आया है जब हाल के वर्षों में अमेरिका और पाकिस्तान के बीच संबंधों में सुधार की चर्चा रही है। दोनों देशों के बीच सुरक्षा, क्षेत्रीय स्थिरता और कूटनीतिक सहयोग को लेकर कई स्तरों पर बातचीत होती रही है। ऐसे माहौल में पाकिस्तान सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री द्वारा अमेरिका पर पाकिस्तान विरोधी प्रचार अभियान चलाने का आरोप लगाना दोनों देशों के रिश्तों में नई बहस को जन्म दे सकता है। फिलहाल यह मामला पाकिस्तान के दावों तक सीमित है और इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहसिन नकवी ने देश की मौजूदा शासन व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए चेतावनी दी है कि यदि युवाओं की नाराजगी और जन असंतोष को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो पाकिस्तान भी बड़े जन आंदोलनों का सामना कर सकता है। इस्लामाबाद में आयोजित पाकिस्तान इकोनॉमिक समिट में दिए गए उनके बयान की अब राजनीतिक हलकों में व्यापक चर्चा हो रही है। 'मौजूदा सिस्टम पूरी तरह विफल' जियो न्यूज के मुताबिक, मोहसिन नकवी ने कहा कि वर्तमान प्रशासनिक व्यवस्था देश की समस्याओं का समाधान करने में सक्षम नहीं है। उन्होंने कहा, "जिस व्यवस्था के तहत हम रह रहे हैं, वह पूरी तरह विफल हो चुकी है। इस सिस्टम से देश की समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता। अगर व्यापक सुधार नहीं किए गए, तो 10 साल बाद भी हम इन्हीं मुद्दों पर बहस करते रहेंगे।" युवाओं का किया जिक्र अपने संबोधन में नकवी ने कहा कि पाकिस्तान के युवाओं को मुफ्त सहायता नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण व्यवस्था और रोजगार के अवसर चाहिए। उन्होंने कहा कि आम लोगों की सबसे बड़ी मांग है कि— योग्यता के आधार पर अवसर मिलें, न्याय सुनिश्चित हो, युवाओं के लिए रोजगार के बेहतर अवसर उपलब्ध हों। 'कॉकरोच' वाली टिप्पणी बनी चर्चा का विषय भाषण के दौरान मोहसिन नकवी ने युवाओं की एकजुटता का उदाहरण देते हुए कहा कि अगर असंतुष्ट युवा संगठित हो जाएं, तो बड़ा बदलाव ला सकते हैं। समा टीवी के अनुसार उन्होंने कहा, "चाहे आप उस युवा को युवा कहें, कॉकरोच कहें या कुछ और... अगर ये 'कॉकरोच' एकजुट हो जाएं, तो सब कुछ पलट सकते हैं।" उनकी यह टिप्पणी अब पाकिस्तान की राजनीति और सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी हुई है। प्रशासनिक सुधारों की वकालत गृह मंत्री ने कहा कि देश की शासन व्यवस्था को प्रभावी बनाने के लिए बड़े प्रशासनिक सुधारों की आवश्यकता है। उन्होंने नए प्रशासनिक यूनिट बनाने और स्थानीय सरकारों को अधिक अधिकार देने की भी पैरवी की, ताकि लोगों तक बेहतर शासन और सेवाएं पहुंच सकें। आर्थिक और राजनीतिक चुनौतियों के बीच आया बयान मोहसिन नकवी का यह बयान ऐसे समय आया है, जब पाकिस्तान आर्थिक संकट, बढ़ती बेरोजगारी, राजनीतिक अस्थिरता और बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा तथा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे माहौल में उनका यह बयान देश की मौजूदा व्यवस्था और युवाओं के बढ़ते असंतोष को लेकर गंभीर चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है।
Pakistan Politics: पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहसिन नकवी ने देश की राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा है कि मौजूदा सिस्टम पूरी तरह विफल हो चुका है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि समय रहते शासन व्यवस्था में सुधार नहीं किया गया, तो पाकिस्तान को बड़े जनआंदोलनों और राजनीतिक अस्थिरता का सामना करना पड़ सकता है। एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए नकवी ने कहा कि देश की मौजूदा प्रशासनिक व्यवस्था लोगों की उम्मीदों पर खरी नहीं उतर रही है। उन्होंने कहा कि केवल समस्याओं पर चर्चा करने से हालात नहीं बदलेंगे, बल्कि जवाबदेह और प्रभावी शासन व्यवस्था स्थापित करनी होगी। लोकतंत्र के साथ मजबूत प्रशासन भी जरूरी मोहसिन नकवी ने कहा कि वह लोकतंत्र के समर्थक हैं, लेकिन लोकतंत्र तभी सफल हो सकता है जब प्रशासन पारदर्शी, जवाबदेह और प्रभावी हो। उन्होंने कहा कि यदि मौजूदा व्यवस्था में सुधार नहीं हुआ, तो आने वाले वर्षों में भी देश को उन्हीं समस्याओं से जूझना पड़ेगा जिनका सामना आज करना पड़ रहा है। युवाओं के बढ़ते असंतोष का किया जिक्र अपने संबोधन में नकवी ने युवाओं की बढ़ती नाराजगी को गंभीर चिंता का विषय बताया। उन्होंने कहा कि आज की Gen-Z केवल स्थानीय मुद्दों तक सीमित नहीं है, बल्कि रोजगार, पारदर्शिता, बेहतर शासन, शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं जैसे विषयों पर भी मुखर हो रही है। इसी दौरान उन्होंने भारत में हुए CJP आंदोलन का भी उल्लेख करते हुए कहा कि दक्षिण एशिया में युवाओं की राजनीतिक और सामाजिक भागीदारी लगातार बढ़ रही है। उनके अनुसार, यदि सरकारें युवाओं की अपेक्षाओं को नजरअंदाज करेंगी, तो व्यापक असंतोष पैदा हो सकता है। चुनावी वादों पर भी उठाए सवाल पाकिस्तानी गृह मंत्री ने राजनीतिक नेतृत्व की आलोचना करते हुए कहा कि चुनावों के दौरान बड़े पैमाने पर संसाधन खर्च किए जाते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होने के बाद आम लोगों को बेहतर आर्थिक अवसर और बुनियादी सुविधाएं नहीं मिल पातीं। उन्होंने कहा कि इससे जनता, खासकर युवाओं का व्यवस्था पर भरोसा कमजोर होता है। यदि सरकारें लोगों की वास्तविक समस्याओं का समाधान नहीं करेंगी, तो राजनीतिक व्यवस्था के प्रति विश्वास और कम होता जाएगा। सुधार की जरूरत पर दिया जोर मोहसिन नकवी ने कहा कि पाकिस्तान इस समय आर्थिक चुनौतियों, राजनीतिक तनाव और प्रशासनिक कमजोरियों से जूझ रहा है। ऐसे में केवल बयानबाजी से काम नहीं चलेगा, बल्कि राजनीतिक नेतृत्व, प्रशासन और समाज के सभी वर्गों को मिलकर शासन व्यवस्था में सुधार के लिए गंभीर प्रयास करने होंगे। उन्होंने कहा कि देश के भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए पारदर्शी प्रशासन, जवाबदेही और जनविश्वास को मजबूत करना सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए।
