पाकिस्तान के सबसे बड़े और प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध प्रांत बलूचिस्तान को लेकर एक बार फिर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में जारी विरोध प्रदर्शनों के बीच अब बलूचिस्तान से जुड़े एक संगठन ने 11 अगस्त को अपना 'स्वतंत्रता दिवस' मनाने का ऐलान किया है। संगठन ने दुनिया भर में रहने वाले बलूच समुदाय से इस दिन बड़े पैमाने पर कार्यक्रम आयोजित करने और कथित स्वतंत्र बलूचिस्तान का झंडा फहराने की अपील की है।
साथ ही, संगठन ने संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से बलूचिस्तान को एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र के रूप में मान्यता देने की मांग भी दोहराई है।
रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान से जुड़े नेताओं का दावा है कि 11 अगस्त 1947 को, ब्रिटिश शासन समाप्त होने से ठीक पहले, तत्कालीन कलात रियासत ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित किया था। संगठन का कहना है कि बाद में बलूचिस्तान को पाकिस्तान में शामिल होने के लिए मजबूर किया गया।
हालांकि, पाकिस्तान इस दावे को स्वीकार नहीं करता और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बलूचिस्तान को पाकिस्तान का ही हिस्सा माना जाता है। इसलिए संगठन का यह दावा उसकी अपनी राजनीतिक स्थिति को दर्शाता है, न कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त तथ्य को।
बलूच आंदोलन से जुड़े नेता मीर यार बलोच ने विभिन्न देशों में रहने वाले बलूच समुदाय से 11 अगस्त को अपने घरों, बाजारों, शैक्षणिक संस्थानों और सार्वजनिक स्थानों पर कथित स्वतंत्र बलूचिस्तान का झंडा फहराने की अपील की है।
उन्होंने कहा कि अब हर वर्ष 11 अगस्त को बलूचिस्तान का स्वतंत्रता दिवस मनाया जाएगा। उनका दावा है कि यह दिन बलूच पहचान और आत्मनिर्णय के अधिकार का प्रतीक है।
यह घोषणा ऐसे समय में आई है, जब कुछ सप्ताह पहले भी रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान से जुड़े नेताओं ने खुद को पाकिस्तान से स्वतंत्र घोषित करने का दावा किया था।
हालांकि:
संगठन का कहना है कि जब तक बलूचिस्तान को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता नहीं मिलती, तब तक क्षेत्र में स्थायी शांति और विकास संभव नहीं होगा। उसने संयुक्त राष्ट्र और अन्य देशों से बलूचिस्तान के आत्मनिर्णय के अधिकार का समर्थन करने की अपील की है।
संगठन का यह भी दावा है कि दुनिया भर में रहने वाले करोड़ों बलूच स्वयं को एक अलग राष्ट्र का नागरिक मानते हैं। हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान ने 8 फरवरी 2026 को एक अंतरिम संविधान जारी करने का भी दावा किया था। संगठन के अनुसार, इस दस्तावेज का उद्देश्य एक धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और समान अधिकारों वाले गणराज्य की रूपरेखा प्रस्तुत करना है।
मीर यार बलोच ने उस समय कहा था कि यह संविधान वर्षों से संघर्ष कर रहे बलूच लोगों की आकांक्षाओं का प्रतीक है और दुनिया के सामने यह संदेश देता है कि बलूचिस्तान लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार पर आगे बढ़ना चाहता है।
बलूचिस्तान में लंबे समय से अलगाववादी गतिविधियां और सुरक्षा बलों के साथ संघर्ष जारी है। वहीं पाकिस्तान सरकार का कहना है कि वह प्रांत में कानून-व्यवस्था बनाए रखने और विकास कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है। दूसरी ओर, अलगाववादी संगठन लगातार राजनीतिक अधिकारों और स्वतंत्रता की मांग उठाते रहे हैं।
ऐसे में 11 अगस्त को प्रस्तावित 'स्वतंत्रता दिवस' कार्यक्रम को लेकर एक बार फिर बलूचिस्तान का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय चर्चा में आ सकता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