PoK Protest: पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में जारी विरोध प्रदर्शनों के बीच पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है। उन्होंने प्रदर्शनकारियों को "भारत की तरह दुश्मन" बताते हुए कहा कि सरकार उनके साथ किसी भी तरह की बातचीत नहीं करेगी। दूसरी ओर, प्रदर्शनकारी संगठन ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) का दावा है कि सुरक्षा बलों के साथ झड़पों में अब तक 20 कार्यकर्ताओं की मौत हो चुकी है। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। प्रदर्शनकारियों से बातचीत से किया इनकार पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि सरकार प्रदर्शनकारियों के साथ कोई वार्ता नहीं करेगी। उन्होंने कहा, "मैं उन्हें भारत की ही श्रेणी में मानता हूं और उन्हें पाकिस्तान का दुश्मन समझता हूं।" उनके इस बयान से PoK में पहले से जारी तनाव और बढ़ गया है। वहीं, कानून प्रवर्तन एजेंसियों का आरोप है कि प्रदर्शनकारियों ने सुरक्षा बलों पर गोलीबारी की, जबकि प्रदर्शनकारी संगठन इन आरोपों से इनकार कर रहा है। सलाहकार बोले- प्रदर्शनकारी कब्जे की कोशिश कर रहे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के सलाहकार राणा सनाउल्लाह ने कहा कि JAAC ने पहले सरकार के साथ बैठक कर 38 मांगें रखी थीं। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदर्शनकारी मुजफ्फराबाद और मीरपुर पर बलपूर्वक कब्जा करने की कोशिश कर रहे हैं। सनाउल्लाह ने दावा किया कि उनकी गतिविधियां भारत जैसी रणनीति से प्रेरित हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई झड़पों में किसी की मौत नहीं हुई, जो JAAC के दावों से अलग है। JAAC का दावा- 20 कार्यकर्ताओं की मौत प्रतिबंधित संगठन ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) ने दावा किया है कि सोमवार से सुरक्षा बलों के साथ हुई झड़पों में उसके कम से कम 20 कार्यकर्ता मारे गए हैं और कई अन्य घायल हुए हैं। संगठन का आरोप है कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल प्रयोग किया गया। इस बीच, बीबीसी उर्दू की रिपोर्ट के अनुसार, मीरपुर में विरोध के चलते बाजार और दुकानें बंद रहीं और कई इलाकों में सामान्य जनजीवन प्रभावित हुआ। चुनाव के बीच बढ़ा विवाद PoK की तथाकथित विधानसभा की 13 सीटों के लिए पहले चरण का मतदान सोमवार को हुआ, जिसमें पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (PML-N) ने नौ सीटों पर जीत दर्ज की। शेष 32 सीटों के लिए दूसरे और तीसरे चरण का मतदान क्रमशः 2 अगस्त और 10 अगस्त को होना है। मुख्य मुकाबला PML-N और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) के बीच माना जा रहा है, जबकि पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) ने चुनाव का बहिष्कार किया है। 12 सीटों को लेकर आंदोलन JAAC पिछले महीने से विधानसभा की 12 विवादित सीटों को लेकर प्रदर्शन कर रही है। संगठन का आरोप है कि पाकिस्तान का सत्ता प्रतिष्ठान इन सीटों के जरिए अपनी पसंद की सरकार बनवाने के लिए चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप कर रहा है। भारत ने चुनावों पर जताई आपत्ति भारत ने भी PoK में कराए जा रहे चुनावों पर कड़ी आपत्ति जताई है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि पाकिस्तान इन चुनावों के जरिए अपने अवैध कब्जे और क्षेत्र में मानवाधिकार उल्लंघनों को छिपाने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने दोहराया कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख का पूरा केंद्र शासित प्रदेश, जिसमें पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले क्षेत्र भी शामिल हैं, भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा है। भारत ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि PoK पर उसका रुख पहले की तरह स्पष्ट और अपरिवर्तित है।
PoK Elections 2026: पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में सोमवार (27 जुलाई) को विधानसभा चुनाव के पहले चरण के तहत 13 सीटों पर मतदान हो रहा है। सुरक्षा हालात और लंबे समय से जारी विरोध प्रदर्शनों को देखते हुए पाकिस्तान चुनाव आयोग ने चुनाव तीन चरणों में कराने का फैसला लिया है। चुनाव के नतीजों के साथ-साथ क्षेत्र में राजनीतिक असंतोष और सुरक्षा स्थिति पर भी नजर बनी हुई है। तीन चरणों में होगा चुनाव पाकिस्तानी चुनाव आयोग के अनुसार, 45 सदस्यीय विधानसभा के लिए मतदान इस तरह होगा: 27 जुलाई: मीरपुर डिवीजन की 13 सीटें 2 अगस्त: मुजफ्फराबाद डिवीजन की 9 सीटें और पाकिस्तान में रहने वाले शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 सीटें 10 अगस्त: पूंछ डिवीजन की 11 सीटें मतदान के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सेना और सुरक्षा बलों की अतिरिक्त तैनाती की गई है। विरोध प्रदर्शनों के बीच चुनाव PoK में पिछले कई महीनों से महंगाई, बढ़े हुए बिजली बिल, सरकारी नीतियों और राजनीतिक हस्तक्षेप के खिलाफ व्यापक प्रदर्शन हो रहे हैं। इन आंदोलनों की अगुआई जम्मू-कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JKJAAC) कर रही है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि सुरक्षा बलों ने कई जगह बल प्रयोग किया, संचार सेवाएं बाधित कीं और रास्ते बंद कर दिए, जिससे आम लोगों को खाद्य सामग्री और दवाइयों की कमी का सामना करना पड़ा। कई जगह प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच झड़पों में लोगों की मौत और घायल होने की घटनाएं भी सामने आई हैं। 12 शरणार्थी सीटों पर विवाद इस चुनाव का सबसे बड़ा विवाद पाकिस्तान में रहने वाले कश्मीरी शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 सीटों को लेकर है। स्थानीय संगठनों और JKJAAC का आरोप है कि इन सीटों के जरिए इस्लामाबाद की सरकार चुनावी नतीजों को प्रभावित करती है, जिससे स्थानीय मतदाताओं की राजनीतिक आवाज कमजोर पड़ जाती है और केंद्र समर्थित दलों को फायदा मिलता है। क्या चुनाव से बदलेगी स्थिति? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव कराने से संवैधानिक प्रक्रिया पूरी हो जाएगी, लेकिन महंगाई, बिजली संकट, राजनीतिक अधिकारों और सुरक्षा बलों की कार्रवाई जैसे मूल मुद्दों का समाधान फिलहाल होता नहीं दिख रहा। ऐसे में चुनाव के बाद भी क्षेत्र में राजनीतिक तनाव जारी रहने की आशंका जताई जा रही है। भारत ने फिर जताया विरोध भारत लगातार स्पष्ट करता रहा है कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख का पूरा केंद्र शासित प्रदेश, जिसमें PoK और गिलगित-बाल्टिस्तान शामिल हैं, भारत का अभिन्न हिस्सा हैं। भारत ने इन क्षेत्रों में पाकिस्तान द्वारा कराए जाने वाले चुनावों पर पहले भी कड़ा विरोध दर्ज कराया है और ऐसी चुनावी प्रक्रिया या तथाकथित विधानसभा को मान्यता नहीं दी है। वहीं, मानवाधिकार संगठनों ने PoK में हालात को लेकर चिंता जताई है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने भी हिंसा की घटनाओं की निष्पक्ष जांच की मांग की है। नवाज शरीफ का बड़ा बयान चुनाव प्रचार के दौरान पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (PML-N) प्रमुख नवाज शरीफ ने कहा कि यदि उनकी पार्टी चुनाव जीतती है तो वह प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से उन्हें PoK का प्रधानमंत्री बनाने का आग्रह करेंगे ताकि वे स्वयं क्षेत्र के विकास की निगरानी कर सकें। उन्होंने कहा कि "PoK मेरे लिए पंजाब जितना ही प्रिय है। मेरे पूर्वज कश्मीर से आए थे, इसलिए यह मेरा दूसरा घर है।" 2021 के चुनाव में क्या हुआ था? 2021 के विधानसभा चुनाव में इमरान खान की PTI ने 45 में से 25 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी। सरदार अब्दुल कय्यूम नियाजी प्रधानमंत्री बने, लेकिन 2022 में उन्होंने इस्तीफा दे दिया। इसके बाद सरदार तनवीर इलियास प्रधानमंत्री बने, जिन्हें 2023 में अदालत ने अयोग्य घोषित कर दिया। बाद में चौधरी अनवरुल हक प्रधानमंत्री बने, लेकिन नवंबर 2025 में अविश्वास प्रस्ताव के जरिए उन्हें भी हटा दिया गया। वर्तमान में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) के फैसल मुमताज राठौर PoK के प्रधानमंत्री हैं।
इस्लामाबाद, एजेंसियां। पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर एक बार फिर राजनीतिक विवादों के केंद्र में हैं। पाकिस्तान की विपक्षी राजनीति में यह आरोप लगाया जा रहा है कि सैन्य प्रतिष्ठान आलोचकों की आवाज़ दबाने के लिए धार्मिक और राजनीतिक नेटवर्क का इस्तेमाल कर रहा है। ताज़ा विवाद तब सामने आया जब एक कथित बैठक को लेकर नई राजनीतिक बहस शुरू हो गई। फज़लुर रहमान के समर्थन में उठे सवाल रिपोर्टों के अनुसार, पाकिस्तान उलेमा काउंसिल के प्रमुख हाफिज़ ताहिर महमूद अशरफी और लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े हाफिज़ तल्हा सईद की कथित मुलाकात के बाद विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया कि सेना प्रमुख आसिम मुनीर की आलोचना करने वाले जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम (फ) के प्रमुख मौलाना फज़लुर रहमान पर दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है। हालांकि पाकिस्तान की सेना ने इन आरोपों पर आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। विपक्ष ने निष्पक्ष राजनीति की मांग की विपक्षी दलों का कहना है कि पाकिस्तान में लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करने के लिए राजनीतिक गतिविधियों में सैन्य हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। उन्होंने सरकार से इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने और राजनीतिक दलों को स्वतंत्र रूप से काम करने देने की मांग की है। क्षेत्रीय सुरक्षा मुद्दों पर भी सक्रिय हैं आसिम मुनीर इसी बीच, आसिम मुनीर हाल ही में पाकिस्तान दौरे पर आए ईरान के गृह मंत्री एस्कंदर मोमेनी से भी मिले। दोनों नेताओं के बीच सीमा सुरक्षा, आतंकवाद-रोधी सहयोग और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई। यह बैठक ऐसे समय हुई है जब पश्चिम एशिया की सुरक्षा स्थिति लगातार चर्चा में बनी हुई है।
मुजफ्फराबाद, एजेंसियां। पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री और पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (PML-N) के प्रमुख नवाज शरीफ ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) के आगामी चुनावों के बीच बड़ा राजनीतिक बयान दिया है। मुजफ्फराबाद में चुनावी रैली को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि यदि उनकी पार्टी चुनाव जीतती है तो वह प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से उन्हें PoK का प्रधानमंत्री बनाने का अनुरोध करेंगे। उनके इस बयान ने पाकिस्तान की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। AJK चुनाव प्रचार का किया आगाज नवाज शरीफ ने अपनी बेटी और पंजाब की मुख्यमंत्री मरियम नवाज के साथ मुजफ्फराबाद में रैली कर आजाद जम्मू-कश्मीर (AJK) चुनाव अभियान की औपचारिक शुरुआत की। उन्होंने कहा कि यदि PML-N सत्ता में आती है तो क्षेत्र में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और पर्यटन से जुड़ी बड़ी परियोजनाएं शुरू की जाएंगी। विकास के कई वादे किए रैली में नवाज शरीफ ने कहा कि पाकिस्तान के अन्य हिस्सों में मोटरवे और एक्सप्रेसवे बने, लेकिन मुजफ्फराबाद और आसपास के क्षेत्रों में विकास अपेक्षित गति से नहीं हुआ। उन्होंने क्षेत्र में आधुनिक बुनियादी ढांचे के निर्माण का वादा किया। बयान से तेज हुई राजनीतिक बहस नवाज शरीफ के PoK का प्रधानमंत्री बनने संबंधी बयान के बाद पाकिस्तान में राजनीतिक हलकों में बहस तेज हो गई है। विपक्षी दलों ने इसे चुनावी बयान बताया, जबकि PML-N समर्थकों ने इसे क्षेत्र के विकास के प्रति उनकी प्रतिबद्धता बताया। 27 जुलाई से शुरू होंगे चुनाव आजाद जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव 27 जुलाई से चरणबद्ध तरीके से शुरू होने वाले हैं। चुनाव से पहले सभी प्रमुख राजनीतिक दलों ने अपना प्रचार अभियान तेज कर दिया है और PML-N इस चुनाव को अपने लिए अहम मान रही है।