यमन के तट के पास लाल सागर (Red Sea) में भारतीय ध्वज वाले मालवाहक जहाज MSV Faize Noore Oliya पर हुए हमले के बाद जहाज डूब गया। राहत की बात यह रही कि जहाज पर सवार 13 भारतीय नागरिकों समेत सभी 14 चालक दल के सदस्यों को सुरक्षित बचा लिया गया। इस घटना के बाद भारत सरकार ने हमले की कड़ी निंदा करते हुए समुद्री व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की है। कैसे हुआ हमला? केंद्रीय बंदरगाह, पोत परिवहन एवं जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने बताया कि भारतीय ध्वज वाला यह मालवाहक जहाज यमन के समुद्री क्षेत्र के पास एक प्रोजेक्टाइल (गोला या मिसाइल जैसे हथियार) की चपेट में आ गया, जिसके बाद जहाज गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हुआ और अंततः डूब गया। हालांकि, घटना को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए हैं। यमन सरकार समर्थित नेशनल रेजिस्टेंस फोर्सेज का कहना है कि जहाज पर पश्चिमी तट के पास विस्फोटकों से भरी एक नाव के जरिए हमला किया गया। फिलहाल हमले के सटीक तरीके की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। भारत ने जताया कड़ा विरोध विदेश मंत्रालय (MEA) ने इस घटना की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि 4 अगस्त 2026 को यमन तट के पास भारतीय व्यापारिक जहाज पर हुआ हमला पूरी तरह अस्वीकार्य है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों पर व्यापारिक जहाजों को निशाना बनाना तत्काल बंद होना चाहिए और समुद्री आवाजाही की सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए। वहीं केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने इसे "निहत्थे व्यापारिक जहाज पर उकसावे वाला हमला" बताते हुए दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। सभी चालक दल के सदस्य सुरक्षित जहाज पर कुल 14 चालक दल के सदस्य मौजूद थे, जिनमें: 13 भारतीय नागरिक 1 यमन का नागरिक शामिल थे। यमन की नौसेना और तटरक्षक बल ने संयुक्त बचाव अभियान चलाकर सभी को सुरक्षित निकाल लिया और उन्हें मोखा (Mocha) बंदरगाह पहुंचाया। विदेश मंत्रालय ने बताया कि सऊदी अरब स्थित भारतीय दूतावास लगातार बचाए गए भारतीय नाविकों के संपर्क में है और हरसंभव सहायता उपलब्ध करा रहा है। पश्चिम एशिया में बढ़ता समुद्री संकट भारत सरकार ने कहा कि पश्चिम एशिया में हाल के दिनों में व्यापारिक जहाजों पर बढ़ते हमले गंभीर चिंता का विषय हैं। इन घटनाओं से वैश्विक व्यापार और समुद्री सुरक्षा दोनों प्रभावित हो रहे हैं। सरकार ने सभी पक्षों से अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन करने और समुद्री मार्गों को सुरक्षित बनाए रखने की अपील की है। अब तक 16 भारतीयों की हो चुकी है मौत सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के दौरान अब तक 16 भारतीय नागरिकों की जान जा चुकी है। इनमें: 10 भारतीय नाविक, जो क्षेत्र में हुए समुद्री हमलों में मारे गए। 5 अन्य भारतीय नाविक, जिनकी रूस-यूक्रेन संघर्ष के दौरान ब्लैक सी (काला सागर) में व्यापारी जहाजों पर हुए हमलों में मौत हुई। अन्य एक भारतीय की भी संघर्ष से जुड़ी घटनाओं में मृत्यु हुई है। क्यों बढ़ा लाल सागर में खतरा? लाल सागर और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्गों में शामिल हैं। इसी रास्ते से यूरोप, एशिया और मध्य पूर्व के बीच बड़ी मात्रा में व्यापार होता है। पिछले महीने ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के खिलाफ "नौसैनिक नाकेबंदी" की घोषणा की थी, जिसमें बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य भी शामिल है। इसके बाद से इस क्षेत्र में व्यापारिक जहाजों पर हमलों का खतरा लगातार बढ़ गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि लाल सागर में सुरक्षा स्थिति नहीं सुधरी, तो इसका असर वैश्विक सप्लाई चेन, तेल परिवहन और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी पड़ सकता है।
बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना आज (5 अगस्त 2026) एक साल बाद पहली बार मीडिया को संबोधित करने जा रही हैं। उनकी पार्टी बांग्लादेश आवामी लीग ने घोषणा की है कि वह शाम को एक वर्चुअल प्रेस कॉन्फ्रेंस करेंगी। माना जा रहा है कि इस दौरान वह अपनी संभावित बांग्लादेश वापसी, भविष्य की राजनीतिक रणनीति और मौजूदा हालात पर बड़ा बयान दे सकती हैं। पार्टी के मुताबिक यह प्रेस कॉन्फ्रेंस बांग्लादेशी समयानुसार शाम 6:30 बजे और भारतीय समयानुसार शाम 6:00 बजे शुरू होगी। इसमें बांग्लादेश के साथ-साथ दुनिया भर के मीडिया संगठनों के पत्रकारों को शामिल होने का निमंत्रण दिया गया है। देश वापसी पर हो सकता है बड़ा ऐलान आवामी लीग ने अपने आधिकारिक बयान में कहा है कि शेख हसीना प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान बांग्लादेश लौटने को लेकर महत्वपूर्ण घोषणा कर सकती हैं। हालांकि, पार्टी ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि वह वापसी की कोई निश्चित तारीख बताएंगी या केवल अपनी राजनीतिक योजना साझा करेंगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह संबोधन बांग्लादेश की मौजूदा राजनीति पर बड़ा असर डाल सकता है, क्योंकि शेख हसीना पिछले एक वर्ष से सार्वजनिक रूप से मीडिया के सामने नहीं आई हैं। क्यों अहम है यह प्रेस कॉन्फ्रेंस? यह प्रेस कॉन्फ्रेंस इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि 5 अगस्त 2024 को बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन और व्यापक विरोध प्रदर्शनों के बाद शेख हसीना को प्रधानमंत्री पद छोड़कर देश से बाहर जाना पड़ा था। उसके बाद यह पहला अवसर होगा जब वह सीधे मीडिया और जनता को संबोधित करेंगी। उम्मीद की जा रही है कि अपने संबोधन में वह: बांग्लादेश की मौजूदा राजनीतिक स्थिति पर अपनी राय रखेंगी। आवामी लीग की आगे की रणनीति बताएंगी। देश वापसी को लेकर अपना रुख स्पष्ट करेंगी। समर्थकों के लिए राजनीतिक संदेश भी दे सकती हैं। भारत क्यों आई थीं शेख हसीना? शेख हसीना 5 अगस्त 2024 को बांग्लादेश छोड़कर भारत आई थीं। उस समय सरकारी नौकरियों में आरक्षण (कोटा) व्यवस्था के विरोध में शुरू हुआ छात्र आंदोलन धीरे-धीरे सरकार विरोधी व्यापक प्रदर्शन में बदल गया था। देशभर में हिंसा और राजनीतिक संकट बढ़ने के बाद उन्होंने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और सैन्य हेलीकॉप्टर से ढाका छोड़कर भारत पहुंचीं। इसके बाद से वह भारत में रह रही हैं। बांग्लादेश की राजनीति पर रहेगी नजर शेख हसीना की प्रेस कॉन्फ्रेंस ऐसे समय हो रही है जब बांग्लादेश की राजनीति में लगातार बदलाव देखने को मिल रहे हैं। उनकी संभावित वापसी को लेकर लंबे समय से अटकलें लगाई जा रही हैं। ऐसे में आज का उनका संबोधन न केवल आवामी लीग, बल्कि पूरे बांग्लादेश के राजनीतिक परिदृश्य के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अब सभी की नजर इस बात पर है कि क्या शेख हसीना वास्तव में अपनी देश वापसी की घोषणा करती हैं या फिर भविष्य की राजनीतिक रणनीति का केवल खाका पेश करती हैं।
विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (Foreign Contribution Regulation Act - FCRA) में प्रस्तावित संशोधनों को लेकर देश और विदेश दोनों जगह बहस तेज हो गई है। संसद में इस विधेयक पर चर्चा के बीच अमेरिका के रिपब्लिकन सांसद रिले मूर ने भारत सरकार के प्रस्तावित बदलावों पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि नए प्रावधानों से सरकार को चर्चों और धार्मिक संस्थाओं के कामकाज तथा उनकी संपत्तियों पर अधिक नियंत्रण मिल सकता है। मूर ने इसे ईसाई समुदाय के लिए चिंता का विषय बताते हुए कहा कि यदि यह विधेयक मौजूदा स्वरूप में पारित होता है, तो इसका असर भारत-अमेरिका द्विपक्षीय संबंधों पर भी पड़ सकता है। सोशल मीडिया पर रिले मूर ने क्या कहा? अमेरिकी सांसद रिले मूर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर भारत में ईसाई समुदाय के लंबे इतिहास का जिक्र करते हुए कहा कि संत थॉमस के मालाबार तट पर आने के बाद से भारत में ईसाई धर्म की मजबूत मौजूदगी रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि FCRA में प्रस्तावित संशोधन सरकार को चर्चों और धार्मिक चैरिटी संस्थाओं से जुड़ी संपत्तियों और उनके प्रबंधन में हस्तक्षेप करने की शक्ति दे सकते हैं। मूर ने