मुजफ्फराबाद: पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (PoJK) में 27 जुलाई को होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक माहौल लगातार तनावपूर्ण होता जा रहा है। संयुक्त अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) ने आर्थिक मुद्दों से शुरू हुए आंदोलन को अब राजनीतिक अधिकारों, स्वशासन और संस्थागत सुधारों की मांग से जोड़ दिया है। संगठन ने चुनावों के बहिष्कार का भी ऐलान किया है, जिससे पाकिस्तान सरकार के सामने नई चुनौती खड़ी हो गई है। महंगाई के विरोध से राजनीतिक आंदोलन तक पहुंचा मामला रिपोर्ट के मुताबिक, JAAC की शुरुआत वर्ष 2023 में बढ़े बिजली बिल, गेहूं की कीमतों और महंगाई के खिलाफ हुई थी। बाद में आंदोलन का दायरा बढ़ा और संगठन ने 38 सूत्रीय मांगपत्र सरकार के सामने रखा। इनमें विधानसभा की आरक्षित 12 शरणार्थी सीटों को समाप्त करने की मांग भी शामिल है। प्रशासन की सख्ती, अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात पाकिस्तान प्रशासन ने जून 2026 में प्रस्तावित 'लॉन्ग मार्च' से पहले 5 जून को JAAC को आतंकवाद-रोधी कानून (Anti-Terrorism Act) के तहत प्रतिबंधित संगठन घोषित कर दिया। इसके बाद कई इलाकों में धारा 144 लागू की गई, इंटरनेट और मोबाइल सेवाएं बंद कर दी गईं तथा करीब 14 हजार अतिरिक्त अर्धसैनिक बल तैनात किए गए। JAAC का आरोप है कि उसके नेताओं और कार्यकर्ताओं पर कार्रवाई की गई। संगठन का दावा है कि उसके नेता उमर नजीर कश्मीरी को निशाना बनाया गया, जबकि इस दौरान उनके सहयोगी शहजैब हबीब की मौत हो गई। प्रतिबंध के बावजूद जारी हैं प्रदर्शन संगठन पर प्रतिबंध के बावजूद भिंबर, मीरपुर, कोटली और रावलाकोट समेत कई इलाकों में विरोध प्रदर्शन जारी हैं। प्रदर्शनकारी लगातार मुजफ्फराबाद की ओर मार्च कर रहे हैं। कई स्थानों पर महिलाओं, बुजुर्गों और युवाओं की भागीदारी भी देखने को मिल रही है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि उन्हें खाद्य सामग्री, दवाइयों और संचार सुविधाओं तक पहुंच में भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। चुनाव बहिष्कार का ऐलान JAAC ने कहा है कि मौजूदा परिस्थितियों में निष्पक्ष चुनाव संभव नहीं हैं। संगठन का कहना है कि जब तक उनकी मांगों पर कार्रवाई नहीं होती, तब तक वे चुनाव प्रक्रिया में हिस्सा नहीं लेंगे। ऐसे में 27 जुलाई को होने वाले चुनावों की निष्पक्षता और विश्वसनीयता को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। विदेशों में भी मिला समर्थन PoJK में चल रहे आंदोलन को विदेशों में रहने वाले कश्मीरी प्रवासियों का भी समर्थन मिल रहा है। ब्रिटेन, कनाडा, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया, डेनमार्क और अमेरिका में प्रदर्शन आयोजित किए गए। 5 जुलाई को लंदन में आयोजित "लंदन लॉन्ग मार्च" में बड़ी संख्या में लोगों ने भाग लेकर पाकिस्तान सरकार की नीतियों के खिलाफ प्रदर्शन किया। पाकिस्तान के दावों पर उठ रहे सवाल PoJK में जारी विरोध प्रदर्शन और सुरक्षा बलों की कार्रवाई के बीच आंदोलनकारी आरोप लगा रहे हैं कि उनकी लोकतांत्रिक मांगों को बल प्रयोग के जरिए दबाया जा रहा है। वहीं, पाकिस्तान की ओर से इन आरोपों पर आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। क्षेत्र में जारी घटनाक्रम को लेकर राजनीतिक तनाव लगातार बना हुआ है।
इस्लामाबाद/मुजफ्फराबाद: पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में सरकार विरोधी आंदोलन के बीच हालात लगातार बिगड़ने के दावे सामने आ रहे हैं। स्थानीय लोगों, ट्रक चालकों और प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि पाकिस्तान प्रशासन ने खाद्य सामग्री, ईंधन और दवाओं की आपूर्ति सीमित कर आंदोलन को कमजोर करने की कोशिश की है। पाकिस्तान सरकार ने इन आरोपों से इनकार किया है, लेकिन विभिन्न मीडिया रिपोर्टों के अनुसार कई इलाकों में आवश्यक वस्तुओं की कमी की शिकायतें बढ़ रही हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के नेतृत्व में चल रहे विरोध प्रदर्शन और बंद के कारण आम लोगों की परेशानियां बढ़ गई हैं। राजधानी मुजफ्फराबाद सहित कई शहरों में बाजार बंद हैं और इंटरनेट सेवाओं में भी रुकावट की खबरें सामने आई हैं। खाद्य सामग्री और दवाओं की कमी का दावा स्थानीय निवासियों का कहना है कि आटा, चावल, दाल, चीनी, दवाइयों और अन्य जरूरी सामान की उपलब्धता लगातार कम होती जा रही है। दूरदराज के इलाकों में रहने वाले लोगों का आरोप है कि राशन डिपो पर कई दिनों तक इंतजार करने के बावजूद उन्हें आवश्यक वस्तुएं नहीं मिल रही हैं, जबकि खुले बाजार में कीमतें तेजी से बढ़ गई हैं। ईंधन संकट से बढ़ी मुश्किलें ईंधन की कमी भी लोगों के लिए बड़ी समस्या बन गई है। कई जिलों में पेट्रोल पंप बंद होने की खबरें हैं। वाहन चालकों का दावा है कि उन्हें ब्लैक मार्केट से ऊंचे दामों पर पेट्रोल खरीदना पड़ रहा है, जिससे आम लोगों और व्यापारियों दोनों की परेशानियां बढ़ गई हैं। जरूरी सामान लाने वालों को रोके जाने के आरोप रिपोर्टों के अनुसार, कई लोग आवश्यक सामान खरीदने के लिए पाकिस्तान के अन्य शहरों जैसे रावलपिंडी और इस्लामाबाद जा रहे हैं। कुछ स्थानीय लोगों का आरोप है कि लौटते समय उन्हें खाद्य सामग्री, दवाइयां और ईंधन लेकर PoK में प्रवेश नहीं करने दिया जा रहा। कुछ लोगों ने यह भी दावा किया कि पुलिस ने चेकपोस्ट पर उनके वाहनों को रोककर सामान वापस ले जाने या फेंकने के लिए दबाव बनाया। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। ट्रकों की आवाजाही प्रभावित होने का दावा स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, आवश्यक वस्तुओं से भरे कई ट्रकों को रास्ते में रोके जाने के कारण सप्लाई प्रभावित हुई है। ट्रक चालकों का कहना है कि कई वाहन घंटों और कुछ मामलों में कई दिनों तक रास्ते में खड़े रहे, जिससे खराब होने वाला सामान भी नुकसान का शिकार हुआ। पाकिस्तान प्रशासन ने आरोपों से किया इनकार पाकिस्तान प्रशासन ने खाद्य सामग्री और ईंधन की आपूर्ति रोकने के आरोपों को खारिज किया है। अधिकारियों का कहना है कि आवश्यक वस्तुओं की सप्लाई सामान्य रूप से जारी है और किसी भी वाहन को जानबूझकर नहीं रोका गया है। कुछ मीडिया रिपोर्टों में यह दावा किया गया है कि आंदोलन को कमजोर करने के लिए प्रशासनिक स्तर पर कुछ रणनीतिक कदम उठाए गए हैं। इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। क्या है पूरे विवाद की वजह? PoK में मौजूदा आंदोलन की शुरुआत विधानसभा की उन 12 आरक्षित सीटों को लेकर हुई, जो भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर से आए शरणार्थियों के लिए निर्धारित हैं। आंदोलनकारी संगठनों का आरोप है कि इन सीटों के जरिए इस्लामाबाद क्षेत्र की राजनीति को प्रभावित करता है। इसी मुद्दे को लेकर ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) ने विरोध प्रदर्शन शुरू किया। बाद में पाकिस्तान सरकार ने JAAC को प्रतिबंधित संगठन घोषित कर उसके समर्थकों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी। आंदोलन के और तेज होने के संकेत रिपोर्टों के अनुसार, PoK के कई शहरों और कस्बों में प्रदर्शन लगातार फैल रहे हैं। आंदोलनकारी संगठन दावा कर रहे हैं कि रावलाकोट में चल रहे धरने में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए हैं। JAAC ने आने वाले दिनों में रावलाकोट से मुजफ्फराबाद तक बड़े मार्च का भी आह्वान किया है। इस बीच क्षेत्र में तनाव बना हुआ है और प्रशासन स्थिति पर लगातार नजर रखे हुए है।
पाकिस्तान के कब्जे वाले गिलगित-बाल्टिस्तान में विधानसभा चुनाव से पहले हिंसा की एक बड़ी घटना सामने आई है। पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (PML-N) की एक चुनावी रैली के दौरान हुई फायरिंग में दो लोगों की मौत हो गई, जबकि दो अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए। घटना के बाद पूरे इलाके में अफरा-तफरी का माहौल बन गया। चुनावी रैली में चली गोलियां मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, गिलगित के तांगीर क्षेत्र में PML-N की चुनावी रैली आयोजित की गई थी। इसी दौरान हवाई फायरिंग की जा रही थी, तभी एक व्यक्ति के हाथ से AK-47 राइफल फिसल गई और गोलियां सीधे भीड़ की ओर चल गईं। पुलिस के मुताबिक, गोली लगने से एक बच्चे की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि तीन अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। सभी घायलों को अस्पताल पहुंचाया गया, जहां इलाज के दौरान एक अन्य व्यक्ति ने दम तोड़ दिया। इस तरह मृतकों की संख्या बढ़कर दो हो गई। वायरल हुआ घटना का वीडियो घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में देखा जा सकता है कि रैली में शामिल एक व्यक्ति राइफल को लोड कर हवा में फायरिंग करता है। कुछ ही क्षण बाद हथियार उसके नियंत्रण से बाहर हो जाता है और गोलियां भीड़ की दिशा में चलने लगती हैं। वीडियो में मौके पर मौजूद लोगों के बीच भगदड़ और अफरा-तफरी भी साफ दिखाई देती है। फुटेज से यह भी संकेत मिलता है कि रैली में एक से अधिक लोगों द्वारा फायरिंग की जा रही थी। पुलिस ने शुरू की जांच स्थानीय पुलिस ने मामले में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। अधिकारियों का कहना है कि घटना के सभी पहलुओं की जांच की जा रही है और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। घटना के बाद क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था भी कड़ी कर दी गई है। पीड़ित परिवारों के लिए सहायता का ऐलान पाकिस्तान सरकार में कश्मीर मामलों के मंत्री अमीर मकाम ने मृतकों और घायलों के परिवारों के लिए आर्थिक सहायता की घोषणा की है। उन्होंने घटना पर दुख व्यक्त करते हुए निष्पक्ष जांच का आश्वासन दिया। 7 जून को होने हैं चुनाव गिलगित-बाल्टिस्तान में 7 जून 2026 को विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। 10 जिलों की 24 सीटों पर मतदान होना है। चुनाव प्रचार के दौरान हुई इस घटना ने सुरक्षा व्यवस्था को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। भारत ने चुनावों को बताया अवैध भारत लगातार कहता रहा है कि गिलगित-बाल्टिस्तान सहित पूरा जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत का अभिन्न हिस्सा है तथा पाकिस्तान का वहां कब्जा अवैध है। इसी कारण भारत ने गिलगित-बाल्टिस्तान में कराए जा रहे चुनावों का विरोध करते हुए कहा है कि ऐसे कदम क्षेत्र की वास्तविक स्थिति को नहीं बदल सकते।
पाकिस्तान की राजनीति में एक बार फिर सियासी तूफान खड़ा हो गया है। जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-फजल (JUI-F) के प्रमुख Maulana Fazlur Rehman ने कराची में आयोजित एक जनसभा में पाकिस्तान की मौजूदा सत्ता व्यवस्था और सेना पर तीखा हमला बोला। उनके बयान को सीधे तौर पर पाकिस्तानी सेना प्रमुख Asim Munir और सत्ता प्रतिष्ठान को चुनौती माना जा रहा है। “अगर मुझे कुछ हुआ तो जिम्मेदार एस्टैब्लिशमेंट होगी” कराची में समर्थकों को संबोधित करते हुए मौलाना फजलुर रहमान ने दावा किया कि उन्हें लगातार धमकी भरे फोन कॉल और पत्र मिल रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि भविष्य में उनके साथ कोई अनहोनी होती है तो इसके लिए पाकिस्तान की “एस्टैब्लिशमेंट” जिम्मेदार होगी। उन्होंने मंच से कहा कि देश में लोकतांत्रिक सरकार नहीं, बल्कि “सिविल-मिलिट्री हाइब्रिड राज” चल रहा है। उनके इस बयान ने पाकिस्तान की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। भारत, अफगानिस्तान और चीन के रिश्तों का भी किया जिक्र मौलाना ने पाकिस्तान की विदेश नीति पर भी सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि मौजूदा नीतियों के कारण पाकिस्तान के भारत और अफगानिस्तान के साथ संबंध खराब हुए हैं, जबकि चीन का भरोसा भी कमजोर पड़ता जा रहा है। उन्होंने कहा कि देश की नीतियां पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग कर रही हैं और इसका खामियाजा आम जनता भुगत रही है। इमरान खान की तरह टकराव? पाकिस्तान में इससे पहले Imran Khan और उनकी पार्टी भी सेना पर राजनीतिक हस्तक्षेप के आरोप लगा चुकी है। अब मौलाना फजलुर रहमान के तेवरों को उसी तरह की नई टकराव की शुरुआत माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान में लंबे समय से विपक्षी दल यह आरोप लगाते रहे हैं कि देश की वास्तविक ताकत सेना के हाथ में है और सरकारें उसी के प्रभाव में काम करती हैं। देशव्यापी आंदोलन का ऐलान मौलाना फजलुर रहमान ने 22 मई से देशव्यापी विरोध आंदोलन शुरू करने की घोषणा भी की। उन्होंने बढ़ती महंगाई, आर्थिक संकट और सरकार की नीतियों को लेकर जनता से सड़क पर उतरने की अपील की। उन्होंने गाजा युद्ध का जिक्र करते हुए मुस्लिम देशों से इजरायल के खिलाफ एकजुट होने की भी मांग की। मौलाना ने दावा किया कि क्षेत्र में इजरायल का प्रभाव बढ़ रहा है और भविष्य में पाकिस्तान भी खतरे का सामना कर सकता है। पाकिस्तान की राजनीति में बढ़ सकती है हलचल मौलाना के इस बयान के बाद पाकिस्तान की राजनीति में नया तनाव पैदा हो गया है। विपक्ष और सत्ता प्रतिष्ठान के बीच टकराव की आशंका फिर बढ़ती दिख रही है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा पाकिस्तान की सियासत में बड़ा विवाद बन सकता है।