अपने बयान में कहा कि यह सिर्फ प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि ईसाई समुदाय के अधिकारों से जुड़ा गंभीर मुद्दा है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि यह कानून इसी स्वरूप में लागू होता है तो यह भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय संबंधों में भी चिंता का कारण बन सकता है। क्या है FCRA कानून? विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA) भारत में उन संस्थाओं को नियंत्रित करता है जो विदेशों से आर्थिक सहायता या चंदा प्राप्त करती हैं। यह कानून गैर-सरकारी संगठनों (NGO), धार्मिक ट्रस्टों, शैक्षणिक संस्थानों, सामाजिक संगठनों और अन्य गैर-लाभकारी संस्थाओं पर लागू होता है। मौजूदा नियमों के अनुसार विदेशी चंदा प्राप्त करने के लिए किसी भी संस्था को केंद्रीय गृह मंत्रालय से FCRA पंजीकरण कराना अनिवार्य होता है। यह पंजीकरण पांच वर्षों के लिए मान्य रहता है और इसके बाद नवीनीकरण कराना पड़ता है। प्रस्तावित संशोधनों में क्या बदलाव होंगे? सरकार ने FCRA में कई महत्वपूर्ण बदलाव प्रस्तावित किए हैं। सबसे अहम प्रस्ताव एक 'नामित प्राधिकरण' (Designated Authority) के गठन का है। यदि किसी संस्था का FCRA पंजीकरण रद्द हो जाता है, उसकी अवधि समाप्त हो जाती है या संस्था स्वयं अपना पंजीकरण वापस लेती है, तो यह नामित प्राधिकरण विदेशी चंदे और उससे अर्जित संपत्तियों का प्रबंधन संभाल सकेगा। इसके अलावा प्रस्तावित संशोधनों में कई नई शर्तें भी जोड़ी गई हैं। प्रमुख प्रस्तावित बदलाव संस्था को पंजीकरण के समय अपने कार्य का स्पष्ट उद्देश्य बताना होगा। जिन राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों में संस्था कार्य करेगी, उनका उल्लेख अनिवार्य होगा। संस्था को निर्धारित श्रेणियों में से अपने कार्य क्षेत्र का चयन करना होगा। FCRA पंजीकरण के नवीनीकरण के लिए पिछले दो वर्षों में कम-से-कम 10 लाख रुपये के विदेशी अंशदान के उपयोग का विवरण देना होगा। विदेशी धन किस परियोजना और किस गतिविधि पर खर्च किया गया, इसका पूरा ब्यौरा देना होगा। विदेशी अंशदान देने वाले वास्तविक (Ultimate Beneficial Donor) दाता की पहचान बताना अनिवार्य होगा। संस्था को अपनी वेबसाइट और सभी सोशल मीडिया खातों का विवरण भी वार्षिक रिपोर्ट में देना होगा। सबसे ज्यादा विवाद किस प्रावधान पर? विवाद का सबसे बड़ा कारण नामित प्राधिकरण को मिलने वाले अधिकार हैं। विपक्षी दलों, कई गैर-सरकारी संगठनों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों का कहना है कि इससे केंद्र सरकार को विदेशी सहायता प्राप्त संस्थाओं पर अत्यधिक प्रशासनिक नियंत्रण मिल जाएगा। धार्मिक संगठनों की चिंता है कि यदि किसी चर्च, ट्रस्ट या संस्था का FCRA पंजीकरण रद्द हो जाता है या उसका नवीनीकरण नहीं होता, तो विदेशी सहायता से संचालित स्कूल, अस्पताल, अनाथालय, सामाजिक सेवा केंद्र और अन्य संपत्तियां सरकारी प्रबंधन में जा सकती हैं। सरकार का क्या कहना है? केंद्र सरकार ने इन आशंकाओं को खारिज करते हुए कहा है कि प्रस्तावित संशोधनों का उद्देश्य किसी संस्था या धार्मिक समुदाय को निशाना बनाना नहीं है। सरकार के अनुसार इन बदलावों का मकसद विदेशी धन के उपयोग में पारदर्शिता बढ़ाना, जवाबदेही सुनिश्चित करना और धन के दुरुपयोग को रोकना है। सरकार का कहना है कि विदेशी सहायता का उपयोग केवल उसी उद्देश्य के लिए हो, जिसके लिए उसे अनुमति दी गई है, इसलिए निगरानी व्यवस्था को मजबूत करना आवश्यक है। संसद में जारी है बहस FCRA संशोधन विधेयक पर संसद में चर्चा जारी है। एक ओर सरकार इसे विदेशी फंडिंग व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाने वाला सुधार बता रही है, वहीं विपक्ष, कई सामाजिक संगठनों और धार्मिक संस्थाओं का कहना है कि कुछ प्रावधानों की समीक्षा की जानी चाहिए ताकि वैध संस्थाओं के कामकाज पर अनावश्यक प्रशासनिक हस्तक्षेप न हो। इसी बीच अमेरिकी सांसद रिले मूर की टिप्पणी ने इस बहस को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बना दिया है।