मुंबई, एजेंसियां। बॉलीवुड में प्रेम कहानियां हमेशा फेवरेट रही हैं, लेकिन ज्यादातर फिल्मों में प्यार का सफर वहीं खत्म हो जाता है जहां हीरो-हीरोइन एक हो जाते हैं। शादी के बाद क्या होता है, जिम्मेदारियां रिश्ते को कैसे बदल देती हैं और प्यार कब थकने लगता है, इन सवालों से हिंदी सिनेमा अक्सर बचता रहा है। ‘चांद मेरा दिल’ इसी मुश्किल हिस्से को पकड़ने की कोशिश करती है। डायरेक्टर विवेक सोनी की यह फिल्म प्यार को सिर्फ खूबसूरत एहसास की तरह नहीं दिखाती, बल्कि उसके साथ आने वाली उलझनों, गुस्से, टूटन और दोबारा जुड़ने की कोशिशों को भी सामने लाती है। फिल्म कई जगह आपको अपने आसपास के रिश्तों की याद दिलाती है। हालांकि इसकी रफ्तार कुछ हिस्सों में धीमी पड़ती है, लेकिन इमोशनल पकड़ बनी रहती है। कहानी कॉलेज के प्यार से शादी तक और फिर रिश्ते की असली परीक्षाः हैदराबाद के बैकड्रॉप में बनी यह कहानी इंजीनियरिंग स्टूडेंट चांदनी (अनन्या पांडे) और आरव (लक्ष्य) के इर्द-गिर्द घूमती है। आरव पहली नजर में चांदनी पर दिल हार बैठता है। धीरे-धीरे दोस्ती प्यार में बदलती है और दोनों एक-दूसरे की दुनिया बन जाते हैं। कॉलेज रोमांस, लंबी बाइक राइड्स, देर रात की बातें और भविष्य के सपनों के बीच दोनों शादी का फैसला कर लेते हैं। लेकिन, असली कहानी शादी के बाद शुरू होती है। करियर का दबाव, आर्थिक जिम्मेदारियां, परिवार का हस्तक्षेप और रिश्ते में बढ़ती गलतफहमियां दोनों को बदलने लगती हैं। एक ऐसा पल आता है जब आरव का गुस्सा रिश्ते में ऐसी दरार पैदा कर देता है, जहां प्यार से ज्यादा आत्मसम्मान बड़ा सवाल बन जाता है। रिश्ता टूटने की कगार पर पहुंच जाता है। क्या दोनों अपने रिश्ते को दूसरा मौका देंगे या प्यार जिम्मेदारियों के बोझ तले दब जाएगा, यही फिल्म का मूल संघर्ष है। अभिनय अनन्या पांडे ने किया सरप्राइज, लक्ष्य ने दिखाया नया रंगः अगर इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत किसी चीज को कहा जाए, तो वह इसकी एक्टिंग है। अनन्या पांडे ने अपने करियर की अब तक की सबसे संतुलित परफॉर्मेंस दी है। उन्होंने चांदनी के किरदार को सिर्फ एक रोमांटिक लड़की बनाकर नहीं छोड़ा, बल्कि उसकी उलझन, दर्द, असुरक्षा और मजबूती को अच्छे से दिखाया है। कई इमोशनल सीन्स में वह काफी प्रभाव छोड़ती हैं। वहीं लक्ष्य इस फिल्म का बड़ा सरप्राइज हैं। ‘किल’ जैसी एक्शन फिल्म के बाद यहां उनका बेहद संवेदनशील और टूटा हुआ रूप देखने को मिलता है। गुस्से, पछतावे और प्यार के बीच फंसे एक लड़के की बेचैनी उन्होंने अच्छे ढंग से निभाई है। कई जगह उनकी बॉडी लैंग्वेज और इमोशनल सीन आपको बांधे रखते हैं। दोनों कलाकारों की केमिस्ट्री फिल्म का सबसे मजबूत हिस्सा बनकर सामने आती है। कम स्क्रीन टाइम में परेश पाहुजा भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं। निर्देशन और तकनीक रिश्तों की बारीकियों को समझती फिल्म डायरेक्टर विवेक सोनी ने कहानी को जरूरत से ज्यादा फिल्मी बनाने की बजाय उसे जमीन से जोड़े रखने की कोशिश की है। अच्छी बात यह है कि यहां गुस्से को हीरोइज्म की तरह नहीं दिखाया गया। रिश्तों में छोटी गलतियां किस तरह बड़ी दूरी में बदल जाती हैं, फिल्म इसे संवेदनशील तरीके से दिखाती है। कैमरा वर्क खासकर इमोशनल सीक्वेंस में अच्छा लगता है। कुछ सीन की फ्रेमिंग और लाइटिंग कहानी की बेचैनी को और असरदार बनाती है। एडिटिंग पहले हाफ में अच्छी है, लेकिन दूसरे हिस्से में फिल्म थोड़ी लंबी महसूस होने लगती है। फिल्म की कमियां दूसरे हाफ में ढीली पड़ती रफ्तार फिल्म का सबसे कमजोर हिस्सा इसकी लंबाई है। 2 घंटे 26 मिनट का रनटाइम कुछ जगह भारी महसूस होता है। सेकेंड हाफ में कुछ सीन जरूरत से ज्यादा खिंचे लगते हैं और कहानी थोड़ी दोहराव वाली महसूस होती है। हालांकि ये बातें फिल्म के इमोशनल असर को पूरी तरह कमजोर नहीं करतीं। संगीत फिल्म का टाइटल ट्रैक असरदारः सचिन-जिगर का संगीत फिल्म की जान है। गाने कहानी पर बोझ नहीं लगते, बल्कि उसे आगे बढ़ाने का काम करते हैं। टाइटल ट्रैक लंबे समय तक याद रहता है। बैकग्राउंड स्कोर कई इमोशनल पलों को और मजबूत बनाता है और रिश्ते की बेचैनी को महसूस कराता है। फिल्म देखें या नहीं? ‘चांद मेरा दिल’ ऐसी प्रेम कहानी है, जो सिर्फ प्यार में पड़ने की नहीं, प्यार को बचाने की जद्दोजहद दिखाती है। फिल्म पूरी तरह परफेक्ट नहीं है और दूसरे हाफ में थोड़ा खिंचती भी है, लेकिन इसकी ईमानदार कहानी, मजबूत एक्टिंग और रिश्तों की सच्चाई इसे देखने लायक बनाती है। अगर आपको ऐसी फिल्में पसंद हैं जो प्यार की चमक के साथ उसकी थकान भी दिखाएं, तो यह फिल्म एक बार जरूर देखी जा सकती है। रेटिंग: 3/5 स्टार अवधि: 2 घंटे 26 मिनट कास्ट- अनन्या पांडे, लक्ष्य ललवानी डायरेक्टर- विवेक सोनी
Pakistan की राजनीति में पूर्व प्रधानमंत्री Imran Khan की सत्ता से विदाई और सेना प्रमुख Asim Munir के तेजी से उभार को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि यह केवल पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति नहीं, बल्कि वैश्विक भू-राजनीतिक रणनीति का हिस्सा था, जिसमें United States की भूमिका भी चर्चा में है। रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान में सत्ता परिवर्तन की पटकथा काफी पहले लिखी जा चुकी थी और घटनाएं धीरे-धीरे उसी दिशा में बढ़ती गईं। ‘साइफर केस’ से शुरू हुआ विवाद अमेरिकी मीडिया प्लेटफॉर्म Drop Site News की रिपोर्ट में दावा किया गया कि पूरा विवाद एक गोपनीय राजनयिक संदेश यानी “साइफर” से शुरू हुआ। मार्च 2022 में पाकिस्तान के तत्कालीन अमेरिका स्थित राजदूत Asad Majeed Khan ने इस्लामाबाद को एक संदेश भेजा था। रिपोर्ट के अनुसार, इसमें अमेरिकी अधिकारी Donald Lu का कथित बयान शामिल था कि यदि इमरान खान के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव सफल हो जाता है, तो “वॉशिंगटन सब कुछ माफ कर देगा।” इमरान खान ने इसे विदेशी साजिश का प्रमाण बताया था और कई रैलियों में इसे “लंदन प्लान” कहा। अमेरिका से क्यों बिगड़े इमरान के रिश्ते? प्रधानमंत्री बनने के बाद इमरान खान ने धीरे-धीरे अमेरिका से दूरी बनाने वाली विदेश नीति अपनाई। अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे के बाद उन्होंने अमेरिका को सैन्य ठिकाने देने से साफ इनकार कर दिया था। अमेरिकी मीडिया को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा था — “Absolutely Not।” सबसे बड़ा विवाद तब हुआ जब 24 फरवरी 2022 को, रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के दिन, इमरान खान ने Vladimir Putin से मॉस्को में मुलाकात की। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस मुलाकात से वॉशिंगटन बेहद नाराज हुआ। सेना और इमरान खान के बीच बढ़ा टकराव रिपोर्ट में दावा किया गया कि पाकिस्तान की सेना को लगने लगा था कि इमरान खान की नीतियां देश को अमेरिका से दूर कर सकती हैं, जिससे रणनीतिक नुकसान हो सकता है। यहीं से सेना और इमरान खान के बीच तनाव बढ़ने लगा। आसिम मुनीर का उभार कैसे हुआ? रिपोर्ट के अनुसार, 2019 में इमरान खान के ईरान दौरे के दौरान आसिम मुनीर, जो उस समय ISI प्रमुख थे, ने ईरानी अधिकारियों के साथ बेहद सख्त रुख अपनाया था। रिपोर्ट में इसे अमेरिकी रणनीतिक सोच के करीब माना गया, क्योंकि उस समय अमेरिका पाकिस्तान-ईरान संबंधों को मजबूत होते नहीं देखना चाहता था। कुछ समय बाद इमरान खान ने खुद आसिम मुनीर को ISI प्रमुख पद से हटा दिया था। CIA प्रमुख से मिलने से इनकार रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि इमरान खान ने 2021 में William J. Burns से मिलने से इनकार कर दिया था। वह सीधे अमेरिकी राष्ट्रपति Joe Biden से बात करना चाहते थे। हालांकि बाइडेन प्रशासन ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री से संपर्क नहीं किया। अविश्वास प्रस्ताव और सत्ता से बाहर होना अप्रैल 2022 में संसद में अविश्वास प्रस्ताव के जरिए इमरान खान की सरकार गिर गई। तकनीकी रूप से यह संवैधानिक प्रक्रिया थी, लेकिन उनके समर्थकों ने इसे सेना और अमेरिका के बीच समझौते का परिणाम बताया। सरकार गिरने के बाद Pakistan Tehreek-e-Insaf (PTI) पर कार्रवाई शुरू हुई। इमरान खान और उनकी पत्नी Bushra Bibi को जेल भेज दिया गया। यूक्रेन युद्ध के बाद बदला पाकिस्तान का रुख रिपोर्ट में दावा किया गया कि इमरान खान के हटने के बाद पाकिस्तान धीरे-धीरे अमेरिका के करीब आने लगा। इस दौरान पाकिस्तान ने अप्रत्यक्ष रूप से यूक्रेन को हथियार और गोला-बारूद उपलब्ध कराए। साथ ही आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान को International Monetary Fund से राहत पैकेज भी मिला। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद और मजबूत हुए मुनीर आसिम मुनीर नवंबर 2022 में पाकिस्तान के सेना प्रमुख बने। बाद में उनका कार्यकाल 2027 तक बढ़ा दिया गया। रिपोर्ट के अनुसार, मई 2025 में भारत के कथित “ऑपरेशन सिंदूर” के बाद पाकिस्तान में उनकी स्थिति और मजबूत हो गई। इसके बाद उन्हें फील्ड मार्शल बनाया गया और नए बनाए गए चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज (CDF) पद की जिम्मेदारी भी सौंपी गई। अमेरिका, सऊदी अरब और पाकिस्तान की नई रणनीति? रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पाकिस्तान अब Saudi Arabia के साथ सैन्य सहयोग बढ़ा रहा है और आसिम मुनीर विभिन्न संघर्षग्रस्त क्षेत्रों के दौरों में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। साथ ही पाकिस्तान, अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता की संभावनाओं में भी चर्चा में है। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन रिपोर्ट ने पाकिस्तान की राजनीति, सेना और वैश्विक शक्तियों के संबंधों पर नई बहस जरूर छेड़ दी है।
भारत-पाकिस्तान विभाजन के लगभग 80 वर्ष बाद पाकिस्तान के ऐतिहासिक शहर Lahore में एक बड़ा सांस्कृतिक बदलाव देखने को मिल रहा है। शहर की कई सड़कों, चौकों और इलाकों के विभाजन-पूर्व नाम फिर से बहाल किए जा रहे हैं। इनमें हिंदू, सिख, जैन और ब्रिटिश दौर से जुड़े नाम शामिल हैं। पाकिस्तान के पंजाब प्रांत की सरकार ने लाहौर की ऐतिहासिक और बहु-सांस्कृतिक विरासत को पुनर्जीवित करने की दिशा में यह पहल शुरू की है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, पंजाब कैबिनेट ने मुख्यमंत्री Maryam Nawaz की अध्यक्षता में हुई बैठक में पुराने नाम बहाल करने की योजना को मंजूरी दी है। बदले गए कई ऐतिहासिक नाम नई पहल के तहत शहर के कई इलाकों और सड़कों को उनके पुराने नाम वापस दिए जा रहे हैं। उदाहरण के तौर पर: इस्लामपुरा को फिर से कृष्ण नगर नाम दिया गया बाबरी मस्जिद चौक अब दोबारा जैन मंदिर चौक कहलाएगा सुन्नत नगर का नाम बदलकर फिर संत नगर कर दिया गया मुस्तफाबाद अब दोबारा धर्मपुरा बन गया है इसके अलावा कई प्रसिद्ध स्थानों के नाम भी पुराने स्वरूप में लौटाए जा रहे हैं। लक्ष्मी चौक और क्वींस रोड की वापसी लाहौर का मशहूर लक्ष्मी चौक, जिसे पहले मौलाना जफर अली खान चौक कहा जाने लगा था, अब फिर पुराने नाम से पहचाना जाएगा। इसी तरह: सर आगा खान रोड का नाम फिर डेविस रोड किया गया फातिमा जिन्ना रोड फिर क्वींस रोड बन गई लंबे समय से बाग-ए-जिन्ना कहलाने वाला ऐतिहासिक लॉरेंस गार्डन्स भी अपने औपनिवेशिक दौर के नाम से दोबारा जुड़ रहा है “लोगों ने पुराने नाम कभी नहीं भूले” लाहौर के सांस्कृतिक मामलों से जुड़े विशेषज्ञ Kamran Lashari ने कहा कि स्थानीय लोगों ने इन नामों को कभी पूरी तरह भुलाया ही नहीं था। उन्होंने कहा, “दुकानदार, रिक्शा चालक और आम लोग रोजमर्रा की बातचीत में आज भी पुराने नामों का इस्तेमाल करते हैं। लक्ष्मी चौक हमेशा लोगों के लिए लक्ष्मी चौक ही रहा।” उनके अनुसार, यह पहल लाहौर की बहु-स्तरीय पहचान को स्वीकार करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, जिसमें मुस्लिम, हिंदू, सिख, ईसाई और पारसी विरासत सभी शामिल हैं। विभाजन के बाद बदले गए थे नाम 1947 के विभाजन से पहले लाहौर संयुक्त पंजाब की सांस्कृतिक राजधानी माना जाता था। शहर में हिंदू, सिख और मुस्लिम समुदायों की साझा सांस्कृतिक पहचान दिखाई देती थी। लेकिन विभाजन के दौरान हुई हिंसा के बाद बड़ी संख्या में हिंदू और सिख परिवारों को शहर छोड़ना पड़ा। इसके बाद कई इलाकों और ऐतिहासिक स्थलों के नाम बदल दिए गए थे। विरासत संरक्षण पर भी जोर लाहौर में इस समय 100 से अधिक ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण और मरम्मत का काम चल रहा है। इसमें औपनिवेशिक दौर की इमारतों, चर्चों और सिख शासनकाल से जुड़े ढांचों की मरम्मत भी शामिल है। Maharaja Ranjit Singh से जुड़े ऐतिहासिक स्थलों और लाहौर किले में सिख शाही परिवार की अंतिम वंशज Princess Bamba Sutherland की पेंटिंग को भी बहाल किया गया है। नवाज शरीफ की पहल इस विरासत पुनरुद्धार अभियान का नेतृत्व पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री Nawaz Sharif कर रहे हैं। उन्हें लाहौर विरासत क्षेत्र पुनरुद्धार परियोजना का प्रमुख माना जा रहा है। बताया जा रहा है कि उन्होंने पुराने क्रिकेट मैदानों और ऐतिहासिक अखाड़ों को भी दोबारा विकसित करने का प्रस्ताव दिया है। लाहौर की साझा विरासत फिर चर्चा में यह पहल केवल नाम बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि लाहौर की उस साझा सांस्कृतिक पहचान को फिर से सामने लाने की कोशिश है, जो विभाजन के बाद धीरे-धीरे धुंधली पड़ गई थी।
Pakistan के पंजाब प्रांत में अल्पसंख्यक समुदायों की उपेक्षा को लेकर राजनीतिक विवाद गहरा गया है। पंजाब विधानसभा में विधायकों ने सरकार पर आरोप लगाया कि 2025-26 के बजट में चर्चों और मंदिरों के संरक्षण के लिए कोई फंड आवंटित नहीं किया गया, जबकि अल्पसंख्यक बहुल इलाकों के विकास के लिए भी पर्याप्त राशि नहीं रखी गई। सत्तारूढ़ Pakistan Muslim League-Nawaz के सीनेटर Baba Falbus Christopher ने विधानसभा सत्र के दौरान कहा कि पंजाब में चर्चों और मंदिरों की मरम्मत व संरक्षण के लिए “एक भी पैसा” नहीं दिया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि ईसाई बहुल बस्तियों के विकास के लिए भी लगभग कोई बजट नहीं रखा गया। क्रिस्टोफर ने सरकार से मांग की कि 2026-27 के बजट में अल्पसंख्यक समुदायों के धार्मिक स्थलों और बुनियादी सुविधाओं के लिए पर्याप्त फंड आवंटित किया जाए। हिंदू विधायक ने उठाए सवाल वहीं Pakistan Peoples Party के हिंदू विधायक Basro Ji ने कहा कि दक्षिण पंजाब में बड़ी संख्या में हिंदू आबादी रहती है, लेकिन उनके लिए कोई ठोस कल्याणकारी योजना शुरू नहीं की गई। उन्होंने आरोप लगाया कि हिंदू इलाकों के विकास के लिए जो सीमित फंड रखा गया था, उसे बाद में वापस ले लिया गया। इससे समुदाय में नाराजगी बढ़ी है। स्पीकर ने भी जताई चिंता बहस के दौरान पंजाब विधानसभा के स्पीकर Malik Muhammad Ahmad Khan ने अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के कामकाज पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि अल्पसंख्यक समुदाय आज भी: पीने के पानी सफाई स्वास्थ्य सुविधाओं जैसी बुनियादी जरूरतों से वंचित हैं। स्पीकर ने कहा कि विकास निधि का इस्तेमाल सबसे पहले इन जरूरी सुविधाओं पर होना चाहिए। मंत्री रमेश सिंह अरोड़ा की सफाई अल्पसंख्यक मामलों का मंत्रालय संभाल रहे Ramesh Singh Arora ने सरकार का बचाव करते हुए कहा कि अल्पसंख्यकों की समस्याएं 1947 से चली आ रही हैं और उन्हें “रातोंरात खत्म नहीं किया जा सकता।” उन्होंने दावा किया कि Maryam Nawaz सरकार ने पिछले दो वर्षों में अल्पसंख्यक मामलों के विभाग का बजट 300 प्रतिशत तक बढ़ाया है। हालांकि विपक्ष और अल्पसंख्यक प्रतिनिधियों का कहना है कि जमीनी स्तर पर अब भी हालात में ज्यादा सुधार दिखाई नहीं दे रहा। मानवाधिकार संगठनों ने जताई चिंता मानवाधिकार संगठन Minority Rights Group के अनुसार पाकिस्तान में हिंदू, ईसाई, अहमदी, सिख और कलाश जैसे अल्पसंख्यक समुदाय अक्सर गरीबी, भेदभाव और असुरक्षा के माहौल में जीवन बिताते हैं। संगठन का कहना है कि देश की लगभग 4 प्रतिशत आबादी होने के बावजूद इन समुदायों को कई बार “दूसरे दर्जे के नागरिक” जैसा व्यवहार झेलना पड़ता है। लगातार उठते रहे हैं अल्पसंख्यकों से जुड़े मुद्दे पाकिस्तान में लंबे समय से: धार्मिक स्थलों की सुरक्षा जबरन धर्मांतरण सामाजिक भेदभाव सीमित राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों को लेकर सवाल उठते रहे हैं। अब पंजाब विधानसभा में यह मामला जोर-शोर से उठने के बाद सरकार पर अल्पसंख्यकों के लिए ठोस कदम उठाने का दबाव बढ़ सकता है।
Middle East Tension: अमेरिका-ईरान के बीच जारी 14 दिनों के सीजफायर के बीच पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के विवादित बयान ने नया कूटनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। इजराइल ने इस बयान की कड़ी निंदा करते हुए पाकिस्तान की मध्यस्थ भूमिका पर सवाल उठाए हैं। क्या कहा था ख्वाजा आसिफ ने? पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ने सोशल मीडिया पर इजराइल को: “मानवता के लिए अभिशाप” बताया लेबनान में हो रहे हमलों को “नरसंहार” करार दिया गाजा, ईरान और लेबनान में हिंसा का आरोप लगाया उनके बयान के कुछ हिस्सों को लेकर इजराइल ने गंभीर आपत्ति जताई है। इजराइल का सख्त रुख इजराइल के प्रधानमंत्री कार्यालय ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा: “इजराइल के विनाश की बात करना बेहद आपत्तिजनक है” “ऐसे बयान किसी भी सरकार से स्वीकार्य नहीं हैं, खासकर उस देश से जो खुद को शांति का मध्यस्थ बताता है” इस बयान के बाद पाकिस्तान की तटस्थता पर सवाल उठने लगे हैं। विदेश मंत्री की भी कड़ी प्रतिक्रिया इजराइल के विदेश मंत्री गिदोन सआर ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी: बयान को यहूदी-विरोधी और भ्रामक बताया कहा कि इजराइल अपनी सुरक्षा के लिए हर कदम उठाएगा शांति वार्ता पर असर? यह बयानबाजी ऐसे समय में सामने आई है जब: अमेरिका और ईरान के बीच 14 दिन का सीजफायर लागू है पाकिस्तान में संभावित शांति वार्ता की तैयारी चल रही है ऐसे में पाकिस्तान-इजराइल के बीच बढ़ती बयानबाजी से कूटनीतिक माहौल और तनावपूर्ण हो सकता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।